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एक शाम मुकेश चन्द्र माथुर के नाम, सदाबहार गीतों ने बांधा ऐसा समां कि देर तक गूंजती रहीं तालियां

स्वर सम्राट मुकेश चन्द्र माथुर के अमर नगमों ने श्रोताओं को सुनहरे दौर की यादों में डुबोया, कलाकारों की शानदार प्रस्तुतियों से गूंजा सभागार, हर वर्ष इस संगीतमय आयोजन को जारी रखने की घोषणा।

काशीपुर। नगर की सांस्कृतिक फिजा उस समय सुरों की मधुर मिठास से सराबोर हो उठी, जब श्री कायस्थ सभा, काशीपुर की ओर से स्वर सम्राट स्वर्गीय मुकेश चन्द्र माथुर की स्मृति को समर्पित भव्य संगीतमय सांस्कृतिक संध्या “एक शाम मुकेश चन्द्र माथुर के नाम” का आयोजन किया गया। कार्यक्रम केवल एक संगीत संध्या भर नहीं रहा, बल्कि भारतीय फिल्म संगीत के उस स्वर्णिम दौर को जीवंत करने वाला भावनात्मक उत्सव बन गया, जिसने सभागार में मौजूद प्रत्येक संगीत प्रेमी को वर्षों पुरानी यादों की दुनिया में पहुंचा दिया। कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने वाले श्रोताओं में उत्साह साफ दिखाई दे रहा था और जैसे-जैसे शाम आगे बढ़ती गई, वैसे-वैसे माहौल पूरी तरह संगीत के रंग में रंगता चला गया। मंच को आकर्षक ढंग से सजाया गया था, जहां स्वर सम्राट मुकेश चन्द्र माथुर की तस्वीर के समक्ष पुष्प अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। उपस्थित लोगों का कहना था कि आज के दौर में जहां आधुनिक संगीत का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, वहीं ऐसे आयोजन भारतीय संगीत की मूल आत्मा को जीवित रखने का कार्य करते हैं। कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ नागरिकों से लेकर युवा पीढ़ी तक सभी ने एक स्वर में माना कि मुकेश चन्द्र माथुर के गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भावनाओं, संवेदनाओं और जीवन के विविध रंगों को शब्द और सुरों में पिरोने वाली अमूल्य धरोहर हैं। यही कारण रहा कि कार्यक्रम की शुरुआत से लेकर समापन तक सभागार में बैठे प्रत्येक श्रोता पूरी तन्मयता के साथ हर प्रस्तुति का आनंद लेते दिखाई दिए।

सांस्कृतिक संध्या का शुभारंभ पारंपरिक भारतीय संस्कृति के अनुरूप अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। दीप की पावन ज्योति प्रज्वलित होते ही पूरे सभागार में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक वातावरण का अद्भुत संगम देखने को मिला। इसके बाद श्री कायस्थ सभा, काशीपुर एवं माँ सरस्वती सुर संगीत कला मंच से जुड़े कलाकारों ने अपनी शानदार प्रस्तुतियों के माध्यम से कार्यक्रम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया। मंच पर जैसे ही मुकेश चन्द्र माथुर के अमर गीतों की स्वर लहरियां गूंजनी शुरू हुईं, पूरा सभागार संगीत की मधुरता में डूब गया। कलाकारों ने एक के बाद एक ऐसे सदाबहार गीत प्रस्तुत किए, जिन्होंने उपस्थित श्रोताओं को दशकों पुराने सुनहरे दौर की याद दिला दी। प्रत्येक प्रस्तुति में सुर, लय और भावों का ऐसा सुंदर समन्वय देखने को मिला कि हर गीत समाप्त होने के बाद पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता। कई श्रोता गीतों के साथ-साथ खुद भी गुनगुनाते दिखाई दिए, जबकि कुछ संगीत प्रेमी भावुक होकर पुराने दिनों की यादों में खो गए। कलाकारों की प्रस्तुति में केवल गायन ही नहीं, बल्कि गीतों के भावों को जीवंत करने का भी सुंदर प्रयास देखने को मिला। कार्यक्रम के दौरान यह स्पष्ट महसूस किया गया कि आज भी मुकेश चन्द्र माथुर की आवाज और उनके गीत लोगों के दिलों में उसी आत्मीयता के साथ बसे हुए हैं, जैसी दशकों पहले हुआ करती थी। कार्यक्रम के अंत में संस्था के सचिव राजेश कुमार सक्सेना ने सभी प्रतिभागी कलाकारों को प्रतिभागिता प्रमाण-पत्र प्रदान कर उनका उत्साहवर्धन किया और संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान की सराहना की।

जैसे-जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ा, वैसे-वैसे श्रोताओं की भावनात्मक सहभागिता भी बढ़ती चली गई। पूरे आयोजन के दौरान सभागार में ऐसा माहौल बना रहा मानो हर गीत अपने साथ कोई नई स्मृति और नई अनुभूति लेकर आया हो। वरिष्ठ संगीत प्रेमियों ने कहा कि आज के समय में ऐसे कार्यक्रम दुर्लभ होते जा रहे हैं, जहां केवल संगीत ही नहीं बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान भी दिखाई देता है। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित अतिथियों और संगीत प्रेमियों ने आयोजन की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए कहा कि इस प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होते, बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय फिल्म संगीत की समृद्ध परंपरा से परिचित कराने का महत्वपूर्ण कार्य भी करते हैं। सभी ने आग्रह किया कि “एक शाम मुकेश चन्द्र माथुर के नाम” कार्यक्रम को एक वार्षिक परंपरा के रूप में आगे बढ़ाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां भी भारतीय संगीत के इस स्वर्णिम अध्याय से जुड़ सकें। इस अवसर पर सभा के अध्यक्ष अभिताभ सक्सेना ने मंच से घोषणा करते हुए कहा कि श्री कायस्थ सभा प्रत्येक वर्ष इसी प्रकार का संगीतमय कार्यक्रम आयोजित करेगी। उन्होंने कहा कि संस्था का उद्देश्य केवल कार्यक्रम आयोजित करना नहीं, बल्कि भारतीय संगीत की अमूल्य विरासत का संरक्षण करना और उसे नई पीढ़ी तक सम्मानपूर्वक पहुंचाना है। उनके इस ऐलान का उपस्थित लोगों ने जोरदार तालियों के साथ स्वागत किया और इसे सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया।

आयोजन की सफलता के पीछे अनेक लोगों का समर्पण और टीमवर्क स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। कार्यक्रम के संयोजक कुलदीप श्रीवास्तव एवं सह-संयोजक सरिता सक्सेना ने पूरी योजना को व्यवस्थित रूप से क्रियान्वित करते हुए प्रत्येक व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया, जिसके कारण पूरा आयोजन अत्यंत गरिमापूर्ण और अनुशासित वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सुनीत माथुर, विशिष्ट अतिथि डॉ. रजनीश शर्मा, डॉ. मनोज कुशवाहा, डॉ. सिद्धांत माथुर, गौरव सक्सेना, अपूर्व महरोत्रा, रोहिणी शाह तथा कार्यक्रम अध्यक्ष सुशील कुमार सक्सेना की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन की शोभा बढ़ाई। मंच संचालन की जिम्मेदारी अश्वनी शर्मा ने अत्यंत प्रभावशाली और आकर्षक शैली में निभाई। उन्होंने प्रत्येक प्रस्तुति को रोचक ढंग से श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करते हुए पूरे कार्यक्रम को एक सूत्र में बांधे रखा। उनके संचालन ने कार्यक्रम में ऊर्जा, अनुशासन और सहजता का सुंदर संतुलन बनाए रखा, जिसकी उपस्थित लोगों ने भी सराहना की। संगीत, संस्कृति और सामाजिक सहभागिता का यह अनूठा संगम काशीपुर के सांस्कृतिक इतिहास में एक यादगार शाम के रूप में दर्ज हो गया, जहां सुरों की मिठास ने हर दिल को छू लिया और स्वर सम्राट मुकेश चन्द्र माथुर के अमर गीतों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि सच्चा संगीत कभी पुराना नहीं होता।

समारोह के अंतिम चरण में भी उत्साह और उल्लास अपने चरम पर बना रहा। जैसे-जैसे प्रस्तुतियां आगे बढ़ती गईं, वैसे-वैसे सभागार में मौजूद संगीत प्रेमियों की भावनाएं भी स्वर सम्राट मुकेश चन्द्र माथुर के अमर गीतों के साथ गहराई से जुड़ती चली गईं। कई श्रोता अपनी सीटों पर बैठे-बैठे गीतों के बोल गुनगुनाते दिखाई दिए, तो कुछ ने तालियों की गूंज के साथ कलाकारों का लगातार उत्साहवर्धन किया। कार्यक्रम के दौरान यह स्पष्ट महसूस किया गया कि संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक विरासत भी है। माँ सरस्वती सुर संगीत कला मंच के कलाकारों ने अपनी मधुर आवाज़, भावपूर्ण अभिव्यक्ति और सधी हुई प्रस्तुतियों से ऐसा वातावरण तैयार किया कि उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति देर तक उस संगीतमय शाम के प्रभाव में डूबा रहा। कलाकारों ने यह साबित कर दिया कि यदि समर्पण और साधना के साथ संगीत प्रस्तुत किया जाए तो वह सीधे श्रोताओं के हृदय तक पहुंचता है। कार्यक्रम के समापन से पहले संस्था सचिव राजेश कुमार सक्सेना ने सभी प्रतिभागी कलाकारों को प्रतिभागिता प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया। उन्होंने कहा कि कलाकारों का सम्मान केवल उनकी प्रतिभा का नहीं, बल्कि भारतीय संगीत परंपरा के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण का सम्मान भी है। इस अवसर पर उपस्थित सभी कलाकारों का जोरदार तालियों के साथ अभिनंदन किया गया और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना व्यक्त की गई। सम्मान समारोह ने पूरे आयोजन को और अधिक गरिमामय बना दिया तथा कलाकारों के चेहरों पर संतोष और उत्साह साफ झलकता दिखाई दिया।

सांस्कृतिक संध्या के समापन अवसर पर उपस्थित अतिथियों, संगीत प्रेमियों और सामाजिक गणमान्य लोगों ने इस आयोजन की मुक्त कंठ से सराहना करते हुए इसे काशीपुर की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताया। वक्ताओं का कहना था कि आधुनिक समय में जहां पारंपरिक संगीत और सांस्कृतिक आयोजनों की संख्या लगातार घटती जा रही है, वहां श्री कायस्थ सभा द्वारा इस प्रकार का आयोजन समाज के लिए प्रेरणादायी पहल है। अनेक लोगों ने सुझाव दिया कि यह कार्यक्रम किसी एक अवसर तक सीमित न रहकर प्रत्येक वर्ष आयोजित किया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी भी भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्णिम दौर और मुकेश चन्द्र माथुर जैसे महान गायक की विरासत से परिचित हो सके। उपस्थित लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए सभा के अध्यक्ष अभिताभ सक्सेना ने मंच से घोषणा की कि श्री कायस्थ सभा, काशीपुर प्रतिवर्ष “एक शाम मुकेश चन्द्र माथुर के नाम” संगीतमय कार्यक्रम का आयोजन करेगी। उन्होंने कहा कि संस्था का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक आयोजन करना नहीं, बल्कि भारतीय संगीत की समृद्ध धरोहर का संरक्षण, संवर्धन और उसे नई पीढ़ी तक सम्मानपूर्वक पहुंचाना भी है। उनके इस ऐलान का सभागार में मौजूद सभी लोगों ने जोरदार तालियों के साथ स्वागत किया। अनेक संगीत प्रेमियों ने इसे आने वाले वर्षों में काशीपुर के सांस्कृतिक कैलेंडर का स्थायी और प्रतिष्ठित आयोजन बनने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

इस यादगार आयोजन की सफलता के पीछे अनेक लोगों का अथक परिश्रम और सुनियोजित प्रयास भी प्रमुख रूप से दिखाई दिया। कार्यक्रम संयोजक कुलदीप श्रीवास्तव तथा सह-संयोजक सरिता सक्सेना ने आयोजन की संपूर्ण व्यवस्थाओं को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करते हुए प्रत्येक छोटी-बड़ी जिम्मेदारी का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। उनकी योजनाबद्ध कार्यशैली के कारण पूरा कार्यक्रम अनुशासित, गरिमामय और प्रभावशाली वातावरण में संपन्न हुआ। मुख्य अतिथि सुनीत माथुर, विशिष्ट अतिथि डॉ. रजनीश शर्मा, डॉ. मनोज कुशवाहा, डॉ. सिद्धांत माथुर, गौरव सक्सेना, अपूर्व महरोत्रा, रोहिणी शाह तथा कार्यक्रम अध्यक्ष सुशील कुमार सक्सेना की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन की शोभा में चार चांद लगा दिए। वहीं पूरे कार्यक्रम का संचालन अश्वनी शर्मा ने अत्यंत प्रभावशाली, सहज और रोचक शैली में किया। उन्होंने प्रत्येक प्रस्तुति से पहले गीतों और स्वर सम्राट मुकेश चन्द्र माथुर के संगीत योगदान का संक्षिप्त परिचय देकर श्रोताओं को कार्यक्रम से भावनात्मक रूप से जोड़े रखा। उनके मंच संचालन ने पूरे आयोजन को निरंतर गतिशील बनाए रखा और कहीं भी कार्यक्रम की गति धीमी नहीं होने दी। उपस्थित लोगों ने मंच संचालन की शैली की भी खुलकर प्रशंसा की और इसे आयोजन की बड़ी विशेषताओं में शामिल बताया।

कार्यक्रम में सामाजिक और सांस्कृतिक जगत से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित लोगों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। श्री कायस्थ सभा के संरक्षक अशोक सक्सेना, मुकेश सक्सेना, शिव प्रकाश सक्सेना, गीता सक्सेना, उपसचिव अरविंद सक्सेना (बंटी), कोषाध्यक्ष किशन अवतार सक्सेना, कार्यकारिणी सदस्य राजेश कुमार सक्सेना, अनिल सक्सेना, महिला शक्ति की ओर से सुनीता सक्सेना, कविता सक्सेना, सुनीता चक्रपाणि, कामिनी श्रीवास्तव, तुलिका चक्रपाणि तथा प्रियंका श्रीवास्तव सहित बड़ी संख्या में संस्था के सदस्य कार्यक्रम में मौजूद रहे। वहीं माँ सरस्वती सुर संगीत कला मंच की ओर से देव शाह, प्रेम शर्मा, अजय गुप्ता, महेश वर्मा, नीलम वर्मा, गुरनाम सिंह, नारायण दास, धरम सिंह, ललित बाली, तान्या बाली, राजीव सक्सेना, बिभू सक्सेना, जॉनी सिंह, मनमोहन अग्रवाल, नासिर गुड्डू, रवि भटनागर, अमित शर्मा, नवीन बिष्ट सहित अनेक कलाकारों और संगीत साधकों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई। कार्यक्रम के समापन पर यह स्पष्ट संदेश सामने आया कि यदि समाज इसी प्रकार अपनी सांस्कृतिक धरोहर, संगीत परंपरा और महान कलाकारों की विरासत को सम्मान देता रहा, तो भारतीय संगीत की अमूल्य परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक उसी गौरव के साथ पहुंचती रहेगी। यह संगीतमय शाम केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि संगीत, संस्कृति, संवेदनाओं और सामाजिक एकता का ऐसा जीवंत उत्सव बन गई, जिसकी मधुर स्मृतियां लंबे समय तक काशीपुर के संगीत प्रेमियों के मन में गूंजती रहेंगी।

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