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हरेला पर्व पर पीएनजी महाविद्यालय में वृक्षारोपण से गूंजा पर्यावरण संरक्षण और हरित भविष्य का संकल्प

महाविद्यालय परिसर में जनप्रतिनिधियों, वन अधिकारियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने फलदार व छायादार पौधे लगाकर जल संरक्षण, जैव विविधता, स्वच्छता और प्रकृति संवर्धन का सामूहिक संकल्प लिया तथा पर्यावरण बचाने का सशक्त संदेश दिया।

रामनगर। उत्तराखंड की समृद्ध लोकपरंपराओं में प्रकृति, पर्यावरण और मानव जीवन के बीच गहरे संबंध का प्रतीक माने जाने वाले हरेला पर्व को इस बार पी.एन.जी. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रामनगर में अत्यंत उत्साह, सामाजिक जिम्मेदारी और पर्यावरणीय चेतना के साथ मनाया गया। पूरे परिसर में हरियाली, प्रकृति संरक्षण और जनजागरूकता का अनूठा संदेश गूंजता रहा। कार्यक्रम केवल औपचारिक पौधरोपण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे भविष्य की पीढ़ियों के लिए स्वच्छ, सुरक्षित और हरित वातावरण तैयार करने के व्यापक संकल्प के रूप में देखा गया। इस अवसर पर महाविद्यालय प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, वन विभाग के अधिकारियों, शिक्षकों, कर्मचारियों, पूर्व छात्र नेताओं तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने सहभागिता करते हुए यह संदेश दिया कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक और सामाजिक दायित्व है। कार्यक्रम का शुभारंभ महाविद्यालय की प्रभारी प्राचार्य डॉ. पुनीता कुशवाहा द्वारा महाविद्यालय परिसर में पौधा रोपित कर किया गया। पौधरोपण के साथ ही उन्होंने उपस्थित सभी लोगों से पौधों की नियमित देखभाल करने, जल संरक्षण को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने तथा प्रकृति के प्रति संवेदनशील जीवनशैली अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यदि आज पर्यावरण की रक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर प्राकृतिक संकटों का सामना करना पड़ेगा।

कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में डॉ. पुनीता कुशवाहा ने कहा कि हरेला पर्व केवल उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान भर नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करने वाला ऐसा लोकपर्व है जो हर व्यक्ति को धरती, जल, जंगल और जैव विविधता के महत्व का बोध कराता है। उन्होंने कहा कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण, अनियंत्रित विकास और अंधाधुंध वृक्षों की कटाई के कारण पर्यावरणीय असंतुलन लगातार बढ़ रहा है। ऐसे समय में हरेला जैसे पर्व समाज को यह संदेश देते हैं कि विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। उन्होंने छात्र-छात्राओं से अपील करते हुए कहा कि प्रत्येक युवा अपने जीवन में कम से कम एक पौधा अवश्य लगाए और उसकी देखभाल अपने परिवार के सदस्य की तरह करे। उन्होंने यह भी कहा कि केवल पौधे लगाने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखकर बड़ा करना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने महाविद्यालय परिवार को इस दिशा में निरंतर कार्य करने के लिए प्रेरित करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि शिक्षा संस्थान यदि पर्यावरण संरक्षण की मुहिम का नेतृत्व करें तो समाज में व्यापक सकारात्मक परिवर्तन संभव है।

इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि क्षेत्रीय विधायक दीवान सिंह बिष्ट ने महाविद्यालय परिसर में विभिन्न प्रजातियों के फलदार एवं छायादार पौधों का रोपण कर पर्यावरण संरक्षण की इस मुहिम को नई ऊर्जा प्रदान की। उनके साथ भूतपूर्व छात्र परिषद के अध्यक्ष गणेश रावत तथा अन्य गणमान्य नागरिकों ने भी पौधे लगाकर प्रकृति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। विधायक दीवान सिंह बिष्ट ने कहा कि उत्तराखंड की संस्कृति में प्रकृति को देवतुल्य माना गया है और हरेला पर्व उसी आस्था का जीवंत स्वरूप है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और घटते वन क्षेत्र जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को वृक्षारोपण अभियान से जुड़ना होगा। उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि पौधे केवल ऑक्सीजन का स्रोत नहीं, बल्कि मानव जीवन, कृषि, वन्यजीव, जल स्रोतों और जैव विविधता की रक्षा का सबसे मजबूत आधार हैं। उन्होंने जल संरक्षण, स्वच्छता अभियान और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग को समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताते हुए युवाओं से पर्यावरण के प्रहरी बनने का आह्वान किया। विधायक ने यह भी कहा कि यदि आज की युवा पीढ़ी पर्यावरण संरक्षण को अपनी जिम्मेदारी बना ले तो भविष्य में उत्तराखंड की प्राकृतिक धरोहर और अधिक समृद्ध होकर सामने आएगी।

महाविद्यालय परिसर में आयोजित इस आयोजन के दौरान पर्यावरण संरक्षण विषय पर एक विचार गोष्ठी का भी आयोजन किया गया, जिसमें वक्ताओं ने वर्तमान समय में तेजी से बढ़ते पर्यावरणीय संकटों पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए समाधान के व्यावहारिक उपायों पर विस्तार से चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि अनियंत्रित प्रदूषण, जंगलों का लगातार घटता क्षेत्रफल, जल स्रोतों का सूखना और बदलती जलवायु केवल वैज्ञानिक विषय नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन के अस्तित्व से जुड़े गंभीर प्रश्न बन चुके हैं। उन्होंने कहा कि यदि समाज समय रहते सचेत नहीं हुआ तो भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय असंतुलन की घटनाएं और अधिक बढ़ सकती हैं। गोष्ठी में यह भी कहा गया कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को व्यवहारिक स्वरूप देने की आवश्यकता है ताकि विद्यार्थी केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रहें, बल्कि प्रकृति संरक्षण के वास्तविक अभियानों का हिस्सा बनें। वक्ताओं ने हरेला पर्व की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उत्तराखंड की यह परंपरा विश्व को यह संदेश देती है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना विकास की कल्पना अधूरी है। उपस्थित छात्र-छात्राओं ने भी पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने विचार व्यक्त किए और भविष्य में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का संकल्प दोहराया।

महाविद्यालय की नमामि गंगे इकाई की नोडल अधिकारी डॉ. नीमा राणा के नेतृत्व में आयोजित विशेष अभियान कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण रहा। उनके मार्गदर्शन में स्वयंसेवकों एवं छात्र-छात्राओं ने पूरे परिसर को अधिक हरित, स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल बनाने का संकल्प लिया। इस दौरान “एक पेड़ मां के नाम” तथा “एक विद्यार्थी–एक पौधा” अभियान को जनभागीदारी के माध्यम से सफल बनाने का आह्वान किया गया। डॉ. नीमा राणा ने कहा कि वृक्षारोपण का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा जब लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल, सिंचाई और सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। उन्होंने स्वयंसेवकों को पौधों की निगरानी, उनकी वृद्धि पर ध्यान देने तथा परिसर को स्वच्छ बनाए रखने की जिम्मेदारी भी सौंपी। उन्होंने कहा कि नमामि गंगे अभियान केवल नदी संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वच्छ पर्यावरण, जल संरक्षण और हरित विकास की व्यापक अवधारणा को आगे बढ़ाने वाला राष्ट्रीय अभियान है। छात्र-छात्राओं ने पूरे उत्साह के साथ पौधों की सुरक्षा की सामूहिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए यह संकल्प लिया कि आने वाले वर्षों में महाविद्यालय परिसर को और अधिक हरा-भरा एवं पर्यावरण अनुकूल बनाया जाएगा।

उल्लेखनीय रहा कि इस पूरे आयोजन में वन विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की सक्रिय भागीदारी ने कार्यक्रम को और अधिक प्रभावशाली बना दिया। पार्क वार्डन बिंदर पाल सिंह, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक राहुल मिश्रा, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक साकेत बड़ौला, वन रेंजर नवीन पांडे, वन आरक्षी प्रमोद सत्यबली सहित वन विभाग के अधिकारियों ने पौधरोपण अभियान में भाग लेते हुए विद्यार्थियों को वन संरक्षण, जैव विविधता और वन्यजीवों के संरक्षण के महत्व की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड की पहचान उसके घने जंगलों, समृद्ध जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों से है तथा इनकी सुरक्षा प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। अधिकारियों ने विद्यार्थियों से कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिवर्ष कम से कम एक पौधा लगाकर उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करे तो पर्यावरणीय चुनौतियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने जंगलों में आग की घटनाओं को रोकने, जल स्रोतों की रक्षा करने तथा प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने का भी संदेश दिया। विद्यार्थियों ने वन अधिकारियों से पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अनेक प्रश्न पूछे, जिनका विस्तार से उत्तर देकर उन्हें प्रकृति के प्रति और अधिक जागरूक किया गया।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में महाविद्यालय परिवार ने सामूहिक रूप से पर्यावरण संरक्षण, हरित विकास और स्वच्छ भविष्य के निर्माण की शपथ ग्रहण की। सभी उपस्थित लोगों ने यह संकल्प दोहराया कि वे केवल हरेला पर्व तक सीमित न रहकर वर्षभर वृक्षारोपण, पौधों के संरक्षण, जल बचाने, स्वच्छता बनाए रखने तथा जैव विविधता की रक्षा के लिए निरंतर कार्य करेंगे। इस अवसर पर डॉ. महेंद्र पाल सिंह परमार, डॉ. प्रभाकर त्यागी, डॉ. पंकज प्रियदर्शी, नरेंद्र प्रसाद आर्य, सौरभ रावत, गोविंद सिंह जंगपांगी, भगत सिंह, बलवंत सिंह, दीपक सिंह सहित महाविद्यालय के अनेक प्राध्यापक, कर्मचारी तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। पूरे आयोजन में सहभागी सभी लोगों ने एक स्वर में कहा कि हरेला पर्व केवल परंपरा निभाने का अवसर नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने, पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बनाने और आने वाली पीढ़ियों को हरित, स्वच्छ एवं समृद्ध भविष्य सौंपने का प्रेरक संदेश देने वाला महापर्व है। महाविद्यालय परिसर में लगाए गए फलदार एवं छायादार पौधे इस बात के साक्षी बनेंगे कि यदि समाज सामूहिक संकल्प के साथ आगे बढ़े तो पर्यावरण संरक्षण का सपना केवल अभियान नहीं, बल्कि स्थायी जनचेतना का रूप ले सकता है।

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