हरिद्वार(सुनील कोठारी)।गंगा की पावन धरा पर स्थित हर की पैड़ी, जो करोड़ों हिंदुओं की आस्था का अक्षय केंद्र है, आज भ्रष्टाचार और नियमों की अवहेलना के एक ऐसे भयंकर भंवर में फंसी नजर आ रही है जहां कानून का राज नहीं बल्कि अवैध वसूली का साम्राज्य स्थापित हो चुका है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी के कड़े निर्देशों को ताक पर रखकर यहाँ जो ‘खेल’ खेला जा रहा है, उसने न केवल पर्यावरणविदों को बल्कि आम जनता को भी झकझोर कर रख दिया है। साल 2019 में जब एनजीटी ने स्पष्ट किया था कि मां गंगा की पवित्र जलधारा में किसी भी प्रकार की पूजन सामग्री या फूलों का विसर्जन पूर्णतः प्रतिबंधित होगा, तब लगा था कि पतित पावनी गंगा को प्रदूषण से मुक्ति मिलेगी। परंतु धरातल पर वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है। आज हर की पैड़ी के घाटों पर जिस तरह से टनों की तादाद में फूल और प्लास्टिक कचरा गंगा में समाहित हो रहा है, वह प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक काला धब्बा है। विडंबना यह है कि यह सब कुछ उस प्रशासन की निगरानी में हो रहा है जिसे इन पवित्र धाराओं की रक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा गया है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि रक्षक ही अब भक्षक की भूमिका में नजर आ रहे हैं और चंद सिक्कों के लालच में सनातन संस्कृति के इस सबसे बड़े प्रतीक के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
इस पूरे प्रकरण में जो सबसे सनसनीखेज पहलू सामने आ रहा है, वह है अवैध ठेकों का एक मायाजाल जो नगर निगम की नाक के नीचे पनप रहा है। आधिकारिक आंकड़ों और स्थानीय सूत्रों की मानें तो हर की पैड़ी घंटाघर के आसपास फूल बेचने के लिए केवल दो वैध ठेके ही आवंटित किए गए हैं, जिनसे प्रशासन को सालाना 2 से 3 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। लेकिन धरातल पर जो नजारा दिखता है वह किसी बड़े घोटाले की ओर इशारा करता है, क्योंकि इन्हीं दो वैध परमिटों की आड़ में लगभग 50 से 60 अवैध फड़ और दुकानें संचालित की जा रही हैं। यह अवैध दुकानें न केवल पैदल चलने वाले तीर्थयात्रियों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई हैं, बल्कि इनसे होने वाली अवैध वसूली का एक बड़ा हिस्सा सरकारी खजाने में जाने के बजाय सीधे भ्रष्ट अधिकारियों और बिचौलियों की जेबों को गर्म कर रहा है। करोड़ों रुपये के इस राजस्व घाटे पर नगर निगम की चुप्पी कई गहरे सवाल खड़े करती है कि आखिर किसके संरक्षण में यह अवैध बाजार फल-फूल रहा है और क्यों आज तक इन पर कोई सख्त दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई।
नियमों की बात करें तो नगर निगम के स्वयं के उपनियम स्पष्ट करते हैं कि हर की पैड़ी के घंटाघर क्षेत्र जैसे अति-संवेदनशील और प्रतिबंधित जोन में किसी भी प्रकार का व्यावसायिक क्रय-विक्रय या फड़ लगाना कानूनी रूप से वर्जित है। बावजूद इसके, यहाँ खुलेआम फूलों की टोकरियाँ सज रही हैं, प्लास्टिक की थैलियों में सामग्री बेची जा रही है और भोले-भाले श्रद्धालुओं को इस बात के लिए उकसाया जाता है कि वे इन सामग्रियों को गंगा की धारा में प्रवाहित करें। यह स्थिति दर्शाती है कि यहाँ कानून का इकबाल पूरी तरह से खत्म हो चुका है और माफियाओं का तंत्र इतना मजबूत हो गया है कि वे सरकारी आदेशों को अपनी जूती की नोक पर रखते हैं। इस प्रतिबंधित क्षेत्र में चल रहा यह खुला बाजार न केवल सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक है, बल्कि यह उस गरिमा को भी खंडित कर रहा है जो इस स्थान के साथ जुड़ी हुई है। प्रशासन की इस मूक सहमति ने आज हर की पैड़ी को एक व्यावसायिक मंडी में तब्दील कर दिया है, जहाँ आस्था के नाम पर केवल और केवल प्रदूषण परोसा जा रहा है।

गंगा को ‘मां’ मानने वाले इस देश में उसी मां के आंचल को प्रदूषित करने का यह कारोबार जिस संगठित तरीके से चल रहा है, वह ‘प्रदूषण का प्रसाद’ बांटने जैसा कृत्य है। एनजीटी के आदेशों के मुताबिक गंगा में फूल डालना दंडनीय अपराध है, क्योंकि ये फूल सड़कर पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम कर देते हैं और जलीय जीवन के साथ-साथ जल की शुद्धता को भी नष्ट कर देते हैं। परंतु हरिद्वार के इन घाटों पर रोजाना टनों फूलों का विसर्जन इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण की शक्तियों को स्थानीय स्तर पर ठेंगा दिखाया जा रहा है। क्या यह महज अधिकारियों की लापरवाही है या फिर एक सुनियोजित साजिश, जिसमें गंगा के नाम पर अपनी रोटियां सेकी जा रही हैं? जब उच्च न्यायालय और एनजीटी जैसे संस्थान बार-बार चेतावनी दे रहे हैं, तब भी मां गंगा की गोद में कचरा डालना जारी रखना यह बताता है कि संवेदनशीलता और जवाबदेही पूरी तरह से मर चुकी है। यह एक ऐसा अपराध है जिसके लिए प्रकृति और आने वाली पीढ़ियां हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो एनजीटी के नियमों के उल्लंघन पर प्रति माह 5 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है, जो कि सीधे तौर पर दोषी संस्था या जिम्मेदार अधिकारियों पर आरोपित किया जाना चाहिए। यदि हम वर्ष 2019 से लेकर वर्तमान समय यानी 2025-26 तक के कालखंड का आकलन करें, तो यह राशि करोड़ों रुपये में पहुंच जाती है। अब यक्ष प्रश्न यह उठता है कि पिछले 6 वर्षों से लगातार हो रहे इस उल्लंघन के बदले क्या एक भी रुपया जुर्माने के तौर पर वसूला गया? इस विशाल धनराशि की वसूली का उत्तरदायित्व किस पर है और क्यों अभी तक किसी भी लापरवाह अधिकारी के विरुद्ध विभागीय जांच या दंडात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की गई? यह पूरा तंत्र ऐसा प्रतीत होता है जैसे एक मौन समझौते के तहत इस खेल को जारी रखे हुए है, जहाँ नियम केवल कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए हैं और हकीकत में भ्रष्टाचार की जड़ें पाताल तक गहरी हो चुकी हैं।
हैरानी की बात तो यह है कि जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली जिला गंगा संरक्षण समिति ने अपनी पिछली बैठकों में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि आगामी समय में फूल-फरोशी के लिए कोई भी नया ठेका आवंटित न किया जाए। इन सख्त प्रशासनिक आदेशों के बावजूद नगर निगम द्वारा दोबारा ठेके देने की गुप्त तैयारियां करना यह स्पष्ट करता है कि विभाग के भीतर कुछ ऐसी ताकतें सक्रिय हैं जो जिलाधिकारी के आदेशों को भी नजरअंदाज करने का साहस रखती हैं। क्या यह माना जाए कि इन अवैध कार्यों को किसी उच्च राजनीतिक या प्रशासनिक शक्ति का वरदहस्त प्राप्त है? जब जिला प्रशासन के प्रमुख द्वारा दिए गए आदेशों की ही कोई कीमत नहीं रह जाती, तो फिर सामान्य नागरिक से कानून के पालन की उम्मीद करना बेमानी है। हर की पैड़ी आज न केवल अतिक्रमण की चपेट में है, बल्कि यह कानूनी विफलता और प्रशासनिक अराजकता का सजीव उदाहरण बन चुका है, जहाँ हर नियम को मुनाफे की तराजू पर तोला जा रहा है।

स्थानीय समाजसेवियों और धर्म प्रेमियों में इस अराजकता को लेकर भारी आक्रोश पनप रहा है और उन्होंने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। जागरूक नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि इस बार भी अवैध तरीके से ठेकों का नवीनीकरण किया गया या फूलों की बिक्री पर रोक नहीं लगाई गई, तो नगर निगम के कार्यालयों का घेराव कर एक व्यापक जन-आंदोलन छेड़ा जाएगा। इतना ही नहीं, प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ नामजद मुकदमे दर्ज कराने और इस पूरे मामले को साक्ष्यों सहित पुनः राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के समक्ष ले जाने की तैयारी कर ली है। जब रक्षक ही भक्षक बनकर मां गंगा के अस्तित्व को खतरे में डालने लगें, तो समाज का जागृत होना अनिवार्य हो जाता है। हरिद्वार की गरिमा को बचाने के लिए अब सड़कों से लेकर अदालत तक संघर्ष की गूंज सुनाई देने वाली है, क्योंकि आस्था पर हो रहे इस प्रहार को अब और अधिक सहन करना असंभव हो गया है।
हरिद्वार की पवित्र मर्यादा और मां गंगा की निर्मलता को लेकर उठ रहे इन सुलगते सवालों के घेरे में सबसे प्रमुख नाम श्री गंगा सभा हरिद्वार और स्थानीय प्रशासन का आता है, जिनसे जनता अब सीधे जवाब मांग रही है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब वर्ष 2019 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने गंगा में फूल और पूजन सामग्री डालने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था, तो पिछले 6 वर्षों से टनों कचरा प्रवाहित होने के लिए आखिर किस विभाग की जवाबदेही तय की गई है? आश्चर्य की बात है कि नगर निगम के पास उन 50-60 अवैध फड़ संचालकों का कोई ब्यौरा नहीं है, जो महज दो वैध ठेकों की ओट में हर की पैड़ी जैसे संवेदनशील क्षेत्र में करोड़ों का काला कारोबार कर रहे हैं। यहाँ तक कि जिलाधिकारी के स्पष्ट आदेशों को ठेंगा दिखाते हुए निगम प्रशासन द्वारा दोबारा ठेके देने की गुप्त योजना बनाना सीधे तौर पर प्रशासनिक अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा है।
इस पूरे प्रकरण में श्री गंगा सभा हरिद्वार की भूमिका पर भी उंगलियां उठ रही हैं, क्योंकि घाटों के प्रबंधन और सनातन परंपराओं के संरक्षण का दावा करने वाली यह संस्था आखिर इस खुलेआम हो रहे प्रदूषण और अवैध फूल बिक्री पर अब तक मौन क्यों है? करोड़ों रुपये के जुर्माने की राशि, जो प्रति माह 5 लाख रुपये के हिसाब से अब तक एक भारी भरकम सरकारी कोष बन जानी चाहिए थी, उसकी वसूली न होना यह सिद्ध करता है कि शासन और भ्रष्टाचार के सिंडिकेट के बीच गहरी सांठगांठ है। जनता यह भी जानना चाहती है कि प्रतिबंधित घंटाघर क्षेत्र में पुलिस की तैनाती के बावजूद प्लास्टिक और फूलों का बाजार कैसे सज रहा है और क्या सरकार उन भ्रष्ट अधिकारियों की संपत्ति की जांच कराने का साहस दिखाएगी जिन्होंने निजी स्वार्थ के लिए मां गंगा के आंचल को मैला होने दिया? जब ‘नमामि गंगे’ और अन्य योजनाओं के तहत करोड़ों का फंड आता है, तो उसका वास्तविक असर धरातल पर क्यों नहीं दिखता? यदि प्रशासन और श्री गंगा सभा हरिद्वार ने समय रहते इन विसंगतियों को दूर नहीं किया, तो वैश्विक पटल पर हरिद्वार की सांस्कृतिक गरिमा को पहुँच रही इस क्षति की भरपाई करना भविष्य में असंभव होगा।





