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7 जुलाई द्रोण सागर की बदलेगी तस्वीर नगर निगम संभालेगा जिम्मेदारी विकास को मिलेगी नई रफ्तार

महाभारतकालीन धरोहर पर वर्षों की उपेक्षा खत्म होने की उम्मीद, तेंदुए के खतरे, पुरातत्व विभाग की बंदिशों और 4.95 करोड़ रुपये के प्रस्ताव के बीच प्रशासन ने सफाई, सुरक्षा, सौंदर्यीकरण तथा पर्यटन विकास का व्यापक रोडमैप तैयार किया।

काशीपुर। उत्तराखंड के ऐतिहासिक और धार्मिक पर्यटन को संवारने की दिशा में चल रहे सरकारी दावों के बीच काशीपुर की पौराणिक धरोहर द्रोण सागर अपनी उपेक्षा और प्रशासनिक बंदिशों को लेकर एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। महाभारत कालीन इस पवित्र स्थल की वर्तमान स्थिति और इसके विकास की भविष्य की योजनाओं को लेकर भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता गुरुविंदर सिंह चंडोक ने कई महत्वपूर्ण और चौंकाने वाले खुलासे किए हैं, जिन्होंने स्थानीय राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। स्थानीय मीडिया और जनता के तीखे सवालों का सामना करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि इस ऐतिहासिक स्थल के दिन बहुरने वाले हैं क्योंकि आगामी सात जुलाई को एक ऐतिहासिक घटनाक्रम के तहत काशीपुर नगर निगम इस पूरे परिसर को अपने हाथों में लेने जा रहा है। नगर निगम और स्थानीय प्रशासन के संयुक्त प्रयासों से इस क्षेत्र की सफाई व्यवस्था और बुनियादी ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन देखने को मिलेगा, जिसके बाद गुरु द्रोणाचार्य की इस पवित्र तपोभूमि को एक नया स्वरूप और निखार मिलना बिल्कुल तय माना जा रहा है।

महाभारत काल की गौरवशाली गाथाओं को खुद में समेटे हुए काशीपुर का यह अद्वितीय टीला और सरोवर क्षेत्र पिछले काफी समय से पर्यटकों के लिए पूरी तरह सुलभ नहीं हो पा रहा है, जिससे स्थानीय निवासियों में भारी असंतोष की भावना देखी जा रही थी। कोरोना महामारी के दौर से ही सुरक्षा कारणों और वन्यजीवों के खौफ की वजह से इस विख्यात पर्यटन स्थल के मुख्य हिस्सों को आम जनता के लिए बंद कर दिया गया था, जिसे लेकर सरकार की कार्यप्रणाली पर लगातार गंभीर सवालिया निशान खड़े किए जा रहे थे। इस तीखे जन-आक्रोश और उपेक्षा के आरोपों पर अपना पक्ष रखते हुए भाजपा प्रवक्ता गुरुविंदर सिंह चंडोक ने कहा कि जनता की सुरक्षा और अमूल्य मानव जीवन की रक्षा करना किसी भी कल्याणकारी सरकार की पहली और सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। इस ऐतिहासिक टीले के विशाल और बेहद घने झाड़ियों वाले क्षेत्र में कई बार हिंसक तेंदुए की मौजूदगी की पुष्टि हुई है, जिसके चलते पर्यटकों और स्थानीय मॉर्निंग वॉक करने वाले नागरिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ही इस संवेदनशील क्षेत्र में आवाजाही को अस्थायी रूप से प्रतिबंधित करने का एक बेहद कठिन और कड़ा निर्णय लेना पड़ा था।

इस पौराणिक स्थल की भौगोलिक जटिलताओं और घने जंगलों के कारण तेंदुए को पकड़ने के लिए वन विभाग द्वारा चलाई गईं तमाम कोशिशें और पिंजरे लगाने के अभियान अब तक पूरी तरह से परवान नहीं चढ़ सके हैं, जिससे यह समस्या एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। गुरुविंदर सिंह चंडोक ने इस विषय की गंभीरता को स्वीकार करते हुए बताया कि टीला बहुत बड़े भूभाग में फैला हुआ है और चारों तरफ से खुला होने के कारण हिंसक जानवर की आवाजाही पर पूरी तरह से नकेल कसना वन विभाग की टीमों के लिए भी टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। उन्होंने पहाड़ों में बाघ और तेंदुओं द्वारा महिलाओं, पुरुषों और मासूम बच्चों को अपना निवाला बनाने की दर्दनाक घटनाओं का हवाला देते हुए इस पाबंदी को पूरी तरह से जायज ठहराया और कहा कि वन्यजीवों के खौफ से मुक्त होते ही इस ट्रैक को दोबारा सुचारू कर दिया जाएगा। केंद्र और राज्य की डबल इंजन सरकार पूरे देश में इस तरह के पौराणिक और धार्मिक महत्व के स्थलों का कायाकल्प करने के लिए पूरी तरह से संकल्पबद्ध है और इस क्षेत्र को भी जल्द ही पूरी तरह सुरक्षित बनाकर जनता को सौंप दिया जाएगा।

द्रोण सागर के इस विवादित और उपेक्षित हिस्से के तकनीकी पहलुओं पर रोशनी डालते हुए भाजपा प्रवक्ता ने एक और महत्वपूर्ण जानकारी साझा की कि यह पूरा क्षेत्र भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी पुरातत्व विभाग के कड़े नियमों और संरक्षण के अधीन आता है। पुरातत्व विभाग की गाइडलाइंस के मुताबिक इस आरक्षित भूमि पर किसी भी प्रकार का नया कंक्रीट निर्माण या आधुनिक छेड़छाड़ पूरी तरह से वर्जित है क्योंकि यहाँ प्राचीन पाषाण काल और मौर्य कालीन सभ्यता के अनमोल अवशेष छिपे हुए हैं। पूर्व में इस ऐतिहासिक टीले पर हुई तीन बड़े स्तर की खुदाइयों के दौरान कई दुर्लभ प्राचीन मूर्तियां, प्राचीन किले के अवशेष और हजारों साल पुरानी ऐतिहासिक सामग्री बरामद हो चुकी है, जिन्हें विभाग ने अपने स्थानीय कार्यालय में बेहद सुरक्षित तरीके से सहेज कर रखा हुआ है। यही मुख्य कारण है कि पुरातत्व विभाग सौंदर्यकरण के नाम पर यहां कोई नया ढांचा खड़ा करने की अनुमति नहीं देता है, बल्कि इसका मूल और प्राचीन स्वरूप बनाए रखने के लिए केवल इसके ऐतिहासिक संरक्षण पर ही अपना पूरा ध्यान केंद्रित रखता है।

इस प्राचीन टीले के ऊपर की बंदिशों के इतर, द्रोण सागर के निचले मैदानी हिस्से और सरोवर परिसर के चहुंमुखी विकास के लिए सरकार ने अपने खजाने के द्वार पूरी तरह खोल दिए हैं और इसके लिए एक भारी-भरकम बजट भी स्वीकृत कर दिया है। गुरुविंदर सिंह चंडोक ने विकासात्मक योजनाओं का ब्यौरा देते हुए ऐलान किया कि पर्यटन विभाग द्वारा पहले चरण के अंतर्गत यहां पर शानदार सड़कों और रास्तों का निर्माण कार्य काफी हद तक सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है, जिससे आगंतुकों को काफी राहत मिली है। इसके साथ ही, पर्यटन विभाग ने द्रोण सागर के दूसरे चरण के व्यापक सौंदर्यकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए चार करोड़ पिंचानवे लाख रुपए का एक बेहद महत्वाकांक्षी प्रस्ताव तैयार करके शासन को भेज दिया है। इस भारी-भरकम बजट के स्वीकृत होते ही सरोवर के आसपास के पूरे परिदृश्य को बेहद आकर्षक, आधुनिक और मनोरम बना दिया जाएगा, जो भविष्य में देश-विदेश के पर्यटकों को काशीपुर की ओर आकर्षित करने में एक मील का पत्थर साबित होने वाला है।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा और सकारात्मक मोड़ आगामी सात तारीख को आने वाला है, जब नगर निगम काशीपुर इस पूरे परिसर की कमान संभालकर इसकी दुर्दशा को दूर करने के मिशन में पूरी ताकत से जुट जाएगा। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता ने स्थानीय जनता को आश्वस्त करते हुए कहा कि आदरणीय बालीजी के विशेष सहयोग और मार्गदर्शन में सात जुलाई को कार्यदायी संस्था से इस स्थल को नगर निगम के हैंडओवर कर दिया जाएगा, जिसके बाद सफाई और रखरखाव की व्यवस्था सीधे स्थानीय प्रशासन के नियंत्रण में आ जाएगी। नगर निगम के अंतर्गत आने के बाद इस परिसर की नियमित सफाई, लाइटिंग और सुरक्षा व्यवस्था को बेहद चाक-चौबंद किया जाएगा, जिससे यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को एक बेहद स्वच्छ, सुंदर और आध्यात्मिक वातावरण की अनुभूति हो सकेगी। इस ऐतिहासिक प्रशासनिक हस्तांतरण को काशीपुर के विकास के इतिहास में एक बेहद बड़ी और युगांतरकारी घटना के रूप में देखा जा रहा है, जो आने वाले समय में इस पौराणिक सरोवर की तकदीर और तस्वीर दोनों को पूरी तरह से बदलकर रख देगी।

लगभग सात सौ मीटर की विशाल परिधि में फैले इस मनोरम और शांत द्रोण सागर परिसर को स्वास्थ्य, अध्यात्म और प्राकृतिक सौंदर्य का एक अनूठा और बेहतरीन समावेश माना जाता है, जहां सुबह-शाम स्थानीय लोगों का तांता लगा रहता है। इस स्थल के साथ अपनी व्यक्तिगत और भावनात्मक यादों को साझा करते हुए गुरुविंदर सिंह चंडोक ने भावुक स्वर में कहा कि यह पवित्र भूमि उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों रही है, और वे अपने बचपन के दिनों से ही इस परिसर के ट्रैक पर लगातार आते रहे हैं। उन्होंने क्षेत्र की जनता से एक बेहद विनम्र और आत्मीय अपील करते हुए कहा कि व्यस्ततम दिनचर्या में से कम से कम एक घंटा सुबह या शाम को इस दैवीय वातावरण में टहलने के लिए जरूर निकालना चाहिए। उनके अनुसार, पहला सुख निरोगी काया होता है और जब मनुष्य का शरीर और मन पूरी तरह स्वस्थ रहेगा, तभी वह अपने जीवन के बड़े से बड़े लक्ष्यों और संकल्पों को सफलतापूर्वक हासिल करने में पूरी तरह सक्षम हो पाएगा।

इस ऐतिहासिक स्थल की महत्ता को रेखांकित करते हुए उन्होंने विश्वास जताया कि मंदिर परिसर से गूंजती आरती, मधुर भजनों के कीर्तन और चारों तरफ फैली इस अद्भुत हरियाली के बीच बिताया गया समय किसी भी व्यक्ति को मानसिक शांति और अपार ऊर्जा से भर देता है। काशीपुर आने वाला हर छोटा-बड़ा पर्यटक इस महाभारत कालीन द्रोण सागर की पावन मिट्टी को छूने और इसके दर्शन करने के लिए खिंचा चला आता है, इसलिए इसके गौरव को पुनः स्थापित करना सरकार का परम कर्तव्य है। सात तारीख के इस बड़े प्रशासनिक फैसले और चार करोड़ पिंचानवे लाख रुपए की आगामी योजनाओं के धरातल पर उतरने के बाद, द्रोण सागर आने वाले दिनों में एक नए और बेहद भव्य रूप में निखरकर सामने आएगा। भाजपा प्रवक्ता के इन तमाम दावों और घोषणाओं के बाद अब काशीपुर की सम्मानित जनता की निगाहें आगामी सात जुलाई पर टिकी हुई हैं, ताकि इस पौराणिक गुरु भूमि को उसकी उपेक्षा के अंधकार से निकालकर एक वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर चमकाया जा सके।

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