रामनगर। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्रांगण में आज सुरों का ऐसा सैलाब उमड़ा कि महाविद्यालय की दीवारें भी संगीत की मधुर तान से झंकृत हो उठीं, जहाँ संगीत विभागीय परिषद के तत्वावधान में आयोजित शास्त्रीय, लोक और भजन गायन प्रतियोगिता ने एक ऐतिहासिक अमिट छाप छोड़ दी है। आयोजन की भव्यता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल संगीत प्रेमी ही नहीं, बल्कि विज्ञान, कला और वाणिज्य जैसे हर संकाय के छात्र-छात्राएं और प्राध्यापक इस जादुई माहौल का हिस्सा बनने के लिए खिंचे चले आए, जिससे पूरा परिसर एक सांस्कृतिक कुंभ में तब्दील हो गया। हवाओं में घुली संगीत की मिठास और वाद्य यंत्रों की गूँज ने ऐसा समां बांधा कि हर कोई बस उसी में खोकर रह गया, जहाँ शास्त्रीय रागों की गंभीरता के साथ-साथ पहाड़ की मिट्टी से जुड़े लोकगीतों की खनक ने दर्शकों के दिलों को छू लिया। यह केवल एक प्रतियोगिता मात्र नहीं थी, बल्कि यह युवा पीढ़ी के भीतर छिपी उन कलात्मक प्रतिभाओं का विस्फोट था, जो मंच मिलते ही साक्षात मां सरस्वती के वरदान की तरह बरसने लगीं और देखते ही देखते यह कार्यक्रम एक उत्सव में बदल गया।
पवित्र ज्ञान की अधिष्ठात्री मां सरस्वती के चरणों में वंदना और दीप प्रज्ज्वलन के साथ शुरू हुए इस कार्यक्रम ने उस वक्त अपनी चरम सीमा को छू लिया जब प्रतिभागियों ने एक-एक कर शास्त्रीय संगीत की बारीकियों और रागों के जटिल आरोह-अवरोह को इतनी सुगमता से प्रस्तुत किया कि वहां मौजूद हर शख्स दंग रह गया। इसके उपरांत जब पहाड़ी संस्कृति के प्रतीक लोकगीतों की बारी आई, तो ढोल-दमाऊ की थाप और हुड़के की गूँज के बिना ही छात्रों की आवाज़ ने उत्तराखंड की वादियों का सजीव चित्रण संगीत कक्ष के भीतर कर दिया, जिससे उपस्थित जनसमूह झूमने पर मजबूर हो गया। भक्ति के रस में सराबोर भजनों की प्रस्तुतियों ने तो जैसे वक्त को ही रोक दिया हो, जहाँ हर छात्र की आवाज़ में एक असीम श्रद्धा और रूहानियत का अहसास था, जिसने पूरे माहौल को आध्यात्मिक रंग में रंग दिया। संगीत कक्ष का कोना-कोना तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज रहा था और हर परफॉर्मेंस के बाद दर्शकों का उत्साह यह बता रहा था कि शास्त्रीय और पारंपरिक कलाएं आज भी युवाओं के रगों में कितनी गहराई से दौड़ रही हैं।
प्रतिभा के इस कड़े मुकाबले में निर्णय लेना कोई आसान काम नहीं था, क्योंकि हर प्रतिभागी एक से बढ़कर एक सुरों की सौगात पेश कर रहा था, जिसे परखने के लिए डॉo सुमन कुमार, डॉo लोतिका अमित, डॉ शिप्रा पंत एवं डॉ इंदु आर्या जैसे विद्वान निर्णायक मंडल ने अपनी पैनी नज़र बनाए रखी। इन संगीत मनीषियों ने सुरों की शुद्धता, ताल की सटीकता और गायक के भावों की गहराई को कसौटी पर कसते हुए बेहद सूक्ष्मता से मूल्यांकन किया, ताकि संगीत के वास्तविक हुनर को न्याय मिल सके। निर्णायकों ने स्वीकारा कि आज के दौर में जब पाश्चात्य संगीत का बोलबाला है, तब इन छात्र-छात्राओं का शास्त्रीय और लोक गायन के प्रति ऐसा समर्पण देखना वास्तव में सुखद और आश्चर्यजनक है। संगीत की यह परीक्षा केवल गले की तैयारी तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह मंच पर उनके आत्मविश्वास और अपनी जड़ों से जुड़ाव की भी परीक्षा थी, जिसमें महाविद्यालय के इन नन्हे सितारों ने खुद को अव्वल साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

कार्यक्रम के चरमोत्कर्ष पर जब विजेताओं की घोषणा की गई, तो उत्साह का सैलाब उमड़ पड़ा और प्राचार्य प्रोफेसर एम o सी o पांडे ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से सभी सफल प्रतिभागियों को सम्मानित करते हुए उनका मनोबल बढ़ाया। प्राचार्य ने अपने ओजस्वी संबोधन में इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि ऐसे सांस्कृतिक और कलात्मक आयोजन ही छात्र के व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करते हैं और हमारे गौरवशाली सांस्कृतिक मूल्यों को सशक्त बनाते हैं। उन्होंने कहा कि संगीत वह भाषा है जो सीमाओं को तोड़कर एकता और सहयोग का संदेश देती है, और राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय इस परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाता रहेगा ताकि यहाँ से निकलने वाला हर छात्र अपनी संस्कृति का ध्वजवाहक बने। सम्मानित होने वाले छात्रों के चेहरों पर जो गर्व और खुशी थी, वह इस बात का प्रमाण थी कि कड़ी मेहनत और सही मार्गदर्शन के समन्वय से संगीत की साधना किस तरह फलदायी होती है, जिससे कॉलेज का नाम रोशन हुआ।
इस वृहद और चुनौतीपूर्ण आयोजन को सफलतापूर्वक धरातल पर उतारने के पीछे पर्दे के पीछे काम करने वाली एक समर्पित टीम का भी विशेष हाथ रहा, जिसमें प्रयोगशाला सहायक गोविंद सिंह मेवाड़ी और डॉo डीo एनo जोशी के प्रशासनिक और तकनीकी सहयोग ने कार्यक्रम की राह आसान बना दी। साथ ही, सांस्कृतिक सचिव कृतिका मंडोलिया एवं करण जोशी ने अपने कुशल नेतृत्व और अथक परिश्रम से यह सुनिश्चित किया कि कार्यक्रम का एक-एक पल सुचारू रूप से संचालित हो और प्रतिभागियों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो। इन सभी के सामूहिक प्रयासों का ही परिणाम था कि यह प्रतियोगिता मात्र एक प्रतिस्पर्धा न रहकर संगीत के माध्यम से एकता, अनुशासन और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक महाकुंभ बन गई, जिसकी गूँज आने वाले लंबे समय तक महाविद्यालय के गलियारों में सुनाई देती रहेगी। यह दिन रामनगर के इस महाविद्यालय के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है, जहाँ सुरों की सरिता में डूबकर हर कोई निहाल हो उठा और संगीत का जादू हर दिल पर चढ़कर बोला।





