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लाठीचार्ज के बाद भड़का छात्र आक्रोश मोदी सरकार की रणनीति पर उठे सबसे बड़े राजनीतिक सवाल

जंतर-मंतर से संसद तक पहुंचे विरोध प्रदर्शन ने परीक्षा प्रणाली, सरकारी जवाबदेही, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं, छात्रों की मांगों, पुलिस कार्रवाई और लोकतांत्रिक संवाद को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया, जिससे पूरे देश में व्यापक चर्चा तेज हुई।

नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़े छात्र आंदोलन पर हुए पुलिस बल प्रयोग ने देश की राजनीति, लोकतांत्रिक संवाद और सरकार की रणनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। जिस आंदोलन को शुरुआती दिनों में सीमित दायरे का विरोध प्रदर्शन मानकर गंभीरता से नहीं लिया गया, वही घटनाक्रम अब राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल बल प्रयोग या प्रशासनिक कार्रवाई ही सबसे बड़ा मुद्दा नहीं बनती, बल्कि उस कार्रवाई का समय, उससे पहले अपनाया गया रवैया और उसके बाद उत्पन्न जनभावनाएं कहीं अधिक प्रभाव डालती हैं। जंतर-मंतर पर छात्रों के धरने, संसद मार्च, पुलिस की कार्रवाई, घायल प्रदर्शनकारी, घायल पुलिसकर्मी, अस्पताल पहुंचाए गए अनशनकारी और उसके बाद देशभर में उठी राजनीतिक प्रतिक्रियाओं ने पूरे घटनाक्रम को एक बड़े राष्ट्रीय मुद्दे में बदल दिया है। यही कारण है कि अब चर्चा केवल लाठीचार्ज तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि यह सवाल भी प्रमुखता से उठने लगा है कि क्या सरकार ने बातचीत के अवसर गंवाकर स्वयं अपने सामने एक अधिक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक संकट खड़ा कर लिया। देशभर में सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक यही प्रश्न सुनाई दे रहा है कि क्या समय रहते संवाद स्थापित किया जाता तो हालात इतने विस्फोटक नहीं बनते और क्या अब यह आंदोलन पहले से कहीं अधिक व्यापक स्वरूप ग्रहण कर चुका है।

घटनाक्रम पर नजर डालें तो बताया जा रहा है कि बीस जून से जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन जारी था। शुरुआती चरण में प्रदर्शन में अपेक्षाकृत कम संख्या में छात्र और समर्थक शामिल हो रहे थे तथा आंदोलन की ओर से लगातार सरकार से बातचीत की मांग की जा रही थी। विशेष रूप से सोनम वांग्चुक के नेतृत्व में संवाद स्थापित करने का आग्रह दोहराया जाता रहा, लेकिन आंदोलनकारियों का आरोप है कि लंबे समय तक उनकी बात सुनने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई। विश्लेषकों का कहना है कि यदि शुरुआती दौर में ही सरकार बातचीत के लिए आगे आती, कोई समिति गठित करती या औपचारिक आश्वासन देती, तो संभवतः आंदोलन उसी समय शांत हो सकता था। लेकिन जब लंबे इंतजार के बाद भी कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिली तो प्रदर्शन धीरे-धीरे बड़ा होता गया। दूसरी ओर यह भी देखने को मिला कि संसद मार्च वाले दिन सुबह-सुबह ही सरकार की ओर से वार्ता की कोशिशें तेज हो गईं और जेपी नड्डा तक मुलाकात के लिए सामने आए। यही तुलना अब बहस का विषय बनी हुई है कि जब भीड़ सीमित थी तब संवाद क्यों नहीं हुआ और जब जनसमर्थन बढ़ गया तब अचानक बातचीत की आवश्यकता क्यों महसूस हुई।

इसी क्रम में अठारह जुलाई की घटना ने पूरे आंदोलन को नया मोड़ दे दिया। आंदोलनकारियों का दावा है कि अनशन पर बैठे सोनम वांग्चुक को जबरन अस्पताल ले जाया गया, जबकि प्रशासन का पक्ष अलग बताया जा रहा है। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर अनेक तस्वीरें और वीडियो तेजी से वायरल हुए, जिनमें अनशन, स्वास्थ्य और मानवीय संवेदनाओं को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि सरकार को उम्मीद रही होगी कि अनशन समाप्त होने से आंदोलन की धार कमजोर पड़ेगी, लेकिन इसके उलट सहानुभूति की लहर तेज हो गई। अगले ही दिन जंतर-मंतर पर लोगों की संख्या बढ़ने लगी और संसद मार्च से पहले आंदोलन पहले की तुलना में अधिक मजबूत दिखाई देने लगा। इसके बाद बीस जुलाई को जब बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़े और पुलिस के साथ टकराव की स्थिति बनी तो आंसू गैस, धक्का-मुक्की और लाठीचार्ज की तस्वीरों ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यही वह क्षण माना जा रहा है जिसने आंदोलन को राष्ट्रीय बहस का सबसे बड़ा विषय बना दिया।

पुलिस का पक्ष भी इस पूरे विवाद में उतना ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दिल्ली पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश की गई तथा झड़प में सौ से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए। पुलिस का दावा है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर जाती दिखाई दे रही थी, इसलिए आवश्यक कार्रवाई करनी पड़ी। वहीं दूसरी ओर आंदोलनकारियों का आरोप है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया गया। इस बीच लाठीचार्ज के खिलाफ अदालत का दरवाजा भी खटखटाया गया, हालांकि प्रारंभिक स्तर पर तत्काल सुनवाई से इनकार किए जाने की जानकारी सामने आई। अदालत ने अभी किसी भी पक्ष को दोषी नहीं ठहराया है, इसलिए पूरे मामले की कानूनी स्थिति अभी स्पष्ट नहीं मानी जा सकती। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब दोनों पक्षों के घायल होने की खबर सामने आती है तो केवल कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि संवाद की विफलता भी चर्चा का विषय बन जाती है। यही कारण है कि अब बहस इस बात पर अधिक केंद्रित है कि आखिर ऐसी स्थिति बनने ही क्यों दी गई।

पेपर लीक को लेकर सरकार की ओर से लगातार यह कहा जाता रहा है कि कई आरोपियों की गिरफ्तारी की गई है और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई जारी है। सरकार यह भी दोहरा रही है कि पेपर लीक कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि वर्षों पुरानी चुनौती रही है। इसके बावजूद आंदोलनकारी छात्रों का कहना है कि केवल गिरफ्तारियां पर्याप्त नहीं हैं। उनका तर्क है कि उन्हें जवाबदेही चाहिए, शीर्ष स्तर पर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए जिससे भविष्य में किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न न लगे। आंदोलन में शामिल छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि लाखों युवाओं की वर्षों की मेहनत, परिवारों की आर्थिक कठिनाइयों और भविष्य की उम्मीदों से जुड़ा विषय केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रह सकता। यही कारण है कि मांग केवल जांच तक सीमित नहीं रही बल्कि व्यापक सुधार, पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने तक पहुंच गई है।

इस पूरे आंदोलन के दौरान देश की राजनीति भी तेजी से सक्रिय होती दिखाई दी। संसद मार्च और पुलिस कार्रवाई के बाद राहुल गांधी आंदोलनकारियों से मिलने पहुंचे। इसके अतिरिक्त अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और चंद्रशेखर आजाद सहित कई विपक्षी दलों और नेताओं ने छात्रों के समर्थन में बयान दिए। सोशल मीडिया पर भी अनेक कलाकारों, सार्वजनिक हस्तियों और विभिन्न संगठनों ने अपनी प्रतिक्रियाएं दर्ज कराईं। मानसून सत्र शुरू होते ही संसद के भीतर भी इस मुद्दे को लेकर तीखी नोकझोंक देखने को मिली और विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की। इसी बीच किसानों के समर्थन की खबरों ने भी राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया। विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी आंदोलन को सामाजिक, राजनीतिक और डिजिटल—तीनों स्तरों पर समर्थन मिलने लगता है, तब उसका प्रभाव केवल धरना स्थल तक सीमित नहीं रहता बल्कि वह राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन जाता है।

इतिहास के संदर्भ में भी इस आंदोलन की तुलना कई पुराने आंदोलनों से की जा रही है। विश्लेषकों का कहना है कि हर आंदोलन का परिणाम केवल भीड़ की संख्या तय नहीं करती, बल्कि जनसमर्थन का स्वरूप और समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी भी निर्णायक भूमिका निभाती है। उदाहरण के तौर पर शाहीन बाग आंदोलन, बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों का प्रदर्शन तथा वर्ष 2020-21 का किसान आंदोलन अलग-अलग परिस्थितियों में हुए, जिनके परिणाम भी अलग रहे। किसान आंदोलन के दौरान लंबे समय तक सीमाओं पर डटे किसानों और व्यापक सामाजिक समर्थन ने अंततः सरकार को कृषि कानून वापस लेने के लिए प्रेरित किया था। अब विशेषज्ञ यह चर्चा कर रहे हैं कि वर्तमान छात्र आंदोलन की प्रकृति अलग है क्योंकि यह केवल किसी एक राज्य, क्षेत्र या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े लाखों परिवारों की भावनाओं को प्रभावित करता है। यही वजह है कि इसे सामान्य विरोध प्रदर्शन के बजाय व्यापक सामाजिक असंतोष के रूप में भी देखा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह भी मानता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दे सीधे देश के मध्यवर्ग, छात्रों और अभिभावकों को प्रभावित करते हैं। लाखों परिवार वर्षों तक अपने बच्चों की पढ़ाई, कोचिंग, आवास और अन्य खर्चों के लिए आर्थिक त्याग करते हैं। जब परीक्षा प्रणाली पर प्रश्न उठते हैं तो उसका असर केवल परीक्षार्थियों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदों पर पड़ता है। आंदोलन में शामिल कई अभिभावकों ने कहा कि उनके बच्चों ने दिन-रात मेहनत की, परिवारों ने अपनी बचत तक खर्च कर दी, लेकिन यदि परीक्षा प्रक्रिया ही निष्पक्ष न रहे तो उनका विश्वास टूट जाता है। इसी कारण यह आंदोलन केवल एक परीक्षा या एक भर्ती तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि व्यवस्था में भरोसे की बहाली की मांग के रूप में सामने आया है। यही वह पहलू है जिसे राजनीतिक रूप से भी अत्यंत संवेदनशील माना जा रहा है।

आंदोलन के दौरान सोनम वांग्चुक ने अनशन समाप्त करने के लिए कुछ प्रमुख शर्तें भी सामने रखीं। इनमें पेपर लीक के लिए जिम्मेदारी तय करने, प्रतिनिधियों को संसद में सांसदों से मिलने का अवसर देने तथा धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग प्रमुख बताई गई। इसके बाद चर्चा शुरू हुई कि शायद समाधान की संभावना बन रही है, लेकिन शाम तक हुए घटनाक्रम और पुलिस कार्रवाई के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई। आंदोलनकारी पहले की तुलना में अधिक आक्रामक रुख अपनाते दिखाई दिए और उन्होंने स्पष्ट संकेत दिए कि जब तक उनकी प्रमुख मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, आंदोलन जारी रहेगा। अब राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि सरकार के सामने आगे की रणनीति क्या होगी। एक विकल्प यह माना जा रहा है कि सरकार व्यापक संवाद स्थापित करे, दूसरा यह कि समय के साथ प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर बदलाव कर स्थिति को नियंत्रित करे, जबकि तीसरा विकल्प कानून-व्यवस्था के आधार पर सख्ती जारी रखने का हो सकता है। हालांकि प्रत्येक विकल्प के अपने राजनीतिक और सामाजिक परिणाम बताए जा रहे हैं।

पूरा घटनाक्रम अब केवल जंतर-मंतर या संसद मार्च तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और शासन की कार्यशैली पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है। इस विवाद के बीच जिन छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं का उल्लेख किया जा रहा है, उनमें प्रदीप मेघवाल, रतिक मिश्रा, अंशिका पांडे, भाग्यश्री, रेणू और मीरा शेख सनाप जैसे नाम बार-बार सामने लाए जा रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं बल्कि उन परिवारों के दर्द का सवाल है जिन्होंने अपने बच्चों के भविष्य के लिए सब कुछ दांव पर लगाया। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई जारी है और व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। फिलहाल सबसे बड़ा प्रश्न यही बना हुआ है कि क्या यह आंदोलन आगे चलकर किसान आंदोलन जैसी लंबी राजनीतिक चुनौती बनेगा या फिर किसी संवाद और समाधान के जरिए इसका रास्ता निकलेगा। इतना अवश्य है कि बीस जुलाई के घटनाक्रम ने देश में परीक्षा प्रणाली, सरकारी जवाबदेही और लोकतांत्रिक संवाद पर ऐसी बहस छेड़ दी है, जिसका असर आने वाले समय में राजनीति और नीति—दोनों स्तरों पर दिखाई दे सकता है।

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