नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। उत्तर प्रदेश की सड़कों और एक्सप्रेसवे को लेकर सरकार की ओर से विकास की बड़ी तस्वीर पेश की जाती रही है, लेकिन अब इन्हीं परियोजनाओं की गुणवत्ता, लागत, ठेकों और सरकारी प्रचार पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। उपलब्ध दावों और उठाए गए सवालों के अनुसार, एक तरफ सरकार देश में तेजी से बढ़ते हाईवे नेटवर्क, एक्सप्रेसवे और हाई-स्पीड कॉरिडोर को विकास की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है, वहीं दूसरी ओर बारिश के दौरान नई सड़कों के क्षतिग्रस्त होने, सड़क धंसने और निर्माण गुणवत्ता पर उठती शिकायतों ने इस चमकदार तस्वीर के दूसरे पहलू को सामने ला दिया है। सरकार समर्थक दावों में कहा जाता है कि पहले की तुलना में राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण की गति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और हाई-स्पीड कॉरिडोर का नेटवर्क कई गुना बढ़ा है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के कार्यकाल में एक हजार दो सौ किलोमीटर से अधिक एक्सप्रेसवे तैयार होने का दावा भी विकास मॉडल की चर्चा में प्रमुखता से किया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि यदि निर्माण की रफ्तार और परियोजनाओं पर खर्च लगातार बढ़ रहा है तो उनकी गुणवत्ता की स्वतंत्र और निष्पक्ष निगरानी कितनी मजबूत है। इसी विरोधाभास को लेकर अब सड़क निर्माण व्यवस्था, सरकारी प्रचार और ठेकेदारों की जवाबदेही पर बहस तेज हो रही है। हालांकि इन दावों और आरोपों के प्रत्येक हिस्से की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन उठे सवालों ने सार्वजनिक धन से तैयार होने वाली परियोजनाओं की निगरानी को केंद्र में ला दिया है।
सबसे ज्यादा चर्चा लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे को लेकर सामने आई तस्वीरों और वीडियो के बाद शुरू हुई, जिनमें निर्माणाधीन या तैयार सड़क के कुछ हिस्सों में पानी और नमी से जुड़ी समस्याओं को लेकर सवाल उठाए गए। आलोचकों का दावा है कि जिस परियोजना पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, वहां इतनी जल्दी निर्माण संबंधी समस्या सामने आना सामान्य घटना मानकर टाला नहीं जा सकता। इसी संदर्भ में सड़क निर्माण की लागत, प्रति किलोमीटर खर्च और गुणवत्ता नियंत्रण की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। आरोप लगाने वालों का कहना है कि यदि एक किलोमीटर सड़क पर अत्यधिक राशि खर्च होती है तो उसके निर्माण में इस्तेमाल सामग्री, डिजाइन, ड्रेनेज, मिट्टी की जांच, मौसम संबंधी अध्ययन और निर्माण के प्रत्येक चरण की स्वतंत्र निगरानी भी उसी स्तर की होनी चाहिए। दूसरी तरफ सरकारी और परियोजना से जुड़े पक्षों की ओर से खराब मौसम या अन्य तकनीकी कारणों को संभावित वजह बताया जा सकता है। ऐसे में असली सवाल यह है कि सड़क खराब क्यों हुई, जिम्मेदारी किसकी तय हुई और सुधार की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही। किसी तस्वीर या वायरल वीडियो के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय तकनीकी जांच, गुणवत्ता ऑडिट और आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है। यही वह बिंदु है जहां सड़क परियोजनाओं की वास्तविक सफलता केवल उद्घाटन समारोह या विज्ञापनों से नहीं, बल्कि वर्षों तक टिकाऊ रहने वाली निर्माण गुणवत्ता से तय होती है।
इसी बहस के बीच सरकारी विज्ञापन और जनसंपर्क पर होने वाले खर्च को लेकर भी तीखे सवाल सामने आए हैं। प्रस्तुत दावों में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले आठ वर्षों में प्रचार और पब्लिसिटी पर लगभग छह हजार आठ सौ ग्यारह करोड़ रुपये खर्च किए। यह दावा कितना सही है, इसकी पुष्टि आधिकारिक बजट और व्यय दस्तावेजों से होना आवश्यक है, लेकिन यदि आंकड़ा सही है तो यह अपने आप में सार्वजनिक नीति और प्राथमिकताओं पर व्यापक चर्चा का विषय बन सकता है। आलोचना करने वालों का सवाल है कि सरकार की उपलब्धियों की जानकारी जनता तक पहुंचाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का सामान्य हिस्सा है, लेकिन प्रचार पर होने वाला खर्च उस सीमा तक कितना उचित है, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क रखरखाव और स्थानीय बुनियादी सुविधाओं के लिए संसाधनों की आवश्यकता बनी रहती है। दूसरी ओर सरकारें आमतौर पर यह तर्क देती हैं कि जनकल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यों की जानकारी जनता तक पहुंचाने के लिए सूचना एवं प्रचार अभियान आवश्यक हैं। इस पूरे विवाद में असली आवश्यकता पारदर्शी आंकड़ों की है। कितना पैसा किस विभाग ने खर्च किया, किस माध्यम को भुगतान हुआ, किस अभियान पर कितना खर्च हुआ और उसके परिणाम क्या रहे, इन सभी सवालों के सार्वजनिक उत्तर होने चाहिए। यदि विज्ञापन का उद्देश्य सरकारी उपलब्धियों की जानकारी देना है तो उसके खर्च और प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन भी होना चाहिए। यही पारदर्शिता उस आरोप को भी परख सकती है कि सरकारी प्रचार मशीनरी विकास की वास्तविक कमियों से जनता का ध्यान भटकाने का काम कर रही है।
सड़क निर्माण की गुणवत्ता को लेकर उठाए जा रहे सवालों को समझने के लिए उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के उदाहरण भी चर्चा में लाए जा रहे हैं। प्रस्तुत सामग्री में बताया गया है कि लगभग तीन सौ चालीस किलोमीटर लंबे पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर करीब बाईस हजार पांच सौ करोड़ रुपये खर्च हुए और नवंबर 2021 में इसका भव्य उद्घाटन हुआ, जिसमें लड़ाकू विमानों की लैंडिंग ने परियोजना को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया। इसके बाद अक्टूबर 2022 में सुल्तानपुर के पास सड़क के हिस्से में गहरा गड्ढा बनने की खबरों ने गुणवत्ता पर सवाल उठाए। इसी तरह लगभग दो सौ छियानवे किलोमीटर लंबे बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे की लागत करीब चौदह हजार सात सौ सोलह करोड़ रुपये बताई गई और जुलाई 2022 में इसके उद्घाटन के कुछ ही समय बाद बारिश के दौरान जालौन के पास सड़क के क्षतिग्रस्त होने की खबर सामने आई। इन घटनाओं को आलोचक निर्माण गुणवत्ता की समस्या का उदाहरण बताते हैं, जबकि किसी भी परियोजना में वास्तविक दोष निर्धारित करने के लिए तकनीकी जांच और जिम्मेदारी तय करने की आधिकारिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। यदि सड़क निर्माण के कुछ हिस्से वास्तव में निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थे, तो सवाल केवल ठेकेदार पर कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहिए। डिजाइन तैयार करने वाले, निगरानी करने वाले, गुणवत्ता प्रमाणित करने वाले और भुगतान स्वीकृत करने वाले प्रत्येक स्तर की भूमिका की जांच होनी चाहिए। तभी सार्वजनिक धन से बनी परियोजनाओं में वास्तविक जवाबदेही स्थापित हो सकती है।
इसी क्रम में एक और बड़ा दावा सामने आता है, जिसमें करीब पांच सौ चौरानवे किलोमीटर के एक बड़े सड़क प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत छत्तीस हजार दो सौ तीस करोड़ रुपये बताई गई है और कहा गया है कि इसके बारह पैकेज में से आठ पैकेज अदानी एंटरप्राइजेज को मिले। इस संदर्भ में प्रस्तुत सामग्री में यह भी आरोप लगाया गया है कि परियोजना से जुड़े ठेकों और पहले के सड़क निर्माण विवादों के बीच कंपनियों की भूमिका की जांच की जानी चाहिए। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी कंपनी को सरकारी परियोजना का ठेका मिलना अपने आप में अनियमितता या भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है। इसी प्रकार किसी कंपनी का पहले किसी परियोजना में काम करना और बाद में किसी अन्य परियोजना में बोली जीतना भी तब तक दोष सिद्ध नहीं करता, जब तक निविदा प्रक्रिया, पात्रता, तकनीकी मूल्यांकन और अनुबंध की शर्तों में नियमों के उल्लंघन का ठोस प्रमाण न मिले। प्रस्तुत सामग्री में पीएनसी इंफ्राटेक लिमिटेड को लेकर भी गंभीर राजनीतिक संबंधों और ठेकों से जुड़े आरोप लगाए गए हैं। कंपनी के प्रमोटर और प्रबंध निदेशक प्रदीप जैन तथा नवीन जैन को लेकर राजनीतिक संबंधों का दावा किया गया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और आधिकारिक दस्तावेजों की जांच जरूरी है। किसी कारोबारी या राजनीतिक व्यक्ति के रिश्ते मात्र से भ्रष्टाचार सिद्ध नहीं होता। निष्पक्ष जांच का आधार शेयरहोल्डिंग, निदेशक मंडल, लाभार्थी स्वामित्व, निविदा दस्तावेज और निर्णय प्रक्रिया जैसे सत्यापन योग्य रिकॉर्ड होने चाहिए।
मामला तब और गंभीर सवाल पैदा करता है जब किसी ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई की बात सामने आने के साथ ही उसी कंपनी को नए प्रोजेक्ट मिलने के दावे भी किए जाएं। प्रस्तुत सामग्री में पीएनसी इंफ्राटेक लिमिटेड की कथित बीएसई फाइलिंग का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि 17 जुलाई 2026 की फाइलिंग में कंपनी सचिव तपन जैन ने दो नए प्रोजेक्ट समझौतों की जानकारी दी और इनकी कुल कीमत तीन हजार चार सौ तिरासी करोड़ रुपये बताई गई। कथित तौर पर ये परियोजनाएं उत्तर प्रदेश में बाराबंकी से मुस्तफाबाद पैकेज और मुस्तफाबाद से बिश्वरिया पैकेज से संबंधित थीं, जिनकी लागत क्रमशः लगभग एक हजार सात सौ अट्ठाईस करोड़ और एक हजार सात सौ पचपन करोड़ रुपये बताई गई है। यदि किसी सरकारी संस्था की ओर से किसी कंपनी को गैर-प्रदर्शनकारी या दोषपूर्ण माना गया हो और उसी अवधि में उसे नए ठेके भी दिए गए हों, तो इस पूरी प्रक्रिया का दस्तावेजी परीक्षण बेहद जरूरी हो जाता है। हालांकि “ब्लैकलिस्ट”, “नॉन-परफॉर्मर” या “कार्रवाई” जैसे शब्दों का वास्तविक कानूनी अर्थ संबंधित प्राधिकरण के आदेशों और अनुबंध शर्तों से ही तय किया जा सकता है। इसलिए इस मामले में सवाल यह होना चाहिए कि क्या कोई आधिकारिक प्रतिबंध था, उसकी अवधि क्या थी, क्या नई निविदा में कंपनी पात्र थी और किस तकनीकी व वित्तीय प्रक्रिया के आधार पर उसे काम मिला। पारदर्शी दस्तावेज सामने आने पर ही आरोप और वास्तविकता के बीच अंतर स्पष्ट हो सकेगा।
पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू राजनीतिक फंडिंग, ठेके और सत्ता के संभावित संबंधों को लेकर लगाए जा रहे आरोप हैं। आलोचकों का तर्क है कि भारत में बड़े चुनावों में भारी आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है और इसी कारण सार्वजनिक ठेकों को लेकर राजनीतिक प्रभाव की आशंका पर निगरानी बढ़नी चाहिए। लेकिन किसी भी ठेकेदार, कंपनी या राजनीतिक व्यक्ति को बिना प्रमाण भ्रष्ट बताना भी उचित नहीं होगा। वास्तविक लोकतांत्रिक जवाबदेही का रास्ता दस्तावेज, ऑडिट और स्वतंत्र जांच से होकर गुजरता है। यदि किसी परियोजना की लागत हजारों करोड़ रुपये है तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि निविदा में कितनी कंपनियों ने हिस्सा लिया, किसे तकनीकी रूप से योग्य माना गया, किसकी वित्तीय बोली सबसे बेहतर थी, अनुबंध में गुणवत्ता की क्या शर्तें थीं और खराब निर्माण की स्थिति में दंड का प्रावधान क्या था। इसी तरह यह भी जरूरी है कि परियोजना की निगरानी करने वाले स्वतंत्र इंजीनियरों और ऑडिट संस्थाओं की भूमिका राजनीतिक दबाव से मुक्त हो। अमेरिका के 1956 के फेडरल-एड हाईवे एक्ट का उदाहरण देते हुए यह तर्क दिया जा रहा है कि वहां हाईवे निर्माण के साथ गुणवत्ता नियंत्रण और संस्थागत निगरानी को महत्व दिया गया। भारत में भी ऐसी स्वतंत्र और मजबूत व्यवस्था की आवश्यकता पर बहस हो सकती है। सड़क केवल डामर, कंक्रीट और मिट्टी का ढांचा नहीं है; वह जनता के कर से तैयार सार्वजनिक संपत्ति है, इसलिए उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठना लोकतांत्रिक निगरानी का हिस्सा है।
आखिरकार इस पूरे विवाद का केंद्र किसी एक एक्सप्रेसवे, किसी एक कंपनी या किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। असली सवाल यह है कि सार्वजनिक धन से बनने वाली सड़कें कितने समय तक टिकती हैं, उनके निर्माण में निर्धारित मानकों का कितना पालन होता है और खराबी सामने आने पर जवाबदेही किस स्तर तक तय होती है। यदि सरकार विकास की उपलब्धियों का प्रचार करती है तो उसे उन्हीं परियोजनाओं की गुणवत्ता पर उठने वाले सवालों का जवाब भी उतनी ही मजबूती से देना चाहिए। इसी तरह विपक्ष या आलोचक यदि भ्रष्टाचार, राजनीतिक संरक्षण अथवा ठेका प्रक्रिया में अनियमितता का आरोप लगाते हैं तो उन्हें भी दस्तावेजी प्रमाण सार्वजनिक करने चाहिए। जनता को धर्म, जाति और राजनीतिक शोर से आगे बढ़कर यह देखने की जरूरत है कि उसके टैक्स का पैसा कहां और किस प्रक्रिया से खर्च हो रहा है। नागरिकों के लिए मंत्रालयों और सरकारी पोर्टलों पर उपलब्ध निविदा दस्तावेज, कंपनी की वैधानिक फाइलिंग, शेयरहोल्डिंग पैटर्न, गुणवत्ता ऑडिट और शिकायत तंत्र महत्वपूर्ण साधन हो सकते हैं। यदि किसी सड़क परियोजना में गड़बड़ी की आशंका है तो उसका समाधान वायरल तस्वीरों या राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि स्वतंत्र तकनीकी जांच और सार्वजनिक रिपोर्ट से होना चाहिए। एक्सप्रेसवे की चमक तभी वास्तविक विकास मानी जाएगी, जब वह बारिश, भारी यातायात और वर्षों के इस्तेमाल के बाद भी मजबूती से खड़ा रहे। वरना उद्घाटन के मंच, बड़े विज्ञापन और विकास के दावे जनता के उस सवाल का जवाब नहीं दे पाएंगे कि आखिर उसके हजारों करोड़ रुपये की सड़क कितने साल के लिए बनी थी।





