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बारिश थमी तो जलभराव भी हुआ रवाना, लेकिन नालियों में भरा कचरा खोल गया शहर की बड़ी चिंता

नगर निगम की तत्परता से बारिश का पानी जल्द उतरा, लेकिन ग्राउंड जीरो पर नालियों में प्लास्टिक और कचरे का अंबार दिखा, सवाल उठा आखिर जागरूकता के बावजूद लोग कब बदलेंगे अपनी आदतें।

काशीपुर। सुबह हुई बारिश ने एक बार फिर शहर की जल निकासी व्यवस्था की परीक्षा ली, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ बदली हुई दिखाई दी। बारिश के दौरान कई इलाकों में पानी सड़कों पर जमा हुआ, मगर लंबे समय तक लोगों को जलभराव के बीच फंसे रहने की नौबत नहीं आई। बारिश थमने के कुछ ही समय बाद अधिकांश स्थानों से पानी उतरने लगा। इसे नगर निगम प्रशासन की मानसून पूर्व तैयारियों और महापौर दीपक बाली की लगातार सक्रियता का परिणाम माना जा रहा है। महापौर के निर्देश मिलते ही नगर निगम का सफाई अमला विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हो गया और जल निकासी के रास्तों को खोलने में जुट गया। हालांकि, इसी बारिश ने शहर के सामने एक दूसरी गंभीर तस्वीर भी रख दी। सड़क किनारे और नालियों के भीतर जमा प्लास्टिक, पॉलीथिन, घरेलू कचरा और अन्य अपशिष्ट ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर बार-बार जागरूक करने के बावजूद नागरिक नालियों को कूड़ेदान की तरह इस्तेमाल करना कब बंद करेंगे। ‘सहर प्रजातंत्र’ की ग्राउंड जीरो पड़ताल में कई स्थानों पर नालियां कचरे से अटी मिलीं, जिससे साफ हुआ कि जलभराव की समस्या केवल बारिश की मात्रा से जुड़ी नहीं है, बल्कि नागरिक व्यवहार भी इसका बड़ा कारण बन रहा है।

महापौर पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद दीपक बाली ने काशीपुर की पुरानी जलभराव की समस्या को प्रमुख चुनौतियों में शामिल किया था। मानसून के दौरान शहर के अनेक हिस्सों में पानी भरना वर्षों से लोगों के लिए परेशानी का कारण रहा है। कहीं बाजारों में आवाजाही प्रभावित होती थी तो कहीं आवासीय क्षेत्रों में घरों के सामने पानी जमा होने से लोगों को घंटों मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। बीते मानसून के दौरान स्थिति का जायजा लेने के बाद महापौर ने नगर निगम अधिकारियों के साथ विस्तृत चर्चा की और जल निकासी की वास्तविक स्थिति को समझने का प्रयास किया। इसके बाद नाले-नालियों की सफाई, जल निकासी के मार्गों को दुरुस्त करने और संवेदनशील स्थानों पर निगरानी बढ़ाने की दिशा में काम शुरू किया गया। महापौर की ओर से शहरवासियों से भी लगातार सहयोग की अपील की गई। लोगों से कहा गया कि सड़क, नाली और जल निकासी वाले स्थानों पर कूड़ा, पॉलीथिन, गोबर अथवा निर्माण सामग्री न फेंकी जाए, क्योंकि थोड़ी सी लापरवाही बारिश के समय बड़े अवरोध का रूप ले लेती है। नगर निगम का दावा है कि इस वर्ष मानसून को ध्यान में रखते हुए पहले से ही नालों और छोटी-बड़ी नालियों की सफाई कराई गई है, जिसका असर आज हुई बारिश के बाद देखने को मिला।

बारिश के बाद ‘सहर प्रजातंत्र’ की टीम जब शहर में जलभराव की स्थिति का जायजा लेने ग्राउंड जीरो पर पहुंची तो तस्वीर का एक दूसरा पहलू सामने आया। कई स्थानों पर नालियों के भीतर प्लास्टिक की थैलियां, बोतलें, घरेलू कचरा और दूसरे अपशिष्ट फंसे हुए नजर आए। कुछ जगहों पर नालियों का प्रवाह कूड़े की वजह से बाधित दिखाई दिया, जबकि आसपास की सड़कों पर भी लोगों द्वारा फेंका गया कचरा नजर आया। यह स्थिति उस समय और गंभीर हो जाती है, जब नगर निगम लगातार सफाई अभियान चलाने और नालियों की नियमित सफाई का दावा कर रहा है। सवाल यह नहीं है कि सफाई कर्मचारी नालियां साफ कर रहे हैं या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि सफाई के बाद दोबारा उनमें कचरा कौन डाल रहा है। यदि एक तरफ नगर निगम कर्मचारी घंटों मेहनत करके नालियों से कचरा निकालें और दूसरी तरफ वही कचरा कुछ समय बाद फिर नालियों में पहुंच जाए, तो जल निकासी की व्यवस्था कितनी भी बेहतर क्यों न हो, उसका असर सीमित रह जाएगा। आज के जलभराव ने इसी विरोधाभास को सामने ला दिया। बारिश के बाद तेजी से पानी उतरना राहत की बात है, लेकिन नालियों में जमा कचरा यह चेतावनी भी दे रहा है कि समस्या की जड़ तक पहुंचे बिना स्थायी समाधान संभव नहीं है।

शहर में जलभराव को लेकर केवल नगर निगम को जिम्मेदार ठहराना भी पूरी तस्वीर नहीं होगी। निस्संदेह जल निकासी व्यवस्था को बेहतर बनाना, नालों की सफाई कराना और बारिश के दौरान त्वरित कार्रवाई करना स्थानीय निकाय की जिम्मेदारी है, लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर कचरा डालने से बचना नागरिकों का भी उतना ही महत्वपूर्ण दायित्व है। अक्सर देखा जाता है कि घरों और दुकानों से निकलने वाला कचरा निर्धारित स्थान तक पहुंचाने के बजाय सड़क किनारे, खाली प्लॉट या सीधे नाली में डाल दिया जाता है। पॉलीथिन और प्लास्टिक विशेष रूप से खतरनाक साबित होते हैं, क्योंकि ये पानी के साथ बहकर नालियों के मुहाने और पाइपों में फंस जाते हैं। इसके बाद थोड़ी देर की तेज बारिश भी जल निकासी को रोकने के लिए पर्याप्त हो जाती है। गोबर और अन्य ठोस अपशिष्ट भी नालियों में पहुंचकर पानी के प्रवाह को प्रभावित करते हैं। नगर निगम की ओर से लोगों को लगातार जागरूक किए जाने के बावजूद यदि यह सिलसिला जारी रहता है तो शहर को हर मानसून में इसी तरह की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए अब जरूरत केवल अपील करने की नहीं, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी को व्यवहार में उतारने की है।

नगर निगम की ओर से मानसून से पहले नाले-नालियों की सफाई पर जोर दिया गया है। सफाई कर्मियों को संवेदनशील स्थानों पर सक्रिय रखने के साथ बारिश के दौरान जल निकासी की स्थिति पर नजर रखने के निर्देश भी दिए गए हैं। महापौर दीपक बाली का कहना है कि काशीपुर नगर निगम शहरवासियों को जलभराव से राहत दिलाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और इस दिशा में लगातार काम किया जा रहा है। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि लक्ष्मीपुर माइनर कवरिंग कार्य पूरा होने के बाद शहर की जल निकासी व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इस परियोजना को शहर की जलभराव समस्या के समाधान की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। लंबे समय से बारिश के दौरान प्रभावित होने वाले इलाकों के लिए यह कार्य उम्मीद की वजह बना हुआ है। हालांकि, किसी भी बड़े निर्माण या आधारभूत परियोजना का लाभ तभी पूरी तरह सामने आएगा, जब उसके साथ शहर की छोटी नालियों और जल निकासी मार्गों को भी साफ रखा जाए। यदि मुख्य निकासी मार्ग दुरुस्त हो जाएं लेकिन मोहल्लों की नालियां प्लास्टिक और घरेलू कचरे से बंद रहें, तो पानी मुख्य सिस्टम तक पहुंचेगा ही नहीं। इसलिए बड़े प्रोजेक्ट और नागरिक अनुशासन दोनों को एक साथ आगे बढ़ाना जरूरी है।

आज की बारिश ने काशीपुर को एक अहम संदेश भी दिया है। शहर में जलभराव की स्थिति पहले की तुलना में जल्दी सामान्य होना राहत जरूर देता है, लेकिन यह मान लेना उचित नहीं होगा कि समस्या पूरी तरह समाप्त हो गई है। बारिश की तीव्रता, समय और जल निकासी की परिस्थितियां हर बार अलग हो सकती हैं। किसी दिन लगातार कई घंटे तक तेज बारिश होती है तो नालियों पर दबाव कई गुना बढ़ सकता है। ऐसे में यदि जल निकासी के छोटे रास्ते कचरे से बंद रहे तो बड़े नाले और मुख्य ड्रेनेज सिस्टम भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगे। ग्राउंड जीरो पर मिली तस्वीरों ने इसी खतरे की ओर ध्यान खींचा है। एक ओर नगर निगम का सफाई अमला बारिश के बीच सक्रिय दिखाई देता है, दूसरी ओर नागरिकों द्वारा नालियों में डाला गया कचरा उसी व्यवस्था के सामने चुनौती बनकर खड़ा है। ऐसे में शहरवासियों को यह समझना होगा कि नाली में फेंकी गई एक प्लास्टिक थैली केवल कचरा नहीं, बल्कि बारिश के समय पूरे मोहल्ले के लिए जलभराव का कारण बन सकती है। यदि नागरिक इस छोटी-सी बात को गंभीरता से समझ लें तो नगर निगम की मेहनत का परिणाम कई गुना बेहतर हो सकता है।

काशीपुर की मौजूदा स्थिति को देखते हुए अब जलभराव के मुद्दे पर जिम्मेदारी तय करने की बहस को एक व्यापक दिशा देने की आवश्यकता है। नगर निगम को अपनी सफाई व्यवस्था और निगरानी को लगातार मजबूत करना होगा, वहीं नागरिकों को भी यह संकल्प लेना होगा कि वे नालियों, सड़कों और सार्वजनिक स्थानों को कचरा फेंकने की जगह नहीं बनाएंगे। दुकानदारों, आवासीय क्षेत्रों, बाजारों और कॉलोनियों में स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को यह समझाना जरूरी होगा कि बारिश के मौसम में कचरा प्रबंधन सीधे जल निकासी से जुड़ा विषय है। केवल बारिश के बाद सफाई करने से समस्या का स्थायी हल नहीं निकलेगा; बारिश से पहले, बारिश के दौरान और बारिश के बाद लगातार निगरानी आवश्यक होगी। महापौर दीपक बाली द्वारा जलभराव को प्राथमिकता देने और लक्ष्मीपुर माइनर कवरिंग जैसे कार्यों को आगे बढ़ाने की कोशिश निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन शहर की तस्वीर तभी स्थायी रूप से बदलेगी जब प्रशासनिक प्रयासों के साथ नागरिक सहयोग भी दिखाई देगा। आज की बारिश ने राहत और चेतावनी दोनों दी हैं—राहत इसलिए कि पानी ज्यादा देर नहीं रुका, और चेतावनी इसलिए कि नालियों में मौजूद कचरा भविष्य के बड़े जलभराव का कारण बन सकता है। अब सवाल शहरवासियों के सामने है कि क्या जागरूकता के बावजूद नालियों में कचरा डालने की आदत बदलेगी, या हर बारिश के बाद काशीपुर को इसी सवाल का सामना करना पड़ेगा।

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