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फास्ट ट्रैक कोर्ट पर उठे सवाल, संदीप सहगल ने सरकार से मांगा युवाओं के भविष्य का जवाब

कांग्रेस के पूर्व मेयर प्रत्याशी संदीप सहगल ने कहा कि केवल फास्ट ट्रैक कोर्ट की घोषणा पर्याप्त नहीं, युवाओं का भरोसा तभी लौटेगा जब पेपर लीक नेटवर्क पर निर्णायक कार्रवाई और परीक्षा व्यवस्था पूरी तरह सुरक्षित बने।

काशीपुर। देशभर में युवाओं के उज्ज्वल भविष्य के साथ हो रहे लगातार खिलवाड़, सरकारी नौकरियों की निष्पक्ष भर्ती प्रक्रियाओं में बार-बार लग रहे भ्रष्टाचार के दीमक और प्रश्नपत्रों की खुलेआम खरीद-फरोख्त के संगठित मामलों को लेकर अब देश के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में अभूतपूर्व जुबानी जंग छिड़ गई है। इसी बेहद ज्वलंत, संवेदनशील और राष्ट्रव्यापी मुद्दे को पूरी प्रखरता से उठाते हुए कांग्रेस के पूर्व जिला महानगर अध्यक्ष व पूर्व मेयर प्रत्याशी संदीप सहगल ने सत्ता पक्ष की मंशा, प्रशासनिक दावों और खोखली व्यवस्था पर बेहद तीखे और तीखे प्रहार किए हैं। उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में दोटूक शब्दों में कहा कि आज डिग्रियों का भारी-भरकम बोझ अपने कंधों पर उठाए दर-दर भटकने को मजबूर देश के करोड़ों होनहार, प्रतिभावान और मेहनती अभ्यर्थियों का सब्र अब पूरी तरह टूट चुका है, लेकिन हुकूमत इस नासूर बन चुकी समस्या का कोई स्थायी और व्यावहारिक निदान खोजने के बजाय केवल बयानबाजी, दिखावे और जुमलेबाजी से जनता की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रही है। वर्षों तक अपनी जवानी, माता-पिता की खून-पसीने की गाढ़ी कमाई, दिन-रात का चैन और मानसिक सुकून गंवाकर किताबों में रात-दिन सिर खपाने वाले मेधावी छात्र जब उम्मीदों के साथ परीक्षा केंद्रों पर पहुंचते हैं, तो उन्हें अचानक पता चलता है कि उनकी वर्षों की अटूट तपस्या को चंद रुपयों के लालच में माफियाओं और दलालों ने नीलाम कर दिया है। बार-बार कठोर से कठोर कानूनों के ढोल पीटने, विधानसभाओं में विधेयक पारित करने और नई-नई जांच एजेंसियों से निष्पक्ष जांच कराने के बड़े-बड़े वादों के बावजूद जमीनी हकीकत में एक इंच का भी सकारात्मक बदलाव देखने को नहीं मिला है।

पूर्व जिला महानगर अध्यक्ष व पूर्व मेयर प्रत्याशी संदीप सहगल ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में पेपर लीक के जटिल मुकदमों के जल्द से जल्द निपटारे के लिए ‘फास्ट ट्रैक’ न्याय प्रणाली लागू करने की बात पर गहरा ऐतराज और असहमति जताते हुए इसे सीधे तौर पर देश के भटके हुए युवाओं को गुमराह करने का एक और नया राजनीतिक हथकंडा करार दिया। उन्होंने बेहद आक्रामक और तीखे अंदाज में सवाल दागा कि जब पिछले कई सालों से देश के कोने-कोने में, चाहे वे अलग-अलग राज्यों की राज्य लोक सेवा आयोग की प्रांतीय परीक्षाएं हों या फिर राष्ट्रीय स्तर की बड़ी प्रवेश और भर्ती परीक्षाएं, लगातार बड़े पैमाने पर धांधलियां और जालसाजी हो रही थीं, तब हुकूमत की नींद इतने वर्षों तक क्यों नहीं टूटी? क्या उस समय देश के लाखों नौजवानों का स्वर्णिम करियर, उनका सबसे कीमती समय, आर्थिक संसाधन और उनका मानसिक स्वास्थ्य सरकार की प्राथमिकताओं की सूची में शामिल नहीं था? उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जब-जब इस संगठित सिंडिकेट ने प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता में सेंध लगाई, तब-तब शासन-प्रशासन के जिम्मेदार आका मूकदर्शक बने रहे या केवल औपचारिकता निभाते रहे। आख़िर कौन सी ऐसी अदृश्य और शक्तिशाली ताकतें या ऊंचे राजनीतिक पद पर बैठे लोगों की छत्रछाया है, जिसके दम पर यह खतरनाक माफिया तंत्र बिना किसी कानून के खौफ के इतने लंबे समय से फल-फूल रहा है और लाखों बच्चों के सुनहरे सपनों का सौदा खुले बाजार में धड़ल्ले से कर रहा है?

इस पूरे प्रकरण में अभ्यर्थियों के अंतहीन आर्थिक, मानसिक और सामाजिक उत्पीड़न को रेखांकित करते हुए पूर्व जिला महानगर अध्यक्ष व पूर्व मेयर प्रत्याशी नेता संदीप सहगल ने कहा कि एक आम छात्र का गुस्सा सिर्फ प्रश्नपत्र परीक्षा भवन से बाहर आने तक सीमित नहीं है, बल्कि उस भ्रष्ट, संवेदनहीन और जनविरोधी पूरी मशीनरी के खिलाफ है जिसने उनकी कड़ी मेहनत, लगन और निष्ठा का खुलेआम मजाक बनाकर रख दिया है। दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों, दूरस्थ क्षेत्रों और छोटे-छोटे कस्बों से आने वाले गरीब और मध्यमवर्गीय अभ्यर्थी अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी, अपने माता-पिता की गाढ़ी कमाई, भारी-भरकम ब्याज पर लिया गया कर्ज और यहां तक कि अपने पैतृक घर-जमीन गिरवी रखकर बड़े-बड़े शहरों में कोचिंग सेंटरों, मकान के किराए, अत्यधिक महंगे परीक्षा फॉर्म और किताबों पर लाखों रुपये पानी की तरह न्योछावर कर देते हैं। कड़ाके की ठंड, चिलचिलाती गर्मी और विपरीत परिस्थितियों में एक-एक नंबर के लिए कड़ा संघर्ष करने वाले इन युवाओं की तमाम उम्मीदें उस वक्त ताश के पत्तों की तरह चकनाचूर हो जाती हैं, जब परीक्षा शुरू होने से चंद घंटे पहले ही पूरी उत्तर-पुस्तिकाएं और प्रश्नपत्र व्हाट्सएप, टेलीग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कौड़ियों के भाव बिकते हुए पाए जाते हैं। यह केवल किसी एक भर्ती परीक्षा या विभाग की नाकामी का साधारण मामला नहीं है, बल्कि यह भारत के पूरे लोकतांत्रिक ढांचे, न्याय व्यवस्था, शासन प्रणाली और सरकारी संस्थाओं की साख पर एक ऐसा बदनुमा दाग है, जिसे आने वाली सदियों तक आसानी से धोया या मिटाया नहीं जा सकता।

फास्ट ट्रैक अदालतों की वास्तविक उपयोगिता और प्रासंगिकता पर करारा हमला बोलते हुए पूर्व जिला महानगर अध्यक्ष संदीप सहगल ने पूरी तरह स्पष्ट किया कि केवल अदालतों में मुकदमों की सुनवाई की रफ्तार बढ़ा देने या त्वरित सुनवाई का कानूनी ढोंग रचने से यह घिनौना और संगठित अपराध कभी रुकने वाला नहीं है। इस विकराल समस्या का असली और स्थायी समाधान केवल तब संभव होगा जब इस काले कारोबार को जन्म देने वाली मूल गंगोत्री पर ही करारा प्रहार किया जाएगा और माफिया तंत्र को पैदा होने से पहले ही पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर दिया जाएगा। जब तक परीक्षा कराने वाली बड़ी भर्ती एजेंसियों के शीर्ष अधिकारियों और प्रशासनिक अध्यक्षों की सीधी आपराधिक जवाबदेही तय नहीं होगी, जब तक परीक्षा कराने वाली निजी कंपनियों और सरकारी संस्थाओं की गोपनीयता को अभेद्य व तकनीकी रूप से पूरी तरह सुरक्षित नहीं बनाया जाएगा और जब तक इस भ्रष्ट सिंडिकेट को बैकडोर से शह देने वाले बड़े राजनेताओं व उच्च पदस्थ नौकरशाहों पर बिना किसी राजनीतिक दबाव के सीधे शिकंजा नहीं कसा जाएगा, तब तक ऐसे दिखावटी और सतही उपायों का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। अपराध घटित हो जाने और लाखों बच्चों का भविष्य बर्बाद हो जाने के बाद महज अदालती कार्यवाही तेज करने का मौखिक आश्वासन देना असली बीमारी का जड़ से इलाज करने के बजाय केवल मरीज को अस्थाई दर्द निवारक दवा देने जैसा है, जिसे कोई भी विवेकशील व्यक्ति वास्तविक समाधान नहीं बल्कि शुद्ध रूप से ‘राजनीतिक इवेंट मैनेजमेंट’ और चुनावी पैंतरेबाजी ही कहेगा।

हाल के दिनों में देशभर के अलग-अलग राज्यों, प्रमुख शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालयों, सड़कों और मुख्य चौराहों पर छात्र संगठनों व बेरोजगार युवाओं द्वारा किए जा रहे अभूतपूर्व और उग्र होते विरोध प्रदर्शनों का विशेष रूप से जिक्र करते हुए उन्होंने इसे वर्तमान सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ उबले जनआक्रोश का प्रत्यक्ष और जीवंत प्रमाण बताया। पूर्व जिला महानगर अध्यक्ष व पूर्व मेयर प्रत्याशी संदीप सहगल ने कड़ा कटाक्ष करते हुए कहा कि जब देश का हर नौजवान अपने संवैधानिक हक, पारदर्शी रोजगार, निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया और पेपर लीक के पूरी तरह खात्मे के लिए सड़कों पर उतरकर हुकूमत की ईंट से ईंट बजा रहा है, ठीक उसी नाजुक वक्त में अचानक ‘फास्ट ट्रैक’ न्याय का राजनीतिक शिगूफा मीडिया के सामने छोड़ देना कोई साधारण इत्तेफाक या महज प्रशासनिक कदम नहीं हो सकता। यह सीधे-सीधे देश भर में सुलगते हुए उग्र छात्र आंदोलन की धार को कुंद करने, छात्रों की चट्टानी एकजुटता को आपस में बांटने और पूरे देश का ध्यान असली और बुनियादी मुद्दों से भटकाने की एक बहुत ही सोची-समझी रणनीतिक और राजनीतिक चाल है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में एक जिम्मेदार और संवेदनशील सरकार का मुख्य दायित्व अपने नागरिकों के न्यायसंगत और जायज आंदोलनों को पुलिस के बल पर दबाना या कुचलना नहीं होता, बल्कि उन मूल कारणों, कमियों और प्रशासनिक खामियों को जड़ से उखाड़ फेंकना होता है, जिनकी वजह से देश की धरोहर और भविष्य को मजबूरी में अपना पढ़ाई-लिखाई छोड़कर सड़कों पर उतरने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

कांग्रेस के पूर्व जिला महानगर अध्यक्ष व पूर्व मेयर प्रत्याशी नेता संदीप सहगल ने सत्ताधीशों और शासन में बैठे आकाओं को स्पष्ट रूप से चेतावनी देते हुए कहा कि आज का बेहद प्रबुद्ध, शिक्षित और जागरूक युवा अब बड़े-बड़े मंचों से दिए जाने वाले खोखले भाषणों, विज्ञापनों में छपने वाले लुभावने दावों और मंत्रियों के कोरे आश्वासनों के बहकावे में किसी भी कीमत पर आने वाला नहीं है, उसे अब धरातल पर ठोस और कंक्रीट परिणाम चाहिए। देश के पीड़ित अभ्यर्थी अब टीवी चैनलों पर यह घिसा-पिटा जुमला नहीं सुनना चाहते कि ‘दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा’, बल्कि वे अपनी नग्न आंखों से उन बड़ी-बड़ी मछलियों, आकाओं और सफेदपोशों को जेल की सलाखों के पीछे सड़ते हुए देखना चाहते हैं जिन्होंने अपने निजी स्वार्थों के लिए उनके भविष्य को दांव पर लगा दिया है। देश के करोड़ों युवाओं का डगमगाया हुआ भरोसा किसी नई सरकारी घोषणा, प्रेस कॉन्फ्रेंस या कमेटी के गठन से बहाल नहीं होने वाला, बल्कि उनका विश्वास उस दिन बहाल होगा जब पेपर लीक कराने वाले अंतर्राष्ट्रीय या अंतरराज्यीय गिरोह के अंतिम व्यक्ति तक कानून का लंबा हाथ पहुंचेगा और किसी भी बाहुबली या राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति को सरकारी या प्रशासनिक ढाल नहीं मिलेगी। बयानबाज़ियों, जुमलेबाज़ियों और भाषणबाज़ियों का दौर अब पूरी तरह समाप्त हो चुका है और अब केवल न्यायपरक, कठोर, कड़े और पारदर्शी ज़मीनी कदम ही देश के उबलते युवा असंतोष को शांत कर सकते हैं।

अपनी बात को बेहद मजबूती और तार्किकता से रखते हुए संदीप सहगल ने सरकार से सीधी मांग की कि यदि हुकूमत वास्तव में देश के इस विशाल युवा वर्ग के साथ पूरी निष्ठा, ईमानदारी और हमदर्दी से खड़ी है, तो उसे केवल अदालती प्रपंचों का ढोंग रचने और नई-नई बातें बनाने के बजाय तंत्र में बुनियादी और क्रांतिकारी ऐतिहासिक सुधार करने होंगे। सरकार को बिना किसी देरी के तुरंत प्रभाव से एक पूरी तरह पारदर्शी, सुरक्षित और समयबद्ध ‘वार्षिक भर्ती कैलेंडर’ आधिकारिक रूप से जारी करना चाहिए, जिसमें आवेदन से लेकर परीक्षा, परिणाम और नियुक्ति पत्र मिलने तक की तिथियां पत्थर की लकीर की तरह तय और बाध्यकारी हों। इसके साथ ही, अत्याधुनिक डिजिटल तकनीक, बायोमेट्रिक सुरक्षा और ब्लॉकचेन सिस्टम से लैस फुल-प्रूफ परीक्षा सुरक्षा प्रणाली लागू की जानी चाहिए। इसके अलावा, किसी भी पेपर लीक की जांच हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के कार्यरत जज की सीधी देखरेख में स्वतंत्र एजेंसी से कराने, पेपर लीक में रंगे हाथों पकड़े जाने वाले अपराधियों व उनके आकाओं की पूरी चल-अचल संपत्ति की कुर्की-जब्ती करने और ऐसे राष्ट्रविरोधी तत्वों पर आजीवन सरकारी नौकरियों तथा किसी भी तरह के चुनाव लड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने जैसे कड़े और ऐतिहासिक कानून बनाने होंगे। जब तक ये कठोर और निर्णायक निर्णय धरातल पर पूर्ण रूप से लागू नहीं होते, तब तक देश के करोड़ों युवाओं को यही प्रतीत होता रहेगा कि सरकार उनके भविष्य को सुरक्षित करने के प्रति कतई गंभीर नहीं है, बल्कि केवल उनके उबलते गुस्से को चुनावी मौसम में अस्थायी रूप से ठंडा करने का प्रयास कर रही है।

पूर्व जिला महानगर अध्यक्ष व पूर्व मेयर प्रत्याशी संदीप सहगल ने सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को आईना दिखाते हुए कहा कि देश का नौजवान आज बेहद तल्ख और सीधे लहजे में यह तीखा सवाल पूछ रहा है कि क्या हर प्रशासनिक विफलता के बाद केवल एक नई घोषणा कर देना ही इस देश की नीयति बन चुकी है? क्या हर बार निष्पक्ष परीक्षा का दावा टूटने और प्रश्नपत्र बाजार में बिकने के बाद हुकूमत नया राग अलापेगी और फिर अगली परीक्षा आते-आते वही संगठित धांधली, वही भ्रष्टाचारी खेल और वही असहाय अभ्यर्थियों के आंसू दोबारा दोहराए जाएंगे? अगर यही निराशाजनक सिलसिला यूं ही अनवरत जारी रहा, तो फास्ट ट्रैक न्याय प्रणाली की बात भी इतिहास के पन्नों में दर्ज उन अनगिनत अधूरे, खोखले और झूठे वादों की लंबी फेहरिस्त में शामिल होकर रह जाएगी जिन्हें केवल चुनाव जीतने और जनविरोधी माहौल को मोड़ने के लिए उछाला जाता है। भारत के होनहार युवाओं का स्वर्णिम भविष्य किसी भी राजनीतिक दल की अल्पकालिक रणनीति, चुनावी पैंतरेबाजी या वोटों के गुणा-गणित को साधने का जरिया नहीं बन सकता। देश के नौजवानों को अपनी योग्यता के बल पर पूर्ण न्याय, पूरी तरह से पारदर्शी व सुरक्षित परीक्षा प्रणाली, समय पर योग्यता के आधार पर रोजगार और एक ऐसा स्वच्छ व पारदर्शी माहौल चाहिए जहां उनकी वर्षों की हाड़-तोड़ मेहनत किसी माफिया की तिजोरी की शोभा न बने। हुकूमत की असली अग्निपरीक्षा भाषणों में या न्यायालयों के बंद कमरों में नहीं, बल्कि देश के करोड़ों युवाओं का खोया हुआ विश्वास धरातल पर दोबारा जीतने में है; यदि सरकार इस परीक्षा में असफल रही तो आने वाला इतिहास इन कागजी घोषणाओं और इन्हें करने वाले हुक्मरानों से बेहद कड़े और चुभते हुए सवाल पूछेगा।

कांग्रेस के पूर्व जिला महानगर अध्यक्ष व पूर्व मेयर प्रत्याशी संदीप सहगल ने प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार हो रहे पेपर लीक मामलों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार से सख्त कदम उठाने की पुरजोर मांग की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य और मेहनत से खिलवाड़ करने वाले इस संगठित माफिया तंत्र को खत्म करने के लिए संसद में एक विशेष एवं कठोर कानून पास किया जाना चाहिए। संदीप सहगल ने जोर देकर कहा कि केवल घोषणाओं या जांच के दावों से पेपर लीक रुकने वाला नहीं है। नए कानून के तहत दोषियों, माफियाओं और उनके संरक्षणदाताओं के लिए कड़ी सजा, भारी जुर्माना और उनकी संपत्तियों की जब्ती का स्पष्ट प्रावधान तय होना चाहिए। जब तक संसद से कठोर विधायी कानून लागू नहीं होगा और त्वरित सजा की गारंटी नहीं मिलेगी, तब तक युवाओं का विश्वास बहाल नहीं हो सकता।

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