काशीपुर। राधे हरि स्नातकोत्तर महाविद्यालयएक बार फिर अपनी व्यवस्था प्रणाली को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में आ खड़ा हुआ है। यह वही महाविद्यालय है जिसे आसपास के क्षेत्रों में उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है, लेकिन समय-समय पर सामने आने वाली अव्यवस्थाओं और लापरवाह रवैये ने इसकी छवि पर गहरा असर डाला है। इस बार मामला किसी छोटी प्रशासनिक चूक का नहीं, बल्कि एक छात्र के भविष्य से जुड़े उस गंभीर संकट का है, जिसने पिछले दो वर्षों से छात्र को मानसिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर परेशान कर रखा है। शिक्षा को जीवन की दिशा तय करने वाला माध्यम माना जाता है, लेकिन जब वही संस्थान छात्रों को न्याय दिलाने में असफल हो जाए, तो सवाल केवल एक छात्र का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर खड़े हो जाते हैं। महाविद्यालय की कार्यप्रणाली पर उठे इन सवालों ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर किसके भरोसे छात्र अपना भविष्य सौंप रहे हैं।
महाविद्यालय की इस ताजा लापरवाही का शिकार बना काशीपुर का एक छात्र, जिसने राधे हरि स्नातकोत्तर महाविद्यालय से बैचलर्स ऑफ आर्ट्स की पढ़ाई पूरी की थी। पढ़ाई पूरी किए हुए उसे पूरे दो वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आज तक उसकी मार्कशीट उसके हाथों तक नहीं पहुंच सकी। दो साल का यह लंबा अंतराल किसी भी युवा के जीवन में बेहद अहम होता है, क्योंकि इसी अवधि में वह आगे की पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं या रोजगार की तैयारी करता है। लेकिन यहां छात्र का पूरा समय महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के चक्कर काटने में ही बीत गया। हर बार उसे केवल आश्वासन मिले, समाधान नहीं। नतीजा यह हुआ कि छात्र का करियर एक अनिश्चितता के अंधेरे में फंसा रह गया। शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले इस संस्थान की लापरवाही ने छात्र को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या उसकी मेहनत और समय की कोई कीमत नहीं है।

लगातार प्रयासों के बावजूद जब छात्र को महाविद्यालय से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो उसने स्वयं विश्वविद्यालय से संपर्क साधा। वहां से जो जानकारी सामने आई, उसने पूरे मामले को और भी गंभीर बना दिया। विश्वविद्यालय की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि संबंधित छात्र की मार्कशीट समय रहते महाविद्यालय को भेज दी गई थी। यानी दस्तावेज कहीं रास्ते में नहीं खोए, न ही विश्वविद्यालय स्तर पर कोई देरी हुई। इसके बावजूद महाविद्यालय प्रशासन की ओर से न तो छात्र को इसकी सूचना दी गई और न ही उसे मार्कशीट सौंपी गई। यह स्थिति सीधे तौर पर महाविद्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। यदि मार्कशीट वास्तव में कॉलेज में मौजूद थी, तो फिर दो वर्षों तक छात्र को क्यों भटकाया गया? इस अनदेखी ने न केवल छात्र के धैर्य की परीक्षा ली, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में भरोसे की नींव को भी कमजोर किया।
मामला तब और उलझ गया जब छात्र ने महाविद्यालय के एक शिक्षक से सीधे तौर पर अपनी मार्कशीट के बारे में पूछा। शिक्षक ने कथित तौर पर यह कहकर छात्र को चौंका दिया कि मार्कशीट कॉलेज में ही है, लेकिन किसी प्रोफेसर ने उसे अपने पास दबाकर रखा हुआ है। यह बयान अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। आखिर किसी प्रोफेसर के पास छात्र की मार्कशीट क्यों होगी? क्या यह व्यक्तिगत लापरवाही है या इसके पीछे कोई गहरी साजिश छिपी है? शिक्षा संस्थानों में इस तरह की बातें सामने आना बेहद चिंताजनक है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि छात्रों के महत्वपूर्ण दस्तावेजों के साथ गंभीर स्तर पर गैर-जिम्मेदारी बरती जा रही है। छात्र के मन में यह आशंका भी पैदा हुई कि कहीं यह सब उसके भविष्य के खिलाफ किसी सोची-समझी साजिश का हिस्सा तो नहीं है।

जब छात्र ने दोबारा संबंधित प्रोफेसर से अपनी मार्कशीट के बारे में सवाल किया, तो उसे जो जवाब मिला, उसने पूरे मामले को और भी विवादास्पद बना दिया। प्रोफेसर डॉ. अनुराग अग्रवाल द्वारा कथित तौर पर कहे गए शब्द – “अगर नहीं दे रहे हैं तो क्या फांसी के फंदे पर चढ़ाओगे” – न केवल असंवेदनशील हैं, बल्कि एक शिक्षक की गरिमा के भी खिलाफ हैं। एक छात्र, जो अपने भविष्य को लेकर पहले से ही तनाव में है, उसके साथ इस तरह की भाषा का प्रयोग किया जाना शिक्षा के मूल मूल्यों पर प्रहार है। यह बयान दर्शाता है कि किस तरह कुछ लोग अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए छात्रों की भावनाओं की अनदेखी कर देते हैं। इस तरह के शब्द किसी भी छात्र को मानसिक रूप से तोड़ सकते हैं और व्यवस्था के प्रति उसके विश्वास को पूरी तरह समाप्त कर सकते हैं।
राधे हरि स्नातकोत्तर महाविद्यालय का नाम यूं तो क्षेत्र के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित कॉलेजों में लिया जाता है, लेकिन आए दिन सामने आने वाली घटनाएं इसकी साख पर सवालिया निशान लगा रही हैं। कभी प्रशासनिक अव्यवस्था, कभी छात्रों की शिकायतें, तो कभी शिक्षकों के विवादास्पद बयान – इन सबने मिलकर यह साबित कर दिया है कि महाविद्यालय में सुधार की सख्त जरूरत है। इस मामले में हुई लापरवाही को कोई साधारण गलती नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इससे एक छात्र का भविष्य दो वर्षों तक ठहराव में चला गया। शिक्षा व्यवस्था में समय का महत्व सबसे अधिक होता है, और जब वही समय किसी की लापरवाही की भेंट चढ़ जाए, तो उसका नुकसान कभी-कभी पूरी जिंदगी भर झेलना पड़ता है।
इस पूरे प्रकरण ने समाज के सामने एक कड़वा सवाल भी खड़ा किया है। यदि इस छात्र की जगह किसी प्रोफेसर या प्रशासनिक अधिकारी का बच्चा होता, तो क्या उसके साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया जाता? क्या उसे भी दो वर्षों तक विश्वविद्यालय और कॉलेज के चक्कर काटने पड़ते? या फिर उसके लिए तुरंत समाधान निकाल लिया जाता? यह सवाल इसलिए भी अहम है, क्योंकि इससे व्यवस्था में मौजूद दोहरे मापदंडों की झलक मिलती है। आम छात्र अक्सर अपनी आवाज उठाने में असहाय महसूस करता है, जबकि प्रभावशाली लोगों के मामलों में निर्णय तेजी से लिए जाते हैं। यही कारण है कि इस छात्र को भी अंततः अपने स्तर से ऊपर जाकर न्याय की गुहार लगानी पड़ी।
लंबे समय तक निराशा झेलने के बाद छात्र ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से न्याय की उम्मीद लगाई। उसने मुख्यमंत्री पोर्टल पर अपनी शिकायत दर्ज कराई, क्योंकि उसके पास अब कोई और रास्ता नहीं बचा था। जैसे ही मामला मुख्यमंत्री पोर्टल तक पहुंचा, महाविद्यालय प्रशासन में हलचल मच गई। बताया जाता है कि शिकायत सामने आते ही संबंधित प्रोफेसरों के हाथ-पांव फूल गए और आनन-फानन में विश्वविद्यालय को एक पत्र भेजा गया, जिसमें छात्र की मार्कशीट दोबारा मंगवाने का अनुरोध किया गया। यह घटनाक्रम अपने आप में बहुत कुछ कहता है। जब तक उच्च स्तर पर शिकायत नहीं की गई, तब तक छात्र की बात को गंभीरता से नहीं लिया गया।
इस प्रकरण से यह भी स्पष्ट होता है कि कई बार शासन-प्रशासन की सक्रियता केवल तब ही देखने को मिलती है, जब मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंचता है। आम स्तर पर की गई शिकायतें अक्सर फाइलों में ही दबकर रह जाती हैं। छात्र की मजबूरी यह थी कि उसने हर संभव प्रयास कर लिया, लेकिन समाधान नहीं मिला। मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज होने के बाद ही महाविद्यालय प्रशासन हरकत में आया, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या बिना दबाव के इस तरह के मामलों का निपटारा संभव ही नहीं है। यह स्थिति न केवल छात्रों के लिए, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के लिए एक चेतावनी है कि यदि पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं लाई गई, तो ऐसे मामले बार-बार सामने आते रहेंगे।
पूरे मामले को लेकर छात्र और महाविद्यालय परिवार की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने की बात कही जा रही है। छात्र का कहना है कि उसने केवल अपनी मेहनत का फल मांगा है, कोई एहसान नहीं। वहीं महाविद्यालय प्रशासन की ओर से अक्सर प्रक्रियात्मक देरी और तकनीकी कारणों का हवाला दिया जाता रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जब विश्वविद्यालय यह स्पष्ट कर चुका है कि मार्कशीट समय पर कॉलेज भेजी गई थी, तो फिर दो वर्षों तक देरी किस स्तर पर हुई? क्या इसके लिए किसी की जवाबदेही तय की जाएगी, या फिर मामला समय के साथ ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? यही वे सवाल हैं, जिनके जवाब आज छात्र ही नहीं, बल्कि पूरा समाज जानना चाहता है।

अब जब यह मामला सार्वजनिक हो चुका है, तो उम्मीद की जा रही है कि संबंधित विभाग और उच्च शिक्षा से जुड़े अधिकारी इस पर गंभीरता से संज्ञान लेंगे। यह सिर्फ एक छात्र की मार्कशीट का मामला नहीं है, बल्कि उन अनगिनत छात्रों की पीड़ा का प्रतीक है, जो व्यवस्था की खामियों के कारण अपने भविष्य के साथ समझौता करने को मजबूर हो जाते हैं। शिक्षा संस्थानों को चाहिए कि वे छात्रों के प्रति संवेदनशीलता दिखाएं और उनकी समस्याओं का समयबद्ध समाधान करें। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो शिक्षा के प्रति युवाओं का भरोसा धीरे-धीरे खत्म होता चला जाएगा, जो किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है।
महाविद्यालय और संबंधित प्रोफेसर की भूमिका को लेकर इस पूरे प्रकरण में कई गंभीर और असहज करने वाले सवाल स्वतः ही खड़े हो जाते हैं। जब विश्वविद्यालय यह स्पष्ट कर चुका है कि छात्र की मार्कशीट समय रहते महाविद्यालय को भेज दी गई थी, तो फिर दो वर्षों तक उसे छात्र को न सौंपना किस स्तर की लापरवाही या उदासीनता को दर्शाता है। यह भी समझ से परे है कि आखिर किस अधिकार और नियम के तहत किसी प्रोफेसर के पास छात्र की महत्वपूर्ण शैक्षणिक दस्तावेज रखी गई और इसकी जवाबदेही किस अधिकारी पर तय होती है। एक छात्र से इस तरह की असंवेदनशील और अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना क्या शिक्षक की मर्यादा, गरिमा और आचार संहिता का खुला उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि छात्र मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज न करता, तो क्या उसे कभी अपनी मार्कशीट मिल पाती या वह यूं ही भटकता रहता। साथ ही यह भी देखना जरूरी है कि क्या इस गंभीर लापरवाही के लिए किसी जिम्मेदार अधिकारी या प्रोफेसर पर ठोस कार्रवाई होगी, या फिर मामला हमेशा की तरह दबा दिया जाएगा।





