अनंतनाग। यह महज एक समाचार नहीं, बल्कि हमारी आस्था के सर्वोच्च शिखर से आई वह चेतावनी है जो सीधे कलेजे को चीर देती है। आस्था और अंधाधुंध मानवीय हस्तक्षेप की इस जंग में देवाधिदेव महादेव के भक्तों के लिए एक अत्यंत दुखद और विचलित करने वाली खबर सामने आ रही है। जिस अमरनाथ यात्रा को लेकर करोड़ों श्रद्धालुओं के दिलों में जीवनभर की आस टिकी होती है, वहाँ इस बार एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने हर शिवभक्त की रूह को कंपा दिया। सात जुलाई दो हजार छब्बीस की वह सुबह जब हजारों श्रद्धालु बम-बम भोले के जयकारों के साथ पवित्र अमरनाथ गुफा के भीतर दाखिल हुए, तो वहाँ का नजारा देखकर उनके पैरों तले की जमीन खिसक गई। बाबा बर्फानी का वह विहंगम और अलौकिक स्वरूप वहाँ मौजूद ही नहीं था; उस पावन स्थान पर केवल एक गीला और ठंडा पत्थर बचा हुआ था। यह कोई मानवीय तोड़फोड़ या चोरी की घटना नहीं थी, बल्कि यह कुदरत की वह मूक चीख थी जिसने पाँच दिन के भीतर ही आदि-अनादि देव को अदृश्य होने पर मजबूर कर दिया।
सदियों से चली आ रही इस पावन परंपरा में यह पहला मौका नहीं है जब बाबा का आकार छोटा हुआ हो, लेकिन जिस तेज रफ्तार से पिछले कुछ सालों में दर्शन के दिन घटे हैं, उसने भविष्य के प्रति एक भयानक डर पैदा कर दिया है। कभी सत्तावन दिन तक भक्तों को निहाल करने वाले बाबा बर्फानी, फिर सिमटकर अड़तीस दिन पर आए, उसके बाद अट्ठाईस दिन और इस बार तो महज पाँच ही दिनों में बाबा अंतर्ध्यान हो गए। इस आकस्मिक घटना ने उन तीन लाख से अधिक पंजीकृत श्रद्धालुओं के अरमानों पर पानी फेर दिया, जिन्होंने महीनों पहले अपनी गाढ़ी कमाई जोड़कर, कई कठिन नियमों को पार करते हुए इस यात्रा का संकल्प लिया था। कई बुजुर्ग माताएं इसे अपने जीवन की अंतिम यात्रा मानकर घर से निकली थीं, परंतु उनके हिस्से में अब केवल वह खाली और उदास गुफा ही बची है। व्हाट्सएप पर तैरने वाले उन कथित संदेशों पर यकीन करना बिल्कुल बेमानी होगा जो इसे महज कलयुग का प्रकोप या भगवान की सामान्य नाराजगी बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं, क्योंकि सच हमेशा आसान नहीं होता, वह बेहद कड़वा, जटिल और वैज्ञानिक धरातल पर टिका होता है।
इस पूरे घटनाक्रम के वैज्ञानिक और व्यावहारिक सच को समझने के लिए हमें उस अद्भुत प्राकृतिक प्रक्रिया को जानना होगा जिसके जरिए जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले की दुर्गम वादियों में इस दिव्य शिवलिंग का निर्माण होता है। पहाड़ों के बीच बसी इस अलौकिक गुफा की छत से जब सर्दियों के दिनों में पानी की बूंदें टपकती हैं, तो वहाँ की हाड़ कंपा देने वाली अत्यधिक ठंड उन बूंदों को गिरते ही बर्फ के रूप में जमा देती है। बूंद पर बूंद जमने के इस प्राकृतिक चमत्कार को आकार देने के लिए न तो किसी सांचे की जरूरत होती है और न ही किसी इंसान के हुनर की; इसे सिर्फ और सिर्फ कड़ाके की ठंड और पानी का संतुलन ही मुकम्मल बनाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पावन बर्फानी स्वरूप का घटना और बढ़ना पूरी तरह से चंद्रमा की कलाओं के साथ जुड़ा हुआ है, जहाँ पूर्णिमा के दिन यह अपने पूर्ण आकार में खिलता है और अमावस्या तक आते-आते इसका स्वरूप छोटा हो जाता है। यह वही ऐतिहासिक और पौराणिक गुफा है जहाँ महादेव ने माता पार्वती को अमरता की गूढ़ कथा सुनाई थी, जिसे परम गोपनीय रखने के लिए उन्होंने मार्ग में अपने वाहन नंदी, सिर के चांद, गले के सांपों और यहाँ तक कि पुत्र गणेश जी को भी महागुनस पहाड़ पर छोड़ दिया था।
अगर हम इसके ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को खंगालें तो पता चलता है कि बाबा बर्फानी का यह दरबार पिछले दो हजार सालों से लगातार मानव सभ्यता का मार्गदर्शन करता आ रहा है। कश्मीर के प्राचीन इतिहास ग्रंथ राजतरंगिणी में इस बात का साफ उल्लेख मिलता है कि उस प्राचीन दौर के राजा संधिमान गर्मियों के पूरे मौसम में इसी दुर्गम क्षेत्र में रहकर बर्फ के शिवलिंग की आराधना में लीन रहते थे। इसके अलावा, छठी सदी के नीलमत पुराण में अमरेश्वर के नाम से इस स्थान की महिमा गाई गई है और मुगल शासक अकबर के शासनकाल की प्रसिद्ध पुस्तक आईने अकबरी में भी इस पवित्र यात्रा का पूरा विवरण दर्ज है। पंद्रहवीं सदी में कश्मीरी आवाम के चहेते सुल्तान जैनुल आबेदीन, जिन्हें लोग आदर से बडशाह कहते थे, उन्होंने भी इस गुफा की कठिन यात्रा की थी और इसके बहुत बाद पौने दो सौ साल पहले एक स्थानीय मुस्लिम चरवाहे बूटा मलिक ने इसे दोबारा दुनिया के सामने लाया था। साल अटठारह सौ नब्बे के दशक में स्वामी विवेकानंद जी ने भी यहाँ आकर बाबा के साक्षात दर्शन किए थे, जिससे यह साबित होता है कि सदियों से यहाँ सल्तनत बदली, हुक्मरान बदले, लेकिन ठंड ने कभी बाबा के निर्माण में धोखा नहीं दिया था।

परंतु आज हमारे समय में जो सबसे बड़ा संकट खड़ा हुआ है, उसका मुख्य कारण वह अनियंत्रित भीड़ और विकास की अंधी दौड़ है जिसने इस बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को पूरी तरह तबाह कर दिया है। पिछले दो दशकों में जो यात्रा एक अत्यंत कठिन तपस्या मानी जाती थी, जहाँ पतली और संकरी पगडंडियों के कारण सालभर में बमुश्किल एक लाख लोग पहुँच पाते थे, आज उसे बारह फीट चौड़ी सड़कों में तब्दील कर दिया गया है जहाँ जीप और ट्रक आसानी से दौड़ रहे हैं। गुफा के बेहद नजदीक तक भारी-भरकम जनरेटरों का पहुंचना, दर्जनों लंगरों के चूल्हों से निकलने वाली भीषण गर्मी और अब रोपे यानी केबल कार जैसी आधुनिक सुविधाओं की मंजूरी ने इस पूरे क्षेत्र के तापमान को बिगाड़ कर रख दिया है। लाखों इंसानी शरीरों की गर्मी, गाड़ियों का जहरीला धुआं और पहाड़ों पर फेंकी जाने वाली प्लास्टिक की बोतलें तथा कचरा मिलकर उस पवित्र ठंडक को पूरी तरह सोख रहे हैं जो बाबा बर्फानी के अस्तित्व का आधार है। विज्ञान का यह सीधा नियम है कि साफ और चमकीली बर्फ सूर्य की किरणों को वापस परावर्तित कर देती है, लेकिन जब उसी बर्फ पर प्रदूषण और गंदगी की काली परत जम जाती है, तो वह धूप की गर्मी को सोखने लगती है जिससे ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघलने लगते हैं।
इस साल बाबा के इतनी जल्दी अंतर्ध्यान होने के पीछे प्रकृति का वह भयानक रूप भी जिम्मेदार है जिसके तहत इस बार जम्मू-कश्मीर में सर्दियों के मौसम में सामान्य से करीब पैंसठ प्रतिशत कम बर्फबारी और बारिश दर्ज की गई। हालात इस कदर डरावने थे कि जनवरी के शुरुआती हफ्तों में श्रीनगर समेत घाटी के कई बड़े जिलों में बर्फ का एक कतरा तक नहीं गिरा, जो कि लगातार सातवीं ऐसी सर्दी है जब बादलों ने यहाँ से अपना रुख मोड़ लिया। जब आसमान से वह बुनियादी बर्फ ही नहीं उतरी जिससे बाबा का स्वरूप निर्मित होता है, तो केवल सात फीट के बने बाबा यात्रा के शुरुआती पाँच दिनों की भीड़ और तापमान को बर्दाश्त नहीं कर पाए। गुफा के इर्द-गिर्द मौजूद लगभग दस बड़े ग्लेशियर इस समय इतनी तेजी से पिघल रहे हैं मानो पूरे हिमालय को किसी ने उठाकर रेफ्रिजरेटर से बाहर रख दिया हो, जिससे न केवल यह धार्मिक स्थल बल्कि कश्मीर का पूरा जल चक्र ही खतरे में पड़ गया है। उदाहरण के लिए, मुगल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां द्वारा बनवाया गया अनंतनाग का ऐतिहासिक बाग चश्मा शाही चश्मा, जिसने मुगलों, अंग्रेजों और आजादी के बाद के कई युगों को देखा, वह भी इस बार इतिहास में पहली बार पूरी तरह सूखकर पत्थरों के ढेर में बदल गया है।
प्रकृति के इस रौद्र और चेतावनी भरे रुख को केदारनाथ की दो हजार तेरह की भीषण त्रासदी या फिर जोशीमठ की जमीन में आई गहरी दरारों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जहाँ पहाड़ अब चीख-चीखकर इंसानों को सचेत कर रहे हैं। सनातन धर्म में प्रकृति और ईश्वर को कभी अलग माना ही नहीं गया है; हमारे यहाँ नदियां मां हैं, हिमालय स्वयं देवताओं का वास है और बर्फ साक्षात शिव का रूप है, इसलिए पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना सीधे अपनी आस्था पर चोट करने जैसा है। भोलेनाथ तो स्वयं जंगलों, श्मशानों और पहाड़ों के रक्षक हैं जिनके पूरे स्वरूप में कुदरत समाई हुई है, इसलिए यदि आज उनका शिवलिंग पिघल रहा है तो यह उनकी नाराजगी नहीं बल्कि हमारी गलतियों का नतीजा है। अगर हम वाकई भविष्य की उस डरावनी कल्पना से बचना चाहते हैं जहाँ आने वाली पीढ़ियां केवल तस्वीरों में बाबा बर्फानी को देखेंगी, तो हमें अपनी आस्था को पिकनिक मानने की भूल सुधारकर इसे दोबारा एक पवित्र तपस्या बनाना होगा। सरकारों और श्राइन बोर्ड को तुरंत सख्त कदम उठाते हुए प्रतिदिन श्रद्धालुओं की संख्या सीमित करनी होगी, प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना होगा और पहाड़ों पर पक्के निर्माण को रोककर केवल अपने पैरों के निशान छोड़ने की आदत डालनी होगी, क्योंकि बर्फ को बचाना ही इस दौर की सबसे सच्ची और वास्तविक शिव भक्ति है।





