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शादी की चमक फीकी रिश्तों की नींव कमजोर टूटते परिवारों का बढ़ता दर्दनाक सच

भव्य विवाह समारोहों, दिखावे, कृत्रिम जीवनशैली और घटती सहनशीलता के बीच बढ़ते तलाक, पारिवारिक विघटन, सामाजिक मूल्यों के क्षरण तथा संस्कारों से दूरी पर गंभीर आत्ममंथन की जरूरत बताती यह विशेष पड़ताल।

भारत(सुनील कोठारी)। आधुनिकता की चकाचौंध और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच आज हमारे पारंपरिक रिश्तों और वैवाहिक संस्था की जड़ें जिस तेजी से खोखली हो रही हैं, वह कलयुग के एक बहुत ही कड़वे और डरावने सच को बयां करता है। वर्तमान दौर में शादियों के भव्य आयोजनों में जितनी रौनक, तड़क-भड़क और लाखों-करोड़ों रुपयों का दिखावा बढ़ रहा है, विडंबना यह है कि रिश्तों की आपसी डोर उतनी ही ज्यादा कमजोर और संवेदनहीन होती जा रही है। आज के इस दौर का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि लड़का और लड़की एक-दूसरे को सालों-साल समझने, जानने और परखने का लंबा दावा करने के बाद परिपक्वता से विवाह के बंधन में बंध रहे हैं, लेकिन उतनी ही गजब की रफ्तार से अदालतों में तलाक के मुकदमों और अलगाव की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। आज के भव्य मैरिज हॉलों के भीतर बजने वाली शहनाइयों की गूंज शांत भी नहीं हो पाती कि उससे पहले ही रिश्तों में दरार की खबरें सामने आने लगती हैं। यह इस कलयुगी समाज का वो स्याह पहलू है जो हमारे सामाजिक ढांचे को अंदर ही अंदर घुन की तरह खाए जा रहा है और प्रेम की जगह आपसी अहम और स्वार्थ ने ले ली है।

यदि हम आज से करीब बीस-पच्चीस साल पहले के बीते दौर के वैवाहिक जीवन और रीति-रिवाजों की तुलना वर्तमान समय से करें, तो जमीन-आसमान का एक बहुत बड़ा और हैरान करने वाला अंतर साफ तौर पर नजर आता है। पुराने समय में जब कोई नई-नवेली दुल्हन अपनी ससुराल से पहली बार विदा होकर और रस्मों को निभाकर अपनी मायके की दहलीज पर ‘पग फेरे’ की रस्म के लिए कदम रखती थी, तो उसके चेहरे पर एक स्वाभाविक और अनोखी रौनक के साथ-साथ गजब का प्राकृतिक निखार साफ झलकता था। इसके विपरीत, आज की आधुनिक शादियों में वरमाला के समय जब दुल्हन स्टेज पर पहुंचती है, तो उसके मुखमंडल पर कृत्रिम चमक और कॉस्मेटिक का जो भारी दबाव होता है, वह विवाह संपन्न होने के महज दो दिन बाद ही हवा की तरह छूमंतर हो जाता है। यही कारण है कि शादी के कुछ ही दिनों बाद जब वो लड़की पहली बार अपने माता-पिता के घर वापस लौटती है, तो उसका चेहरा पूरी तरह से मुरझाए हुए किसी बेजान फूल की तरह सूखा और बेरंग दिखाई देता है, जिसे देखकर माता-पिता का दिल भी भीतर तक दहल जाता है।

आजकल की शादियों में दिखावे और स्टेटस सिंबल के नाम पर भोजन की भव्य व्यवस्था और कैटरिंग पर पानी की तरह लाखों रुपये अंधाधुंध बहा दिए जाते हैं, लेकिन इस भारी-भरकम खर्च के बाद भी मेहमानों को सम्मान से भोजन नसीब नहीं होता। पचास तरह के अजीबो-गरीब पकवानों और विदेशी मिठाइयों का मेनू कार्ड छपवाने के बावजूद आमंत्रित मेहमानों को पंडाल के भीतर अपनी मनपसंद की मिठाई ढूंढने से भी नजर नहीं आती है। कैटरिंग और इवेंट मैनेजमेंट चलाने वाले लोग इसका पूरा बंदोबस्त और चालाकी का ताना-बाना इस तरह से बुनते हैं कि कागज के मेनू में तो सब कुछ दर्ज होता है, लेकिन काउंटर पर केवल आधा सामान ही जनता को परोसा जाता है। मेहमानों को अपनी ही थाली में खाना लेने के लिए स्टाफ के आगे हाथ फैलाना पड़ता है और मांग-मांग कर भोजन ग्रहण करना पड़ता है, जिसे समाज की भाषा में ‘ऊंची दुकान और फीके पकवान’ की कहावत से पूरी तरह परिभाषित किया जा सकता है। यह कलयुगी शादियों का वो कड़वा सच है जहां पैसे की तो बर्बादी होती है लेकिन तृप्ति और दुआएं किसी को नहीं मिलतीं।

वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने वाले आज के युवा खुद को बहुत ज्यादा मैच्योर, पढ़ा-लिखा और दुनियादारी समझने का ढिंढोरा तो खूब पीटते हैं, लेकिन विवाह के ठीक बाद उनकी हरकतें उतनी ही ज्यादा फूहड़, बचकानी और नासमझी से भरी हुई दिखाई देती हैं। सहनशीलता और आपसी सामंजस्य का स्तर इस कदर गिर चुका है कि अखबार के पन्ने रोज ऐसी खौफनाक खबरों से रंगे रहते हैं जहां कोई नवविवाहिता अपने ही सुहाग यानी पति की बेरहमी से हत्या कर रही है, तो कहीं कोई क्रूर पति अपनी नई दुल्हन को दहेज या आपसी विवाद में जिंदा आग के हवाले कर रहा है। ऐसे भयानक और रूह कपा देने वाले अपराधों के कारण आज वो बूढ़े पिता, जो अपनी लाडली बेटी के हाथ पीले करके और उसकी जिम्मेदारी से मुक्त होकर गंगा स्नान करने और मोक्ष की कामना करने की उम्र में थे, वे इस कलयुग के चलते पुलिस थानों, वकीलों के चौंबरों और कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने को पूरी तरह मजबूर हैं।

अगर हम इस सामाजिक गिरावट के मूल कारणों की गहराई में जाकर पड़ताल करें, तो पुराने समय में बच्चों के विवाह का पूरा अहम फैसला घर के तजुर्बेकार बुजुर्ग, माता-पिता और अनुभवी लोग मिलकर तय करते थे। वे अपने लंबे सामाजिक जीवन और व्यावहारिक अनुभव के आधार पर बहुत ही बारीकी से योग्य वर और वधू की तलाश में महीनों का समय लगाते थे। किसी भी बेटी का पिता अपनी संतान का हाथ सौंपने से पहले लड़के के चरित्र, उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, खानदान की साख, यहां तक कि उसके पूरे मोहल्ले और उठने-बैठने वाले दोस्तों तक की बेहद गहनता से छानबीन और जांच-पड़ताल करता था। इस बेहद सघन और पुख्ता प्रक्रिया के कारण उस दौर के विवाहों में किसी भी प्रकार के धोखे, फरेब या झूठ की गुंजाइश न के बराबर होती थी। इसके विपरीत, आज की आधुनिक पीढ़ी के बच्चे अपने जीवनसाथी का चुनाव खुद सोशल मीडिया या पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आकर कर रहे हैं, जिसका एकमात्र मुख्य आधार केवल शारीरिक आकर्षण और बाहरी चकाचौंध होता है। वे इंसान के वास्तविक चरित्र, उसके नैतिक गुणों और पारिवारिक संस्कारों को पूरी तरह अनदेखा कर देते हैं, जिसका परिणाम बाद में केवल और केवल जीवन भर के पछतावे के रूप में सामने आता है।

आज से दो-तीन दशक पहले जब बेटियों की शादियां होती थीं, तो वैवाहिक रस्मों के दौरान वधू को कई दिनों पहले से पारंपरिक रूप से हल्दी और सरसों के तेल का उबटन चढ़ाया जाता था। उस सादगी भरे दौर में वरमाला के समय तक लड़कियां बहुत ही सामान्य और घरेलू रूप से थोड़ा बहुत श्रृंगार तो करती थीं, लेकिन आज की तरह ब्यूटी पार्लर के हैवी केमिकल वाले मेकअप का नामोनिशान नहीं होता था। यही वजह थी कि बेहद गोरी और सुंदर दिखने वाली लड़कियां भी वरमाला के समय मंच पर थोड़ी सांवली या दबी हुई रंगत की नजर आती थीं, क्योंकि हल्दी और तेल के लगातार इस्तेमाल से उनका असली रंग कुछ समय के लिए दब जाता था। जब दूल्हा और उसके साथ आए तमाम रिश्तेदार पहली बार वधू को देखते थे, तो वे आपस में चर्चा करते थे कि लड़की का रंग भले ही थोड़ा दबा हुआ है लेकिन उसके नैन-नक्श और नजाकत बहुत ही खूबसूरत और लाजवाब है। इसके बाद जब वो लड़की अपनी ससुराल पहुंचती थी और दो-तीन दिनों बाद वहां सामान्य रूप से नहाती-धोती थी, तो हल्दी का असर हटने पर उसका असली प्राकृतिक रंग पूरी तरह से निखर कर सामने आता था और वह साक्षात पूर्णिमा के चांद की तरह चमक उठती थी, जिससे मायके आने पर उसका चेहरा हमेशा खिला-खिला और खुशहाल दिखता था।

प्राचीन समय की दुल्हनों के खिले हुए चेहरे को देखकर पूरे आस-पड़ोस और गांव-मोहल्ले में इस बात की सकारात्मक चर्चाएं गर्म रहती थीं कि लड़की बहुत ही अच्छे और सुखी परिवार में ब्याही गई है और वह अपनी ससुराल में पूरे राजसी सुख भोग रही है। इसके बिल्कुल उलट, आज के इस कलयुगी दौर में शादियों की तारीख तय होने के एक-डेढ़ महीने पहले से ही लड़कियां खुद को पूरी तरह से महंगे ब्यूटी पार्लरों और कॉस्मेटिक एक्सपर्ट्स के हवाले कर देती हैं। वरमाला के समय जब दुल्हन लाखों रुपये के आर्टिफिशियल और हैवी लेयर वाले मेकअप के बाद स्टेज पर कदम रखती है, तो वह पहली नजर में हर किसी को अप्सरा जैसी बेहद सुंदर और आकर्षक लगती है। लेकिन इस कृत्रिम खूबसूरती का असली ढोंग विवाह के महज दो-चार दिनों के भीतर ही तब पूरी तरह से बेनकाब हो जाता है, जब चेहरे से उस महंगे मेकअप का केमिकल युक्त असर धीरे-धीरे कम होने लगता है। कई बार तो पार्लरों में इस्तेमाल होने वाले घटिया और खराब ब्यूटी प्रोडक्ट्स के साइड इफेक्ट्स के कारण उस नवविवाहिता का असली चेहरा पूरी तरह से बेरंग, दाग-धब्बों से भरा हुआ और बेहद भद्दा नजर आने लगता है, जो वैवाहिक रिश्तों में अविश्वास की पहली चिंगारी बन जाता है।

पुराने समय में जब लड़कियों का विवाह बहुत ही कम उम्र यानी लगभग इक्कीस वर्ष या उससे कम की आयु में संपन्न हो जाता था, तो उनके भीतर एक मासूम सा बचपन और लचीलापन जिंदा रहता था। इस अल्हड़पन और मासूमियत के कारण वे किसी भी नए और अनजाने परिवेश या ससुराल के अजनबी माहौल में खुद को बहुत ही आसानी, सहजता और सम्मान के साथ ढाल लेती थीं। उस समय उनका दिमाग बहुत ज्यादा तार्किक या दुनियादारी के प्रपंचों से भरा हुआ नहीं होता था, जिसके कारण वे परिवार को जोड़कर रखने में विश्वास करती थीं। इसके बिल्कुल विपरीत, आज के इस आधुनिक युग में लड़कियां करियर और पढ़ाई के नाम पर तीस से बत्तीस साल की परिपक्व उम्र में जाकर विवाह के पवित्र बंधन में बंध रही हैं। इस उम्र तक आते-आते उनकी अपनी एक पूरी तरह से स्वतंत्र सोच, आत्मनिर्भर आर्थिक दृष्टिकोण और दुनियादारी की एक अलग ही गंभीर समझ विकसित हो चुकी होती है। इस अत्यधिक बौद्धिक परिपक्वता और अहंकार के कारण शादी के बाद उनका अपने पति और ससुराल वालों के स्थापित विचारों के साथ हर छोटी बात पर तीखा टकराव और वैचारिक मतभेद शुरू हो जाता है, जिसका अंत यह होता है कि उनके पवित्र वैवाहिक रिश्ते पतझड़ के सूखे पत्तों की तरह बिखर कर अदालतों के कमरों में दम तोड़ देते हैं।

रिश्तों के इस कलयुगी पतन के साथ-साथ सामाजिक समरसता का जो ढांचा टूटा है, वह भी बेहद विचारणीय है क्योंकि पहले के समय में जब किसी गरीब या अमीर की बेटी की शादी होती थी, तो पूरा गांव और मोहल्ला बारातियों के भव्य स्वागत-सत्कार के लिए खुद को एक परिवार मानकर तैयार रहता था। लोग अपने हाथों से बहुत ही आदर और पूरे सम्मान के साथ बारातियों की पंगत में घूम-घूम कर खाना परोसते थे, भले ही उस दौर में पकवानों की संख्या बहुत कम और सीमित होती थी, परंतु परोसने वालों के प्रेम और अपनेपन से मेहमानों का पेट और मन पूरी तरह से भर जाता था। यह कलयुग की शादियां और खोखले होते जा रहे दिखावे के रिश्ते आज पूरे समाज को विनाश की ओर धकेल रहे हैं, जिस पर यदि आज भी माता-पिता और युवाओं ने मिलकर गंभीर आत्ममंथन और समझदारी से काम नहीं लिया, तो आने वाले समय में हमारी पारिवारिक व्यवस्था इससे भी ज्यादा बदतर और भयावह रूप अख्तियार कर लेगी।

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