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संस्कृत के वैश्विक पुनर्जागरण की ओर उत्तराखण्ड का ऐतिहासिक कदम, उच्च स्तरीय आयोग गठन की तैयारी

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की पहल पर देशभर के शीर्ष संस्कृत विद्वानों, कुलपतियों और नीति विशेषज्ञों ने भारतीय ज्ञान परम्परा, आधुनिक शिक्षा, अनुसंधान, तकनीक तथा रोजगारोन्मुखी संस्कृत विकास की व्यापक रूपरेखा सुझाई।

देहरादून। भारतीय संस्कृति की आत्मा मानी जाने वाली संस्कृत भाषा को केवल धार्मिक अनुष्ठानों अथवा पारंपरिक अध्ययन तक सीमित रखने के बजाय उसे आधुनिक समाज, शासन व्यवस्था, शिक्षा, अनुसंधान, तकनीक, नवाचार और रोजगार से जोड़ने की दिशा में उत्तराखण्ड सरकार ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी पहल की है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की मंशा के अनुरूप प्रस्तावित उत्तराखण्ड संस्कृत आयोग के गठन को लेकर गुरुवार को सचिवालय में आयोजित उच्च स्तरीय संवाद एवं परामर्श बैठक ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया कि राज्य अब संस्कृत के पुनर्जागरण का राष्ट्रीय मॉडल बनने की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ रहा है। इस महत्वपूर्ण बैठक में देश के प्रतिष्ठित संस्कृत विद्वानों, शिक्षाविदों, कुलपतियों, प्रशासनिक विशेषज्ञों तथा नीति निर्धारकों ने भाग लेते हुए आयोग के स्वरूप, उसकी शक्तियों, कार्यक्षेत्र, दीर्घकालिक उद्देश्यों और भविष्य की रणनीति पर विस्तार से विचार रखा। चर्चा के दौरान यह भावना प्रमुखता से उभरकर सामने आई कि यदि संस्कृत को वास्तव में जनभाषा के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना है तो केवल भाषाई संरक्षण पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि भारतीय ज्ञान परम्परा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वैदिक दर्शन, सांस्कृतिक मूल्यों और आधुनिक तकनीकी नवाचारों को एकीकृत करते हुए व्यापक कार्ययोजना तैयार करनी होगी। विशेषज्ञों ने इस पहल को उत्तराखण्ड ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए एक ऐतिहासिक अवसर बताया, जो भारतीय सभ्यता की प्राचीन धरोहर को नई पीढ़ी से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

बैठक की अध्यक्षता कर रहे संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार ने राज्य में संस्कृत भाषा एवं संस्कृत शिक्षा की वर्तमान स्थिति का विस्तृत प्रस्तुतीकरण करते हुए बताया कि उत्तराखण्ड सरकार पिछले कई वर्षों से संस्कृत के संरक्षण, विस्तार और व्यावहारिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए निरंतर योजनाबद्ध प्रयास कर रही है। उन्होंने उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय, उत्तराखण्ड संस्कृत संस्थान, संस्कृत शिक्षा निदेशालय तथा संस्कृत शिक्षा परिषद् के माध्यम से संचालित विभिन्न योजनाओं, शोध गतिविधियों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा जनजागरूकता अभियानों का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 2010 में 7 जनवरी को संस्कृत भाषा को उत्तराखण्ड की द्वितीय राजभाषा का संवैधानिक दर्जा प्रदान किया जाना राज्य के इतिहास का अत्यंत गौरवपूर्ण निर्णय था, जिसने प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को नई मजबूती दी। उन्होंने इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला कि राज्य के सभी 13 जनपदों में संस्कृत ग्रामों के प्रति बढ़ती रुचि, संस्कृत कुटुम्ब सम्मेलन, संस्कृत विदुषी सम्मेलन और अन्य सामाजिक कार्यक्रम यह प्रमाणित करते हैं कि समाज में संस्कृत के प्रति विश्वास और अपनत्व लगातार बढ़ रहा है। उनके अनुसार अब समय आ गया है कि इन प्रयासों को संस्थागत स्वरूप देकर एक प्रभावी आयोग के माध्यम से नई दिशा प्रदान की जाए।

विचार-विमर्श के दौरान यह जानकारी भी साझा की गई कि उत्तराखण्ड संस्कृत आयोग की अवधारणा कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सुविचारित प्रक्रिया रही है। संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार ने बताया कि 1 दिसम्बर 2025 को उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संस्कृत के संरक्षण, संवर्धन और प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एक उच्च स्तरीय आयोग गठित किए जाने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया था। मुख्यमंत्री की इसी घोषणा के बाद आयोग की रूपरेखा तैयार करने की प्रक्रिया प्रारम्भ की गई और देशभर के संस्कृत विश्वविद्यालयों, शिक्षण संस्थानों, विद्वानों, शोधकर्ताओं तथा संबंधित संगठनों से सुझाव आमंत्रित किए गए। प्राप्त सुझावों का गहन अध्ययन करने के बाद इस उच्च स्तरीय बैठक का आयोजन किया गया ताकि आयोग के गठन से पहले विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की राय को अंतिम स्वरूप दिया जा सके। बैठक में यह स्पष्ट किया गया कि आयोग का गठन केवल औपचारिक संस्था बनाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे संस्कृत और भारतीय ज्ञान परम्परा के विकास का प्रभावी नीति मंच बनाया जाएगा।

गहन मंथन के दौरान अधिकांश विशेषज्ञों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि प्रस्तावित आयोग का कार्य केवल संस्कृत भाषा के संरक्षण तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार आयोग को भारतीय ज्ञान परम्परा, वैदिक साहित्य, दर्शन, योग, आयुर्वेद, न्याय, व्याकरण, साहित्य, विज्ञान, गणित, खगोल, पर्यावरणीय ज्ञान, अनुसंधान, नवाचार, कौशल विकास, स्टार्टअप संस्कृति तथा रोजगारोन्मुखी संस्कृत शिक्षा को भी अपने कार्यक्षेत्र में शामिल करना चाहिए। विशेषज्ञों ने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि संस्कृत को केवल अतीत की भाषा के रूप में नहीं बल्कि भविष्य की संभावनाओं से जुड़ी भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जाए। बैठक में इस दिशा में आधुनिक पाठ्यक्रम विकसित करने, उद्योगों और शिक्षण संस्थानों के साथ समन्वय स्थापित करने, डिजिटल माध्यमों से संस्कृत शिक्षा उपलब्ध कराने तथा युवाओं को संस्कृत आधारित रोजगार एवं उद्यमिता के अवसर उपलब्ध कराने जैसे अनेक सुझाव भी सामने आए। इस दृष्टिकोण को भारतीय ज्ञान परम्परा के पुनर्स्थापन की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम माना गया।

राष्ट्रीय स्तर पर संस्कृत के व्यापक प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से बैठक में एक अत्यंत महत्वाकांक्षी सुझाव भी सामने आया, जिसके अंतर्गत पूरे देश में “संस्कृत विजय यात्रा” आयोजित करने की परिकल्पना रखी गई। विशेषज्ञों का मानना था कि यह यात्रा केवल सांस्कृतिक आयोजन न होकर जनभागीदारी आधारित अभियान के रूप में संचालित की जानी चाहिए, जिसमें विद्यार्थियों, शिक्षकों, विद्वानों, सामाजिक संगठनों तथा आम नागरिकों की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित हो। साथ ही देशभर के संस्कृत विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, संस्कृत अकादमियों के सचिवों, शोध संस्थानों तथा प्रमुख विद्वानों के सहयोग से संस्कृत के लिए एक समन्वित राष्ट्रीय कार्ययोजना तैयार करने पर भी जोर दिया गया। चर्चा में यह विचार भी प्रमुखता से सामने आया कि यदि विभिन्न संस्थानों के बीच साझा मंच विकसित किया जाए तो संस्कृत शिक्षा, अनुसंधान, प्रकाशन, तकनीकी विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। विशेषज्ञों ने इसे राष्ट्रीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रभावी माध्यम बताया।

बैठक में शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी अनेक महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए गए। विशेषज्ञों ने उत्तराखण्ड के सभी विश्वविद्यालयों में संस्कृत एवं हिन्दू अध्ययन विभागों की अनिवार्य स्थापना का प्रस्ताव रखा ताकि भारतीय ज्ञान परम्परा पर व्यवस्थित एवं उच्चस्तरीय अध्ययन को बढ़ावा मिल सके। इसके साथ ही यह भी सुझाव दिया गया कि शासन के मंत्रालयों एवं विभिन्न विभागों में संस्कृत भाषा का अधिकाधिक उपयोग सुनिश्चित किया जाए तथा सभी प्रमुख कार्यालयों में प्रशिक्षित संस्कृत अनुवादकों की नियुक्ति की जाए। इससे सरकारी कार्यों में संस्कृत का व्यावहारिक प्रयोग बढ़ेगा और इसे केवल शैक्षणिक विषय तक सीमित रहने से रोका जा सकेगा। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि राजकीय अभिलेखों, अधिसूचनाओं, सांस्कृतिक दस्तावेजों तथा विशेष अवसरों पर संस्कृत भाषा का उपयोग बढ़ाकर इसे आम नागरिकों के बीच अधिक लोकप्रिय बनाया जा सकता है। इस सुझाव को संस्कृत के प्रशासनिक सशक्तीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया। सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और अकादमिक विकास को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों ने वैदिक ऋषियों, महान आचार्यों तथा भारतीय परम्परा के विशिष्ट विद्वानों के नाम पर अध्ययन पीठ स्थापित करने की आवश्यकता भी रेखांकित की। उनका मत था कि ऐसी अध्ययन पीठें न केवल शोध गतिविधियों को नई गति देंगी बल्कि देश-विदेश के शोधार्थियों को भी आकर्षित करेंगी। इसके अतिरिक्त उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में संवादात्मक संस्कृत शिक्षण केन्द्र स्थापित करने का सुझाव दिया गया ताकि संस्कृत केवल पुस्तक आधारित अध्ययन का विषय न रहकर व्यवहारिक संवाद की भाषा बन सके। बैठक में पाली और प्राकृत जैसी प्राचीन भारतीय भाषाओं के अध्ययन, अध्यापन तथा अनुसंधान को भी समान महत्व देने की आवश्यकता पर बल दिया गया। विशेषज्ञों का कहना था कि भारतीय इतिहास, दर्शन और सांस्कृतिक विकास की व्यापक समझ के लिए इन भाषाओं का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है और आयोग को इन क्षेत्रों में भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

डिजिटल युग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए बैठक में संस्कृत को आधुनिक तकनीक से जोड़ने पर भी व्यापक चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि उत्तराखण्ड शासन संस्कृत भाषा में फिल्म, वृत्तचित्र, वेब सामग्री, ई-लर्निंग मॉड्यूल, मोबाइल एप्लीकेशन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अध्ययन सामग्री तथा अन्य डिजिटल संसाधनों के निर्माण के लिए विशेष वित्तीय सहायता उपलब्ध कराए। साथ ही वरिष्ठ एवं सेवानिवृत्त संस्कृत आचार्यों के विशाल अनुभव का लाभ नई पीढ़ी तक पहुँचाने के उद्देश्य से “संस्कृत चूड़ामणि योजना” प्रारम्भ करने का सुझाव दिया गया, जिसके माध्यम से शास्त्र-अध्ययन, प्रशिक्षण, शोध, व्याख्यान श्रृंखला तथा मार्गदर्शन कार्यक्रम संचालित किए जा सकें। विशेषज्ञों का मानना था कि यदि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक विद्वता का समन्वय स्थापित किया जाए तो संस्कृत शिक्षा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया जा सकता है तथा युवाओं में इसके प्रति स्वाभाविक आकर्षण भी विकसित होगा।

उत्तराखण्ड राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर को संस्कृत शिक्षा के सुदृढ़ीकरण से जोड़ने पर भी बैठक में गंभीर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि पर्वतीय एवं दूरस्थ क्षेत्रों में संचालित संस्कृत विद्यालयों और पाठशालाओं के आधारभूत ढाँचे को मजबूत बनाने के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार की जाए। उन्होंने इन संस्थानों में आधुनिक शिक्षण संसाधन, डिजिटल कक्षाएँ, पुस्तकालय, शोध सुविधाएँ, प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता तथा विद्यार्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक वातावरण सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका मत था कि यदि ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में संस्कृत शिक्षा को मजबूत किया जाए तो यह सांस्कृतिक संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक विकास का भी प्रभावी माध्यम बन सकती है। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि उत्तराखण्ड की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान को देखते हुए राज्य संस्कृत शिक्षा के राष्ट्रीय केंद्र के रूप में विकसित होने की पूर्ण क्षमता रखता है।

इस महत्वपूर्ण विचार-विमर्श में देशभर से अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों और विशेषज्ञों ने सक्रिय सहभागिता करते हुए अपने सुझाव प्रस्तुत किए। इनमें केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के पूर्व कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र, श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एन. के. जोशी, पाणिनीय शोध संस्थान की अध्यक्षा प्रो. पुष्पा दीक्षित, उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. सुधा रानी पाण्डेय, उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्य सचिव इन्दु कुमार पाण्डेय, भारत सरकार के पूर्व सचिव राजीव गुप्ता, पूर्व अपर सचिव सी वी गोपीनाथ, संस्कृत से संबंधित सॉफ्टवेयर एवं हार्डवेयर पर कार्य करने वाले बुलूसू, शास्त्री एवं सुब्रत प्रूस्ती, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. सन्तोष कुमार शुक्ल, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू अध्ययन विभाग के निदेशक प्रो. ओमनाथ बिमली, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज के संस्कृत विभाग के आचार्य डॉ. सुनील जोशी, उत्तराखंड संस्कृत संस्थानम की पूर्व सचिव डॉ. सविता मोहन, कृष्ण सेमवाल, संस्थानम के पूर्व उपाध्यक्ष नन्दकिशोर पुरोहित, प्रेमचन्द्र शास्त्री, डॉ. धनंजय तथा डॉ. कृष्ण पाण्डेय सहित शासन के वरिष्ठ अधिकारियों और अनेक प्रतिष्ठित संस्कृत विद्वानों ने भाग लेते हुए आयोग के स्वरूप को लेकर अपने बहुमूल्य विचार रखे।

बैठक के समापन पर यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया कि प्रस्तावित उत्तराखण्ड संस्कृत आयोग के गठन तथा उसके उद्देश्यों को अंतिम स्वरूप देने के लिए एक प्रतिनिधिमण्डल शीघ्र ही राज्यपाल, मुख्यमंत्री तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश से भेंट करेगा। इस दौरान आयोग की रूपरेखा, उसके अधिकार, कार्यप्रणाली तथा भावी कार्ययोजना पर विस्तार से विचार-विमर्श किया जाएगा ताकि इसे प्रभावी, परिणामोन्मुख और दीर्घकालिक संस्था के रूप में विकसित किया जा सके। विशेषज्ञों ने विश्वास व्यक्त किया कि यदि आयोग को व्यापक अधिकार, स्पष्ट नीति और पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए गए तो उत्तराखण्ड न केवल संस्कृत संरक्षण का अग्रणी राज्य बनेगा बल्कि भारतीय ज्ञान परम्परा के पुनर्जागरण का राष्ट्रीय केंद्र भी स्थापित हो सकेगा। सचिवालय में आयोजित यह उच्च स्तरीय मंथन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है, जिसने यह संकेत दिया है कि आने वाले समय में उत्तराखण्ड संस्कृत, संस्कृति और भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण एवं वैश्विक प्रचार-प्रसार की नई इबारत लिखने की तैयारी कर चुका है।

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