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रेल हादसों से पेपर लीक तक सलामत रही मंत्रियों की कुर्सी और नैतिक जवाबदेही हुई शून्य

रेल हादसों से लेकर पेपर लीक और बड़े राष्ट्रीय विवादों तक सवाल लगातार उठे, विपक्ष ने जवाब मांगा, जनता सड़कों पर उतरी, लेकिन सत्ता के गलियारों में जिम्मेदारी तय होने के बजाय कुर्सियां पहले की तरह सुरक्षित रहीं।

नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। राजनीतिक गलियारों की सत्ता में कुर्सी का मोह और नैतिकता की बलि चढ़ाने का सिलसिला भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का एक ऐसा काला अध्याय बन चुका है जिसने जन-जवाबदेही की मूल परिभाषा को ही पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। साल दो हज़ार पंद्रह के उस तपते दौर में तात्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने एक भरी सभा में बेबाकी से यह ऐलान कर दिया था कि भारत की सरकार में बैठे मंत्रियों के त्यागपत्र देने का कोई स्थापित नियम या रिवाज नहीं होता है क्योंकि यह कोई पुरानी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार नहीं बल्कि एक मजबूत और अडिग राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की केंद्र सरकार है। राजनाथ सिंह द्वारा बोला गया वह एक ऐतिहासिक वाक्य असल में इस शासन व्यवस्था का एक ऐसा अनलिखा और अटल कानून बन गया, जिसने आने वाले ग्यारह वर्षों तक भारतीय राजनीति की पूरी दिशा और दशा को निर्धारित किया। इस बीते एक दशक से अधिक के समय में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने देश के भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र और बुनियादी प्रशासनिक ढांचे में बड़े-बड़े क्रांतिकारी बदलाव करने का दावा किया, जिसमें नए नोट जारी करने से लेकर दशकों पुराने औपनिवेशिक कानूनों को बदलना, ऐतिहासिक शहरों, सुदूर गांवों, रेलवे स्टेशनों, लंबी सड़कों और विशाल हवाई अड्डों के नामकरण और उनके संचालन के अधिकार बदलना शामिल रहा। परंतु इस अभूतपूर्व राजनीतिक परिवर्तन के आंधी-तूफान के बीच भी अगर कोई एक चीज पूरी तरह से स्थिर, अचल और अपरिवर्तनीय रही, तो वह थी गंभीर आपराधिक, प्रशासनिक और नैतिक आरोपों से घिरे हुए मंत्रियों की मजबूत कुर्सियों का सलामत बचे रहना। शून्य का आविष्कार भले ही भारत की प्राचीन महान गणितीय भूमि पर हुआ था, लेकिन राजनीतिक प्रशासनिक विफलता और राष्ट्रीय त्रासदियों के बाद भी मंत्रियों से इस्तीफा न लेने की अनोखी खोज का पूरा श्रेय आज की मौजूदा सत्ता व्यवस्था को ही जाता है। यह पूरा मामला सिर्फ मंत्रियों की कुर्सियां बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों मासूम बच्चों के भविष्य, आपकी रोजमर्रा की असुरक्षित ट्रेन यात्राओं, सड़कों पर बहते खून और देश के हर नागरिक की जिंदगी की बुनियादी जवाबदेही से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ एक बहुत बड़ा ज्वलंत राष्ट्रीय प्रश्न बन चुका है।

देश के पिछले ग्यारह-बारह वर्षों के दर्दनाक इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही की बलि चढ़ाने के अनेक दिल दहला देने वाले उदाहरण साफ-साफ नजर आते हैं। साल दो हज़ार तेईस का वह भयानक दौर कोई नहीं भूल सकता जब ओडिशा के बालासोर में एक भीषण ट्रेन हादसा हुआ और लगभग दो सौ छियानवे बेकसूर नागरिकों की दर्दनाक मौत हो गई, लेकिन इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी के बावजूद रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा और वे अपने पद पर सीना ताने मजबूती से जमे रहे। ठीक इसी तरह साल दो हज़ार इक्कीस के चर्चित लखीमपुर खीरी कांड में जब चार निहत्थे किसान एक अनियंत्रित गाड़ी से कुचल दिए गए और हत्या का सीधा आरोप गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के सगे बेटे पर लगा, तब भी पूरा देश आक्रोशित रहा परंतु अजय मिश्रा टेनी की केंद्रीय सत्ता की कुर्सी पूरी तरह से सुरक्षित बनी रही। मणिपुर जैसा संवेदनशील पूर्वोत्तर राज्य जब लगभग दो वर्षों तक भीषण जातीय हिंसा, नागरिक अशांति और आगजनी में झुलसता रहा तथा पूरा विपक्ष लगातार देश के शक्तिशाली गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग पर अड़ा रहा, तब भी सत्ता के शीर्ष नेतृत्व ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। ठीक इसी कड़ी में जब साल दो हज़ार चौबीस में देश के लाखों होनहार अभ्यर्थियों के भविष्य को अंधकार में धकेलने वाला नीट यूजी परीक्षा का बहुचर्चित पेपर लीक मामला सामने आया, तब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पहले तो संसद और मीडिया के सामने सार्वजनिक रूप से किसी भी प्रकार के पेपर लीक होने की घटना से साफ इनकार कर दिया, लेकिन बाद में साल दो हज़ार छब्बीस के आते-आते उन्हें मजबूरन सच को स्वीकारना पड़ा। इसके बावजूद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की कुर्सी जस की तस बनी रही और उन पर किसी भी प्रकार की प्रशासनिक या नैतिक गाज नहीं गिरी। ग्यारह-बारह सालों के इस लंबे कार्यकाल में विपक्ष और जनता द्वारा कम से कम नौ बड़े राष्ट्रीय अवसरों पर मंत्रियों के इस्तीफे की पुरजोर मांग उठाई गई, लेकिन सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल में काम के दौरान हुई भीषण प्रशासनिक चूक, भ्रष्टाचार या लापरवाही के आधार पर एक भी मंत्री का त्यागपत्र स्वीकार नहीं किया, सिवाय एमजे अकबर के जिन्हें यौन उत्पीड़न के व्यक्तिगत आरोपों के कारण पद छोड़ना पड़ा था।

प्रशासनिक स्तर पर मंत्रियों की इस कथित निरंकुशता और बेपरवाही का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि मौजूदा राजनीतिक तंत्र में स्वयं मंत्रियों के अपने हाथ में भी यह अधिकार नहीं रह गया है कि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर पद त्याग सकें। इसका सबसे सटीक और ज्वलंत उदाहरण पूर्व रेल मंत्री सुरेश प्रभु का है, जिन्होंने साल दो हज़ार सत्रह में हुए एक बड़े और भयानक रेल हादसे की नैतिक जिम्मेदारी अपने सिर पर लेते हुए स्वयं प्रधानमंत्री के समक्ष अपना इस्तीफा सौंपने की पेशकश की थी। परंतु इस देश के शासन तंत्र ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया और उनके इस्तीफे को नामंजूर करते हुए यह संदेश दे दिया कि इस सरकार के शब्दकोश में नैतिक जिम्मेदारी नाम का कोई शब्द मौजूद ही नहीं है। सुरेश प्रभु को इस्तीफा देने की अनुमति न देकर कुछ समय बाद बेहद खामोशी से वाणिज्य मंत्रालय का प्रभार सौंप दिया गया और बाद में साल दो हज़ार उन्नीस के चुनाव के बाद उन्हें कैबिनेट से ही किनारे लगा दिया गया। जिन-जिन नेताओं और मंत्रियों पर जनता या विपक्ष ने गंभीर सवाल खड़े किए, इस राजनीतिक व्यवस्था ने उनका करियर खत्म करने के बजाय उन्हें और बड़े पदों से पुरस्कृत किया। पूर्व शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी पर जब जेएनयू विवाद और दलित छात्र रोहित वेमुला की दुखद आत्महत्या को लेकर गंभीर आरोप लगे और सड़क से संसद तक हंगामे हुए, तब उनका इस्तीफा लेने के बजाय उन्हें बाद में कपड़ा मंत्रालय जैसा बड़ा विभाग सौंप दिया गया। इसी प्रकार तीन-तीन बड़े रेल हादसों के बावजूद अश्विनी वैष्णव आज भी रेल मंत्रालय के साथ-साथ कई अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभाल रहे हैं। इस पूरी व्यवस्था को देखकर यह साफ जाहिर होता है कि मौजूदा सरकार में कोई भी बड़ा राष्ट्रीय विवाद या घोटाला मंत्रियों के करियर के लिए केवल एक मामूली स्पीड ब्रेकर का काम करता है, जिसे वे आसानी से पार कर लेते हैं, लेकिन वह उनकी राजनीतिक यात्रा के आगे कभी कोई मजबूत और मजबूत दीवार नहीं बन पाता।

पूर्ववर्ती सरकारों और मौजूदा शासन व्यवस्था की कार्यप्रणाली के बीच तुलनात्मक विश्लेषण करने पर यह कड़वा सच सामने आता है कि पहले की सरकारों में कम से कम लोकलाज और सार्वजनिक दबाव के चलते इस्तीफों की एक औपचारिक परंपरा जीवित थी। हालांकि भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों के कारण जनता ने पिछली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार को उखाड़ फेंका था और उसे दो-दो बार संसद में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा तक हासिल नहीं होने दिया, लेकिन उस दौर में जनता के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए मंत्रियों के त्यागपत्र जरूर ले लिए जाते थे। उदाहरण के तौर पर साल दो हज़ार दस में आईपीएल विवाद के घेरे में आने पर शशि थरूर, दो जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में ए राजा और बहुचर्चित आदर्श सोसाइटी घोटाले में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को अपने पदों से त्यागपत्र देना पड़ा था। इसके अलावा साल दो हज़ार तेरह के चुनावी माहौल में जब पूर्व रेल मंत्री पवन बंसल के भान्जे पर रिश्वतखोरी के संगीन आरोप लगे, तब बिना बंसल पर सीधा आरोप हुए भी उनसे तुरंत रेल मंत्रालय छीन लिया गया था। परंतु इसके ठीक विपरीत मौजूदा दौर में गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे पर किसानों को गाड़ी से रौंदने का सीधा आरोप लगने के बावजूद केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अपने पद पर पूरी तरह से आसीन रहे। यदि हम राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के ही पुराने दौर से इसकी तुलना करें, तो अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में साल उन्नीस सौ निन्यानवे के भीषण गैसल रेल हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार ने तुरंत अपना इस्तीफा सौंप दिया था, जिसमें लगभग दो सौ नब्बे यात्रियों की जान चली गई थी। इसी प्रकार साल दो हज़ार एक में चर्चित तहलका रक्षा सौदे घोटाले का भंडाफोड़ होने पर जॉर्ज फर्नांडिस ने भी रक्षा मंत्री के पद से तुरंत इस्तीफा दे दिया था। यह उदाहरण सिद्ध करते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी के दौर तक भारत में जवाबदेही और नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र देने की जो लोकतांत्रिक परिपाटी जीवित थी, वह आज पूरी तरह से दफन हो चुकी है।

शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और नीट यूजी परीक्षा घोटाले के संदर्भ में धर्मेंद्र प्रधान का मामला आज देश के करोड़ों युवाओं और उनके अभिभावकों के लिए बेहद पीड़ादायक और आक्रोश का विषय बना हुआ है। जब जंतर-मंतर से लेकर देश की संसद और सड़कों तक हजारों छात्र और युवा सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और पुलिस बल के साथ उनकी तीखी झड़पें हो रही हैं, तब भी सत्ता के शीर्ष पर बैठे नीति-नियंताओं के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है। देश के सात वर्षों के दौरान पंद्रह राज्यों में सत्तर से भी अधिक प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने के रिकॉर्ड दर्ज किए जा चुके हैं, जिससे साढ़े सात करोड़ से भी ज्यादा युवाओं का भविष्य सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है। इसके बावजूद जब साल दो हज़ार चौबीस में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान मीडिया के सामने आकर पहले यह दावा करते हैं कि परीक्षा में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है और फिर साल दो हज़ार छब्बीस में दोबारा जांच के बाद यह बात खुद स्वीकार करते हैं कि परीक्षा से पहले ही पैंतीस बच्चों तक लीक पेपर पहुंच चुका था, तो यह साफ हो जाता है कि नीतिगत स्तर पर कितनी बड़ी नाकामी रही है। इसके बावजूद मंत्री जी अपनी कुर्सी पर मजबूती से विराजमान हैं और पूरी सरकार परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों, आला अफसरों और पुलिस तंत्र पर दोष मढ़कर मंत्री का बचाव करने में जुटी हुई है। जिस प्रकार पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर संसद में ‘रेनकोट पहनकर नहाने’ का तंज कसा गया था, ठीक वही स्थिति आज के मंत्रियों पर भी लागू होती है कि उनके विभागों के अंतर्गत चाहे जितने बड़े घोटाले, पेपर लीक या रेल हादसे हो जाएं, उनके निजी दामन पर छींटे तक नहीं आने दिए जाते और वे नैतिक जवाबदेही से पूरी तरह से मुक्त बने रहते हैं।

सरकार और उसके समर्थकों का इस पूरे विषय पर यह तर्क रहता है कि किसी मंत्री का इस्तीफा ले लेने से जनता के बीच यह गलत संदेश चला जाएगा कि सरकार ने अपनी गलती स्वीकार कर ली है या वह मीडिया और विपक्षी दलों के दबाव के आगे झुक गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली यह सरकार पिछले बारह वर्षों में किसी भी परिस्थिति में स्वयं को गलत साबित नहीं होने देना चाहती और यही कारण है कि वह किसी भी मंत्री का त्यागपत्र स्वीकार करने से बचती है। यद्यपि साल दो हज़ार इक्कीस में कोविड की भयानक दूसरी लहर के बाद डॉक्टर हर्षवर्धन, रविशंकर प्रसाद और रमेश पोखरियाल निशंक जैसे दर्जन भर बड़े मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया गया था, लेकिन सरकार ने उसे कभी सार्वजनिक जवाबदेही या प्रशासनिक नाकामी के रूप में स्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे महज एक नियमित संगठनात्मक फेरबदल और कार्य-प्रदर्शन का नाम देकर कागजों पर निपटा दिया। सरकार की यह स्थापित रणनीति रही है कि वह किसी भी जन आंदोलन या विरोध प्रदर्शन के सामने तुरंत झुकने के बजाय उस आंदोलन को लंबा खींचकर थका देती है और उसके राजनीतिक नफा-नुकसान को वोटों के तराजू पर तौलती है। जिस प्रकार वर्ष दो हज़ार बीस-इक्कीस के ऐतिहासिक किसान आंदोलन में सरकार महीनों तक अड़ी रही और अंततः पंजाब व उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों के राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए ही तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला किया, ठीक उसी प्रकार आज भी सरकार जन-आक्रोश को चुपचाप भांप रही है और धर्मेंद्र प्रधान जैसे प्रभावशाली संगठनात्मक नेताओं को अपनी सत्ता की ढाल बनाकर सुरक्षित रखने का प्रयास कर रही है।

वैश्विक इतिहास और भारत के अपने समृद्ध अतीत पर नजर डालें तो लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में नैतिक मूल्यों और जन-जवाबदेही के बेहद गौरवशाली और अनुकरणीय उदाहरण देखने को मिलते हैं। साल एक हज़ार नौ सौ बियासी में जब अर्जेंटीना की सेना ने ब्रिटेन के फॉकलैंड द्वीपों पर कब्जा कर लिया था, तब ब्रिटेन के विदेश मंत्री लॉर्ड कैरिंगटन ने घटना के महज तीन दिन के भीतर यह कहते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था कि इस राष्ट्रीय शर्मिंदगी की पूरी नैतिक जिम्मेदारी उनकी है, जबकि बाद में हुई निष्पक्ष जांच में वे पूरी तरह से निर्दोष पाए गए थे। इसी प्रकार भारत के महान सपूत और पूर्व रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने साल एक हज़ार नौ सौ छप्पन में महबूबनगर ट्रेन हादसे के बाद स्वतः ही अपना इस्तीफा तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भेज दिया था। जब तीन महीने बाद तमिलनाडु के अरियालूर में एक और भीषण रेल दुर्घटना हुई जिसमें एक सौ चवालीस लोगों की जान चली गई, तब शास्त्री जी ने दोबारा कड़ा रुख अपनाते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। तब पंडित नेहरू ने संसद में खड़े होकर स्पष्ट रूप से कहा था कि लाल बहादुर शास्त्री इस हादसे के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं हैं, फिर भी उनका इस्तीफा इसलिए स्वीकार किया जा रहा है ताकि भविष्य के भारत के लिए सार्वजनिक जीवन में उच्च नैतिक मानकों की एक अमर मिसाल कायम की जा सके। आज के इस आधुनिक राजनीतिक परिवेश में लाल बहादुर शास्त्री और लॉर्ड कैरिंगटन जैसी महान नैतिक मिसालों को पूरी तरह से भुला दिया गया है और अब रेल हादसों, पेपर लीक घोटालों और प्रशासनिक विफलताओं पर मंत्रियों के इस्तीफे मांगना तो दूर, उल्टे उनकी कुर्सियों को हर कीमत पर बचाने की एक नई परंपरा स्थापित कर दी गई है, जिससे देश का आम नागरिक खुद को ठगा हुआ और असहाय महसूस कर रहा है।

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