रामनगर। कॉर्बेट के पाखरो टाइगर सफारी प्रकरण को पांच वर्ष का लंबा समय गुजर चुका है, लेकिन इस बहुचर्चित मामले की तस्वीर आज भी पूरी तरह साफ नहीं हो सकी है। अगस्त 2021 में सामने आए इस विवाद ने उत्तराखंड के वन महकमे से लेकर देश की पर्यावरणीय और न्यायिक व्यवस्था तक को हिला दिया था। शुरुआत में पाखरो क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पेड़ों के अवैध कटान की चर्चा हुई और दावा हजारों पेड़ों तक पहुंच गया। मामला इतना गंभीर बना कि दिल्ली हाईकोर्ट, नैनीताल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक इसकी गूंज पहुंची। केंद्र और राज्य सरकार की अलग-अलग संस्थाओं के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर की कई जांच एजेंसियों ने अपने-अपने स्तर पर पड़ताल की। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी, केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, सेंट्रल जू अथॉरिटी, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया, सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी, उत्तराखंड विजिलेंस, विभागीय जांच समितियां, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, कैग और एनजीटी से जुड़ी जांच भी इस प्रकरण तक पहुंची। इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल आज भी जस का तस है कि जिन पेड़ों के बड़े पैमाने पर कटने की चर्चा हुई, उनका वास्तविक भौतिक सत्यापन और बरामदगी आखिर किस स्तर पर हुई। जांच आगे बढ़ती रही, रिपोर्टें आती रहीं और आंकड़ों में लगातार बदलाव दिखाई देता रहा, लेकिन कटे हुए पेड़ों की अंतिम स्थिति को लेकर तस्वीर पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हो पाई। यही वजह है कि पांच साल बाद भी पाखरो प्रकरण उत्तराखंड के वन इतिहास का ऐसा अध्याय बना हुआ है, जिसमें जांच की लंबी श्रृंखला तो दिखाई देती है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष को लेकर अब भी कई सवाल हवा में तैर रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जिस विवाद ने शुरुआती दौर में करीब 10 हजार पेड़ों के कथित अवैध कटान के आरोपों के कारण देशभर में सुर्खियां बटोरी थीं, उसी प्रकरण में आगे चलकर जांच एजेंसियों के आंकड़े लगातार नीचे आते चले गए। एक तरफ शुरुआती चर्चाओं में हजारों पेड़ों के गायब होने की बात सामने आई, वहीं फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की जांच में लगभग 6093 पेड़ों के कटान की पुष्टि बताई गई। इसके बाद जब सीबीआई की टीम ने मौके की स्थिति को समझने के लिए विभिन्न विशेषज्ञ संस्थाओं के अधिकारियों के साथ निरीक्षण किया, तो आंकड़ा और घटकर करीब 819 संभावित पेड़ों तक पहुंच गया। इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण अंतर यह भी रहा कि कई आंकड़े मौके की परिस्थितियों, सैटेलाइट इमेजरी और वैज्ञानिक आकलन के आधार पर संभावित बताए गए, जबकि कुछ मामलों में वास्तविक रूप से काटे गए पेड़ों की संख्या का भौतिक सत्यापन किया गया। प्रकरण में 163 पेड़ों को काटने की अनुमति होने की बात सामने आई, लेकिन मौके पर 260 पेड़ों के कटे होने की पुष्टि हुई। इनमें 41 पेड़ों को वन विकास निगम ने गलती से काटे जाने की बात स्वीकार की। खास बात यह रही कि ये 260 पेड़ मौके पर बरामद भी हो गए। इसके उलट जिन हजारों पेड़ों के कटान का दावा प्रारंभिक दौर में चर्चा का केंद्र बना, उनकी बरामदगी या बिक्री और भंडारण की अंतिम स्थिति को लेकर वैसी स्पष्टता सामने नहीं आई। इसी विरोधाभास ने मामले को और पेचीदा बना दिया है। सवाल यह नहीं है कि जांच हुई या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि इतनी लंबी जांच प्रक्रिया के बाद भी कथित अवैध कटान के वास्तविक आकार और उससे जुड़े लकड़ी के भौतिक साक्ष्य को लेकर अंतिम तस्वीर क्यों स्पष्ट नहीं हो पाई।
पाखरो टाइगर सफारी का विवाद केवल वन विभाग के प्रशासनिक फैसलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसकी गंभीरता न्यायपालिका के स्तर पर भी सामने आई। अगस्त 2021 में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की जांच के लिए नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी को सक्रिय किया। इसके बाद नवंबर 2021 में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने भी इस प्रकरण की अलग जांच शुरू कर दी। इसी दौरान नैनीताल हाईकोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा। इसके बाद उत्तराखंड के प्रमुख वन संरक्षक हॉफ और पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ की समिति ने मौके का निरीक्षण किया और घटनाक्रम से जुड़े तथ्यों को समझने का प्रयास किया। मामला यहीं नहीं रुका। फरवरी 2022 में विभागीय जांच समिति बनाई गई, जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन पीसीसीएफ कपिल जोशी ने की। मार्च 2022 में सेंट्रल जू अथॉरिटी भी जांच प्रक्रिया में शामिल हो गया। इसी महीने सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी ने भी प्रकरण की स्वतः पड़ताल शुरू की। इसके बाद उत्तराखंड सरकार ने विजिलेंस जांच के निर्देश दिए और अगस्त 2022 से विजिलेंस ने अपना काम शुरू किया। सितंबर 2022 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने भी मामले से संबंधित पत्र मिलने के बाद जांच प्रारंभ कर दी। इस तरह एक ही प्रकरण पर अलग-अलग संस्थाओं की जांच की परतें जुड़ती चली गईं। अदालतों की निगरानी, केंद्र की संस्थाओं की पड़ताल और राज्य स्तरीय जांचों के बावजूद मामला किसी एक निर्णायक निष्कर्ष तक पहुंचने के बजाय लगातार नए सवाल पैदा करता रहा। यही वजह है कि पाखरो प्रकरण आज भी उत्तराखंड के सबसे चर्चित वन विवादों में शामिल है।
समय बीतने के साथ इस मामले में जांच का दायरा लगातार विस्तृत होता गया और वर्ष 2023 तक कई बड़ी संस्थाएं इसकी पड़ताल से जुड़ चुकी थीं। कैग, एनजीटी, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय ने भी अपने-अपने स्तर पर मामले की जांच शुरू की। इतने बड़े स्तर पर जांच होने से स्वाभाविक उम्मीद जगी कि अब पाखरो टाइगर सफारी से जुड़े सभी सवालों का ठोस उत्तर सामने आएगा और यह स्पष्ट हो जाएगा कि वास्तविकता में कितने पेड़ काटे गए, किन परिस्थितियों में काटे गए और उनकी लकड़ी का आगे क्या हुआ। लेकिन जांच के दौरान सामने आए आंकड़ों ने कहानी को और उलझा दिया। अनुमति प्राप्त पेड़ों की संख्या 163 बताई गई, जबकि मौके पर 260 पेड़ों के काटे जाने की पुष्टि हुई। इन 260 में से 41 पेड़ों के संबंध में वन विकास निगम ने गलती से कटान की बात स्वीकार की। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि ये 260 पेड़ मौके पर बरामद हो गए थे। मगर विवाद का मूल केंद्र इससे कहीं बड़ा था। शुरुआती दौर में जिस कथित 10 हजार पेड़ों के कटान की चर्चा ने पूरे देश का ध्यान खींचा था, वह संख्या जांच के विभिन्न चरणों में लगातार बदलती रही। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने 6093 पेड़ों के कटान की बात कही, जबकि सीबीआई और उसके साथ मौके का आकलन करने वाली टीम ने परिस्थितियों तथा उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर करीब 819 पेड़ों के संभावित कटान की बात मानी। यानी शुरुआती दावे से लेकर अंतिम संभावित आंकड़े तक भारी अंतर दिखाई देता है। इस अंतर ने यह सवाल और गंभीर कर दिया कि आखिर वह कौन-सा वैज्ञानिक, भौतिक और दस्तावेजी आधार था, जिसके चलते संख्या हजारों से घटते-घटते सैकड़ों तक पहुंच गई।
सीबीआई की जांच के दौरान मामले की वास्तविक स्थिति को परखने के लिए केवल एक विभाग के अधिकारियों पर निर्भरता नहीं रखी गई, बल्कि कई विशेषज्ञ संस्थाओं को साथ लेकर मौके का निरीक्षण किया गया। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के अधिकारियों के साथ केंद्रीय लोक निर्माण विभाग, वन अनुसंधान संस्थान, उत्तराखंड वन विभाग और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के अधिकारियों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया। जांच टीम ने कॉर्बेट क्षेत्र में पहुंचकर उपलब्ध परिस्थितियों, भू-भाग और पेड़ों की स्थिति को समझने का प्रयास किया। वैज्ञानिक आकलन, सैटेलाइट इमेजरी और मौके की परिस्थितियों को मिलाकर टीम ने यह संभावना जताई कि क्षेत्र में करीब 819 पेड़ काटे गए होंगे। यहां ‘संभावित’ शब्द अपने आप में इस प्रकरण की जटिलता को सामने रखता है, क्योंकि शुरुआती दौर में जिस संख्या को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा हुई थी, वह बाद की वैज्ञानिक जांच में उसी रूप में कायम नहीं रह सकी। दूसरी ओर 163 पेड़ों की अनुमति और 260 पेड़ों के मौके पर कटे होने की पुष्टि एक अलग तथ्य था, जिसका भौतिक आधार भी सामने आया। 41 पेड़ों के गलती से काटे जाने की जिम्मेदारी वन विकास निगम की ओर से स्वीकार किए जाने के बाद इस हिस्से की स्थिति अपेक्षाकृत स्पष्ट हुई और 260 पेड़ों की मौके पर बरामदगी भी हुई। मगर कथित बड़े पैमाने के अवैध कटान के संदर्भ में वही स्पष्टता दिखाई नहीं दी। जांच के इतने चरणों के बाद भी यह सवाल बना रहा कि यदि सैकड़ों पेड़ वास्तव में काटे गए थे, तो उनकी लकड़ी का क्या हुआ, वह कहां गई, किसके कब्जे में रही और क्या उसकी कोई विस्तृत बरामदगी या दस्तावेजी श्रृंखला जांच एजेंसियों के सामने आई। यही प्रश्न इस पूरे विवाद को आज भी चर्चा के केंद्र में रखता है।
पांच साल की इस पूरी कहानी में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला पहलू जांच की संख्या नहीं, बल्कि उसके बावजूद बने हुए सवाल हैं। एक ओर करीब 12 अलग-अलग जांचों और समितियों का उल्लेख सामने आता है, दूसरी तरफ अवैध रूप से काटे गए पेड़ों की वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े दिखाई देते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश से लेकर केंद्रीय संस्थाओं की जांच, नैनीताल हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से लेकर राज्य की समितियों तक, सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी से लेकर विजिलेंस, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय तक कई स्तरों पर पड़ताल हुई। इसके अलावा कैग और एनजीटी से जुड़ी प्रक्रिया ने भी इस प्रकरण को गंभीरता दी। इतने व्यापक संस्थागत हस्तक्षेप के बाद सामान्य तौर पर उम्मीद की जाती है कि विवाद के सभी पहलू एक निश्चित निष्कर्ष में बदल जाएंगे। मगर पाखरो प्रकरण में स्थिति कुछ अलग दिखाई देती है। पेड़ों की संख्या के साथ-साथ यह सवाल भी बना रहा कि कथित कटान के बाद लकड़ी का वास्तविक प्रवाह क्या था। यदि कटे पेड़ मौके पर मौजूद थे तो उनकी बरामदगी का रिकॉर्ड क्या है और यदि पेड़ वहां नहीं थे तो उन्हें हटाने या बेचने से जुड़ा कोई प्रमाण कहां है। इसी तरह यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है कि शुरुआती दौर में 10 हजार पेड़ों की चर्चा किस आधार पर हुई और बाद में जांचों ने उसे किस वैज्ञानिक पद्धति से संशोधित किया। इन सवालों का स्पष्ट और सार्वजनिक उत्तर सामने न आने के कारण मामला आज भी केवल दोष तय करने का विषय नहीं है, बल्कि जांच प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करता है।
वन मंत्री सुबोध उनियाल ने इस विवाद पर अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि पाखरो टाइगर सफारी प्रोजेक्ट में अवैध रूप से काटे गए पेड़ों की संख्या को लेकर पहले से ही कई तरह की बातें सामने आती रही हैं और हजारों पेड़ों के कटान का आंकड़ा वास्तविक स्थिति के बजाय काल्पनिक रूप से प्रस्तुत किया जाता रहा है। उनके अनुसार मौके की स्थिति में जितना कटान दिखाई देता है, उसे जांच के आधार पर देखा जा रहा है और फिलहाल मामला सीबीआई की जांच के दायरे में है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच पूरी होने के बाद न्यायालय के समक्ष जो तथ्य आएंगे, उसी आधार पर जिम्मेदारी तय होगी और जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। वन मंत्री के इस बयान का महत्व इसलिए भी है क्योंकि पाखरो प्रकरण में आंकड़ों को लेकर शुरुआत से ही बड़ा अंतर दिखाई देता रहा है। शुरुआती चर्चा में 10 हजार पेड़ों का कथित अवैध कटान सामने आया, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की पड़ताल में 6093 पेड़ों का आंकड़ा आया और बाद में सीबीआई के साथ विभिन्न संस्थाओं के मौके के आकलन में करीब 819 संभावित पेड़ों की बात सामने आई। ऐसे में सरकार की ओर से यह कहना कि वास्तविक स्थिति जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही तय होगी, मामले के अंतिम परिणाम की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि जब तक जांच अदालत में अंतिम रूप से परखी नहीं जाती और सभी तथ्य सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आते, तब तक पाखरो से जुड़े सवाल पूरी तरह खत्म होते नजर नहीं आते।
वहीं इस प्रकरण के शुरुआती दौर से जुड़े तत्कालीन वन मंत्री हरक सिंह रावत लगातार यह कहते रहे कि कॉर्बेट में टाइगर सफारी प्रोजेक्ट का उद्देश्य सकारात्मक और कानूनी था। उनका कहना रहा कि परियोजना को आगे बढ़ाने के पीछे वन्यजीव पर्यटन और संबंधित विकास की मंशा थी तथा जानबूझकर किसी प्रकार की अनियमितता नहीं की गई। हरक सिंह रावत ने उन दावों पर भी सवाल उठाए जिनमें हजारों पेड़ों के अवैध कटान की बात कही गई थी। उनका कहना रहा कि जिस तरह से बड़ी संख्या में पेड़ों के काटे जाने का आरोप प्रचारित हुआ, वह वास्तविकता से मेल नहीं खाता और इससे परियोजना की छवि को नुकसान पहुंचा। दूसरी ओर जांच एजेंसियों की अलग-अलग रिपोर्टों और मौके के आकलन ने मामले को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय कई स्तरों पर नए तथ्य सामने रखे। यही कारण है कि पाखरो टाइगर सफारी विवाद केवल एक वन परियोजना का मामला नहीं रह गया, बल्कि यह प्रशासनिक निर्णय, पर्यावरणीय अनुमति, वन संरक्षण, न्यायिक निगरानी और सरकारी जवाबदेही से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है। पांच वर्षों में जांच का सिलसिला कई संस्थाओं तक पहुंचा, पेड़ों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए और 260 पेड़ों की मौके पर बरामदगी जैसे तथ्य भी सामने आए, लेकिन कथित बड़े पैमाने के कटान से जुड़ी लकड़ी की अंतिम स्थिति अब भी बहस का हिस्सा है। अब निगाहें सीबीआई जांच और उसके बाद न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हैं। यदि अंतिम जांच में तथ्य पूरी तरह स्पष्ट होते हैं तो वर्षों से चले आ रहे इस विवाद को निर्णायक दिशा मिल सकती है, लेकिन तब तक पाखरो के जंगलों से जुड़े सवाल उत्तराखंड की वन व्यवस्था के सामने एक गंभीर परीक्षा बने रहेंगे।





