- 100 साल का सबसे बड़ा मानसूनी झटका खरीफ बुवाई में 23 फीसदी गिरावट
- सूखे ने तोड़ी खेती की कमर खरीफ बुवाई 23 फीसदी घटी अन्न संकट गहराया
- जून का रिकॉर्ड सूखा खरीफ बुवाई 23 फीसदी घटी किसानों पर गहराया संकट
- मानसून की दगाबाजी से खेती बेहाल खरीफ बुवाई 23 फीसदी घटी महंगाई तय
- 100 साल में तीसरी सबसे कम बारिश खरीफ उत्पादन पर मंडराया बड़ा खतरा
भारत। खेती-किसानी के मोर्चे पर देश के लिए एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है, जिसने नीति-निर्माताओं से लेकर आम आदमी तक के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. अभी हाल ही में भारतीय अर्थव्यवस्था मध्य पूर्व के देशों में उपजे भीषण भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष की वजह से कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और रासायनिक खादों की भारी किल्लत और आसमान छूती कीमतों के बड़े संकट से किसी तरह जूझकर बाहर निकली ही थी कि अब आसमानी आफत यानी मानसून की दगाबाज़ी ने देश को एक नए और गहरे संकट में धकेल दिया है. देश के अन्नदाता इस बार आसमान की तरफ टकटकी लगाए बैठे रह गए, लेकिन जून के महीने में मानसून ने अपनी ऐसी बेरुखी दिखाई कि खरीफ की फसलों के उत्पादन पर सीधे तौर पर एक बड़ा ख़तरा मंडराने लगा है. मौसम वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस साल मानसून की शुरुआती सुस्ती और अल-नीनो के तेजी से बढ़ते प्रकोप के कारण देश के कृषि क्षेत्र को एक गहरा झटका लगा है, जिससे आने वाले दिनों में न केवल खाद्यान्न उत्पादन में भारी कमी आने की आशंका है, बल्कि इसके सीधे परिणाम के रूप में देशव्यापी खाद्य संकट और बेकाबू महंगाई का एक नया दौर भी शुरू हो सकता है, जो आम जनता की जेब पर भारी पड़ेगा.
मौसम विभाग से प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों की मानें तो चालू वर्ष के जून महीने में देश के भीतर सामान्य से लगभग 42 प्रतिशत तक कम वर्षा दर्ज की गई है, जिसके चलते ग्रामीण भारत में खरीफ सीजन की प्रमुख फसलों की बुवाई के कुल रकबे में 23 फीसदी की एक ऐतिहासिक और बेहद डरावनी गिरावट दर्ज की गई है. इस विकट स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने पूरी मुस्तैदी के साथ देश के भीतर कुल 111 ऐसे संवेदनशील जिलों की सूची तैयार की है, जहां फसलों के पूरी तरह से नष्ट या बर्बाद होने की सर्वाधिक संभावना जताई जा रही है. परंपरागत रूप से हमारे देश में जून से लेकर जुलाई तक का दो महीनों का समय खरीफ फसलों जैसे धान, दलहन और तिलहन की समय पर बुवाई के लिए सबसे आदर्श और स्वर्णिम कालखंड माना जाता है, जिसमें शुरुआती मानसूनी बौछारें पौधों के अंकुरण के लिए अमृत का काम करती हैं. इसके विपरीत, इस बार देश के कई प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों में किसान केवल बादलों की गड़गड़ाहट और बरसात का इंतजार ही करते रह गए और सूखी जमीनों पर बुवाई का पहिया पूरी तरह थम गया, जिसने आने वाले समय में देश के भीतर अनाज की भारी कमी और आवश्यक वस्तुओं के दामों में अप्रत्याशित उछाल का एक बड़ा अलार्म बजा दिया है.
अन्न संकट की इस आहट को कृषि मंत्रालय द्वारा जारी किए गए हालिया और बेहद चौंकाने वाले सांख्यिकीय आंकड़ों से भी आसानी से समझा जा सकता है, जो यह बताते हैं कि इस साल खरीफ फसलों के कुल बोए गए क्षेत्र में 53.74 लाख हेक्टेयर की भारी-भरकम कमी आई है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि खरीफ की मुख्य श्रेणी के अंतर्गत भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाली धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, अरहर, तुअर, उड़द, मूंग, सोयाबीन, मूंगफली, तिल, कपास और जूट जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण और नकदी फसलें आती हैं. सरकारी डेटा के आधिकारिक विश्लेषण के अनुसार, मानसूनी बारिश की इस अभूतपूर्व किल्लत के चलते 25 जून की कट-ऑफ तारीख तक देश के भीतर महज 182.72 लाख हेक्टेयर भूमि पर ही खरीफ की विभिन्न फसलों की बुवाई का काम पूरा किया जा सका है. यदि हम इस आंकड़े की तुलना पिछले वर्ष की इसी समान समयावधि से करते हैं, तो पता चलता है कि पिछले साल इस समय तक देश के कुल 236.46 लाख हेक्टेयर के विशाल भू-भाग पर बुवाई का काम संपन्न हो चुका था, जो वर्तमान स्थिति से पूरे 23 प्रतिशत अधिक था और यही फासला आज देश की खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है.

इस देशव्यापी कृषि संकट के भौगोलिक फैलाव और इसकी भयावहता का सटीक आकलन करने के उद्देश्य से कृषि मंत्रालय ने देश के प्रभावित क्षेत्रों की मैपिंग की है, जिसके तहत कमजोर मानसून की मार झेल रहे कुल 315 जिलों की स्पष्ट रूप से पहचान की जा चुकी है. इन चिन्हित क्षेत्रों में से सबसे ज्यादा गंभीर स्थिति वाले 111 अत्यधिक संवेदनशील जिलों में महाराष्ट्र के 20 और छत्तीसगढ़ के 10 जिलों को सबसे कमजोर और संकटग्रस्त घोषित किया गया है, जो बेहद चिंता का विषय है. इन विशिष्ट क्षेत्रों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहां के कुल कृषि योग्य क्षेत्र के केवल 25 प्रतिशत हिस्से को ही कृत्रिम सिंचाई या नहरों के माध्यम से पानी मिल पाता है, जबकि शेष 75 प्रतिशत विशाल खेती बाड़ी का पूरा दारोमदार पूरी तरह से केवल और केवल आसमानी बारिश की मेहरबानी पर ही टिका रहता है. ऐसे में जब मानसून ने ही अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं, तो इन जिलों के करोड़ों किसानों के सामने अपनी आजीविका चलाने और खेतों को सूखे से बचाने का कोई दूसरा विकल्प नजर नहीं आ रहा है, जिससे ग्रामीण इलाकों में त्राहि-त्राहि मचना लगभग तय माना जा रहा है.
यदि हम देश के पश्चिमी और मध्य भागों की भौगोलिक स्थिति पर नजर डालें तो सूखी धरती की यह दर्दनाक दास्तान और भी ज्यादा विकराल रूप में हमारे सामने उभरकर आती है, जहां कई विकसित राज्य भी प्रकृति के इस कहर से अछूते नहीं रहे हैं. देश के पश्चिमी छोर पर स्थित तीन अत्यंत महत्वपूर्ण राज्यों—महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक के कई जिलों का लगभग 71 प्रतिशत विशाल क्षेत्र इस समय भीषण सूखे की सीधी और क्रूर मार झेल रहा है, जहां जलाशयों का जलस्तर भी ऐतिहासिक रूप से नीचे गिर गया है. ठीक इसी प्रकार, देश के ठीक मध्य में स्थित दो मुख्य राज्यों यानी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के भी लगभग 53 प्रतिशत कृषि क्षेत्रों में कम बारिश के कारण हाहाकार मचा हुआ है और फसलें खेतों में ही दम तोड़ रही हैं. सूखा केवल यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के सुदूर पूर्वोत्तर हिस्से में स्थित अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम जैसे हरी-भरी वादियों वाले राज्यों के भी लगभग 62 प्रतिशत इलाके इस बार मानसूनी बादलों के बरसने के इंतजार में पूरी तरह तरस गए हैं, जिससे वहां की पारंपरिक खेती पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं.
सरकारी राहत योजनाओं और प्राथमिकताओं के वर्गीकरण के आधार पर कृषि मंत्रालय ने इन संकटग्रस्त 315 जिलों को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया है, ताकि प्रभावित क्षेत्रों तक तुरंत जरूरी सहायता पहुंचाई जा सके. इस पूरी कार्ययोजना के तहत करीब 76 जिलों को मध्यम-प्राथमिकता (मीडियम प्रायोरिटी) वाले क्षेत्रों की सूची में स्थान दिया गया है, जहां की 20 से लेकर 50 प्रतिशत तक की फसलें पूरी तरह से प्राकृतिक वर्षा के पानी पर ही आश्रित होती हैं और सिंचाई के वैकल्पिक साधन बेहद सीमित हैं. इसके विपरीत, राहत की बात केवल उन 128 जिलों के लिए है जिन्हें सरकार ने निम्न-प्राथमिकता (लो प्रायोरिटी) की श्रेणी में शामिल किया है, क्योंकि इन सौभाग्यशाली क्षेत्रों में फसलों को नहरों, सरकारी नलकूपों समेत अन्य विभिन्न कृत्रिम स्रोतों से पर्याप्त सिंचाई की आधुनिक सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं. इसका सीधा मतलब यह हुआ कि यदि इन विशिष्ट 128 जिलों में आने वाले दिनों में भी बारिश नहीं होती है, तो भी वहां के उन्नत सिंचाई साधनों के बूते फसलों की कुल पैदावार पर कोई बहुत बड़ा या विनाशकारी असर देखने को नहीं मिलेगा क्योंकि फसलों को समय-समय पर पानी मिलता रहेगा.

मौसम विज्ञान के ऐतिहासिक पन्नों को पलटें तो यह कड़वी हकीकत सामने आती है कि भारत ने पिछले 100 वर्षों के अपने लंबे मौसम संबंधी इतिहास में तीसरी बार जून के महीने में इतना भीषण और जानलेवा सूखा देखा है, जो सीधे तौर पर पर्यावरण परिवर्तन की ओर इशारा करता है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के प्रामाणिक आंकड़ों और जलवायु विशेषज्ञों के गहन विश्लेषण के मुताबिक, इस साल प्रशांत महासागर में सक्रिय हुए खतरनाक अल-नीनो के प्रभाव ने भारतीय मानसून की हवाओं को पूरी तरह कमजोर और दिशाहीन बना दिया, जिसके दुष्परिणामस्वरूप जून का पूरा महीना सूखे की कगार पर पहुंच गया. सामान्य परिस्थितियों में देश के भीतर कृषि को सुचारू रूप से चलाने के लिए जून के दौरान कम से कम 157.7 मिलीमीटर बारिश होना अनिवार्य और बेहद आवश्यक माना जाता है, जिसे मौसम विज्ञान की भाषा में एक सामान्य मानक माना गया है. परंतु इस विनाशकारी वर्ष में जून के दौरान पूरे देश में औसत रूप से केवल 92.2 मिलीमीटर ही बारिश रिकॉर्ड की जा सकी, जो यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि प्रकृति का संतुलन किस कदर बिगड़ चुका है और इसका सीधा खामियाजा देश के निर्दोष किसानों को भुगतना पड़ रहा है.
इस मानसूनी बेरुखी और सूखे का सबसे घातक और सीधा प्रहार देश के तिलहन उत्पादन पर हुआ है, जिसके कारण आने वाले समय में खाने वाले तेलों के बाजार में भारी उथल-पुथल और कीमतों में भारी बढ़ोतरी की आशंका सच साबित होती दिख रही है. अगर हम आंकड़ों की बात करें तो पिछले साल देश के कुल 36.41 लाख हेक्टेयर के बड़े क्षेत्र में तिलहन की फसलें यानी सरसों आदि की बुवाई सफलता पूर्वक की गई थी, जो इस बार मानसूनी संकट के कारण घटकर महज 16.99 लाख हेक्टेयर के बेहद निचले स्तर पर सिमट कर रह गई है. चालू खरीफ सीजन की तमाम फसलों की बुवाई में दर्ज की गई गिरावट के ट्रेंड में यह अब तक की सबसे बड़ी और चिंताजनक गिरावट है, जिसने कृषि वैज्ञानिकों को भी हैरत में डाल दिया है. इसी विनाशकारी क्रम में, सफेद सोना कही जाने वाली कपास की फसल का कुल रकबा भी पिछले वर्ष के 45.36 लाख हेक्टेयर से भारी गिरावट के साथ घटकर इस बार केवल 29.66 लाख हेक्टेयर पर सिमट गया है, जबकि मोटे अनाज का कुल बोया गया क्षेत्र भी पिछली बार के 36.07 लाख हेक्टेयर से गिरकर इस बार 31.84 लाख हेक्टेयर के स्तर पर पहुंच गया है, और देश की मुख्य जीवनरेखा माने जाने वाले धान तथा विभिन्न प्रकार की दलहन के रकबे में भी लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है.
हालांकि, इस चौतरफा निराशा और भीषण सूखे के घने बादलों के बीच भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने देश के करोड़ों मायूस किसानों के लिए एक बहुत ही राहतभरी और उम्मीद जगाने वाली ताजा भविष्यवाणी भी जारी की है. मौसम विभाग के क्षेत्रीय आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जून के दौरान देश के केवल 6 राज्यों और महज 4 केंद्र शासित प्रदेशों में ही सामान्य या फिर उससे थोड़ी अधिक बरसात देखने को मिली थी, जबकि 1 से लेकर 23 जून के शुरुआती कालखंड में देश के कुल 22 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में बादलों ने अपनी भारी बेरुखी दिखाई और बेहद कम पानी बरसाया. इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, आईएमडी के महानिदेशक ने अपने ताजा बुलेटिन में यह राहतभरा अनुमान जताया है कि जुलाई के शुरुआती और मध्य दिनों में देश के एक बहुत बड़े हिस्से में मानसून दोबारा सक्रिय हो सकता है और अच्छी झमाझम बारिश देखने को मिल सकती है. मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि जुलाई की इस संभावित मानसूनी रिकवरी का सबसे बड़ा और सीधा फायदा मध्य भारत के कृषि प्रधान जिलों को मिलेगा, जिससे देर से ही सही, लेकिन खरीफ की फसलों को एक नया जीवनदान मिलने की उम्मीद जाग उठी है.





