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देवभूमि में चारधाम यात्रा के दौरान मौत का तांडव मचाने वाले अदृश्य खतरे का सच

श्रद्धालुओं के सैलाब के बीच आखिर क्यों हिमालय की घाटियों में थम रही हैं सांसें? सरकार की मुस्तैदी और दावों के बावजूद केदारनाथ से लेकर यमुनोत्री तक मौत के साए ने मचाया कोहराम, जानिए क्या है हकीकत।

उत्तराखंड। देवभूमि में इस समय आस्था का महाकुंभ उमड़ रहा है, जहां देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालु अपनी अटूट श्रद्धा के साथ हिमालय की गोद में विराजमान भगवान के दर्शनों के लिए पहुंच रहे हैं। लेकिन, भक्ति के इस अपार सैलाब के बीच एक हृदयविदारक और चिंताजनक खबर भी सामने आ रही है, जो पूरी यात्रा व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़े कर रही है। आंकड़ों के आईने में देखें तो अभी इस पवित्र चारधाम यात्रा को शुरू हुए महज 12 दिन ही बीते हैं और इन चंद दिनों के भीतर ही 14 श्रद्धालुओं ने अपनी अंतिम सांसें यहीं त्याग दी हैं। प्रकृति का प्रकोप कहें या शारीरिक अक्षमता, लेकिन जिस गति से मौतों का यह आंकड़ा बढ़ रहा है, उसने न केवल प्रशासन बल्कि उत्तराखंड सरकार की रातों की नींद उड़ा दी है। विशेष रूप से केदारनाथ धाम में जिस तरह से श्रद्धालुओं की तबीयत बिगड़ रही है, उसने स्वास्थ्य सुविधाओं की जमीनी हकीकत और विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बीच यात्रियों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। सरकारी मशीनरी जहां सुविधाओं के पुख्ता होने के दावे कर रही थी, वहीं इन त्रासदियों ने उन दावों की कलई खोलकर रख दी है।

पवित्र गंगोत्री धाम और यमुनोत्री धाम के कपाट 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर खोले गए थे, जिसके बाद से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ इन दुर्गम रास्तों पर उमड़ पड़ी थी। शुरुआती उत्साह के बीच किसी ने यह कल्पना नहीं की थी कि महज 12 दिनों के छोटे से अंतराल में स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों की वजह से 14 परिवारों के चिराग बुझ जाएंगे। सबसे भयावह स्थिति 30 अप्रैल को देखने को मिली, जब काल के क्रूर प्रहार ने एक ही दिन में 6 श्रद्धालुओं को मौत की आगोश में सुला दिया। इस दिन की घटना ने शासन-प्रशासन के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है क्योंकि एक साथ इतनी बड़ी संख्या में मौतों का होना कहीं न कहीं व्यवस्थागत खामियों या फिर यात्रियों द्वारा स्वास्थ्य परामर्श की अनदेखी की ओर इशारा करता है। केदारनाथ धाम की ऊंची चढ़ाई और वहां की विरल ऑक्सीजन ने सबसे ज्यादा कहर बरपाया है, जहां 22 अप्रैल से 30 अप्रैल के बीच महज 9 दिनों में 8 श्रद्धालुओं की जान चली गई है। यह स्थिति तब है जब सरकार ने यात्रा से पूर्व ही स्वास्थ्य विभाग को हाई अलर्ट पर रहने और पर्याप्त चिकित्सा इंतजाम करने के कड़े निर्देश जारी किए थे।

धार्मिक आस्था और मानवीय त्रासदी के इस संगम पर यमुनोत्री धाम के आंकड़े भी कम डराने वाले नहीं हैं, जहां 19 अप्रैल से 30 अप्रैल के बीच 3 श्रद्धालुओं ने दम तोड़ दिया। वहीं, गंगा की अविरल धारा के पास स्थित गंगोत्री धाम में भी एक श्रद्धालु की मृत्यु दर्ज की गई है। इसके अतिरिक्त, बैकुंठ धाम कहे जाने वाले बदरीनाथ धाम में 23 अप्रैल को कपाट खुलने के बाद से अब तक 2 श्रद्धालुओं की मौत हो चुकी है। यद्यपि सरकार ने चारधाम यात्रा को सुलभ, सुगम और सुरक्षित बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया था और स्वास्थ्य विभाग ने बकायदा एक विस्तृत हेल्थ एडवाइजरी भी जारी की थी, लेकिन लगता है कि धरातल पर स्थितियां कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों में अचानक बदलते मौसम और गिरते तापमान ने पहले से ही गंभीर बीमारियों से जूझ रहे यात्रियों के लिए संकट को दोगुना कर दिया है। प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह यात्रियों की आस्था का सम्मान करे या उनके गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें आगे बढ़ने से रोके, क्योंकि हर गुजरते दिन के साथ मौत का यह तांडव रुकने का नाम नहीं ले रहा है।

वर्तमान में उत्तराखंड की पहाड़ियों में मौसम का मिजाज काफी तल्ख बना हुआ है, जिससे यात्रा मार्गों पर फिसलन और ठंड का प्रकोप बढ़ गया है। इसके बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ है और अब तक 4 लाख 54 हजार से अधिक पुण्य के अभिलाषी चारों धामों के दर्शन कर चुके हैं। तीर्थयात्रियों की इस विशाल संख्या को संभालना प्रशासन के लिए वैसे भी टेढ़ी खीर साबित हो रहा था, ऊपर से इन आकस्मिक मौतों ने पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्र तल से अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित इन धामों में हृदय गति का रुकना और सांस लेने में तकलीफ होना आम बात है, लेकिन यदि यात्रियों की स्क्रीनिंग और प्राथमिक उपचार में थोड़ी भी कोताही बरती जाए, तो परिणाम घातक हो सकते हैं। राज्य सरकार अब इस बात पर मंथन कर रही है कि क्या एडवाइजरी का पालन अनिवार्य रूप से कराया जाए या फिर मार्गों पर पोर्टेबल ऑक्सीजन और आपातकालीन चिकित्सा केंद्रों की संख्या में भारी इजाफा किया जाए। सरकार के लिए यह समय आत्ममंथन का है क्योंकि धार्मिक पर्यटन के नाम पर श्रद्धालुओं की जान के साथ खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकता।

इस पूरे घटनाक्रम और बढ़ती मौतों के बीच राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर जनता और विपक्ष की ओर से कई तीखे सवाल उठाए जा रहे हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए उत्तराखंड सरकार से पूछे जाने वाले 10 प्रमुख प्रश्न निम्नलिखित हैं जो शासन की जवाबदेही तय करते हैं:

  1. उत्तराखंड सरकार ने यात्रा शुरू होने से पहले जिस हेल्थ एडवाइजरी को जारी किया था, उसका धरातल पर कितना कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जा रहा है?
  2. केदारनाथ धाम में सबसे अधिक 8 मौतें होने के बावजूद क्या वहां ऑक्सीजन की उपलब्धता और मेडिकल रिलीफ सेंटरों की संख्या को तुरंत बढ़ाया गया है?
  3. 30 अप्रैल को एक ही दिन में 6 श्रद्धालुओं की मौत के पीछे क्या केवल स्वास्थ्य कारण थे या प्रशासन की ओर से त्वरित सहायता पहुंचाने में देरी हुई?
  4. क्या चारधाम यात्रा मार्गों पर तैनात स्वास्थ्य कर्मियों और डॉक्टरों की संख्या लाखों की संख्या में आ रहे श्रद्धालुओं के अनुपात में पर्याप्त है?
  5. जो श्रद्धालु पहले से ही उच्च रक्तचाप या हृदय रोग से पीड़ित हैं, क्या उनकी पंजीकरण के समय अनिवार्य स्क्रीनिंग के लिए कोई ठोस योजना लागू की गई है?
  6. बदरीनाथ धाम और यमुनोत्री धाम में हुई मौतों को देखते हुए क्या इन क्षेत्रों में एयर एम्बुलेंस की सुविधा को और अधिक सुलभ बनाया जाएगा?
  7. हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में खराब मौसम की चेतावनी के बावजूद श्रद्धालुओं को ऊंचे स्थानों पर जाने की अनुमति देने के लिए क्या कोई विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल है?
  8. स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों को स्थानीय भाषाओं और सरल माध्यमों से यात्रियों तक पहुंचाने के लिए सरकार ने क्या अतिरिक्त प्रयास किए हैं?
  9. क्या सरकार उन मौतों की ऑडिट करा रही है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ये मौतें प्राकृतिक थीं या प्रशासनिक लापरवाही के कारण समय पर इलाज न मिलने से हुई?
  10. आगामी पीक सीजन में जब भीड़ और बढ़ेगी, तब बढ़ते मौतों के आंकड़े को नियंत्रित करने के लिए सरकार के पास क्या कोई वैकल्पिक ‘इमरजेंसी बैकअप प्लान’ तैयार है?

इन सवालों के घेरे में खड़ी राज्य सरकार को अब यह साबित करना होगा कि वह केवल पर्यटन और राजस्व पर ही ध्यान नहीं दे रही, बल्कि यात्रियों की जान की सुरक्षा भी उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। हिमालय की इन वादियों में गूंजते जयकारों के बीच सिसकते परिवारों की आवाजें कहीं दब न जाएं, इसके लिए जरूरी है कि व्यवस्थाओं को कागज से निकालकर धरातल पर उतारा जाए। श्रद्धालुओं को भी चाहिए कि वे अपनी शारीरिक क्षमता का आकलन करने के बाद ही इन कठिन चढ़ाइयों पर कदम रखें, क्योंकि जीवन अनमोल है और भक्ति का असली आनंद स्वस्थ रहकर ही प्राप्त किया जा सकता है। सरकार को अपनी व्यवस्थाओं में पारदर्शिता लाते हुए इन सवालों के जवाब न केवल शब्दों में, बल्कि ठोस कार्यों के जरिए देने होंगे ताकि भविष्य में किसी भी श्रद्धालु का देवभूमि आगमन उसके जीवन का अंतिम पड़ाव न बने।

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