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नीट धांधली पर पीएम मोदी की खामोशी से फूटा भीषण जनाक्रोश और सड़कों पर संग्राम

लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोलों और सड़कों पर बहे खून के बीच देश के सबसे बड़े नीट परीक्षा विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खामोशी पर उबला जनता का गुस्सा, विपक्ष ने दागे तीखे सवाल।

नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव कहे जाने वाले संवाद की डोर आज देश के सर्वोच्च प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में पूरी तरह टूटती हुई नजर आ रही है। राजधानी दिल्ली की सड़कों से लेकर देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद भवन के प्रांगण तक जो अप्रत्याशित, खौफनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाले दृश्य दिखाई दिए हैं, उन्होंने आजाद भारत के पिछले पांच दशकों के राजनीतिक इतिहास को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) के प्रश्नपत्र लीक मामले और लाखों होनहार युवाओं के भविष्य के साथ हुए खिलवाड़ के खिलाफ उपजे भयानक जनाक्रोश ने आज एक विकराल राष्ट्रीय जन-आंदोलन का रूप धारण कर लिया। राजधानी के चप्पे-चप्पे पर टूटे हुए लोहे के बैरिकेड्स, हवा में लगातार लहराती पुलिस की कठोर लाठियां, चारों तरफ गूंजते और आंखों को अंधा कर देने वाले आंसू गैस के गोले, खून से लथपथ होकर सड़कों पर तड़पते बेबस छात्र और बदहवास इधर-उधर दौड़ते पुलिसकर्मियों की भयावह तस्वीरें किसी भी संवेदनशील और जीवंत लोकतांत्रिक देश की आत्मा को कंपाने के लिए काफी हैं। संसद के नए, अति-आधुनिक और अति-सुरक्षित भवन की ऊंची दीवारों के ठीक बाहर उपजी इस अभूतपूर्व अफरातफरी, लाठीचार्ज और अराजकता की स्थिति ने आम देशवासियों को नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश के उन ऐतिहासिक जन-विद्रोहों की याद दिला दी, जब जनता का सब्र का बांध टूटा था और उबलता हुआ गुस्सा सीधे शासन की व्यवस्थागत प्राचीरों से जा टकराया था।

संसद भवन की नई इमारत भले ही वास्तुशिल्प का अद्भुत नमूना हो और उसकी दीवारें भले ही अभेद्य बनाई गई हों, लेकिन आज सड़कों पर उतरे उग्र जनसैलाब ने यह निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया कि लोकतंत्र में यदि जनता की आवाज को जानबूझकर दबाया जाएगा तो वह आवाज सड़क के रास्ते से होती हुई संसद के मुख्य द्वार तक जरूर पहुंचेगी। इतने विशाल राष्ट्रव्यापी जनआंदोलन, चारों तरफ फैली अराजकता, मेट्रो से लेकर सड़कों तक मचे घमासान और दर्जनों मासूम अभ्यर्थियों के घायल होने के बावजूद देश के सर्वोच्च नेतृत्व की ओर से साधी गई चुप्पी अत्यंत चिंताजनक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साहब स्वयं संसद के भीतर मौजूद थे और उन्हें इस पूरी स्थिति की पल-पल की जानकारी थी, परंतु इस राष्ट्रव्यापी जन-असंतोष और युवाओं के उबलते गुस्से पर कोई ठोस आश्वासन देने या देश को संबोधित करने के बजाय वे विपक्षी दल के नेता राहुल गांधी की उम्र पर व्यंग्य कसते नजर आए। 56 साल के नौजवान और 28 साल की उम्र जैसे तंज कसकर वे सदन से बाहर निकल गए, जिसने देश के पीड़ित युवाओं के जले पर नमक छिड़कने का काम किया। आज देश का हर नागरिक यह यक्ष प्रश्न पूछ रहा है कि आखिर हर संवेदनशील और गंभीर राष्ट्रीय संकट के मौके पर देश के प्रधान का इस तरह पूरी तरह मौन धारण कर लेना किस प्रकार की शासन शैली का परिचायक है?

यदि इस पूरे घटनाक्रम की ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में निष्पक्ष तुलना की जाए तो 2014 से पूर्व के दशक में जब मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे, तब उन्हें 2G स्पेक्ट्रम घोटाला, कोयला आवंटन विवाद और राष्ट्रमंडल खेलों में हुए भ्रष्टाचार जैसे विशाल घोटालों पर शांत रहने के कारण ‘मौन मोहन सिंह’ कहकर पुकारा जाता था और पूरे देश में उनका मजाक उड़ाया जाता था। उस दौर में भारतीय जनता पार्टी और स्वयं नरेंद्र मोदी साहब हर मंच और रैली से यह तीखा सवाल उठाते थे कि आखिर देश का प्रधानमंत्री देश की जलती हुई समस्याओं पर अपना मुंह क्यों नहीं खोलता। परंतु आज जब हम और आप सन् 2026 के दौर में खड़े हैं, तो 12 साल का एक लंबा कार्यकाल बीत जाने के बाद भी देश के हालात बिल्कुल नहीं बदले हैं, केवल मंच के किरदार और नाम बदल गए हैं। बीते 12 वर्षों के लंबे शासनकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साहब ने एक भी ऐसी खुली, निष्पक्ष और बिना किसी पूर्व-निर्धारित पटकथा वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस को अकेले संबोधित नहीं किया है जहां देश के पत्रकार सीधे सवाल पूछ सकें। मई 2019 में चुनाव खत्म होने के बाद बीजेपी मुख्यालय में हुई एकमात्र प्रेस वार्ता में भी वे केवल मूकदर्शक बनकर बैठे रहे और संवाद का सारा जिम्मा गृह मंत्री अमित शाह साहब ने संभाला था, जहां उन्होंने स्वयं को पार्टी का एक अनुशासित सिपाही बताकर उत्तर देने से पल्ला झाड़ लिया था।

दुनिया के सबसे बड़े और जीवंत लोकतंत्र में शासन के इस तरह के संवादहीन मॉडल को अत्यंत खतरनाक और अप्रत्याशित माना जा रहा है। यदि हम विश्व के अन्य विकसित और मजबूत लोकतांत्रिक देशों का अध्ययन करें, तो ब्रिटेन में चाहे प्रधानमंत्री किसी भी राजनीतिक दल का हो, उसे हर सप्ताह संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स में खड़े होकर बिना किसी पूर्व तैयारी के विपक्ष के सीधे, तीखे और कड़वे सवालों का तात्कालिक उत्तर देना पड़ता है और यह स्वस्थ परंपरा विंस्टन चर्चिल के जमाने से लेकर आज तक बदस्तूर जारी है। अमरीका में भी राष्ट्रपति को श्वेत भवन के प्रेस कक्ष में अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के हर प्रकार के चुभते प्रश्नों का निडरता से सामना करना अनिवार्य होता है, जहां चुप रहने का कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है। यहां तक कि भारत के अपने गौरवशाली इतिहास में पंडित जवाहरलाल नेहरू, भारतीय जनता पार्टी के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी साहब और स्वयं मनमोहन सिंह साहब जैसे पूर्व प्रधानमंत्रियों ने भी हमेशा मीडिया के तीखे बाण सहे और प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कीं। मनमोहन सिंह साहब ने तो अपने कार्यकाल के अंतिम क्षणों में जनवरी 2014 में सैकड़ों निर्भीक पत्रकारों के बीच बैठकर ऐतिहासिक विदाई प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी और कहा था कि इतिहास उनके साथ इंसाफ करेगा।

वर्तमान में NEET परीक्षा की धांधली और भ्रष्टाचार को लेकर देश का युवा पूरी तरह मानसिक और भावनात्मक रूप से टूट चुका है और सड़कों पर उतरकर लाठियां खाने को मजबूर हुआ है। 3 मई 2026 को देश के 551 शहरों में 22 लाख से अधिक गरीब, मजदूर और मध्यमवर्गीय मेधावी बच्चों ने दिन-रात एक करके, अपने माता-पिता के गहने गिरवी रखकर और कोचिंग का भारी कर्ज उठाकर डॉक्टर बनने का सपना देखा था। लेकिन 12 मई को जब अचानक यह खबर आई कि परीक्षा का पर्चा हफ्ते भर पहले से ही बाजार में खुलेआम बिक रहा था, तो लाखों परिवारों की उम्मीदों पर पानी फिर गया। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की इस शर्मनाक नाकामी और उसकी प्रशासनिक कमांड चेन में लगी भयानक सेंध की बात खुद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार की है। इसके बावजूद जब पीड़ित छात्र पुनः परीक्षा और निष्पक्ष जांच की न्यायसंगत मांग को लेकर जंतर-मंतर पर एकत्र हुए, तो उन्हें दिलासा देने के बजाय उन पर बर्बरतापूर्वक लाठियां बरसाई गईं। 21 जून को टेलीग्राम ऐप ब्लॉक करके और लीक रोकने की तमाम कोशिशों के साथ री-एग्जाम तो कराया गया, परंतु देश के शीर्ष नेता ने इस पूरे संकट पर देश के नाम एक शब्द भी बोलना उचित नहीं समझा।

यदि बीते सात वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के 15 राज्यों में 70 से अधिक छोटी-बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक हो चुके हैं, जिससे करीब डेढ़ करोड़ से अधिक होनहार युवाओं का भविष्य पूरी तरह से अंधकारमय हो चुका है। 2024 के नीट विवाद से लेकर 2026 तक का यह दुखद सिलसिला केवल प्रशासनिक नाकामी नहीं, बल्कि एक विशाल और संगठित आपराधिक धंधा बन चुका है। “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा” का बुलंद नारा देकर देश की सत्ता में आई सरकार आज अपने ही वादे के कटघरे में खड़ी नजर आ रही है। यदि यह मान भी लिया जाए कि प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से पूरी तरह ईमानदार हैं और एक पैसे की चोरी नहीं करते, तो भी तंत्र में व्याप्त इस भयानक भ्रष्टाचार पर अंकुश न लगा पाना और लगातार चुप्पी साधे रखना उनकी नैतिक और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है। जब उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान या बंगाल जैसे राज्यों से लाखों युवा अपने खून-पसीने की कमाई और सपनों को इस प्रशासनिक नाकामी की बलि चढ़ते देखते हैं, तो उनका पूरी शासन व्यवस्था पर से भरोसा उठ जाता है।

समीक्षकों और सरकार के समर्थकों द्वारा अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि इस पूरे आंदोलन के मंच पर भीम आर्मी, आइसा, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और तमाम वामपंथी राजनीतिक दलों के झंडे लहरा रहे थे और यह सब सरकार को घेरने की एक पूर्व-नियोजित राजनीतिक साजिश है। परंतु सत्ताधीशों को यह गहराई से समझना होगा कि किराए पर बुलाई गई भीड़ तो शाम होते ही अपने-अपने घरों को लौट जाती है, लेकिन जो जनता और अभ्यर्थी हफ्तों तक आंसू गैस और पुलिस की लाठियां सहकर सड़कों पर डटे रहते हैं, उनका दर्द असली और बेहद गहरा होता है। राजनीति हमेशा वहीं पनपती है जहां जन-आक्रोश की आग पहले से सुलग रही हो। यदि केंद्र सरकार वास्तव में संवेदनशील होती तो केवल दो कुर्सी और एक मेज लगाकर आंदोलित छात्रों के प्रतिनिधियों से सीधी वार्ता कर सकती थी। लाठियों, आंसू गैस, पुलिस बल और अभेद्य बैरिकेडिंग पर करोड़ों रुपये का खर्चा उठाने से कहीं ज्यादा आसान और सस्ता रास्ता संवाद का था। इतिहास गवाह है कि ब्रिटिश हुकूमत के दौर में जब महात्मा गांधी सड़क पर उतरते थे, तब क्रूर फिरंगी वायसराय लॉर्ड इरविन भी गांधीजी को वार्ता की मेज पर बैठाकर समझौता करने को बाध्य होता था। फिर आज आजाद भारत की चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार अपने ही देश के नौजवानों से बात करने में इतनी हिचकिचाहट और झिझक क्यों दिखा रही है?

मणिपुर में महीनों तक फैली भयानक जातीय हिंसा हो, सीमा पर एक साल से अधिक चला ऐतिहासिक किसान आंदोलन हो, अग्निपथ योजना का देशव्यापी विरोध हो, या फिर 2023 में जंतर-मंतर पर न्याय की भीख मांगती देश की ओलंपिक पदक विजेता पहलवान बेटियां हों—हर बड़े राष्ट्रीय संकट के समय सत्ता के शीर्ष स्तर से केवल एक रहस्यमयी और पीड़ादायक खामोशी ही देखने को मिली है। जब खिलाड़ी देश के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मेडल लाते हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साहब उन्हें अपने सरकारी आवास पर बुलाकर बधाई देते हैं, चाय पिलाते हैं और फोटो खिंचवाते हैं। परंतु जब वही देश की बेटियां इंसाफ के लिए सड़क पर घसीटी जाती हैं या छात्र अपने हक के लिए खून बहाते हैं, तो सरकार का तंत्र उन्हें विरोधी और देशद्रोही घोषित कर देता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी साहब हमेशा कहा करते थे कि सरकारें आएंगी और जाएंगी, पार्टियां बनेंगी और बिगड़ेंगी, लेकिन इस देश का लोकतंत्र और इसकी जनता का विश्वास हमेशा अक्षुण्ण रहना चाहिए।

यदि सरकार वास्तव में इस सुलगते हुए जनाक्रोश को शांत करना चाहती है और देश के माहौल को सही दिशा देना चाहती है, तो उसे तत्काल प्रभाव से तीन ठोस, क्रांतिकारी और पारदर्शी कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साहब को स्वयं आगे आकर आंदोलित छात्र प्रतिनिधियों से सीधे मेज पर बैठकर वार्ता करनी चाहिए, ताकि देश के करोड़ों युवाओं का टूटता हुआ भरोसा वापस बहाल हो सके। दूसरा, NEET पेपर लीक मामले की पूरी सच्चाई, आंतरिक जांच समितियों की सिफारिशों और दोषियों पर की गई कार्रवाई पर एक विस्तृत ‘श्वेत पत्र’ संसद और जनता के सामने रखा जाना चाहिए ताकि पर्दे के पीछे छिपे बड़े माफियाओं के चेहरे बेनकाब हो सकें। और तीसरा, भारत में प्रधानमंत्री के स्तर पर नियमित, सीधी और निष्पक्ष प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की गरिमामयी लोकतांत्रिक परंपरा को पुनः बहाल किया जाना चाहिए। इतिहास अत्यंत निर्मम होता है; यदि मनमोहन सिंह साहब की विवशता और चुप्पी को देश ने कभी माफ नहीं किया, तो आज स्वेच्छा से साधे गए इस मौन को भी आने वाली पीढ़ियां कभी क्षमा नहीं करेंगी।

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