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पश्चिम बंगाल के राजनीतिक रणक्षेत्र में खिला कमल: ममता बनर्जी के अभेद्य दुर्ग में बीजेपी की ऐतिहासिक सेंधमारी

कोलकाता के आसमान में उड़ते भगवा गुलाल और गलियों में गूंजते ‘जय श्री श्रीराम’ के नारों ने बंगाल की नियति पर एक अमिट मुहर लगा दी है। यह केवल एक चुनावी परिणाम नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के इतिहास का वह मोड़ है जहां ‘दीदी’ के अपराजेय कहलाने वाले किले की ईंटें एक-एक कर ढह गईं। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव 2026 के जो नतीजे सामने आए हैं, उन्होंने राजनीतिक विश्लेषकों को हैरत में डाल दिया है। राज्य की सत्ता पर 15 वर्षों से काबिज ममता बनर्जी की टीएमसी इस बार 100 सीटों के आंकड़े को छूने के लिए भी संघर्ष करती नजर आई, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने 200 के जादुई आंकड़े के करीब पहुंचकर बंगाल की सत्ता पर अपने अधिकार का बिगुल फूंक दिया है। यह जीत इसलिए भी विशेष है क्योंकि बीजेपी को कभी बंगाल में एक बाहरी या उत्तर भारतीय पार्टी माना जाता था, लेकिन आज उसने क्षेत्रीय अस्मिता के दावों को धता बताते हुए एक ऐसी सुनामी पैदा की, जिसमें टीएमसी का ‘मां, माटी, मानुष’ का नारा पूरी तरह विलीन हो गया। चुनावी आंकड़ों की गहराई में उतरें तो पता चलता है कि बीजेपी ने उन क्षेत्रों में भी अपनी बादशाहत कायम की है, जो कभी ममता बनर्जी के सबसे मजबूत गढ़ माने जाते थे।

बंगाल के इस चुनावी महासमर का सबसे चौंकाने वाला पहलू वोटिंग पैटर्न में आया वह आमूलचूल बदलाव है, जिसने डायमंड हारबर मॉडल जैसे चर्चित प्रशासनिक दावों की हवा निकाल दी। राज्य के 37 ऐसे विधानसभा क्षेत्र जहां 95 प्रतिशत से अधिक रिकॉर्ड तोड़ मतदान हुआ, उनमें से 33 सीटों पर बीजेपी ने अपना परचम लहराया है। यह स्पष्ट संकेत है कि जब-जब मतदान का प्रतिशत बढ़ा, वह सत्ता विरोधी लहर में तब्दील होता गया। ममता बनर्जी के शासनकाल के दौरान जिन क्षेत्रों में टीएमसी का एकछत्र राज चलता था, वहां की जनता ने खामोशी से बदलाव के पक्ष में बटन दबाकर यह साबित कर दिया कि वे अब पुरानी व्यवस्था से ऊब चुके हैं। चुनाव आयोग की सख्ती और बाहर से आए पर्यवेक्षकों की मौजूदगी ने एक ऐसा पारदर्शी वातावरण तैयार किया, जिसमें सिस्टम और टेक्नोलॉजी के समन्वय ने टीएमसी के कैडर आधारित चुनावी प्रबंधन को पस्त कर दिया। ममता बनर्जी जिस गवर्नेंस और विकास के एजेंडे को लेकर मैदान में उतरी थीं, वह धरातल पर लोगों की आकांक्षाओं से जुड़ नहीं पाया, जबकि दूसरी ओर बीजेपी ने केंद्रीय एजेंसियों और संगठनात्मक कौशल के जरिए वोटरों के भीतर एक नया विश्वास पैदा किया।

ध्रुवीकरण की राजनीति ने इस चुनाव में एक नई परिभाषा गढ़ी है, जहां हिंदू मतों की एकजुटता ने सारे समीकरण बदल दिए। शुभेंदु अधिकारी द्वारा लगातार उठाए गए सनातनी स्वाभिमान और हिंदू गौरव के मुद्दों ने जमीन पर ऐसा असर दिखाया कि मुस्लिम बहुल सीटों पर भी टीएमसी को वह बढ़त नहीं मिल पाई जिसकी उसे उम्मीद थी। पश्चिम बंगाल की 70 मुस्लिम प्रभावित सीटों पर टीएमसी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा, जिसका मुख्य कारण मुस्लिम वोटों में हुआ 5 से 9 प्रतिशत का बिखराव था। इस बिखराव का सीधा लाभ बीजेपी को मिला, जिसका वोट शेयर 6 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया, जबकि टीएमसी के वोट बैंक में 8 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। वामपंथियों और कांग्रेस की मौजूदगी महज प्रतीकात्मक रह गई, क्योंकि वामपंथ को मात्र 4.5 प्रतिशत और कांग्रेस को 3.5 प्रतिशत वोट ही नसीब हुए। 92 प्रतिशत से अधिक मतदान वाले 52 इलाकों में बीजेपी ने 40 सीटों पर कब्जा करके यह साफ कर दिया कि बंगाल की जनता ने अब तुष्टीकरण की राजनीति को सिरे से नकारते हुए राष्ट्रवाद और विकास के समन्वय को चुना है।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो यह चुनाव टीएमसी के उन कद्दावर नेताओं के लिए भी काल बन गया जो तीन बार से लगातार जीत दर्ज करते आ रहे थे। साल 2011, 2016 और 2021 में लगातार जीतने वाली 29 सीटों पर इस बार बीजेपी ने टीएमसी को करारी शिकस्त दी है। यह हार इसलिए भी चुभने वाली है क्योंकि इन क्षेत्रों में वोटिंग का औसत राज्य के सामान्य औसत से कहीं अधिक 92 प्रतिशत रहा। जनता का यह आक्रोश उन चेहरों के खिलाफ था जो सत्ता के अहंकार में चूर होकर स्थानीय स्तर पर तानाशाही का पर्याय बन चुके थे। चुनाव परिणामों के दौरान आसनसोल जैसे इलाकों में टीएमसी कार्यालयों में हुई तोड़फोड़ और कार्यकर्ताओं का गुस्सा दरअसल उस दबे हुए ज्वालामुखी का विस्फोट था जो पिछले 15 सालों से बंगाल की जनता के भीतर सुलग रहा था। बीजेपी ने संगठन स्तर पर इतनी सूक्ष्म तैयारी की थी कि अमित शाह जैसे कद्दावर नेताओं ने वार रूम में बैठकर हर एक बूथ की निगरानी की। कार्यकर्ताओं की मूवमेंट से लेकर ऑब्जर्वर्स की तैनाती तक, हर चीज एक सटीक कमांड के तहत संचालित हो रही थी, जिसने ममता बनर्जी के पारंपरिक चुनावी तंत्र को पूरी तरह विफल कर दिया।

घुसपैठ और नागरिकता का मुद्दा इस चुनाव में बीजेपी के लिए मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ, विशेषकर असम सीमा से सटे जिलों में जहां पहचान का संकट सबसे गहरा था। बीजेपी ने रणनीतिक रूप से उन 51 सीटों पर ध्यान केंद्रित किया जहां घुसपैठ को लेकर स्थानीय लोगों में डर व्याप्त था। इन क्षेत्रों में 93 प्रतिशत तक मतदान हुआ और बीजेपी ने ‘निर्धारित’ करने के अपने वादे से वोटरों को अपनी ओर खींचा। प्रवासी मजदूरों और ग्रामीण आबादी के लिए बीजेपी ने जो डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर (DBT) और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं का खाका खींचा, उसने गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले लाखों लोगों के मन में सुरक्षा की भावना पैदा की। बंगाल की पिछड़ी अर्थव्यवस्था में जहां प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफी कम है, वहां सीधे खाते में आने वाले पैसे और स्वास्थ्य सेवाओं के वादों ने ममता बनर्जी की ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं को कड़ी चुनौती दी। प्रवासी मजदूरों ने बड़ी संख्या में घर लौटकर केवल इसलिए वोट डाला ताकि वे अपनी नागरिकता पर लगने वाले किसी भी संभावित प्रश्नचिह्न को मिटा सकें, और उनके इस ‘सुरक्षात्मक मतदान’ ने बीजेपी की जीत का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

अंततः, यह चुनाव परिणाम बंगाल की राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात है, जहां सिंघूर और नंदीग्राम से शुरू हुआ ममता बनर्जी का तिलस्म अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है। जिस तरह वामपंथियों की 30 साल की सत्ता का अंत हुआ था, ठीक वैसे ही टीएमसी का पंद्रह वर्षीय साम्राज्य भी ढह गया है। अब बीजेपी के सामने चुनौती केवल सत्ता संभालने की नहीं, बल्कि बंगाल के उस पढ़े-लिखे सभ्रांत वर्ग और ग्रामीण समाज की उम्मीदों पर खरा उतरने की है, जिसने एक बहुत बड़ा जोखिम लेकर परिवर्तन को चुना है। बिहार और बंगाल दोनों राज्यों में बीजेपी की मौजूदगी अब उत्तर-पूर्वी भारत की राजनीति को एक नया स्वरूप देगी, क्योंकि दोनों ही राज्यों की अर्थव्यवस्था कृषि और प्रवासी मजदूरी पर टिकी है। यह जीत एक संदेश है कि अब राजनीति केवल नारों से नहीं बल्कि ठोस धरातलीय बदलावों और आर्थिक सुरक्षा के वादों से संचालित होगी। बंगाल का यह जनादेश भारतीय लोकतंत्र की उस शून्यता को भरने की दिशा में एक कदम है, जहां विपक्ष के कमजोर होने पर जनता स्वयं एक नए और सशक्त विकल्प को चुनकर सत्ता के शीर्ष पर बिठा देती है।

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