spot_img
दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, वह खुद बनिए. - महात्मा गांधी
Homeभारतई20 ईंधन विवाद से मचा बवाल माइलेज गिरा सरकार और जनता आमने...

ई20 ईंधन विवाद से मचा बवाल माइलेज गिरा सरकार और जनता आमने सामने तीखा संघर्ष

ई-20 ईंधन को लेकर देशभर में मचे विवाद, माइलेज में गिरावट के दावों, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, सरकारी सफाई और किसानों की आय बनाम पर्यावरण संकट के बीच जनता का बढ़ता आक्रोश गहराता है लगातार।

भारत। भारतीय सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों के ईंधन टैंक से इन दिनों जो धुआं उठ रहा है, वह सिर्फ पर्यावरण की फिक्र नहीं बढ़ा रहा, बल्कि देश के करोड़ों वाहन चालकों के दिलों में भी आशंकाओं की एक नई आग भड़का रहा है। देश के ऑटोमोबाइल सेक्टर से लेकर आम आदमी की रसोई और मासिक बजट तक, हर जगह ‘e बीस’ यानी अस्सी फीसदी खनिज तेल और बीस फीसदी वनस्पति जनित इनल के इस अनूठे रासायनिक मिश्रण को लेकर एक अभूतपूर्व महाभारत छिड़ चुका है। शासन तंत्र की ओर से इस नीति को देश के आर्थिक स्वावलंबन और ऊर्जा सुरक्षा का एक ऐतिहासिक ब्रह्मास्त्र बताकर प्रचारित किया जा रहा है, मगर आम जनता की ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट एक त्रासद दास्तान बयां कर रही है। देश की राजधानी से लेकर सुदूर कस्बों तक के गैरेजों और चौपालों पर इस समय एक ही सवाल सबसे बड़ा बनकर गूंज रहा है कि आखिर इस नए कॉकटेल ईंधन के आने के बाद गाड़ियों का दम क्यों फूल रहा है। उपभोक्ताओं का साफ तौर पर आरोप है कि इस नए मिश्रण के इस्तेमाल से उनके वाहनों की ईंधन दक्षता यानी माइलेज में अचानक दस से लेकर तीस प्रतिशत तक की एक बड़ी और तगड़ी चपत लगी है, जिसने मध्यमवर्गीय परिवारों के वित्तीय गणित को पूरी तरह छिन्न-भिन्न करके रख दिया है।

इस पूरे विवाद ने उस वक्त एक बेहद सनसनीखेज और नाटकीय मोड़ ले लिया जब देश की सर्वोच्च अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट के भीतर भारत सरकार की ओर से एक बेहद चौंकाने वाला और निरुत्तर कर देने वाला पक्ष सामने रखा गया। कोर्ट की दहलीज पर सरकार के नुमाइंदों ने यह स्वीकार किया कि इस नए जैव-ईंधन मिश्रण के व्यापक इस्तेमाल से वाहनों के इंजनों की दीर्घकालिक कार्यक्षमता और उनकी बनावट पर असल में क्या दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है, इसकी कोई भी प्रामाणिक, वैज्ञानिक या ठोस दस्तावेजी स्टडी वर्तमान में सरकार के पास उपलब्ध ही नहीं है। जैसे ही यह बात देश के कानूनी गलियारों से छनकर बाहर आई, पूरे सोशल मीडिया स्पेस और इंटरनेट की दुनिया में मानो एक भयंकर भूचाल आ गया और डिजिटल दुनिया आरोपों के तीखे तीरों से थर्रा उठी। आक्रोशित जनता और विपक्षी नेताओं ने सीधे तौर पर केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी को कटघरे में खड़ा करते हुए यह तीखा आरोप मढ़ना शुरू कर दिया कि बिना किसी मुकम्मल जांच-पड़ताल और वैज्ञानिक परीक्षण के देश की करोड़ों भोली-भाली जनता को एक अपरिपक्व प्रयोग की प्रयोगशाला में झोंक दिया गया है। हवा में यह दलील भी तैरने लगी कि यह पूरा फैसला किसी राष्ट्रीय हित में नहीं, बल्कि देश की ताकतवर शुगर लॉबी और चीनी मिल मालिकों को फायदा पहुंचाने के एक गुप्त प्रशासनिक दबाव का नतीजा है।

आरोपों और प्रत्यारोपों के इस घने और दमघोंटू धुएं के बीच अचानक एक ऐसा बयान सामने आया, जिसने इस सुलगती हुई आग में सीधे तौर पर शुद्ध घी डालने का काम किया और वह बयान किसी आम आदमी का नहीं बल्कि भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड के कार्यकारी निदेशक अनुराग शराबगी का था। उन्होंने देश के सामने बहुत ही बेबाकी और आधिकारिक रूप से यह कड़वी हकीकत बयां कर दी कि पेट्रोल में इस वनस्पति अर्क के मिलने से गाड़ियों की माइलेज पर वाकई बहुत ही विपरीत और प्रतिकूल असर पड़ता है और ज़मीनी स्तर पर उपभोक्ताओं को सीधे तौर पर तीस प्रतिशत तक कम माइलेज का सामना करना पड़ रहा है। इस आधिकारिक कुबूलनामे ने उन शंकाओं पर पक्की मुहर लगा दी जो अब तक सिर्फ सोशल मीडिया के दावों तक सीमित थीं, और इसके बाद तो जैसे डिजिटल स्पेस में एक अंतहीन युद्ध छिड़ गया। जब इस मामले में देश के अटॉर्नी जनरल के जरिए सुप्रीम कोर्ट में सरकार का रुख साफ करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने इस ‘e बीस’ कार्यक्रम को कोई अस्थाई प्रयोग मानने से साफ इंकार कर दिया। उन्होंने दलील दी कि यह सरकार का एक बेहद सुदृढ़, दूरगामी और मजबूत नीतिगत फैसला है जो पूरी तरह से सुरक्षित और उपभोक्ता के अनुकूल है, मगर चालाकी से इस बयान में भी इंजन की सेहत और माइलेज पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के सवालों को पूरी तरह अनसुना छोड़ दिया गया।

देश के भीतर बढ़ते हुए जन-आक्रोश और चौतरफा घिरती सरकार को देखकर आखिरकार पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी को खुद मोर्चे पर उतरना पड़ा और उन्होंने सिलसिलेवार तरीके से इस नीति का पुरजोर गुणगान करना शुरू किया। लेकिन राष्ट्र को संबोधित करते हुए और इस ईंधन की खूबियां गिनाते हुए अचानक उनके तरकश से भी एक ऐसा उड़ता हुआ तीर निकला जो खुद उनकी ही नीति के विरोधियों के लिए एक अचूक हथियार बन गया। मंत्री जी ने बड़े जोश में आकर इस ईंधन की तुलना रेसिंग कारों में इस्तेमाल होने वाले हाई-ऑक्टेन फ्यूल से कर दी और इसके एंटी-नॉकिंग गुणों की जमकर तारीफ की, मगर जैसे ही बात देश की आम जनता की गाड़ियों के माइलेज पर आई, तो उनके सुर अचानक धीमे पड़ गए। उन्होंने बेहद दबी ज़बान में यह स्वीकार कर लिया कि हां, इसके इस्तेमाल से माइलेज पर थोड़ा सा, बिल्कुल ‘लिटिल-लिटिल’ असर तो पड़ता ही है, हालांकि तुरंत पैंतरा बदलते हुए उन्होंने इसके लिए अन्य बाहरी कारकों को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की। पेट्रोलियम मंत्री के मुंह से निकले इस ‘लिटिल-लिटिल’ शब्द को पकड़कर देश के पीड़ित गाड़ी मालिकों और विशेषज्ञों ने सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ ला दी और सरकार को आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया।

सड़कों पर रोज़ाना अपनी गाड़ियों से जूझ रहे आम लोगों और स्थानीय ऑटो एक्सपर्ट्स के अनुभव इस सरकारी दावे की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी हैं, जहां लोग अपनी रोज़मर्रा की दुर्दशा के वीडियो बनाकर इंटरनेट पर साझा कर रहे हैं। कई वाहन चालकों का कहना है कि जब वे सुबह अपनी गाड़ी को चालू करते हैं, तो इंजन स्टार्ट होने के बाद रेस ही नहीं पकड़ता और जैसे ही थ्रॉटल यानी एक्सीलेटर दबाया जाता है, गाड़ी अचानक घुटकर बंद हो जाती है। जब परेशान होकर लोग सर्विस स्टेशनों पर फोन घुमाते हैं, तो वहां से भी यही हताशा भरा जवाब मिलता है कि जब से बाज़ार में यह नया मिश्रित तेल आया है, तब से गाड़ियों के फ्यूल टैंक और फिल्टर के चोक होने तथा रबर के पाइपों के गलने की शिकायतें अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई हैं। इन तमाम शिकायतों के केंद्र में देश के सड़क और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी हैं, जिन्हें इस नीति का सबसे मुखर पैरोकार माना जाता है और जिन्होंने जून दौ हज़ार छब्बीस में आधिकारिक रूप से देश में शत-प्रतिशत यानी ‘e सौ’ ईंधन के नियमों को वैध बनाने वाली फाइल पर अपने दस्तखत किए थे। नितिन गडकरी लगातार इन तकनीकी खराबियों की खबरों को एक झूठा प्रचार और दुष्प्रचार करार दे रहे हैं, और उनका दावा है कि जो एक बहुत बड़ी लॉबी विदेशों से बाईस लाख करोड़ रुपए का कच्चा तेल आयात करके मलाई खाती रही है, वही इस स्वदेशी नीति को बदनाम करने की गहरी साज़िश रच रही है।

इस महासंग्राम का एक और अत्यंत दिलचस्प और महत्वपूर्ण पहलू देश का कृषि संकट और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है, जिसे सरकार अपनी इस नीति का सबसे मजबूत ढाल मानकर चल रही है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने देश के सामने आंकड़े रखते हुए गर्व से बताया कि पिछले ग्यारह वर्षों के दौरान इस वनस्पति अर्क की खरीद की वजह से देश के अन्नदाता किसानों को एक लाख इक्कीस हजार करोड़ रुपए की अतिरिक्त और सीधी आय प्राप्त हुई है। सरकार का यह भी दावा है कि इस स्वदेशी मिश्रण के कारण उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्यों के ग्रामीण इलाकों में मक्के का भाव जो कभी महज़ एक हजार दो सौ रुपए प्रति क्विंटल हुआ करता था, वह अब बढ़कर छब्बीस सौ रुपए प्रति क्विंटल के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच चुका है। आधिकारिक आंकड़ों की मानें तो वर्ष दौ हज़ार चौदह में मक्के की न्यूनतम कीमत जहां दो हजार नब्बे रुपए प्रति क्विंटल के आसपास थी, वहीं वर्ष दौ हज़ार छब्बस में यह बढ़कर दो हजार चार सौ दस रुपए प्रति क्विंटल दर्ज की गई है। सरकार इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है कि आने वाले समय में टोयोटा, सुजुकी, मारुति और हुंडई जैसी दिग्गज कार निर्माता कंपनियां और टू-व्हीलर निर्माता बहुत जल्द ऐसे नए फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल बड़े पैमाने पर बाजार में उतारने जा रहे हैं जो शत-प्रतिशत इसी ईंधन पर चलेंगे।

प्रशासनिक स्तर पर सरकार इस यात्रा को यहीं रोकने के मूड में बिल्कुल नहीं दिख रही है, बल्कि वह इस मिश्रण की सीमा को और आगे बढ़ाते हुए ‘e पिचासी’ यानी पचासी फीसदी मिश्रण की नीति पर काम कर रही है और इस पर लगने वाले अठारह फीसदी जीएसटी को भी कम करने की जुगत में है। पेट्रोलियम मंत्री ने साफ कर दिया है कि देश चरणबद्ध और संतुलित तरीके से धीमे-धीमे ‘e पच्चीस’, ‘e सत्ताईस’ और ‘e तीस’ की ओर मजबूती से कदम बढ़ाएगा, क्योंकि इससे बीते वर्षों में कच्चे तेल के आयात में दो सौ अड़तीस लाख मीट्रिक टन की भारी कमी आई है और एक लाख चालीस हजार करोड़ रुपए की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा देश के खजाने में बची है। अगर वैश्विक पटल पर नजर दौड़ाई जाए तो यह मिश्रण सिर्फ भारत की कहानी नहीं है; ब्राजील जैसे विशाल देश में तो वाहनों के लिए सत्ताईस फीसदी का मिश्रण कानूनी रूप से पूरी तरह अनिवार्य है और वहां शत-प्रतिशत शुद्ध रूप का विकल्प भी हर पेट्रोल पंप पर हर वक्त मौजूद रहता है। इसी तरह अमेरिका के पारंपरिक ईंधन में दस फीसदी का मिश्रण अनिवार्य रूप से शामिल होता है, और कनाडा, फ्रांस, थाईलैंड, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया तथा चीन जैसे विकसित देशों में भी अलग-अलग अनुपातों में इस रासायनिक मिश्रण का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है।

लेकिन इस पूरे सिक्के का दूसरा पहलू पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से जुड़ा हुआ है, जो सरकार के ‘पर्यावरण रक्षा’ वाले सबसे बड़े और पवित्र दावे पर ही एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर देता है। नीति आयोग की बहुप्रचारित रोडमैप रिपोर्ट कहती है कि बीस फीसदी के इस मिश्रण से दोपहिया वाहनों में पचास फीसदी और चार पहिया वाहनों में करीब तीस फीसदी तक कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन के हानिकारक एमिशन में कमी आती है, जो कि हवा को साफ रखने के लिहाज से बहुत अच्छी बात है। परंतु असली पेंच इस बात पर आकर फंस जाता है कि इस जैव-ईंधन को बनाने के लिए भारत में जिस गन्ने की फसल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है, वह असल में पानी को सोखने वाली एक बेहद प्यासी फसल मानी जाती है। विज्ञान के मुताबिक महज़ एक लीटर इस ईंधन के निर्माण के पीछे लगभग आठ से दस हजार लीटर बहुमूल्य पानी की खपत हो जाती है, जो उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के लिए एक भयानक भूमिगत जल संकट पैदा कर रहा है जहां ज़मीन के नीचे का जलस्तर पहले ही डरावनी रफ्तार से नीचे गिर रहा है। इसके अलावा, इस ईंधन को रिफाइन करने की पूरी औद्योगिक प्रक्रिया में खुद भारी मात्रा में पारंपरिक पेट्रोलियम और रसायनों की खपत होती है, जिससे पर्यावरण संरक्षण का यह पूरा ढोल घूम-फिरकर खोखला साबित होने लगता है। जब तक सरकार इस भ्रम के कचरे को साफ करके जनता को भरोसे में नहीं लेती, तब तक सड़कों पर बंद होती गाड़ियों के साथ सरकार के इकबाल और भरोसे पर भी यह गंभीर संकट लगातार बरकरार रहेगा।

संबंधित ख़बरें
स्वच्छ, सुंदर और विकसित काशीपुर के संकल्प संग गणतंत्र दिवस

लेटेस्ट

ख़ास ख़बरें

error: Content is protected !!