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अग्निपथ योजना में बड़ा बदलाव संकेत तीनों सेनाओं की नई मांग से देश में हलचल

तीनों सेनाओं द्वारा अग्निवीरों के स्थायीकरण को लेकर उठाई गई नई मांग ने रक्षा नीति में बड़ा मोड़ ला दिया है, जिससे भर्ती प्रणाली, सैन्य क्षमता और भविष्य की रणनीति पर देशभर में गहन बहस और राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।

भारत(सुनील कोठारी)। भारतीय सैन्य इतिहास में बीते चार साल उस कड़वे सच की तरह गुज़रे हैं, जिसने देश की सुरक्षा और युवाओं के भविष्य को एक अनिश्चित मोड़ पर खड़ा कर दिया था। साल दो हज़ार बाईस में जब केंद्र सरकार ने एक बड़े सैन्य सुधार के तौर पर अग्निपथ योजना की घोषणा की थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि इसका पच्चीस प्रतिशत का नियम रक्षा गलियारों में एक अंतहीन बहस की वजह बन जाएगा। शुरुआती नियम के तहत केवल पच्चीस फीसदी अग्निवीरों को ही सेना में स्थायी रूप से रखने का प्रावधान था, जबकि बचे हुए पिचहत्तर प्रतिशत नौजवानों को चार साल की देशसेवा के बाद बिना किसी बड़ी पेंशन या स्थायी सुरक्षा के वापस घर भेज दिया जाना तय हुआ था। इस कड़े और विवादित फॉर्मूले ने सेना की तैयारियों और युवाओं की उम्मीदों, दोनों पर ही एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया था। लेकिन अब साल दौ हज़ार छब्बीस में पहले बैच के पास आउट होने से ठीक पहले, तीनों सेनाओं ने एक ऐसा चौंकाने वाला कदम उठाया है जिसने देश की पूरी सियासत और सुरक्षा रणनीति में एक नया भूचाल ला दिया है।

भारतीय थलसेना, नौसेना और वायु सेना ने मिलकर अब रक्षा मंत्रालय और सरकार के सामने एक बेहद दमदार और अभूतपूर्व मांग रख दी है। सैन्य नेतृत्व का स्पष्ट मानना है कि अगर देश की सीमाओं को सुरक्षित रखना है और आधुनिक हथियारों का सही इस्तेमाल करना है, तो पच्चीस प्रतिशत के इस पुराने और संकीर्ण दायरे को तुरंत तोड़ना होगा। रक्षा क्षेत्र की इस सबसे बड़ी हलचल के बीच सूत्रों का कहना है कि सरकार के शीर्ष स्तर पर इस प्रस्ताव को लेकर बेहद गंभीर मंथन शुरू हो चुका है क्योंकि सैन्य कमांडर अब किसी भी कीमत पर प्रशिक्षित नौजवानों को खोना नहीं चाहते। सेनाओं की इस नई और आक्रामक पैरवी के बाद अब यह पूरी तरह साफ हो गया है कि पहले बैच की विदाई से पहले ही इस योजना के नियम पूरी तरह बदल सकते हैं। एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, तीनों अंगों में इस समय अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से अग्निवीरों को लंबे समय तक रोकने की एक जबरदस्त होड़ मची हुई है।

इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाली सिफारिश इंडियन नेवी की तरफ से आ रही है, जिसे इस समय तकनीकी रूप से सक्षम जनशक्ति की सबसे ज्यादा और बेहद गंभीर जरूरत महसूस हो रही है। एक रिपोर्ट बताती है कि भारतीय नौसेना अपने यहाँ सेवा दे रहे करीब पिचहत्तर प्रतिशत तक अग्निवीरों को स्थायी नौकरी पर बनाए रखने के लिए सरकार से सीधी सिफारिश करने की पूरी तैयारी में है। इसके समानांतर अगर हम इंडियन आर्मी और भारतीय वायु सेना की बात करें, तो वे भी इस कोटे को पच्चीस प्रतिशत की मामूली सीमा से बढ़ाकर सीधे पचास प्रतिशत यानी पूरा दोगुना करने की पुरज़ोर मांग कर रहे हैं। सैन्य रणनीतिकारों का यह भी कहना है कि पिछले चार सालों के दौरान इन अग्निवीरों ने जिस तरह दिन-रात एक करके बेहद कठिन और अत्याधुनिक ट्रेनिंग हासिल की है, उसे देखते हुए उन्हें इतनी आसानी से बाहर का रास्ता दिखाना देश के लिए एक बहुत बड़ा नुकसान साबित हो सकता है।

दरअसल इस अप्रत्याशित और बड़े बदलाव की सबसे मुख्य वजह यह है कि पिछले चार वर्षों में ये अग्निवीर देश के सबसे आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म्स, घातक मिसाइल सिस्टम और अत्याधुनिक फाइटर जेट्स को संचालित करने की बेहद जटिल और महंगी ट्रेनिंग का हिस्सा बन चुके हैं। सेना के आला अधिकारियों का साफ तर्क है कि इन संवेदनशील और अत्याधुनिक हथियारों को चलाने के लिए न सिर्फ बहुत लंबी बल्कि बेहद विशेष ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है, जिसके लिए सरकार का करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाया जा चुका है। खासकर नौसेना के नाविकों, वायु सेना के तकनीकी विंग और थलसेना के संवेदनशील तकनीकी दस्तों को इन प्रणालियों पर महारत हासिल करने के लिए कई सालों का लंबा समय लगा है। यदि इन पूरी तरह से परिपक्व और अनुभवी जवानों को महज चार साल का कार्यकाल पूरा होते ही जबरन बाहर कर दिया जाएगा, तो नए रंगरूटों को फिर से उसी तकनीकी स्तर पर लाने में देश का न जाने कितना समय, पैसा और बहुमूल्य संसाधन दोबारा बर्बाद हो जाएंगे।

इस बड़े संकट के बीच देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी लगातार इस मुद्दे पर सरकार को घेरती रही है और अग्निवीर योजना के खिलाफ सड़क से लेकर संसद तक अपनी जोरदार आवाज उठाती आई है। कांग्रेस का हमेशा से यह गंभीर आरोप रहा है कि सरकार ने बिना सोचे-समझे युवाओं के भविष्य को दांव पर लगा दिया है और चार साल बाद युवाओं को बेरोजगार छोड़ना देश के साथ बहुत बड़ा धोखा है। विपक्ष के इस तीखे राजनीतिक हमले और सीमाओं पर बढ़ते तनाव के बीच अब सेना खुद यह मान रही है कि युद्ध जैसी किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए उसे एक ऐसा मजबूत बेस चाहिए जो नई तकनीकों को बिना किसी रुकावट के तुरंत संभाल सके। जवानों को रोकने के इस नए फॉर्मूले से सेना को दो सबसे बड़े फायदे होंगेकृएक तरफ जहां भारतीय सेना की युवा और चुस्त-दुरुस्त प्रोफाइल पूरी तरह बरकरार रहेगी, वहीं दूसरी तरफ युद्ध के मैदान में अनुभवी और टेक-सैवी जवानों का एक बहुत बड़ा और अटूट पूल हमेशा देश की रक्षा के लिए तैयार खड़ा रहेगा।

इसके अलावा इस पूरे मामले का एक बेहद संवेदनशील और गहरा इंसानी पहलू भी है, जिसे युद्ध के मैदान में जीत के लिए सबसे ज्यादा जरूरी माना जाता है। जब युवा सैनिक अग्रिम मोर्चों और कठिन चौकियों पर एक साथ लंबा वक्त गुजारते हैं, तो उनके बीच एक ऐसा अटूट भरोसा और अटूट भाईचारा विकसित होता है जो किसी भी रेजिमेंट की रीढ़ होता है। लेकिन इस सबके बीच एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि यदि डिपार्टमेंट ऑफ़ मिलिट्री अफेयर्स यानी डी इस नए प्रस्ताव को अपनी अंतिम मंजूरी नहीं देता है, तो सेना के पास क्या रास्ता बचेगा। सूत्रों के अनुसार, सेना ने इसके लिए एक बेहद सीक्रेट श्प्लान बीश् भी तैयार कर रखा है, जिसके तहत भले ही कुल कोटा न बदले, लेकिन कुछ बेहद स्पेशल यूनिट जैसे कि नई बटालियन और संवेदनशील तकनीकी विभागों में अपने स्तर पर ही इन अनुभवी अग्निवीरों की संख्या को काफी हद तक बढ़ा दिया जाएगा ताकि रक्षा तैयारियों पर कोई विपरीत असर न पड़े।

रक्षा मंत्रालय और सैन्य मुख्यालयों के बीच इस संवेदनशील मुद्दे पर पहले भी कई दौर की भारी माथापच्ची हो चुकी है, और इससे पहले भी ऐसा ही एक प्रस्ताव डिपार्टमेंट आफ मिलिट्री अफेयर्स को भेजा गया था जिसे विभाग ने और सुधार करने के लिए वापस लौटा दिया था। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, भारतीय सेना में इस समय करीब एक लाख अस्सी हजार सैनिकों की भारी कमी चल रही है, जिसे पूरा करने के लिए सेना इस साल सत्तर हज़ार और अगले साल नब्बे हज़ार नई वैकेंसी निकालने की एक बहुत बड़ी तैयारी कर रही है। इस योजना के भविष्य को लेकर पूर्व आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भी अपने एक बेहद महत्वपूर्ण इंटरव्यू में कहा था कि अग्निपथ योजना को एक बड़े और लगातार सुधरने वाले इवोल्यूशनरी प्रोसेस के तौर पर देखा जाना चाहिए। जनरल उपेंद्र द्विवेदी का मानना था कि चूंकि अभी पहले बैच का पूरा चक्र खत्म नहीं हुआ है, इसलिए इसमें कोई भी बदलाव सैन्य अनुभव, ऑपरेशनल फीडबैक और सेना के अपने आकलन के आधार पर ही किया जाएगा, ताकि देश का युवा अनुशासित और भविष्य की चुनौतियों के लिए पूरी तरह तैयार रहे।

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