काशीपुर। उत्तराखंड रोडवेज कर्मचारी यूनियन काशीपुर शाखा के बैनर तले कर्मचारियों ने अपनी विभिन्न लंबित मांगों और कथित समस्याओं को लेकर सांकेतिक धरना देकर प्रबंधन के खिलाफ जोरदार आवाज बुलंद की। धरना स्थल पर कर्मचारियों ने “रोड कर्मचारी यूनियन जिंदाबाद”, “हम एक हैं” और “हमारी मांगे पूरी हो” जैसे नारों के साथ अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया। कर्मचारियों का कहना था कि यह प्रदर्शन अचानक लिया गया निर्णय नहीं है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही समस्याओं और प्रबंधन के साथ अपेक्षित संवाद नहीं होने का परिणाम है। धरने के दौरान कर्मचारियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनकी लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है और यदि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो आने वाले समय में आंदोलन का दायरा बढ़ाया जा सकता है। प्रदर्शनकारियों ने माननीय अश चौधरी के समर्थन में भी नारे लगाए। यूनियन पदाधिकारियों का आरोप है कि संगठन लगातार कर्मचारियों से जुड़े विषयों को प्रबंधन के सामने उठाता रहा है, लेकिन कई बार पत्राचार के बावजूद वार्ता के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया। कर्मचारियों का कहना था कि जब समस्याओं को बातचीत के माध्यम से सुलझाया जा सकता है तो उन्हें आंदोलन की स्थिति तक पहुंचने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
यूनियन प्रतिनिधियों के मुताबिक कर्मचारियों की समस्याओं को लेकर संगठन ने अलग-अलग स्तर पर प्रबंधन को अवगत कराने का प्रयास किया। उन्होंने बताया कि 11 तारीख को भी संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजा गया था, जबकि क्षेत्रीय मंत्री कर्मचारी यूनियन की ओर से अधिकारियों से कई बार फोन पर संपर्क कर बातचीत के लिए समय मांगा गया। संगठन का कहना था कि सांकेतिक धरने से पहले ही कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच बैठक हो जाती तो संभव है कि कई मुद्दों का समाधान बातचीत की मेज पर ही निकल आता। प्रदर्शनकारियों ने बताया कि धरना सुबह 10 बजे से निर्धारित किया गया था, लेकिन प्रबंधन की ओर से बातचीत के लिए दोपहर 1 बजे का समय दिया गया। इस समय निर्धारण को लेकर कर्मचारियों ने नाराजगी जाहिर की और सवाल उठाया कि यदि प्रबंधन वास्तव में कर्मचारियों की समस्याओं को समझना चाहता था तो पहले ही बैठक क्यों नहीं बुलाई गई। यूनियन का आरोप है कि संगठन को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है और एक विशेष संगठन को अधिक प्राथमिकता दिए जाने की भावना कर्मचारियों के बीच असंतोष पैदा कर रही है। प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि सभी कर्मचारी संगठनों के साथ समान व्यवहार किया जाए और किसी भी संगठन की मांगों पर निर्णय लेने से पहले सभी पक्षों को सुना जाए।
धरने में सबसे गंभीर मुद्दा कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिलने का सामने आया। उत्तराखंड रोडवेज कर्मचारी यूनियन काशीपुर शाखा के पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि कई कर्मचारियों को लगातार दो से तीन महीने तक वेतन नहीं मिल पाने की परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना था कि विशेष श्रेणी और एजेंसी के माध्यम से कार्य करने वाले कर्मचारियों की आमदनी पहले ही सीमित है और लगभग 15 हजार रुपये के आसपास की मासिक आय में परिवार का भरण-पोषण करना आसान नहीं है। ऐसी स्थिति में यदि दो या तीन महीने तक वेतन ही उपलब्ध न हो तो कर्मचारी के सामने राशन, बच्चों की फीस, बिजली-पानी के बिल, इलाज और अन्य जरूरी खर्च पूरे करने का संकट खड़ा हो जाता है। कर्मचारियों ने कहा कि रक्षाबंधन जैसे महत्वपूर्ण त्योहार के दौरान भी कई परिवार आर्थिक तंगी से जूझते रहे। प्रदर्शनकारियों ने काशीपुर डिपो की व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाते हुए शौचालय की समस्या, यात्रियों की कमी और बस संचालन से जुड़ी परेशानियों को सामने रखा। उनका कहना था कि यदि सरकारी बसों में यात्री कम हो रहे हैं तो केवल चालक और परिचालक को दोषी ठहराने से समस्या दूर नहीं होगी। परिवहन सेवा को बेहतर बनाने के लिए प्रबंधन को यात्री सुविधाओं, रूट व्यवस्था और डिपो की मूलभूत व्यवस्थाओं पर भी ध्यान देना होगा।
प्रदर्शनकारियों ने काशीपुर क्षेत्र में कथित डग्गामारी को लेकर भी तीखा आक्रोश जताया। यूनियन का आरोप है कि बस स्टैंड के बाहर तथा टांडा चौराहे सहित कुछ स्थानों पर निजी बसों द्वारा यात्रियों को उठाया जाता है, जिसके कारण सरकारी बसों को अपेक्षित संख्या में यात्री नहीं मिल पाते। इसके बावजूद जब सरकारी बस की आय कम रहती है तो चालक-परिचालक से जवाब मांगा जाता है और कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। कर्मचारियों ने सवाल उठाया कि यदि सरकारी परिवहन सेवा को यात्रियों का पर्याप्त समर्थन नहीं मिल रहा है और निजी वाहन खुले तौर पर यात्रियों को ले जा रहे हैं तो इसके लिए केवल सरकारी बस के चालक को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है। यूनियन ने डीआर और ओवरटाइम से जुड़े विषयों को भी उठाते हुए कहा कि चालक और परिचालक कई घंटे सड़क पर अपनी ड्यूटी निभाते हैं। धूप, बारिश, यातायात और यात्रियों की विभिन्न परिस्थितियों के बीच लगातार काम करने वाले कर्मचारियों को उनके अतिरिक्त श्रम का उचित लाभ मिलना चाहिए। कर्मचारियों का कहना था कि बस संचालन केवल वाहन चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि चालक-परिचालक यात्रियों की सुरक्षा, सुविधा और समयबद्ध यात्रा की जिम्मेदारी भी संभालते हैं। ऐसे में उनकी ड्यूटी अवधि और अतिरिक्त काम का उचित मूल्यांकन होना जरूरी है। यूनियन ने मांग की कि ड्यूटी और ओवरटाइम से जुड़े नियमों को स्पष्ट किया जाए और कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए पारदर्शी व्यवस्था लागू की जाए।
वेतन भुगतान की निश्चित तारीख तय करने की मांग ने भी धरने के दौरान विशेष रूप से जोर पकड़ा। कर्मचारियों ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उन्हें यह पता नहीं रहता कि अगले महीने का वेतन आखिर किस तारीख को मिलेगा। पहले महीने की 5 या 6 तारीख के आसपास भुगतान होने की स्थिति का उल्लेख करते हुए कर्मचारियों ने कहा कि अब कई बार महीना गुजर जाने के बाद भी वेतन खाते में नहीं पहुंचता। यूनियन ने मांग की कि वेतन भुगतान के लिए अधिकतम एक निश्चित तारीख निर्धारित की जाए और यदि पहली तारीख को भुगतान संभव नहीं है तो कम से कम 7 या 10 तारीख तक कर्मचारियों के खाते में राशि पहुंच जानी चाहिए। कर्मचारियों का कहना था कि निश्चित भुगतान तिथि होने से वे अपने घरेलू खर्चों की योजना बना सकेंगे और बच्चों की फीस, राशन तथा अन्य जरूरी भुगतान समय पर कर सकेंगे। लगातार वेतन में देरी होने पर कर्मचारी पहले उधार लेते हैं और फिर उस रकम पर ब्याज का बोझ भी बढ़ता जाता है। यूनियन ने कहा कि सीमित आय वाले कर्मचारी के लिए दो-तीन महीने की देरी केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि पूरे परिवार की व्यवस्था को प्रभावित करने वाली स्थिति है। बच्चों की पढ़ाई तक प्रभावित होने का खतरा रहता है और कर्मचारी मानसिक दबाव में काम करने को मजबूर होता है। इसलिए वेतन भुगतान को नियमित करना कर्मचारियों की सबसे प्राथमिक मांगों में शामिल है।
आर्थिक परेशानी के साथ-साथ कर्मचारियों ने ड्यूटी और कार्रवाई की प्रक्रिया में कथित असमानता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उनका आरोप है कि किसी यात्री की शिकायत या फोन आने के बाद कई बार कर्मचारी के खिलाफ तत्काल कार्रवाई कर दी जाती है, जबकि शिकायत की वास्तविकता और परिस्थितियों की पूरी जांच नहीं होती। कर्मचारियों ने मांग की कि किसी चालक या परिचालक के खिलाफ शिकायत आने पर पहले लिखित शिकायत दर्ज हो, उसके बाद निष्पक्ष जांच की जाए और संबंधित कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिले। धरने में एक कर्मचारी ने सुझाव दिया कि झूठी शिकायतों पर रोक लगाने के लिए शिकायतकर्ता से लिखित शिकायत के साथ 2000 रुपये जमा कराने की व्यवस्था की जा सकती है। यदि जांच में कर्मचारी दोषी पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई हो, लेकिन शिकायत गलत साबित होने पर जमा रकम से कर्मचारी को हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई की जाए। कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया कि कई बार शिकायत के आधार पर बैग बंद कर दिया जाता है, रूट बदल दिया जाता है या कर्मचारी को ड्यूटी से अलग कर दिया जाता है। उनका कहना था कि ऐसी कार्रवाई से कर्मचारी को आर्थिक नुकसान के साथ मानसिक परेशानी भी झेलनी पड़ती है। यूनियन ने स्पष्ट किया कि वह अनुशासनात्मक कार्रवाई के खिलाफ नहीं है, लेकिन कार्रवाई तथ्यों, प्रमाण और निष्पक्ष जांच के आधार पर होनी चाहिए।
रूट संचालन के दौरान आने वाली जमीनी समस्याओं को भी कर्मचारियों ने धरने के माध्यम से सामने रखा। उनका कहना था कि चालक के सामने हर दिन ऐसी परिस्थितियां आती हैं, जहां उसे यात्रियों की अलग-अलग जरूरतों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। किसी यात्री को शौचालय की आवश्यकता होती है तो कोई समय पर अपने गंतव्य तक पहुंचना चाहता है। ऐसे में बस को किसी उपयुक्त स्थान पर रोकने का निर्णय चालक को तत्काल लेना पड़ता है। कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि कई मार्गों पर यात्रियों के लिए पर्याप्त शौचालय या विश्राम की सुविधा नहीं है, लेकिन बस रोकने पर चालक से जवाब मांग लिया जाता है। हरिद्वार मार्ग का उदाहरण देते हुए कर्मचारियों ने कहा कि यात्रा के दौरान मानवीय जरूरतों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। इसके अलावा कर्मचारियों ने ऑनलाइन चालान की समस्या भी उठाई। उनका कहना था कि सड़क किनारे खड़े यात्रियों को बस में बैठाने के प्रयास में चालक को कई बार ऐसे स्थानों पर रुकना पड़ता है, जहां कैमरे के माध्यम से चालान की संभावना रहती है। कर्मचारियों के अनुसार, कई बार 5 हजार, 10 हजार और 15 हजार रुपये तक के चालान का बोझ सामने आ जाता है, जो सीमित वेतन पाने वाले कर्मचारी के लिए बहुत बड़ी राशि है। यूनियन ने मांग की कि चालकों की वास्तविक परिस्थितियों को समझकर चालान और शिकायत व्यवस्था में मानवीय तथा निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाया जाए।
आंदोलन की अगली दिशा को लेकर उत्तराखंड रोडवेज कर्मचारी यूनियन काशीपुर शाखा ने संकेत दिया कि यदि प्रबंधन कर्मचारियों की समस्याओं पर सकारात्मक रुख अपनाता है और वार्ता के माध्यम से समाधान की ठोस पहल करता है तो आंदोलन को आगे बढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। दूसरी ओर, यदि वेतन, ड्यूटी, कथित कर्मचारी उत्पीड़न, शिकायतों पर एकतरफा कार्रवाई, डग्गामारी और संगठन के साथ संवाद जैसे मुद्दे अनसुलझे रहे तो कर्मचारी आंदोलन को और व्यापक करने पर विचार कर सकते हैं। यूनियन ने पूर्ण बहिष्कार और आवश्यकता पड़ने पर चक्का जाम जैसे कठोर कदमों की चेतावनी भी दी है। कर्मचारियों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं और जनता को परिवहन सुविधा उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका आंदोलन किसी व्यवस्था को बाधित करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि अपने अधिकारों और समस्याओं के समाधान के लिए है। कर्मचारियों ने दोहराया कि संगठन एकजुट है और मांगें पूरी होने तक संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया गया है। अब सभी की निगाहें प्रबंधन और यूनियन के बीच होने वाली बातचीत पर टिकी हैं। यदि दोनों पक्ष गंभीरता से बातचीत करते हैं तो विवाद का समाधान निकाला जा सकता है, लेकिन यदि संवाद फिर टला तो काशीपुर में रोडवेज कर्मचारियों का यह सांकेतिक प्रदर्शन बड़े आंदोलन की भूमिका बन सकता है।





