नई दिल्ली। देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों, छात्र आंदोलनों, विरोध-प्रदर्शनों और महंगाई-बेरोजगारी जैसे मुद्दों के बीच अगर आज लोकसभा चुनाव करा दिए जाएं तो सत्ता की तस्वीर कैसी होगी, इसे लेकर सामने आए इंडिया टुडे-सीवोटर के ताजा ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। सर्वे के मुताबिक आज चुनाव होने की स्थिति में एनडीए को कुल 326 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। यह आंकड़ा लोकसभा में बहुमत के लिए जरूरी 272 सीटों से काफी ऊपर है और इसके आधार पर एनडीए एक बार फिर केंद्र में सरकार बनाने की स्थिति में दिखाई देता है। दूसरी तरफ इंडिया गठबंधन को 185 सीटें मिलने का अनुमान सामने आया है, जबकि अन्य दलों, निर्दलीय उम्मीदवारों और विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों के खाते में 32 सीटें जाने की संभावना जताई गई है। हालांकि जनवरी 2026 के पिछले सर्वे की तुलना में एनडीए को लगभग 26 सीटों का नुकसान बताया गया है। यही आंकड़ा इस पूरे सर्वे को दिलचस्प बना देता है, क्योंकि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए बहुमत से काफी आगे खड़ा दिखाई देता है, तो दूसरी ओर विपक्ष भी कुछ बड़े राज्यों में अपनी जमीन मजबूत करता नजर आ रहा है। ऐसे में आंकड़े एक ऐसी राजनीतिक तस्वीर पेश करते हैं, जिसमें सत्ता पक्ष अभी मजबूत है, लेकिन विपक्ष के लिए संभावनाओं के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं।
सियासी गणित को राज्यवार देखा जाए तो तस्वीर और ज्यादा दिलचस्प हो जाती है। देश के सबसे बड़े राजनीतिक रणक्षेत्र उत्तर प्रदेश में विपक्षी गठबंधन को बड़ी बढ़त मिलने का अनुमान सर्वे में सामने आया है। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से इंडिया गठबंधन को 41 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है, जबकि एनडीए करीब 38 सीटों पर सिमटता दिखाई दे रहा है। यह आंकड़ा बीजेपी के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश केंद्र की सत्ता तक पहुंचने के रास्ते में सबसे अहम राज्यों में शामिल है। बेरोजगारी, महंगाई, युवाओं के सवाल, छात्र आंदोलनों और स्थानीय राजनीतिक मुद्दों का असर यहां चुनावी समीकरणों पर पड़ने की संभावना बताई गई है। दूसरी ओर बिहार में तस्वीर एनडीए के पक्ष में ज्यादा मजबूत नजर आती है। सर्वे के अनुसार बिहार में बीजेपी और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले गठबंधन को 28 से 30 सीटों तक मिलने का अनुमान है, जबकि तेजस्वी यादव और इंडिया गठबंधन 10 से 12 सीटों के आसपास रह सकता है। महाराष्ट्र में मुकाबला बेहद करीबी बताया गया है, जहां महा विकास अघाड़ी और महायुति के बीच कड़ा संघर्ष दिखाई देता है। सर्वे के आंकड़ों में इंडिया गठबंधन को 26 से 28 और एनडीए को 20 से 22 सीटें मिलने का अनुमान है। यानी बड़े राज्यों के बदलते समीकरण एनडीए के लिए चेतावनी जरूर हैं।
दक्षिण भारत का राजनीतिक नक्शा भी इस सर्वे में अलग-अलग रंग दिखाता है। केरल, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों में विपक्षी गठबंधन तथा क्षेत्रीय दलों की पकड़ मजबूत रहने का अनुमान लगाया गया है। तमिलनाडु और केरल में एनडीए के लिए लोकसभा सीटों का रास्ता कठिन दिखाई देता है, जबकि आंध्र प्रदेश में तस्वीर इसके बिल्कुल उलट नजर आती है। चंद्रबाबू नायडू के साथ गठबंधन का फायदा एनडीए को मिलने का अनुमान है और राज्य में गठबंधन के लगभग क्लीन स्वीप की संभावना व्यक्त की गई है। यही विरोधाभास राष्ट्रीय चुनाव के वास्तविक गणित को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। एक तरफ उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में बीजेपी का प्रभाव कायम है, तो दूसरी तरफ कुछ बड़े राज्यों में विपक्ष चुनौती खड़ी करता दिखाई दे रहा है। छात्र आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या इन गतिविधियों का असर राष्ट्रीय स्तर पर सरकार की लोकप्रियता पर पड़ा है। सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि असंतोष के मुद्दे जरूर मौजूद हैं, लेकिन उनका सीधा रूपांतरण अभी एनडीए के बहुमत को चुनौती देने वाली स्थिति में होता नजर नहीं आ रहा। जनवरी 2026 की तुलना में 26 सीटों की कमी जरूर विपक्ष के लिए उम्मीद पैदा करती है, लेकिन 326 सीटों का अनुमान सत्ता पक्ष की मौजूदा मजबूती को भी रेखांकित करता है।
प्रधानमंत्री पद की पसंद को लेकर सामने आए आंकड़े भी इस सर्वे को खास बना रहे हैं। सर्वे में नरेंद्र मोदी अब भी सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में आगे दिखाई दे रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक करीब 58 प्रतिशत लोगों ने प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी को अपनी पहली पसंद बताया है। राजनीतिक विरोध, महंगाई, बेरोजगारी और विभिन्न आंदोलनों के बावजूद उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता का यह आंकड़ा बीजेपी के लिए सबसे बड़ा सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। विपक्ष की ओर से राहुल गांधी दूसरे स्थान पर नजर आते हैं और करीब 24 प्रतिशत लोगों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए पसंदीदा बताया है। भारत जोड़ो यात्रा, लगातार सरकार पर हमले और विपक्ष की सक्रिय राजनीति के कारण राहुल गांधी की स्वीकार्यता में सुधार होने का दावा सर्वे के आंकड़ों से किया जा रहा है। तीसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम सामने आता है, जिन्हें करीब 8 प्रतिशत लोगों ने प्रधानमंत्री पद के लिए पसंद किया। बीजेपी समर्थकों के बीच योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता को लेकर भी लगातार चर्चा होती रही है। इस तरह प्रधानमंत्री पद की पसंद के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ अभी भी विपक्ष के नेताओं से काफी आगे है, हालांकि राहुल गांधी की स्थिति पहले की तुलना में मजबूत होती दिखाई जा रही है।
विरोध-प्रदर्शनों और छात्र आंदोलनों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच सर्वे की एक महत्वपूर्ण तस्वीर यह भी है कि सरकार के खिलाफ नाराजगी और प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत लोकप्रियता को अलग-अलग देखा जाना चाहिए। महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे आम मतदाताओं की चिंताओं में शामिल हैं और इनका चुनावी असर आने वाले समय में बढ़ सकता है। युवाओं और जेन-जी वर्ग की राजनीतिक सक्रियता भी अब पहले से ज्यादा दिखाई दे रही है। छात्र आंदोलनों से लेकर रोजगार और शिक्षा से जुड़े सवालों तक, नई पीढ़ी की अपेक्षाएं राजनीतिक दलों के लिए चुनौती बन रही हैं। बावजूद इसके मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि इन मुद्दों ने अभी तक नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता को निर्णायक रूप से कमजोर नहीं किया है। सर्वे 25 हजार से ज्यादा लोगों से बातचीत पर आधारित बताया गया है, इसलिए इसके आंकड़े मौजूदा जनमत का एक महत्वपूर्ण संकेत माने जा सकते हैं, हालांकि किसी भी सर्वे को वास्तविक चुनाव परिणाम की गारंटी नहीं माना जा सकता। चुनाव तक राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं, नए गठबंधन बन सकते हैं और स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय माहौल पर भारी पड़ सकते हैं। खासकर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सीटों का मामूली बदलाव भी राष्ट्रीय आंकड़े को काफी प्रभावित कर सकता है। इसलिए आज के आंकड़ों को मौजूदा राजनीतिक मूड का संकेत माना जाना ज्यादा उचित होगा, अंतिम चुनावी भविष्यवाणी नहीं।
कुल मिलाकर इस सर्वे ने बीजेपी के लिए एक साथ राहत और चेतावनी दोनों सामने रख दी हैं। राहत इसलिए कि अगर आज लोकसभा चुनाव होते हैं तो एनडीए को 326 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिलने का अनुमान है और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की पसंद में 58 प्रतिशत समर्थन के साथ सबसे आगे हैं। चुनौती इसलिए कि जनवरी 2026 के मुकाबले एनडीए की अनुमानित सीटों में 26 की गिरावट हुई है और उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र जैसे निर्णायक राज्यों में विपक्ष मजबूत स्थिति बनाता दिखाई दे रहा है। बिहार में एनडीए की पकड़ बरकरार रहने का अनुमान है, जबकि दक्षिण भारत के कई राज्यों में विपक्ष और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव कायम है। ऐसे में आने वाले महीनों में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मजबूत राज्यों में पकड़ बनाए रखने के साथ-साथ उन क्षेत्रों में नुकसान रोकने की होगी जहां विपक्ष बढ़त बनाता दिख रहा है। दूसरी ओर इंडिया गठबंधन के लिए यह आंकड़े उत्साह पैदा करने वाले जरूर हैं, लेकिन 185 सीटों का अनुमान बताता है कि केंद्र की सत्ता तक पहुंचने के लिए उसे अभी लंबा राजनीतिक रास्ता तय करना होगा। अब असली सवाल यह है कि क्या विपक्ष उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की बढ़त को राष्ट्रीय स्तर की बड़ी चुनावी लहर में बदल पाएगा या एनडीए अपनी संगठनात्मक ताकत और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के सहारे तीसरी बार भी सत्ता का रास्ता साफ कर लेगा। फिलहाल सर्वे का संदेश स्पष्ट है—बीजेपी अभी मुकाबले में सबसे आगे है, लेकिन चुनावी मैदान पूरी तरह एकतरफा नहीं रहा है।





