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अयोध्या की आस्था के साए में सत्ता जमीन घोटाले और राम मंदिर पर उठते बड़े सवाल

म कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या में तेज हुए विकास, जमीन सौदों, चंदे, ठेकों और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर उठते गंभीर सवालों ने आस्था, पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही पर देशव्यापी बहस को नई धार दे दी है।

उत्तरप्रदेश(सुनील कोठारी)। सत्ता के शीर्ष और पाताल के बीच डोलती राजनीतिक बिसात पर अयोध्या केवल एक नगरी या आस्था का केंद्र भर नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के सियासी मुकद्दर को बदलने वाली महाशक्ति रही है। सदियों से इस सरजमीं ने न जाने कितने रसूखदारों को फर्श से उठाकर अर्श की बुलंदियों पर बैठाया और कितनों को सत्ता के अहंकार से खींचकर सीधे राजनीतिक पाताल में धकेल दिया। लेकिन वर्तमान दौर में इस पवित्र भूमि की ओट में जो कुछ चल रहा है, उसने आस्था की परिभाषा को ही एक नए सियासी सांचे में ढालने का दुस्साहस किया है। आज एक ऐसा अघोषित और खतरनाक नियम बना दिया गया है कि यदि आप प्रभु श्री राम के परम भक्त हैं, तो अनिवार्य रूप से आपका झुकाव एक खास राजनीतिक दल की तरफ होना ही चाहिए। अगर कोई सच्चा सनातनी अयोध्या के घटनाक्रमों या व्यवस्थागत खामियों पर निष्पक्ष होकर कोई सवाल दाग देता है, तो उसकी सदियों पुरानी भक्ति पर तुरंत ही उंगलियां उठा दी जाती हैं और उसे सनातन विरोधी व राम विरोधी करार देने की एक सोची-समझी मुहिम शुरू हो जाती है। देश की हुकूमत पर सवाल उठाने वालों को जिस तरह फौरन राष्ट्र विरोधी कह दिया जाता है, ठीक उसी ढर्रे पर अयोध्या की गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों को भी आस्था का दुश्मन ठहराने का एक नया सर्टिफिकेट तंत्र सक्रिय हो चुका है, जिसे सिर्फ वही लोग बांट रहे हैं जो खुद को राम को लाने का श्रेय देते थे, जबकि सच तो यह है कि राम ही समूची सृष्टि को लाए हैं।

मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम की इस पावन लीलाभूमि ने खुद को कर्ताधर्ताओं से ऊपर साबित करते हुए बहुत ही कम समय में यह साफ कर दिया कि जो लोग यह खोखला दंभ भर रहे थे कि वे राम को लाए हैं, असल में वे राम के नाम का खा रहे हैं और अब तक खाते आए हैं। इस महासत्य का खुलासा करने का साहस पहले किसी में इसलिए नहीं था क्योंकि जब व्यवस्था के रखवाले ही खुद कोतवाली बनकर बैठ जाएं, तो फिर कानून और न्याय का डर पूरी तरह काफूर हो जाता है। अयोध्या में 5 अगस्त 2020 को हुए शिलान्यास और उसके बाद 22 जनवरी 2024 को आयोजित प्राण प्रतिष्ठा समारोह के लिए जो शुभ मुहूर्त निकाला गया था, उसकी पटकथा भी एक तयशुदा टाइम फ्रेम के तहत लिखी गई थी। काशी के प्रख्यात विद्वान भाइयों में से एक गणेश्वर शास्त्री ने एक विशेष साक्षात्कार में यह स्पष्ट खुलासा किया था कि राम जन्मभूमि ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरी जी की ओर से बकायदा एक पत्र के जरिए यह समय सीमा दी गई थी कि आगामी लोकसभा चुनाव से पहले ही किसी भी सूरत में मंदिर के उद्घाटन का मुहूर्त खोजा जाए। इस दबाव के बीच बनारस के सामवेद विद्यालय के इन आचार्यों ने अभिजीत मुहूर्त निकाला, जिस पर वे तमाम ज्योतिषविदों से शास्त्रार्थ करने को भी तैयार थे और इसी सहयोग के बदले बाद में गणेश्वर शास्त्री को पद्म पुरस्कार के राजकीय सम्मान से भी नवाजा गया।

अदालत का फैसला राम जन्मभूमि के पक्ष में आते ही अयोध्या की पवित्र धरती पर जमीनों की खरीद-फरोख्त का जो अनैतिक खेल शुरू हुआ, उसने मर्यादा के सारे पैमानों को तार-तार कर दिया। जिन भूखंडों की वास्तविक बाजार कीमत कौड़ियों के भाव महज 2 करोड़ रुपये के आसपास थी, उन्हें राम जन्मभूमि ट्रस्ट ने आनन-फानन में 14 करोड़ रुपये की भारी-भरकम और अविश्वसनीय राशि चुकाकर खरीदना शुरू कर दिया था। उस दौर में स्वतंत्र पत्रकारों द्वारा इस जमीन घोटाले को लेकर जब कड़े खुलासे किए गए, तो सत्ता के मद में चूर अधिकारियों और ट्रस्ट के जिम्मेदारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, बल्कि उलटा सच को उजागर करने वाले निष्पक्ष चेहरों को ही राम विरोधी रंग में रंगने की पुरजोर कोशिश की गई। आज आस्था के नाम पर दुकान चलाने वाले लोग यह खोखला सवाल दागते हैं कि आप उद्घाटन के वक्त राम मंदिर क्यों नहीं गए, मानो किसी के जाने या न जाने से उसकी अंतरात्मा की भक्ति प्रभावित हो जाएगी। लेकिन आज देश देख रहा है कि जो लोग रोज भगवान के गर्भगृह में शीश नवाने जाते थे और वहां बैठकर जो घृणित खेल खेल रहे थे, उनका असली चेहरा अब बेनकाब हो चुका है।

जब अयोध्या के स्थानीय प्रभावशाली लोग, विश्व हिंदू परिषद (विएचपी) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से जुड़े रसूखदार चेहरे जमीनों की अंधाधुंध बंदरबांट कर मनमाफिक माल बना रहे थे, अगर उसी समय शुरुआती शिकायतों पर सख्त कानूनी हंटर चला होता, तो शायद आज सनातनियों का सिर इस तरह शर्म से न झुकता। प्रभु श्री राम के इस भव्य कायाकल्प के लिए हिंदुस्तान के किसी भी कोने का कोई ऐसा अभागा गांव नहीं बचा था जहां की गरीब जनता ने अपनी गाढ़ी कमाई से एक-एक ईंट या चंदे की रकम न भेजी हो। सत्ता पक्ष के विधायकों ने अपनी साख बचाने के लिए दो-दो और पांच-पांच लाख रुपये तो एनडीए व भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने 5 लाख, 11 लाख और 21 लाख रुपये तक का भारी चंदा इस अभियान में झोंका था। उत्तर भारत के हर जिले के बड़े से बड़े पूंजीपतियों और व्यापारियों ने 5 लाख से लेकर 20 लाख रुपये तक की धनवर्षा की थी और गली-मोहल्लों से जो हजारों करोड़ रुपये नकद बटोरे गए, आज उसका कोई प्रामाणिक हिसाब-किताब देश के सामने मौजूद नहीं है। जब उत्तर प्रदेश सरकार को यह स्पष्ट संकेत मिला कि प्रधानमंत्री इस पूरे आयोजन को लोकसभा चुनाव के मुहाने पर एक मेगा इवेंट बनाने वाले हैं, तो उसके बाद अयोध्या को आनन-फानन में सजाने की जो आपाधापी मची, उसने भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान गढ़ दिए।

बीते दो-तीन दशकों से अयोध्या की खाक छानने वाले निष्पक्ष चश्मदीद जब उद्घाटन के वक्त वहां पहुंचे, तो बदली हुई चमचमाती अयोध्या को देखकर एक बारगी तो उन्हें अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हुआ कि इतना सब कुछ इतनी तेजी से कैसे मुमकिन हो गया। विकास के बड़े काम निश्चित रूप से धरातल पर दिखाई दिए, लेकिन इस चमकीली तस्वीर के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि जहां तकनीकी रूप से महज 10 रुपये का वास्तविक खर्च होना चाहिए था, वहां ठेकेदारों को 400 रुपये तक के बेतहाशा और मनमाने पेमेंट किए गए। समय सीमा की भयंकर कमी के चलते लाइटिंग, सड़कों के निर्माण, मिट्टी के भराव, इंटरलॉकिंग टाइल्स और मंदिर के आसपास के रंग-रोगन के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया गया और मानकों को ताक पर रखकर भुगतान किए गए। यह पूरी चकाचौंध बिल्कुल वैसी ही थी जैसे किसी बेटी की बारात आने के वक्त बाहर से रंगा-पुता हुआ घर बेहद हसीन और मुकम्मल दिखाई देता है, लेकिन विदाई के ठीक एक महीने बाद जब पहली मानसूनी बारिश दस्तक देती है, तब जाकर उस मकान की कमजोर बुनियाद और घटिया निर्माण की असलियत सामने आती है। पहली ही बारिश में भव्य राम मंदिर की छत से पानी टपकने लगा था और यह सनसनीखेज सच किसी विरोधी ने नहीं, बल्कि स्वयं मंदिर के तत्कालीन मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास जी ने पूरी दुनिया के सामने रोते हुए बयां किया था।

विश्व हिंदू परिषद और राम जन्मभूमि ट्रस्ट के कर्ताधर्ताओं के लिए आज यह बेहद राहत की बात हो सकती है कि मंदिर की मर्यादा के लिए आजीवन लड़ने वाले मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास जी आज इस दुनिया में नहीं हैं। यदि आज वे जीवित होते तो अयोध्या की इस दुर्दशा और महालूट पर उनका जो विस्फोटक बयान सामने आता, उसे सुनकर इस भ्रष्ट तंत्र की रूह तक कांप जाती। साल 1992 से लगातार बेहद तंगहाली के दौर में टेंट के भीतर रामलला की सेवा करने वाले आचार्य सत्येंद्र दास जी ने उस प्रशासनिक दौर को भी करीब से देखा था जब मंदिर का रिसीवर कमिश्नर स्तर का एक सरकारी अधिकारी होता था और दान के पैसों से पुजारियों को महज 12,000 रुपये का मासिक वेतन मिलता था। नए रसूखदार ट्रस्ट के आने के बाद भले ही पुजारियों की तनख्वाह बढ़ाकर 35,000 रुपये कर दी गई और ब्राह्मणों के 3000 बच्चों में से परीक्षा लेकर 30 नए बाल पुजारियों को ट्रेनिंग के लिए चुन लिया गया, लेकिन आचार्य सत्येंद्र दास जी ने कैमरों के सामने और कैमरों के पीछे जो तमाम राज खोले थे, वे आज भी इस पूरी व्यवस्था की साख को कटघरे में खड़ा करते हैं।

अयोध्या के पावन नाम पर इस देश के भीतर सियासत की रोटियां तो भरपूर सेकी गईं और ध्रुवीकरण के जरिए झोली भरकर वोट भी बटोरे गए, लेकिन भगवान के घर में भी इंसानी नियत किस कदर डोल सकती है, यह देखकर आस्थावानों का कलेजा मुंह को आता है। मंदिरों में दान की हेराफेरी होना कोई अनोखी बात नहीं है, लेकिन जब डिजिटल सुरक्षा चक्र और अभेद्य पहरे वाले राम मंदिर के भीतर लगे सीसीटीवी कैमरों में महज 40 दिनों के भीतर 70 बार से ज्यादा चोरी की शर्मनाक वारदातें सरेआम कैद हो जाएं, तो यह साबित करता है कि इन सफेदपोश अपराधियों के मन में अब ईश्वर का कोई डर बाकी नहीं रह गया है। खोजी पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के ‘टॉप सीक्रेट’ खुलासे और ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष महिपाल सिंह के बयानों ने इस काले सच पर से पर्दा उठा दिया है कि साल 2021 से ही मंदिर के खजाने से रोज पांच-पांच लाख रुपये की हेराफेरी और नोटों की गिनती में घालमेल का धंधा शुरू हो चुका था, जो साल 2025 के महाकुंभ के दौरान अयोध्या आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं के अकूत चढ़ावे के साथ अपने चरम पर पहुंच गया। इस पूरे निर्माण कार्य में 40 से 50 फीसदी तक के तगड़े कमीशन की बात हवा में तैर रही है और जब शुरुआती दौर में विश्व हिंदू परिषद से जुड़े कुछ ईमानदार इंजीनियरों ने चंपत राय के पास जाकर मिट्टी और लकड़ी के दामों में हो रही दोगुनी हेराफेरी की लिखित शिकायत दर्ज कराई थी, तो चंपत राय ने उन अधिकारियों को फटकार लगाकर वहां से बेइज्जत करके चलता कर दिया और बाद में अनिल मिश्रा का नाम भी इसी फेहरिस्त में जुड़ गया जिनका इस्तीफा अब जाकर हुआ है।

यह इस देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने की खुशकिस्मती रही कि इस महाचोरी और घोटाले में आस-पास कोई ‘अब्दुल’ या ‘उस्मान’ नाम का शख्स शामिल नहीं था, वरना इस देश की गोदी मीडिया और सांप्रदायिक तंत्र ने उस गरीब को सूली पर चढ़ाकर पूरे मामले को एक अलग ही मजहबी रंग दे दिया होता। लेकिन अब पुलिस की एफआईआर में आठवें नंबर पर दर्ज टिन्नू यादव का नाम सामने आने के बाद पूरी कहानी के किरदारों को ही बदलने की एक नई सियासी साजिश रची जा रही है। अयोध्या में वॉकी-टॉकी लेकर वीआईपी रौब झाड़ने वाले टिन्नू यादव को अब मीडिया के जरिए इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे राम मंदिर ट्रस्ट के तमाम शक्तिशाली सदस्यों, आरएसएस के प्रचारकों और प्रधानमंत्री कार्यालय के कद्दावर अफसरों से भी ऊपर वही अकेला इस पूरे साम्राज्य का सर्वेसर्वा था। ग्रामीण इलाकों में अब यह भ्रामक विमर्श जानबूझकर फैलाया जा रहा है कि टिन्नू यादव ने ही मंदिर के भीतर की वित्तीय धांधली की खबरें अखिलेश यादव को लीक कर दी थीं, यानी इस देश के अंधभक्तों के लिए दुख की बात यह नहीं है कि उनकी आस्था और गाढ़ी कमाई को सरेआम लूटा गया, बल्कि गुस्सा इस बात पर है कि यह खबर बाहर कैसे आई।

अगर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार वाकई अयोध्या की इस ऐतिहासिक लूट को लेकर थोड़ी भी गंभीर है और पारदर्शिता का ढोंग नहीं कर रही है, तो उसे साल 2019 में आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के ठीक तीन महीने बाद से लेकर दिसंबर 2025 तक अयोध्या के रजिस्ट्रार ऑफिस में हुई एक बिस्वा (1200 स्क्वायर फीट) से ज्यादा की तमाम रजिस्ट्री और उनके खरीदार-बेचदार के नामों की सूची को तत्काल सार्वजनिक पटल पर रख देना चाहिए। अयोध्या में हुए इस जमीनी खेल, अंधाधुंध सरकारी ठेकों और उनके फर्जी भुगतानों का पूरा ऑडिट जनता के सामने आते ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा, क्योंकि आज की सबसे बड़ी नग्न सच्चाई यही है कि धर्म जहां बेबस, लाचार और गरीब आम इंसान के लिए अटूट आस्था, मर्यादा, परंपरा और विश्वास का पावन प्रतीक है, वहीं समाज के रसूखदार, सत्ता संपन्न और सुविधाभोगी मठाधीशों के लिए यह केवल व्यवसाय, अकूत दौलत कमाने के धंधे और राजनीतिक अभिमान का एक जरिया मात्र बनकर रह गया है।

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