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संस्कृत साधना को राष्ट्रीय पहचान डॉ मूलचन्द्र शुक्ल को डी लिट मानद उपाधि से ऐतिहासिक सम्मान

काशी हिन्दी विद्यापीठ वाराणसी द्वारा आयोजित भव्य सम्मान समारोह में चित्रकूट के ग्राम गाहुर निवासी संस्कृत विद्वान डॉ मूलचन्द्र शुक्ल को उच्च शिक्षा और संस्कृत वाङ्गमय में अतुलनीय योगदान के लिए डी लिट की मानद उपाधि प्रदान की गई।

रामनगर। उत्तराप्रदेश के चित्रकूट जनपद के मऊ क्षेत्र अंतर्गत ग्राम गाहुर निवासी और संस्कृत जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके डॉ. मूलचन्द्र शुक्ल के लिए यह समय अत्यंत गौरवपूर्ण बन गया है। शिक्षा, शोध और संस्कृत वाङ्गमय की साधना में निरंतर सक्रिय रहे डॉ. शुक्ल को डी. लिट् (विद्या वाचस्पति) की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उन्हें उनके अकादमिक जीवन, संस्कृत विषय में उत्कृष्ट योगदान और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दीर्घकालिक सेवाओं के लिए प्रदान किया गया। इस उपलब्धि से न केवल उनके परिवार और महाविद्यालय बल्कि समूचे चित्रकूट क्षेत्र में प्रसन्नता का वातावरण है। संस्कृत जैसी प्राचीन और समृद्ध भाषा के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए किया गया उनका कार्य आज राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कर रहा है, जो क्षेत्र के युवाओं और विद्यार्थियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गया है।

वाराणसी स्थित मालवीय सभागार में आयोजित विशेष मानद सम्मान समारोह में यह गरिमामय आयोजन संपन्न हुआ, जहां देश के विभिन्न हिस्सों से आए शिक्षाविदों, साहित्यकारों और विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को ऐतिहासिक बना दिया। समारोह के मुख्य अतिथि अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कवि डॉ. हरेन्द्र हर्ष रहे, जिन्होंने अपने उद्बोधन में संस्कृत भाषा की प्रासंगिकता और विद्वानों की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार डॉ. ओमप्रकाश द्विवेदी ओम ने की, जबकि संरक्षक अध्यक्ष के रूप में सेन्ट्रल बार एसो. वाराणसी एवं काशी सेवा समिति साहित्य भूषण डॉ. राम अवतार पाण्डेय की उपस्थिति रही। विशिष्ट अतिथियों में डॉ. चन्द्रभाल सुकुमार, कर्नल डॉ. आदि शंकर मिश्र, श्रीप्रकाश श्रीवास्तव गणेश तथा काशी हिन्दी विद्यापीठ के कुलसचिव इन्द्रजीत तिवारी प्रमुख रूप से शामिल रहे।

इस सम्मान समारोह में काशी हिन्दी विद्यापीठ वाराणसी द्वारा डी. लिट् अर्थात विद्यावाचस्पति पुरस्कार 2026 के लिए चयन की औपचारिक घोषणा की गई। इसी क्रम में 25 जनवरी को डॉ. मूलचन्द्र शुक्ल को यह मानद उपाधि प्रदान की गई। आयोजकों ने बताया कि यह सम्मान उन विद्वानों को दिया जाता है, जिन्होंने अपने-अपने विषय में उल्लेखनीय कार्य कर समाज और शिक्षा जगत को नई दिशा दी हो। डॉ. शुक्ल के नाम की घोषणा होते ही सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा, जो उनके प्रति सम्मान और स्वीकार्यता का प्रतीक थी। मंच से वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा के अध्ययन और अध्यापन में उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगा।

वर्तमान में पीएनजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रामनगर के संस्कृत विभाग प्रभारी के रूप में कार्यरत डॉ. मूलचन्द्र शुक्ल उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक अनुभवी और समर्पित शिक्षक के रूप में जाने जाते हैं। वह वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर के पद पर रहते हुए संस्कृत विषय का अध्यापन कर रहे हैं और इसके साथ ही योग सहित अनेक शैक्षणिक व सहशैक्षणिक दायित्वों का भी कुशलतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं। लगभग बारह वर्षों से अधिक समय से संस्कृत के क्षेत्र में अध्यापन, शोध और सेवा कार्यों में सक्रिय डॉ. शुक्ल ने विद्यार्थियों के बौद्धिक और नैतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके मार्गदर्शन में अनेक छात्र-छात्राएं संस्कृत अध्ययन में आगे बढ़े हैं और विभिन्न प्रतियोगी एवं शैक्षणिक मंचों पर सफलता अर्जित कर चुके हैं।

शैक्षणिक यात्रा की बात करें तो डॉ. मूलचन्द्र शुक्ल ने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा अत्यंत प्रतिष्ठित संस्थानों से प्राप्त की है। उन्होंने स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से पूरी की, जो देश-विदेश में अपनी अकादमिक गरिमा के लिए जाना जाता है। इसके पश्चात उन्होंने केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली से पीएच.डी. की उपाधि अर्जित की। उनके शोध कार्यों में संस्कृत साहित्य, दर्शन और वाङ्गमय की गहरी समझ झलकती है। अध्ययन के साथ-साथ उन्होंने विभिन्न संगोष्ठियों, सेमिनारों और अकादमिक आयोजनों में भाग लेकर अपने विचार प्रस्तुत किए, जिससे संस्कृत के आधुनिक संदर्भों पर सार्थक विमर्श को बल मिला।

यह पहली बार नहीं है जब डॉ. शुक्ल को उनके कार्यों के लिए सम्मानित किया गया हो। इससे पूर्व भी उन्हें उच्च शिक्षा और संस्कृत वाङ्गमय के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। इन सम्मानों ने उनके अकादमिक व्यक्तित्व को और अधिक सशक्त बनाया है। सहकर्मियों और छात्रों का कहना है कि डॉ. शुक्ल न केवल एक विद्वान शिक्षक हैं, बल्कि एक मार्गदर्शक और प्रेरक व्यक्तित्व भी हैं, जो सदैव विद्यार्थियों को नवीन सोच और अनुसंधान के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं। उनके सरल स्वभाव और विद्वतापूर्ण दृष्टिकोण के कारण वे सभी के बीच सम्मानित स्थान रखते हैं।

डॉ. मूलचन्द्र शुक्ल की इस उपलब्धि पर पीएनजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रामनगर के प्राचार्य प्रो. एम.सी. पाण्डे ने हर्ष व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मान पूरे महाविद्यालय के लिए गर्व का विषय है। चीफ प्रॉक्टर प्रो. एस.एस. मौर्या, प्रख्यात संस्कृत महाकवि डॉ. अरविन्द तिवारी, संस्कृतप्रचारक डॉ. चन्द्रकान्तदत्त शुक्ल, डॉ. अभिषेक पाण्डेय, डॉ. दीपक खाती और डॉ. डी. एन. जोशी सहित समस्त प्राध्यापकों एवं शिक्षणेतर कार्मिकों ने उन्हें शुभकामनाएं दीं। सभी ने एक स्वर में कहा कि डॉ. शुक्ल की उपलब्धि से संस्थान की प्रतिष्ठा और भी बढ़ी है।

परिवार और ग्राम स्तर पर भी इस सम्मान को लेकर उत्साह देखने को मिला। डॉ. शुक्ल के माता-पिता, अग्रज, अनुज और ग्राम गाहुर के निवासियों ने इस उपलब्धि को पूरे क्षेत्र की सफलता बताया। गांव में बधाइयों का तांता लगा रहा और लोगों ने गर्व के साथ कहा कि एक साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर उच्च शिक्षा के शिखर तक पहुंचना आसान नहीं होता। डॉ. शुक्ल ने अपनी सफलता का श्रेय अपने गुरुजनों, परिवार और विद्यार्थियों को देते हुए कहा कि संस्कृत की सेवा ही उनका जीवन उद्देश्य है और वह आगे भी इसी भावना के साथ कार्य करते रहेंगे।

समारोह के दौरान अनेक अन्य गणमान्य अतिथि और प्रतिभागी भी उपस्थित रहे, जिनमें भारतीय विधिक शिक्षा आन्दोलन के राष्ट्रीय संयोजक समर बहादुर सरोज, विख्यात गीतकार एवं भजन गायक राजकुमार आशीर्वाद, सन्मार्ग हिन्दी सान्ध्य दैनिक के पत्रकार विजय कुमार गुप्ता, विंध्याचल से स्वामी ब्रह्माण्ड भैरव शरण, डॉ. चन्द्रकांत मिश्र और विजय नारायण तिवारी प्रमुख रहे। सभी ने अपने संबोधन में डॉ. मूलचन्द्र शुक्ल के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे विद्वान समाज और राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का कार्य करते हैं। इस प्रकार यह सम्मान समारोह शिक्षा, संस्कृत और सांस्कृतिक चेतना के प्रति एक सशक्त संदेश बनकर उभरा।

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