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हाथियों के हक में बच्चों की हुंकार गूंजी, इंसानी दखल और शोर पर उठे तीखे सवाल

रिंगोड़ा की गोष्ठी में नन्हे पर्यावरण प्रहरी बोले, हाथियों के रास्ते बचाइए, जंगलों में बढ़ता मानवीय दबाव घटाइए और वन्यजीवों के साथ सहअस्तित्व की नई मिसाल कायम कीजिए।

रामनगर। विश्व हाथी दिवस के अवसर पर रिंगोड़ा स्थित वाइल्डलाइफ आर्ट गैलरी में आयोजित विशेष गोष्ठी में स्कूली बच्चों ने हाथियों के संरक्षण, उनके घटते प्राकृतिक आवास और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे गंभीर मुद्दों पर जिस बेबाकी से अपनी आवाज बुलंद की, उसने कार्यक्रम में मौजूद लोगों को गहराई से प्रभावित किया। ग्रेट मिशन, शाइनिंग स्टार और लिटिल स्कॉलर स्कूल के छात्र-छात्राओं ने कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी करते हुए केवल हाथियों के प्रति अपनी संवेदनशीलता ही नहीं दिखाई, बल्कि उनके सामने लगातार बढ़ रही चुनौतियों को लेकर अपनी स्पष्ट समझ भी सामने रखी। बच्चों ने अपने विचारों के माध्यम से यह सवाल उठाया कि विकास की दौड़ में आखिर वन्यजीवों के लिए कितनी जगह बची है और उनके प्राकृतिक जीवन में इंसानी दखल किस सीमा तक उचित है। सामान्य तौर पर बच्चों को पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के विषय पर केवल सुनने वाला वर्ग माना जाता है, लेकिन इस गोष्ठी में उनका अंदाज पूरी तरह अलग नजर आया। उन्होंने तथ्यों, अनुभवों और अपनी सहज समझ के आधार पर हाथियों की परेशानियों को सामने रखा। कार्यक्रम का वातावरण उस समय और अधिक गंभीर हो गया, जब बच्चों ने हाथियों को केवल जंगल का विशाल जीव मानने के बजाय पूरे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके सुरक्षित भविष्य की चिंता व्यक्त की। उनकी बातों में भावनात्मक जुड़ाव के साथ-साथ संरक्षण को लेकर जिम्मेदारी का स्पष्ट भाव भी दिखाई दिया। इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि पर्यावरण संरक्षण की समझ अगर बचपन से विकसित की जाए तो आने वाली पीढ़ी वन्यजीवों के प्रति कहीं अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार समाज तैयार कर सकती है।

गोष्ठी के दौरान बच्चों द्वारा उठाए गए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों का बाधित होना प्रमुख रहा। एक बच्चे ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि हाथियों के पुराने रास्ते प्रकृति ने नहीं, बल्कि इंसानों ने बंद किए हैं और इसी कारण अब इन विशाल वन्यजीवों के सामने आवागमन की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है। उसके इस कथन ने पूरी चर्चा को एक महत्वपूर्ण दिशा दे दी। बच्चों ने समझाया कि हाथी सदियों से जिन मार्गों का इस्तेमाल अपने आवास, पानी और भोजन की तलाश में करते आए हैं, उन रास्तों पर जब सड़कें, भवन, बस्तियां और दूसरी मानवीय गतिविधियां बढ़ जाती हैं तो हाथियों का स्वाभाविक आवागमन प्रभावित होता है। ऐसी स्थिति में कई बार हाथी उन्हीं इलाकों में पहुंच जाते हैं, जहां इंसानी आबादी बस चुकी होती है। इसके बाद संघर्ष की स्थिति पैदा होती है और नुकसान दोनों पक्षों को उठाना पड़ता है। बच्चों का तर्क था कि हाथियों को दोष देने से पहले यह समझना जरूरी है कि वे किसी नए रास्ते पर जानबूझकर नहीं जा रहे होते, बल्कि उनके पुराने मार्गों पर मानव गतिविधियों का दबाव बढ़ चुका है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वन्यजीवों के लिए सुरक्षित गलियारे केवल कागजों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि धरातल पर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है। बच्चों की इस सोच ने यह सवाल भी खड़ा किया कि विकास योजनाएं तैयार करते समय वन्यजीवों के पारंपरिक मार्गों और उनके प्राकृतिक व्यवहार को कितनी गंभीरता से ध्यान में रखा जाता है। इस चर्चा ने उपस्थित लोगों को यह सोचने पर मजबूर किया कि यदि हाथियों के रास्ते सुरक्षित नहीं होंगे तो मानव और हाथी के बीच टकराव की घटनाओं को रोकना बेहद कठिन होगा।

इसी क्रम में बढ़ते शोर और मानवीय गतिविधियों को लेकर भी बच्चों ने अपनी चिंता व्यक्त की। एक बच्चे ने कहा कि लगातार बढ़ता शोर हाथियों के लिए बड़ी परेशानी बनता जा रहा है। बच्चों की नजर में जंगल और उसके आसपास का वातावरण केवल पेड़ों और वन्यजीवों से नहीं बनता, बल्कि वहां मौजूद प्राकृतिक शांति भी उस पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनका मानना था कि जब जंगलों के आसपास अनावश्यक हंगामा, तेज आवाज, वाहनों का दबाव और दूसरे प्रकार का शोर बढ़ता है तो वन्यजीवों का सामान्य व्यवहार प्रभावित हो सकता है। हाथियों जैसे संवेदनशील और सामाजिक प्राणी के लिए शांत वातावरण बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। बच्चों ने इसी बात को अपनी सहज भाषा में सामने रखा और कहा कि मनुष्य को यह समझना होगा कि जंगल केवल उसके मनोरंजन या संसाधनों का स्थान नहीं है। वहां रहने वाले जीवों का भी उतना ही अधिकार है जितना मनुष्य का। चर्चा के दौरान एक बच्चे ने तो यहां तक कहा कि इंसान से ज्यादा खतरनाक कोई जानवर नहीं है, क्योंकि हाथियों के रास्ते रोकने और उनके सामने नई परेशानियां खड़ी करने का काम इंसान ही कर रहा है। इस टिप्पणी ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का ध्यान विशेष रूप से खींचा। बच्चों की यह बात केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि मानव गतिविधियों के कारण पैदा हो रहे वन्यजीव संकट पर एक सीधा सवाल भी थी। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से समाज को यह संदेश दिया कि यदि मनुष्य अपने व्यवहार में बदलाव नहीं लाता तो संरक्षण की तमाम कोशिशें अधूरी रह सकती हैं। उनकी बातों में यह स्पष्ट था कि वन्यजीवों के संरक्षण का अर्थ केवल जंगल बचाना नहीं, बल्कि उनके लिए शांत, सुरक्षित और प्राकृतिक वातावरण कायम रखना भी है।

मानव और वन्यजीव के बीच बढ़ते टकराव को लेकर बच्चों ने केवल समस्याएं गिनाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि समाधान की दिशा में भी अपनी सोच सामने रखी। उन्होंने कहा कि हाथियों और इंसानों के बीच बेहतर तालमेल बनाने की जरूरत है तथा दोनों के अस्तित्व को ध्यान में रखकर ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, जिसमें वन्यजीवों के प्राकृतिक जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप कम हो। बच्चों के विचारों में यह बात बार-बार सामने आई कि जंगलों के आसपास रहने वाले लोगों को हाथियों के व्यवहार और उनके आवागमन के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में हाथियों की आवाजाही नियमित है तो वहां लोगों को पहले से सावधान करने, संवेदनशील स्थानों की पहचान करने और सुरक्षित दूरी बनाए रखने जैसे उपायों को मजबूत किया जाना चाहिए। बच्चों ने यह भी समझने की कोशिश की कि केवल हाथियों को जंगल में रखने से संरक्षण पूरा नहीं होता, बल्कि उनके भोजन, पानी, आवास और प्राकृतिक मार्गों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। गोष्ठी में उनकी बातों से यह साफ दिखाई दिया कि नई पीढ़ी वन्यजीव संरक्षण को किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं मानती। वे इसे सामूहिक सामाजिक दायित्व के रूप में देख रहे हैं। बच्चों ने यह संकेत दिया कि अगर समाज पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाए, जंगलों में अनावश्यक दखल घटाए और वन्यजीवों के आवास को सम्मान दे तो संघर्ष की कई परिस्थितियों को बनने से पहले ही रोका जा सकता है। उनकी सोच ने यह भी स्पष्ट किया कि संरक्षण की शुरुआत कानून या सरकारी योजना से पहले सामाजिक समझ और संवेदनशीलता से होती है। इस लिहाज से रिंगोड़ा में हुई यह गोष्ठी बच्चों के लिए केवल प्रतियोगिता या चर्चा का मंच नहीं रही, बल्कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की समझ विकसित करने का महत्वपूर्ण अवसर भी बनी।

कार्यक्रम में निर्णायक अतिथियों के रूप में श्री हरेंद्र बरगली जी, निदेशक कॉर्बेट फाउंडेशन के तथा वरिष्ठ प्रकृतिविद एवं नेचुरलिस्ट राजेश भट्ट जी मौजूद रहे। दोनों ने बच्चों की प्रस्तुतियों और उनके आत्मविश्वास को ध्यानपूर्वक सुना और उनके विचारों की सराहना की। बच्चों द्वारा हाथियों से जुड़े विषयों पर इतनी गंभीरता के साथ विचार रखने को उन्होंने सकारात्मक संकेत बताया। उनका कहना था कि किसी गंभीर पर्यावरणीय विषय को समझना एक बात है, लेकिन मंच पर खड़े होकर अपनी सोच को स्पष्ट और आत्मविश्वासपूर्ण तरीके से व्यक्त करना अलग चुनौती होती है। बच्चों ने इस चुनौती को जिस तरह स्वीकार किया, वह सराहनीय है। उनके अनुसार हाथियों के सामने मौजूद समस्याओं पर बच्चों की समझ यह दर्शाती है कि पर्यावरणीय शिक्षा का प्रभाव केवल किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे बच्चों के व्यवहार और सोच से भी जोड़ना जरूरी है। उन्होंने बच्चों को आने वाली पीढ़ी की उम्मीद बताते हुए कहा कि आज जिन विषयों पर चर्चा हो रही है, उन्हें भविष्य में समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी इन्हीं बच्चों के कंधों पर होगी। निर्णायक अतिथियों ने बच्चों के आत्मविश्वास, तर्क प्रस्तुत करने के तरीके और वन्यजीवों के प्रति उनकी संवेदनशीलता को विशेष रूप से सराहा। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने भी महसूस किया कि बच्चों ने हाथियों के संरक्षण को लेकर जिस गंभीरता का परिचय दिया, वह सामान्य जागरूकता कार्यक्रमों से कहीं आगे की बात है। उनकी प्रस्तुतियों ने यह साबित किया कि यदि बच्चों को सही मंच और सही विषय दिया जाए तो वे समाज के सामने कई ऐसे सवाल खड़े कर सकते हैं, जिन पर बड़े स्तर पर भी गंभीर चर्चा की जरूरत होती है।

प्रतियोगिता के परिणामों ने भी कार्यक्रम को खास बना दिया, जिसमें आयुषी नेगी ने प्रथम, श्रेयसी तिवारी ने द्वितीय और अभिषेक जोशी ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। प्रतिभागियों की प्रस्तुतियों में हाथियों के प्राकृतिक जीवन, मानव गतिविधियों के बढ़ते प्रभाव, जंगलों में शोर, पारंपरिक रास्तों के अवरुद्ध होने और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे विषय प्रमुखता से उभरकर सामने आए। बच्चों ने अपनी बात रखने के दौरान यह दिखाया कि उन्हें हाथियों के संरक्षण की जरूरत केवल एक पर्यावरणीय मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य के भविष्य से जुड़े सवाल के रूप में भी समझ में आती है। उनके विचारों में जंगल, वन्यजीव और मानव जीवन के बीच संबंधों को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण दिखाई दिया। प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली आयुषी नेगी, द्वितीय स्थान पर रहीं श्रेयसी तिवारी और तृतीय स्थान हासिल करने वाले अभिषेक जोशी सहित सभी प्रतिभागियों ने कार्यक्रम में अपनी भूमिका निभाकर आयोजन को सार्थक बनाया। बच्चों के उत्साह से यह भी स्पष्ट हुआ कि विद्यालय स्तर पर यदि वन्यजीव और पर्यावरण से जुड़े विषयों को चर्चा का हिस्सा बनाया जाए तो विद्यार्थियों में संवेदनशीलता के साथ-साथ तार्किक सोच भी विकसित हो सकती है। कार्यक्रम में भाग लेने वाले बच्चों ने एक-दूसरे के विचारों को सुना और हाथियों से संबंधित अलग-अलग पहलुओं को समझने का अवसर प्राप्त किया। इस पूरी प्रक्रिया ने प्रतियोगिता को महज स्थान हासिल करने की गतिविधि के बजाय सीखने और जागरूकता फैलाने का माध्यम बना दिया। यही वजह रही कि आयोजन समाप्त होने के बाद भी बच्चों द्वारा उठाए गए सवाल और उनकी कही बातें उपस्थित लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी रहीं।

आयोजन को सफल बनाने में वाइल्डलाइफ आर्ट गैलरी की पूरी टीम की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। कार्यक्रम की तैयारी से लेकर बच्चों के लिए मंच उपलब्ध कराने, गोष्ठी को व्यवस्थित रूप देने और प्रतिभागियों को अपनी बात रखने का अवसर देने तक टीम के सदस्यों ने सक्रियता दिखाई। संजय छिमवाल, हिमांशु तिरुआ, महेंद्र पवार, रवि बिष्ट, दीप मिलखानी, हरिशंकर देव सहित टीम के अन्य सदस्यों ने आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ऐसे कार्यक्रमों की सफलता केवल मंच पर होने वाली चर्चा से तय नहीं होती, बल्कि इसके पीछे कई लोगों की मेहनत और समन्वय काम करता है। वाइल्डलाइफ आर्ट गैलरी ने बच्चों को ऐसा वातावरण उपलब्ध कराया, जहां वे बिना झिझक अपने विचार व्यक्त कर सके। इस तरह के मंच खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि बच्चों में मौजूद पर्यावरणीय संवेदनशीलता को सार्वजनिक संवाद से जोड़ने का अवसर मिलता है। टीम की ओर से किए गए प्रयासों ने बच्चों के बीच वन्यजीव संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ अभिभावकों और अन्य उपस्थित लोगों को भी इस विषय पर सोचने का मौका दिया। आयोजन की पूरी प्रक्रिया में यह संदेश लगातार दिखाई देता रहा कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी केवल विशेषज्ञों या संरक्षण संस्थाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए। समाज के अलग-अलग वर्गों को इस दिशा में अपनी भूमिका समझनी होगी। बच्चों को मंच देकर उनकी आवाज को सामने लाना इसी सामूहिक प्रयास की एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर सामने आया।

समापन के अवसर पर उभरा सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि हाथियों के संरक्षण की लड़ाई केवल जंगल की सीमाओं के भीतर नहीं लड़ी जा सकती। इसके लिए उन सभी परिस्थितियों पर ध्यान देना होगा, जो हाथियों को उनके प्राकृतिक जीवन से दूर कर रही हैं। पारंपरिक रास्तों का संरक्षण, हाथियों के आवास में मानवीय हस्तक्षेप को नियंत्रित करना, अनावश्यक शोर से उन्हें बचाना और उनके प्राकृतिक व्यवहार को समझना ऐसे कदम हैं, जिन पर समाज को गंभीरता से काम करना होगा। गोष्ठी में बच्चों ने जिस स्पष्टता के साथ अपनी बात रखी, उसने यह साबित किया कि पर्यावरणीय संकट को लेकर नई पीढ़ी की समझ तेजी से विकसित हो रही है। उन्होंने यह सवाल भी अप्रत्यक्ष रूप से सामने रखा कि जब जंगल और वन्यजीवों का अस्तित्व मानव जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण है तो उनके संरक्षण की जिम्मेदारी केवल वन विभाग या संरक्षण संस्थाओं पर क्यों छोड़ी जाए। हाथियों को सुरक्षित रखने के लिए स्थानीय समुदायों, विद्यालयों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। रिंगोड़ा की इस गोष्ठी ने बच्चों की आवाज के माध्यम से समाज को यही याद दिलाया कि हाथी केवल जंगल की पहचान नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि उनके रास्ते, आवास और प्राकृतिक जीवन को सुरक्षित रखा गया तो मानव और वन्यजीव के बीच बेहतर संतुलन संभव है। विश्व हाथी दिवस पर आयोजित यह कार्यक्रम इसी उम्मीद के साथ संपन्न हुआ कि बच्चों की आवाज केवल एक दिन की चर्चा बनकर न रह जाए, बल्कि हाथियों और समूचे वन्यजीवन की सुरक्षा के लिए समाज में स्थायी जागरूकता का आधार बने।

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