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गोविषाण टीले की खुदाई से खुलेगा हजारों वर्षों का इतिहास उत्तराखंड को मिलेगी वैश्विक पुरातात्विक पहचान

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 95 एकड़ में फैले प्राचीन स्थल पर वैज्ञानिक उत्खनन शुरू किया। विशेषज्ञों को बुद्धकाल, कुषाण, गुप्तकाल और पूर्व मध्यकाल से जुड़े दुर्लभ अवशेष मिलने की उम्मीद, जिससे उत्तराखंड के इतिहास को नई दिशा मिल सकती है।

काशीपुर। उत्तराखंड की ऐतिहासिक और पुरातात्विक विरासत को नई पहचान दिलाने की दिशा में गुरुवार को एक ऐसा महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया, जिसका इंतजार इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञ लंबे समय से कर रहे थे। लगभग 95 एकड़ क्षेत्र में फैला गोविषाण टीला एक बार फिर वैज्ञानिक उत्खनन का साक्षी बनने जा रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, देहरादून मंडल की टीम ने कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत की उपस्थिति में विधिवत पूजा-अर्चना के साथ उत्खनन कार्य का शुभारंभ किया। माना जा रहा है कि यह अभियान केवल मिट्टी की खुदाई नहीं, बल्कि सदियों से धरती की परतों में दफन उस इतिहास को सामने लाने का प्रयास है, जिसने कभी काशीपुर को उत्तर भारत के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यापारिक नगरों की श्रेणी में स्थापित किया था। विशेषज्ञों का विश्वास है कि इस बार का उत्खनन इतिहास के ऐसे अनेक अनछुए अध्यायों का खुलासा कर सकता है, जो न केवल काशीपुर बल्कि पूरे उत्तराखंड के प्राचीन अतीत को नई दृष्टि प्रदान करेंगे। यही कारण है कि इस ऐतिहासिक पहल को क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और वैश्विक महत्व से जोड़कर देखा जा रहा है।

धरती की सतह के नीचे छिपी इस प्राचीन विरासत को लेकर वर्षों से इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों के बीच गहरी उत्सुकता बनी हुई थी। गोविषाण टीला कोई साधारण स्थल नहीं माना जाता, बल्कि इसे उत्तर भारत की सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरों में से एक समझा जाता है। इतिहासकारों के अनुसार सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में काशीपुर को गोविषाण के नाम से जाना जाता था और उस समय यह नगर धार्मिक, सांस्कृतिक तथा प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत प्रतिष्ठित केंद्र था। प्रसिद्ध चीनी यात्रियों ह्वेनसांग और फाहियान ने भी अपने यात्रा-वृत्तांतों में इस नगर का उल्लेख किया है। विशेष रूप से ह्वेनसांग ने गोविषाण को उस युग का समृद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र बताते हुए यहां की सामाजिक और आध्यात्मिक गतिविधियों का विस्तार से वर्णन किया था। इन्हीं ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर गोविषाण टीले को भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यहां छिपे पुरातात्विक अवशेष भारतीय सभ्यता के विकासक्रम को समझने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

गोविषाण टीले का महत्व केवल ऐतिहासिक अभिलेखों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्व में हुए उत्खननों ने भी इसकी प्रामाणिकता को मजबूत आधार प्रदान किया है। वर्ष 1963-64 में यहां की गई खुदाई के दौरान गुप्तकालीन किले के अवशेष प्राप्त हुए थे, जिन्होंने यह प्रमाणित किया कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में संगठित शहरी संरचना का हिस्सा था। इसके बाद वर्ष 2004-05 में किए गए उत्खनन में प्राचीन सिक्के, मूर्तियां, मृदभांड, स्थापत्य अवशेष और अनेक महत्वपूर्ण पुरावशेष मिले थे। इन दुर्लभ धरोहरों को वर्तमान में संग्रहालयों में सुरक्षित रखा गया है, जहां वे शोधकर्ताओं और इतिहास प्रेमियों के अध्ययन का महत्वपूर्ण आधार बने हुए हैं। पुरातत्व विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक की खोजें इस स्थल की वास्तविक क्षमता का केवल एक छोटा हिस्सा हैं। अभी भी विशाल क्षेत्र का अधिकांश भाग धरती के भीतर दबा हुआ है और संभावना है कि यहां अनेक ऐसी संरचनाएं तथा पुरावशेष मौजूद हैं, जो भारतीय इतिहास की कई स्थापित धारणाओं को नए सिरे से परिभाषित कर सकते हैं।

इस बार प्रारंभ किए गए वैज्ञानिक उत्खनन अभियान को लेकर विशेषज्ञों की अपेक्षाएं पहले की तुलना में कहीं अधिक हैं। पुरातत्व विभाग का अनुमान है कि इस खुदाई के दौरान भगवान बुद्ध के काल से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य, प्राचीन धार्मिक स्थलों के अवशेष, आवासीय संरचनाएं, मृदभांड, धातु निर्मित वस्तुएं, सिक्के तथा सांस्कृतिक जीवन से संबंधित अनेक प्रमाण प्राप्त हो सकते हैं। द्रोण सागर से सटे इस पूरे क्षेत्र को इतिहासकार सदियों से अत्यंत संवेदनशील पुरातात्विक क्षेत्र मानते रहे हैं। यही कारण है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की विशेषज्ञ टीम आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों और चरणबद्ध पद्धति के माध्यम से अत्यंत सावधानीपूर्वक खुदाई करेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अनुमान के अनुरूप महत्वपूर्ण अवशेष प्राप्त होते हैं तो इससे केवल काशीपुर की ऐतिहासिक पहचान ही मजबूत नहीं होगी, बल्कि उत्तराखंड के प्राचीन इतिहास के अध्ययन को भी नई दिशा मिलेगी। साथ ही गोविषाण टीला विश्व के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों की सूची में और अधिक प्रभावशाली स्थान प्राप्त कर सकता है।

उत्खनन कार्य के शुभारंभ के अवसर पर कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन आने वाला गोविषाण टीला उत्तराखंड के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में शामिल है। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र अत्यंत प्राचीन काल से निरंतर आबाद रहा है और यहां विभिन्न कालखंडों की सांस्कृतिक परतें स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। उनके अनुसार इस स्थल से लेट वैदिक काल, कुषाण काल तथा गुप्तकाल के महत्वपूर्ण अवशेष पहले भी प्राप्त हो चुके हैं, जिससे यह प्रमाणित होता है कि यहां निरंतर मानव बसावट और सांस्कृतिक गतिविधियां होती रही हैं। उन्होंने बताया कि केवल सतह पर ही बड़ी मात्रा में प्राचीन मृदभांड दिखाई देते हैं, जिन्हें देखकर इस स्थल की ऐतिहासिक समृद्धि का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इतने महत्वपूर्ण स्थल का दोबारा वैज्ञानिक उत्खनन आवश्यक था, ताकि इतिहास की अनेक अनसुलझी कड़ियों को प्रमाणिक आधार मिल सके।

दीपक रावत ने यह भी बताया कि गोविषाण टीले पर पूर्व में कई चरणों में उत्खनन हो चुका है और हर बार नई जानकारियां सामने आई हैं। उनके अनुसार प्रारंभिक उत्खनन वर्ष 1949 में हुआ था, इसके बाद 1965 तथा फिर बाद के वर्षों में भी खुदाई की गई। उन्होंने कहा कि इतने विस्तृत क्षेत्र में अब तक सीमित हिस्सों में ही उत्खनन संभव हो पाया है, जबकि लगभग 95 एकड़ में फैले इस पूरे परिसर में अभी भी व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। इस बार वैज्ञानिक पद्धति से लगभग एक वर्ष तक चलने वाले अभियान में छोटे-छोटे सेक्टर बनाकर व्यवस्थित तरीके से खुदाई की जाएगी। उनका कहना था कि इस प्रक्रिया के दौरान जो भी महत्वपूर्ण तथ्य और पुरातात्विक सामग्री सामने आएगी, उसे समय-समय पर सार्वजनिक किया जाएगा ताकि आम लोगों को भी अपनी ऐतिहासिक धरोहर के बारे में जानकारी मिल सके। उन्होंने क्षेत्र के लोगों से भी इस स्थल के संरक्षण और महत्व को समझने की अपील की।

आयुक्त ने भविष्य की योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि गोविषाण टीले को केवल उत्खनन स्थल तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इसे एक समग्र विरासत परिसर के रूप में विकसित करने की दिशा में भी कार्य किया जाएगा। उन्होंने बताया कि इसके लिए एक विस्तृत विकास योजना तैयार की गई है, जिसके अंतर्गत यहां साइट संग्रहालय, इंटरप्रिटेशन सेंटर और आगंतुकों के लिए आवश्यक आधारभूत सुविधाएं विकसित करने का प्रस्ताव है। उनका कहना था कि जब उत्खनन का कार्य पर्याप्त स्तर तक पूरा हो जाएगा, तब इस ऐतिहासिक धरोहर को आम लोगों के लिए व्यवस्थित रूप से खोला जाएगा, ताकि विद्यार्थी, शोधकर्ता, पर्यटक और इतिहास प्रेमी यहां आकर प्राचीन सभ्यता को निकट से समझ सकें। उनके अनुसार किसी भी समाज की पहचान उसकी ऐतिहासिक विरासत से होती है और गोविषाण टीला उत्तराखंड की ऐसी धरोहर है, जिसे विश्व स्तर पर स्थापित किया जाना चाहिए।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, देहरादून मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. मोहनचंद्र जोशी ने भी इस अवसर पर गोविषाण टीले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यहां लगभग एक हजार वर्षों से भी अधिक लंबे समय तक कुषाण काल से लेकर पूर्व मध्यकाल तक के निरंतर सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त होने की संभावना है। उनके अनुसार वैज्ञानिक तरीके से किया जाने वाला उत्खनन इस क्षेत्र की वास्तविक ऐतिहासिक परतों को सामने लाएगा। उन्होंने बताया कि प्रत्येक अवशेष का विधिवत दस्तावेजीकरण किया जाएगा और सभी प्राप्त सामग्री का संरक्षण निर्धारित मानकों के अनुरूप होगा। डॉ. जोशी ने यह भी कहा कि गोविषाण टीला भारतीय इतिहास के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है और यहां से मिलने वाले साक्ष्य भविष्य में अनेक नए शोधों का आधार बन सकते हैं।

उत्खनन कार्य के शुभारंभ के साथ ही पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया गया। कुमाऊं मंडल में व्यापक स्तर पर चलाए जा रहे वृक्षारोपण अभियान का उल्लेख करते हुए दीपक रावत ने कहा कि सभी जिलों और विभागों में बड़े पैमाने पर पौधारोपण कराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक जंगलों में पौधारोपण के साथ-साथ सरकारी परिसरों और विकसित क्षेत्रों में लगाए जाने वाले पौधों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, क्योंकि ऐसे स्थानों पर उनके संरक्षण और जीवित रहने की संभावना अधिक रहती है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की सबसे बड़ी पहचान उसकी हरित प्राकृतिक संपदा है और विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। उनका कहना था कि विरासत संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं तथा दोनों क्षेत्रों में समान रूप से गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए।

कार्यक्रम में एस पी स्वपन कुमार सिंह, उपजिलाधिकारी अभय प्रताप सिंह, डॉ. वृंदा रोपका, राम किशोर मीणा, कमलेश पांगती, के.वी. शर्मा, डॉ. कविता बिष्ट, डॉ. पाल सिंह राणा, उपमंडल प्रभारी दिनेश शर्मा सहित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और मंडल कार्यालय का समस्त स्टाफ उपस्थित रहा। सभी अधिकारियों ने एक स्वर में विश्वास व्यक्त किया कि गोविषाण टीले का यह नया उत्खनन अभियान केवल अतीत की खोज नहीं, बल्कि काशीपुर की ऐतिहासिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में एक निर्णायक पहल सिद्ध होगा। यदि अनुमान के अनुरूप महत्वपूर्ण पुरावशेष प्राप्त होते हैं तो गोविषाण टीला उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का सबसे चमकदार केंद्र बनकर उभरेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास को जीवंत रूप में संरक्षित रखने का सशक्त माध्यम बनेगा।

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