उत्तराखण्ड(सुनील कोठारी)।देवभूमि की सियासत में इन दिनों भूचाल आया हुआ है और यह भूचाल किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर मचे घमासान के कारण आया है। 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अब एक साल से भी कम का वक्त बचा है, ऐसे में जहां पार्टी को पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरने की तैयारी करनी चाहिए थी, वहीं आलम यह है कि उत्तराखंड कांग्रेस चुनाव से पहले ही ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी है। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि पार्टी के दिग्गज नेता अब दबी जुबान में नहीं, बल्कि खुलेआम एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं। उत्तराखंड कांग्रेस में ऐसा अभूतपूर्व घमासान मचा हुआ है कि जहां अपने ही अपनों के खिलाफ तलवार खींचे खड़े नजर आ रहे हैं। इस सब के बीच एक बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि जिस प्रदेश अध्यक्ष, यानी गणेश गोदियाल, के कंधों पर पार्टी को एकजुट रखने और सत्ता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है, वे इस पूरे घटनाक्रम के बीच आखिर कहां गायब नजर आ रहे हैं?
उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों कांग्रेस के अंदर छिड़ा गृह युद्ध चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के समर्थक अचानक फुल एक्शन मोड में आ गए हैं। इस खेमे की आक्रामकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हरीश धामी जैसे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने तो खुलेआम अपने समर्थकों से सामूहिक इस्तीफे तक की अपील कर डाली है। हरीश धामी का यह कदम कांग्रेस आलाकमान के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि यह सीधे तौर पर पार्टी नेतृत्व को चुनौती देने जैसा है। केवल धामी ही नहीं, बल्कि कुंजवाल भी हरीश रावत के समर्थन में पूरी तरह सीना ठोक कर मैदान में आ गए हैं और विरोधियों को ललकार रहे हैं। कांग्रेस के भीतर का यह घमासान केवल पार्टी के लिए ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड के राजनीतिक परिदृश्य के लिए भी एक चिंताजनक संकेत है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच बीजेपी ने भी कांग्रेस के घावों पर नमक छिड़कने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। बीजेपी नेता और कांग्रेस के पूर्व मंत्री दिनेश अग्रवाल ने हरीश रावत को ‘उजाड़ू बल’ कहकर संबोधित किया, जिससे प्रदेश की राजनीति और गरमा गई। दिनेश अग्रवाल के इस तीखे प्रहार ने हरीश रावत के समर्थकों में उबाल ला दिया। लेकिन हरदा ने भी इस बार शांत रहने के बजाय करारा जवाब दिया। उन्होंने कटाक्ष करते हुए दिनेश अग्रवाल को उनका राजनैतिक इतिहास याद दिलाया और साफ शब्दों में कहा कि 2012 के चुनाव के बाद मयूक मेहर की जगह अग्रवाल को मंत्रिमंडल में शामिल करना उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी। हरीश रावत का यह बयान दिनेश अग्रवाल के लिए एक गहरा व्यक्तिगत वार था, जिसने उत्तराखंड की राजनीति में निजी हमलों की एक नई परंपरा को जन्म दे दिया है।
हालांकि इस पूरे दंगल में सबसे ज्यादा हैरत की बात यह है कि जो गणेश गोदियाल सरकार से सवाल जवाब करने और घेराबंदी करने में माहिर माने जाते हैं, वही इस पूरे अंदरूनी कलह को लेकर मौन साधे हुए हैं। नवंबर 2025 में जब हाईकमान ने गणेश गोदियाल को प्रदेश अध्यक्ष की अहम जिम्मेदारी सौंपी थी, तब पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं को उनसे काफी उम्मीदें थीं। शुरुआत में गोदियाल ने इन उम्मीदों पर खरा उतरते हुए काफी मेहनत भी की थी। उनके नेतृत्व में पार्टी का ग्राफ बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा था, जनता से संवाद बढ़ रहा था और सरकार को घेरने की उनकी तरकीबें भी काफी ज्यादा प्रभावी साबित हो रही थीं। लेकिन नेताओं की इस आपसी राह और गुटबाजी ने पार्टी को 6 महीने पीछे धकेल दिया है, जिससे 2027 में सत्ता वापसी का सपना धुंधला होता नजर आ रहा है।
उत्तराखंड कांग्रेस में मचे इस भीषण घमासान और प्रदेश अध्यक्ष की चुप्पी पर खुद पार्टी के कई वरिष्ठ नेता भी सवाल उठाने लगे हैं। पूर्व कैबिनेट मंत्री हीरा सिंह बिश्न का कहना है कि पार्टी के नेता तो केवल अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष को एक जगह सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने गोदियाल को उनकी जिम्मेदारियों का अहसास कराते हुए कहा कि उन्हें स्थिति को संभालना चाहिए, क्योंकि उत्तराखंड में कांग्रेस को अटैकिंग मोड में आने की सख्त जरूरत है, लेकिन दुर्भाग्य से कांग्रेस अभी इस समय बहुत पीछे चल रही है। हीरा सिंह बिश्न का यह बयान साफ करता है कि कांग्रेस के भीतर असंतोष कितना गहरा है और प्रदेश अध्यक्ष का मौन पार्टी के लिए कितना हानिकारक साबित हो रहा है।
वहीं, दूसरी तरफ, बीजेपी भी इस मौके का पूरा फायदा उठा रही है। पूर्व कांग्रेसी और अब बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी ने भी गणेश गोदियाल पर तीखा कटाक्ष किया। जोशी का कहना है कि सच्चाई यह है कि खुद कांग्रेस के नेता गोदियाल को प्रदेश अध्यक्ष मानते ही नहीं हैं। यही वजह है कि पार्टी के नेता बिना किसी डर के खुलेआम बयानबाजी कर रहे हैं और पार्टी अनुशासन की धज्जियां उड़ा रहे हैं। मथुरा दत्त जोशी ने तो यहां तक कहा कि “हां, निश्चित रूप से देखिए प्रदेश अध्यक्ष जी का अभी तक कोई भी बयान नहीं आया। कांग्रेस के इतने बड़े प्रकरण में तमाम तरीके की बातें हो रही हैं। इसका मतलब मूक संरक्षण इनको भी है। मौन स्वीकृति है। ना बोलने का अर्थ भी तो यही माना जाता है कि आपकी भी स्वीकृति है। बोलो भाई हरीश रावत जी के खिलाफ बोलो जितना बोल सकते हो।”
बीजेपी प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी ने उत्तराखंड कांग्रेस की इस दयनीय स्थिति पर गहरा दुख जताते हुए आगे कहा कि “एक अर्थ यह भी लगाया जा सकता है और दूसरा अर्थ यह भी है देखिए कांग्रेस अध्यक्ष को अध्यक्ष मान कहां रहे हैं ये लोग अगर मानते तो कुछ तो लिहाज करते ना जिस तरीके की अनुशासन हीनता हो रही है जिस तरह की बयानबाजी हो रही है और धज्जियां उड़ाई जा रही हैं पार्टी के अनुशासन की ना अनुशासन समिति के अध्यक्ष कहीं दिख रहे हैं उनका बयान आ रहा है ना पार्टी अध्यक्ष का बयान आ रहा है और सबसे बड़ी बात यह है। आप इसको सोचिए कि पार्टी की जो प्रदेश की प्रभारी हैं उनका कोई बयान नहीं है इसमें वो कहीं नहीं दूर-दूर तक। इसका मतलब इन सब की स्वीकृति है और उसका खामियाजा भुगतेगी पार्टी। पहले भी भुगतेगी।”
जोशी ने अतीत के पन्ने पलटते हुए कहा कि उत्तराखंड में कांग्रेस को इस अंदरूनी कलह का खामियाजा पहले भी भुगतना पड़ा है। उन्होंने कहा कि “चुनाव के वक्त पिछली बार हरीश रावत जी ने कितनी बड़ी नौटंकी की थी। मगरमच्छ के बीच में जाल में फेंक दिया गया है। जकड़ा हुआ हूं। कुछ नहीं कर पा रहा हूं। हाथ पैर बांध दिए हैं। आपने यह भी सुना होगा वही स्थिति आज हो रही है। मुझे लगता है कि वही स्थिति अब कहीं गणेश गोदियाल जी की ना हो रही हो कि वो बोल ही नहीं पा रहे हैं कुछ भी। किसके लिए बोले? उनके लिए तो ये हो गया कि इधर खाई है, इधर कुआं है। क्या करेंगे वो? भाई कितनी बड़ी बात है पार्टी में? में इतना बड़ा भवंडर हो रहा है और प्रदेश का अध्यक्ष, प्रदेश के प्रभारी, अनुशासन समिति का अध्यक्ष सब मुंह में ताले लगाए बैठे हुए हैं।”
जोशी का दावा है कि “सब मुंह में ताले लगाए बैठे हुए हैं। इसका मतलब सबकी स्वीकृति है और ठीक है। अच्छा है। ये जितना करेंगे उतना और लेकिन मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि जो स्थिति है जो देखने को मिल रहा है उससे यह लग रहा है कि 2017 से भी बुरी हालत में जाएगी कांग्रेस।” जोशी का यह बयान उत्तराखंड में कांग्रेस के भविष्य को लेकर एक बहुत बड़ी भविष्यवाणी है, जो पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करती है। अगर कांग्रेस इसी तरह आपस में लड़ती रही, तो 2027 के चुनाव में उसे 2017 से भी करारी हार का सामना करना पड़ सकता है, जो उत्तराखंड में पार्टी के अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है।
2027 के विधानसभा चुनाव में अब एक साल से भी कम का समय बचा है। ऐसे में कांग्रेस को एकजुट होकर रणनीति बनानी चाहिए थी, ताकि वह बीजेपी को कड़ी टक्कर दे सके। लेकिन हो क्या रहा है? नेता एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं, गुटबाजी चरम पर है और प्रदेश अध्यक्ष खामोश हैं। यह वाकई हैरत की बात है कि जिस पार्टी को सरकार को घेरना चाहिए, वह खुद अपने ही घेरे में फंस गई है। फिलहाल गणेश गोदियाल के सामने सबसे बड़ी और कठिन चुनौती है अंदरूनी कलह को खत्म करना और पार्टी को एकजुट करना। क्योंकि अगर गोदियाल का यह मौन जारी रहा, तो कहीं पार्टी टूटने की कगार पर ना आ जाए और 2027 में सत्ता वापसी का सपना सपना ही बनकर ना रह जाए। देवभूमि की जनता भी कांग्रेस के इस तमाशे को देख रही है और वह चुनाव में इसका करारा जवाब देने के लिए तैयार बैठी है।





