हरिद्वार। उत्तराखंड के शिवशक्ति धाम डासना के पीठाधीश्वर और पंचदशनाम जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद गिरी महाराज आज हरिद्वार के सर्वानंद घाट पर संत समाज के मौन के विरोध में एक दिन का सांकेतिक उपवास करने के लिए आ रहे थे। उनके साथ वर्ल्ड रिलिजियस कन्वेंशन की मुख्य संयोजक डॉ. उदिता त्यागी और शिष्य यति रणसिंहानंद जी, यति अभयानंद, यति धर्मानंद, मोहित बजरंगी और डॉ. योगेन्द्र योगी भी मौजूद थे। मगर उत्तराखंड पुलिस ने उन्हें उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड बोर्डर पर ही रोक दिया। महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद गिरी ने इसे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन करार देते हुए इसका कड़ा विरोध किया, लेकिन भारी पुलिस बल के कारण उनकी और शिष्य मंडली की कोई भी नहीं चली। उन्होंने स्पष्ट किया कि संत समाज की आवाज़ को दबाना सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के लिए गंभीर खतरा है। यह उपवास यूजीसी एक्ट जैसे षड्यंत्र के विरोध में आयोजित किया गया था, जिसे महाराज ने महाविनाशकारी बताया।
यति नरसिंहानंद गिरी ने बताया कि यूजीसी एक्ट भारत में एक बड़े वैश्विक षड्यंत्र का हिस्सा है। उनका कहना था कि यह एक्ट विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात और अन्य अरब देशों की योजनाओं के तहत भारतीय समाज के ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य समुदायों के डीएनए को बदलने का एक प्रयास है। उन्होंने चेताया कि जब तक भारत के इन प्रमुख सामाजिक वर्गों का अस्तित्व सुरक्षित रहेगा, तब तक भारत का इस्लामीकरण संभव नहीं है। महाराज ने कहा कि संत समाज की मौनता सनातन धर्म के लिए घातक है और यदि संत समाज इस षड्यंत्र के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएगा तो पूरे हिंदू समाज को गंभीर खतरा होगा। उन्होंने इस मुद्दे को केवल स्थानीय या राजनीतिक नहीं बल्कि वैश्विक स्तर का धर्म-संरक्षण का मामला बताया।
महामंडलेश्वर ने कहा कि इतने बड़े षड्यंत्र के बावजूद ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य समाज सनातन धर्म की ढाल बने हुए हैं। अगर यह ढाल हट जाए तो भारत में इस्लामीकरण को रोक पाना असंभव हो जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि यूजीसी एक्ट के माध्यम से भारत के मौलानाओं और राजनीतिक हस्तियों ने मिलकर यह षड्यंत्र रचा है। उनका कहना था कि यह कानून हिन्दू समाज के लिए डेथ वारंट जैसा है और इसे लागू करना समूचे समाज के लिए विनाशकारी होगा। महाराज ने संत समाज से अपील की कि वे मौन न रहें और इस षड्यंत्र के खिलाफ एकजुट होकर खड़े हों। उनका यह संदेश पूरे हिंदू समाज के लिए चेतावनी के रूप में आया।
यति नरसिंहानंद गिरी ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड बोर्डर से संत समाज को मार्मिक अपील की कि यूजीसी एक्ट जैसे महाविनाशकारी षड्यंत्र पर मौन रहना सनातन धर्म के लिए गंभीर खतरा है। उन्होंने कहा कि संत समाज की मौनता पूरी जातीय व्यवस्था को झुलसा सकती है और समाज को आपसी संघर्ष में फंसा सकती है। उनका मानना था कि संत समाज की आवाज़ धर्म और संस्कृति की रक्षा का अंतिम माध्यम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब भी अगर संत समाज चुप रहेगा तो सनातन धर्म को कोई नहीं बचा सकेगा। इस अपील के जरिए उन्होंने लोगों को सचेत किया कि धर्म की रक्षा केवल पूजा पाठ या व्रत से नहीं बल्कि सामूहिक जागरूकता और प्रतिकार से भी संभव है।
इससे पहले 23 जनवरी 2026 को बसंत पंचमी के अवसर पर यति नरसिंहानंद गिरी महाराज इसी यूजीसी एक्ट का विरोध करने दिल्ली जंतर मंतर पर प्राणदान करने जा रहे थे। मगर गाजियाबाद पुलिस ने शिवशक्ति धाम डासना को पुलिस छावनी बना दिया और उन्हें मंदिर में ही नजरबंद कर दिया। इस घटना ने यह स्पष्ट किया कि कानून और प्रशासन द्वारा धर्म और संत समाज की आवाज़ को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। महाराज ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन करार दिया और कहा कि न्याय और संविधान की रक्षा के लिए आवाज़ उठाना हर नागरिक का अधिकार है। उनके अनुसार, यह रुकावट केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि समाज और धर्म के लिए गंभीर खतरा है।
महाराज ने अपने शिष्यों यति रणसिंहानंद, यति अभयानंद, यति धर्मानंद, मोहित बजरंगी और डॉ. योगेन्द्र योगी के साथ मीडिया से बातचीत में कहा कि यह केवल स्थानीय मामला नहीं है। उन्होंने बताया कि यह वैश्विक षड्यंत्र है, जिसमें भारत के प्रमुख सामाजिक और धार्मिक समुदायों को कमजोर कर पूरी दुनिया में इस्लामीकरण का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने चेताया कि संत समाज की मौनता से सनातन धर्म का महाविनाश होगा और पूरी भारतीय संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी। उनके अनुसार, यह समय केवल विरोध का नहीं बल्कि सक्रियता और जागरूकता का है।
हरिद्वार के सर्वानंद घाट पर महाराज की रुकावट और पुलिस कार्रवाई ने संत समाज और जनता में गहरी चिंता पैदा कर दी। यति नरसिंहानंद गिरी ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करार देते हुए कहा कि प्रशासन द्वारा किसी भी संत की आवाज़ को दबाना न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि धर्म और संस्कृति के खिलाफ गंभीर कदम है। उन्होंने अपील की कि संत समाज अब मौन न रहे और इस षड्यंत्र के खिलाफ संगठित होकर अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करे। उनके अनुसार, मौन रहने का अर्थ केवल भविष्य में और अधिक नुकसान का निमंत्रण है।
समग्र रूप से, शिवशक्ति धाम डासना के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरी महाराज द्वारा यूजीसी एक्ट के विरोध में उठाए गए कदम ने धर्म, राजनीति और समाज को एक साथ जोड़ दिया है। उनके रुकावट और उपवास का संदेश स्पष्ट है कि संत समाज की आवाज़ ही सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति की ढाल है। महाराज ने बार-बार यह स्पष्ट किया कि यह केवल कानून या प्रशासन का मामला नहीं है, बल्कि हिंदू समाज और सनातन धर्म के अस्तित्व का सवाल है। उन्होंने अपील की कि संत समाज मौन न रहे और धर्म की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाए।
महाराज ने चेताया कि अगर संत समाज और हिंदू समाज समय रहते आवाज़ नहीं उठाता, तो भारत में धार्मिक और सामाजिक संरचना को गंभीर नुकसान होगा। उनका मानना था कि यूजीसी एक्ट जैसे षड्यंत्र पूरे समाज को जातीय संघर्ष और धर्म-विरोधी परिस्थितियों में धकेल सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रशासन और राजनीतिक हस्तियों के प्रयास केवल हिंदू समाज को कमजोर करने के लिए हैं। महाराज ने यह भी कहा कि संत समाज की एकजुटता ही सनातन धर्म की रक्षा की अंतिम गारंटी है।
उत्तराखंड पुलिस द्वारा उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड बोर्डर पर रोक लगाने के बावजूद पंचदशनाम जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद गिरी महाराज ने संत समाज के प्रति अपनी अपील में किसी भी तरह की ढिलाई नहीं दिखाई। उन्होंने अपने शिष्यों यति रणसिंहानंद, यति अभयानंद, यति धर्मानंद, मोहित बजरंगी और डॉ. योगेन्द्र योगी के माध्यम से पूरे संत समाज और जनता को स्पष्ट संदेश दिया कि मौन रहना न केवल सनातन धर्म के लिए खतरा है बल्कि यह संस्कृति और धार्मिक पहचान के लिए भी घातक है। महाराज ने कहा कि अगर संत समाज अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं हुआ, अगर इस प्रकार के महाविनाशकारी षड्यंत्रों के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई गई, तो पूरे समाज की संरचना कमजोर हो जाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि मौन या निष्क्रियता धर्म की हत्या के बराबर है। यति नरसिंहानंद गिरी महाराज ने बार-बार स्पष्ट किया कि समय रहते सक्रियता, विरोध और जागरूकता ही धर्म और संस्कृति की रक्षा सुनिश्चित कर सकती है, और यह हर संत और नागरिक का नैतिक और सामाजिक कर्तव्य है।
इस पूरे प्रकरण ने स्पष्ट कर दिया कि संत समाज और धार्मिक नेतृत्व केवल पूजा-पाठ, अनुष्ठान या परंपराओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका दायित्व समाज और धर्म की रक्षा करना भी है। पंचदशनाम जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद गिरी महाराज ने यह साबित कर दिया कि सनातन धर्म की सुरक्षा के लिए संत समाज की सक्रिय भूमिका, सतत विरोध और सामाजिक जागरूकता अनिवार्य हैं। महाराज ने अपने शिष्यों और अनुयायियों के माध्यम से यह संदेश दिया कि प्रशासनिक रोक-टोक और राजनीतिक हस्तक्षेप किसी भी तरह संत समाज की प्रतिबद्धता को कमजोर नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि हिंदू समाज को सजग, सतर्क और एकजुट रहना होगा, क्योंकि यदि समाज ने अपने धर्म और संस्कृति के संरक्षण में सक्रियता नहीं दिखाई, तो सनातन धर्म की प्राचीन विरासत और सांस्कृतिक पहचान गंभीर संकट में पड़ सकती है। यति नरसिंहानंद गिरी महाराज के नेतृत्व में यह स्पष्ट हो गया कि संत समाज केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं बल्कि समाज के नैतिक और सांस्कृतिक ढांचे की रक्षा में भी अग्रणी भूमिका निभाता है।
महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद गिरी महाराज ने अंतिम अपील में संत समाज को गंभीर चेतावनी देते हुए कहा कि यदि संत समाज मौन रहता है, तो यह सनातन धर्म की ढाल को कमजोर करने जैसा होगा और इससे पूरे समाज में सामाजिक, धार्मिक और जातीय अस्थिरता फैल सकती है। उनका स्पष्ट मानना था कि मौन रहना केवल धर्म के लिए ही खतरा नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की सांस्कृतिक और नैतिक संरचना को भी प्रभावित करेगा। महाराज ने जोर देकर कहा कि यह समय केवल विरोध जताने का नहीं है, बल्कि सक्रिय जागरूकता, सतर्कता और एकजुटता का है। उन्होंने अपने शिष्यों यति रणसिंहानंद, यति अभयानंद, यति धर्मानंद, मोहित बजरंगी और डॉ. योगेन्द्र योगी के माध्यम से यह संदेश पूरे समाज तक पहुंचाने का प्रयास किया। उनका कहना था कि सनातन धर्म की रक्षा केवल एक व्यक्ति या किसी विशेष समूह का जिम्मा नहीं है, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। यह अपील धर्म, संस्कृति और सामाजिक जागरूकता के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण और समयोचित है, क्योंकि समाज की एकजुटता ही धर्म की सुरक्षा की असली गारंटी है।





