हरिद्वार। हर की पौड़ी में हाल ही में लगाए गए “अहिंदू प्रवेश निषेध” बोर्ड ने एक बार फिर से कानूनी और धार्मिक विवादों के केंद्र में हरिद्वार को ला दिया है। श्री गंगा सभा द्वारा हर की पौड़ी क्षेत्र में लगाए गए बोर्ड को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह कानून का सही पालन है या फिर सिर्फ तीर्थ की पवित्रता की आड़ में एक चयनात्मक नीति अपनाई जा रही है। बोर्ड पर स्पष्ट रूप से लिखा गया है— “अहिंदू प्रवेश निषेध क्षेत्र, आज्ञा से म्यूनिसिपल एक्ट।” गंगा सभा का कहना है कि यह कदम केवल पुराने कानूनों के प्रचार और पालन के लिए उठाया गया है, लेकिन प्रशासन और आम नागरिकों के बीच यह विषय गहरी बहस का कारण बन गया है। कई विशेषज्ञ इस पर सवाल कर रहे हैं कि क्या सिर्फ एक नियम का बोर्ड लगाना पूरे कानून के सही पालन को दर्शाता है।
श्री गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम का कहना है कि यह बोर्ड किसी नए नियम की घोषणा नहीं है, बल्कि नगर निगम के पुराने नियमों को ध्यान में रखते हुए पवित्रता बनाए रखने के लिए लगाया गया है। उनका कहना है कि यह कदम मां गंगा की गरिमा और तीर्थ की पवित्रता को बनाए रखने के लिए जरूरी था। नितिन गौतम ने जोर देकर कहा कि केवल बोर्ड लगाकर या पुराने नियमों का हवाला देकर तीर्थ की मर्यादा सुरक्षित नहीं रहती, बल्कि इसका असर तब होगा जब सभी नियमों का ईमानदारी से पालन किया जाए। उनके अनुसार हर की पौड़ी पर कोई भी धार्मिक या सामाजिक गतिविधि बिना गंगा सभा की अनुमति के नहीं हो सकती, और यही तीर्थ की सच्ची सेवा का तरीका है।
नगर निगम की तरफ से इस मामले में स्पष्ट किया गया है कि यह बोर्ड उनकी ओर से नहीं लगाए गए हैं। नगर आयुक्त नंदन कुमार ने कहा कि उन्होंने इस विषय में गहन अध्ययन किया है और अंग्रेजी शासनकाल के 1916 के नगर पालिका अधिनियम को फिर से पढ़कर निर्णय लिया जाएगा। यह बयान खुद में कई सवाल उठाता है क्योंकि यह मान्यता देता है कि आज भी हरिद्वार नगर निगम पुराने अंग्रेजी कानूनों के अधीन संचालित है। 1916 में बने इस नियमावली में हर की पौड़ी और कनखल घाटों के लिए स्पष्ट और सख्त नियम निर्धारित थे, जिन्हें आज भी कानूनी रूप से लागू माना जाता है, लेकिन व्यवहार में इन नियमों का पालन लगभग बंद हो गया है।

नगर पालिका अधिनियम 1916 की नियमावली के अनुसार हर की पौड़ी, संभूति खंड, दीपाकार प्लेटफॉर्म, कुशाव्रत घाट और कनखल घाट की पवित्रता और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए 19 सख्त उपनियम बनाये गए थे। इनमें से प्रमुख नियमों में शामिल है कि किसी भी व्यक्ति द्वारा घाटों पर कपड़े सुखाना पूरी तरह से वर्जित है। इसके अलावा किसी भी प्रकार के पशु को घाट क्षेत्र में लाना, रखना या बांधना निषिद्ध है। समभूमिखंड पर केवल सनातन धर्म से संबंधित प्रवचन ही हो सकते हैं और वह भी गंगा सभा अध्यक्ष की पूर्व अनुमति से। घाटों पर भाषण, संगीत या भीड़ इकट्ठा करने वाली किसी भी गतिविधि को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है।
इसके अलावा, दीपाकार प्लेटफॉर्म, गऊघाट, कांगड़ा मंदिर से कुशाव्रत घाट और कनखल घाटों पर साबुन लगाकर स्नान करना या कपड़े धोना सख्त मना है। किसी भी घाट पर फेरी लगाकर सामान बेचना, दुकानों या अन्य व्यापारिक गतिविधियों की अनुमति नहीं है। नाई को केवल निर्धारित स्थान पर ही काम करने की अनुमति है, और किसी भिखारी या कोढ़ी को घाट पर घूमने या बैठने की अनुमति नहीं है। समभूमिखंड के किसी कमरे या बरामदे का उपयोग सामान बनाने या बेचने के लिए नहीं किया जा सकता। दान एकत्र करने के लिए केवल अधिकृत गोलक या संस्था की अनुमति मान्य है।
इसके अलावा, प्लेटफॉर्म पर किसी भी प्रकार का अस्थायी आश्रय, कैंप या निवास करना प्रतिबंधित है। गंगा के किनारे किसी भी प्रकार की मूर्ति, फोटो या चित्र प्रदर्शित करना वर्जित है। केवल स्वीकृत चटाई या टाट पर ही बैठने की अनुमति है, और ऐसा कोई साधन नहीं रखा जा सकता जिससे यात्रियों को परेशानी या स्वास्थ्य संबंधी खतरा हो। प्लेटफॉर्म पर साइकिल, पैराम्बुलेटर या अन्य पहिएदार साधन लाना पूरी तरह मना है। फोटो खींचने की अनुमति केवल पालिका अध्यक्ष की लिखित अनुमति पर ही दी जाती है।

कनखल घाट पर सतीघाट को छोड़कर किसी अन्य स्थान पर मृत शरीर की राख गंगा में प्रवाहित करना वर्जित है। इन सभी नियमों में अंतिम और विवादास्पद नियम यह है कि निर्धारित अधिकारियों को छोड़कर हर की पौड़ी, दीपाकार प्लेटफॉर्म, कुशाव्रत घाट और समभूमिखंड में अहिंदुओं का प्रवेश निषेध है। इन नियमों का उद्देश्य सिर्फ तीर्थ की पवित्रता बनाए रखना और सार्वजनिक व्यवस्था सुनिश्चित करना था। हालांकि, आज यह नियम कागजों में जीवित हैं, लेकिन ज़मीन पर अमल में लगभग मृत हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल “अहिंदू प्रवेश निषेध” बोर्ड लगाने से गंगा की मर्यादा नहीं बच सकती। सवाल यह उठता है कि यदि गंगा सभा कानून और पवित्रता की सच्ची रक्षा करना चाहती है, तो बाकी 20 नियमों के बोर्ड क्यों नहीं लगाए गए? खुले आम दुकानों और धर्मशालाओं में विक्रय, भिक्षावृत्ति और साबुन से स्नान जारी है। केवल एक नियम पर ध्यान केंद्रित करके क्या तीर्थ की गरिमा को सुरक्षित रखा जा सकता है, यह बहस का विषय है।
1916 के इस कानून में उल्लंघन पर 10 रुपये का जुर्माना तय किया गया था। उस समय यह जुर्माना गंभीर माना जाता था, लेकिन आज जब सोने का भाव 1,40,000 रुपये प्रति तोला है, तब यह जुर्माना हास्यास्पद हो गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि वर्तमान समय में नियमों के उल्लंघन पर जुर्माना हजारों में होना चाहिए। अधिकारी हों या आम नागरिक, नियमों का पालन करना सख्त और समान होना चाहिए, तभी तीर्थ का संरक्षण संभव है।

हर की पौड़ी किसी एक संस्था की निजी संपत्ति नहीं है। न यह गंगा सभा की निजी जागीर है, न नगर निगम की और न ही स्थानीय लोगों की। यह हर उस हिन्दू व्यक्ति का तीर्थ है जो मां गंगा से प्रेम करता है और तीर्थ की पवित्रता बनाए रखने का इच्छुक है। इसलिए किसी भी नियम या बोर्ड को निजी हित में इस्तेमाल करना या चुनिंदा तरीके से लागू करना उचित नहीं है। गंगा की मर्यादा केवल समान और निष्पक्ष कानून पालन से बनी रह सकती है।
समाप्त करते हुए कहा जा सकता है कि मां गंगा की पवित्रता केवल बोर्ड या संकेत से नहीं बचाई जा सकती। यह केवल तभी संभव है जब प्रशासन, नगर निगम और धार्मिक संस्थाएं पूरे कानून का ईमानदारी से पालन कराएं। केवल चयनात्मक नियमों या प्रतीकात्मक बोर्ड से तीर्थ की सच्ची सेवा नहीं हो सकती। हर की पौड़ी, दीपाकार प्लेटफॉर्म, कुशाव्रत घाट और कनखल घाट का संरक्षण तभी संभव है जब सभी नियमों को समान रूप से लागू किया जाए और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखी जाए।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि तीर्थ किसी एक संस्था या संगठन की संपत्ति नहीं है। हर की पौड़ी का संरक्षण और उसकी पवित्रता हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जो मां गंगा की सेवा और तीर्थ की गरिमा बनाए रखना चाहता है। कानून और आस्था का सही संतुलन बनाए रखना प्रशासन, नगर निगम और धार्मिक संस्थाओं की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यही सच्चा मार्ग है जो हर की पौड़ी को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और पवित्र बनाए रख सकता है।





