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हेलीकॉप्टर के लिए चमकता मैदान खिलाड़ियों के लिए बना वीरान खंडहर

कभी अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की पहचान रहा काशीपुर खेल परिसर आज जर्जर भवनों, बिखरी सिरिंजों, बदहाल सुविधाओं और प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बन चुका है, जबकि मंचों पर खेल विकास के बड़े-बड़े दावे लगातार किए जा रहे हैं।

काशीपुर। उत्तराखंड राज्य के भीतर खेलों के विकास और खेल प्रतिभाओं को तराशने की जो सुनहरी और चमचमाती तस्वीर सरकारी विज्ञापनों तथा बड़े-बड़े राजनीतिक मंचों से जनता के सामने पेश की जाती है, उसकी जमीनी हकीकत बेहद डरावनी, खोखली और निराशाजनक साबित हो रही है। जब हम कुमाऊं अंचल के सबसे प्रमुख और ऐतिहासिक खेल मैदान की बात करते हैं, तो जुबान पर बरबस ही उस विशाल प्रांगण का नाम आ जाता है जिसने कभी देश को अनगिनत होनहार खिलाड़ी दिए थे। इस विशाल और भव्य काशीपुर खेल परिसर का निर्माण उत्तराखंड के महापुरुष और राजनीति के अजातशत्रु कहे जाने वाले दिग्गज नेता नारायण दत्त तिवारी के दूरदर्शी विजन के तहत करवाया गया था। उनका सपना था कि इस क्षेत्र के युवा विश्व स्तर पर अपनी प्रतिभा का डंका बजाएं। एक दौर ऐसा भी था जब इस मैदान की मिट्टी से तराशे गए कई नौजवानों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अमिट छाप छोड़ी थी। लेकिन आज समय का चक्र कुछ इस कदर घूमा है कि यह ऐतिहासिक खेल परिसर अपनी ही दुर्दशा पर खून के आंसू बहाने को विवश हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है मानो शासन और प्रशासन ने जानबूझकर कुमाऊं के इस सबसे पहले और सबसे विशाल खेल प्रांगण को उसके हाल पर छोड़ दिया है ताकि वह धीरे-धीरे खुद ही जमींदोज हो जाए। क्या सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों को इस बात का तनिक भी इल्म नहीं है कि जिस जगह से चैंपियन निकला करते थे, वह आज अपना वजूद बचाने के लिए दिन-रात कड़ा संघर्ष कर रहा है?

वर्ष 1972 के उस स्वर्णिम दौर को याद कर आज भी खेल प्रेमियों की आंखें नम हो जाती हैं, जब इस विशाल और ऐतिहासिक खेल परिसर की नींव रखी गई थी। शहर के बीचों-बीच करीब साढ़े 16 एकड़ के एक बहुत बड़े और बेशकीमती भूभाग पर फैले इस स्पो‌र्ट्स स्टेडियम का निर्माण इस नेक और महान उद्देश्य के साथ किया गया था कि यह जगह भविष्य के चैंपियनों के लिए एक बेहतरीन और विश्वस्तरीय ऩर्सरी साबित होगी। उस जमाने में इतनी विशाल और खुली जगह को विशेष रूप से केवल खेलों और युवाओं के लिए आरक्षित करना अपने आप में एक बेहद क्रांतिकारी और दूरदर्शी कदम था। साढ़े 16 एकड़ का यह हरा-भरा और विशाल प्रांगण कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं का गवाह बनने वाला था और यहाँ की मिट्टी खिलाड़ियों की दौड़ती सांसों, उनके जूतों की थाप और दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजा करती थी। लेकिन यह कितने दुर्भाग्य और घोर प्रशासनिक शर्म की बात है कि दशकों पहले जो बेशकीमती जमीन खेल और खिलाड़ियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए समर्पित की गई थी, आज वह प्रशासनिक अनदेखी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक उपेक्षा की भेंट चढ़कर एक वीरान और डरावने जंगल में तब्दील हो चुकी है। साल 1972 से लेकर आज तक के इस लंबे सफर में साढ़े 16 एकड़ के इस परिसर ने जो दर्दनाक उतार-चढ़ाव देखे हैं, वह इस बात का चीख-चीख कर सबूत दे रहे हैं कि कैसे एक महान विजन को सिस्टम की दीमक ने धीरे-धीरे चाट कर पूरी तरह से खोखला कर दिया है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और चुभने वाला विरोधाभास यह है कि जब भी प्रदेश के मुखिया यानी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस शहर का दौरा करते हैं, तो उनके उड़नखटोले को उतारने के लिए इसी खेल के मैदान को एक वीआईपी हेलीपैड के रूप में तब्दील कर दिया जाता है। उस वक्त पूरा प्रशासनिक अमला, आला अधिकारी और पुलिस महकमा इसी प्रांगण में मुस्तैद रहता है, लेकिन किसी भी जिम्मेदार अधिकारी या नेता की नजर उन दरकती दीवारों और टूटते हौसलों पर नहीं पड़ती जो उनके स्वागत में खामोशी से चीख रहे होते हैं। यह स्थिति इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि सत्ता के नशे में चूर व्यवस्था को केवल अपने आलीशान दौरों से मतलब है, खिलाड़ियों के उजड़ते भविष्य से नहीं। यहां समय-समय पर कई छोटे-बड़े खेल आयोजनों की रूपरेखा तय की जाती है और उन कार्यक्रमों के भव्य उद्घाटन समारोहों में स्थानीय सांसद, विधायक और शहर के महापौर मुख्य अतिथि बनकर पहुंचते हैं। मंच पर खड़े होकर माइक थामते ही ये तमाम जनप्रतिनिधि बड़े ही आत्मविश्वास के साथ यह घोषणा करते हैं कि इस खेल परिसर को जल्द ही अत्याधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस कर दिया जाएगा, लेकिन कार्यक्रम समाप्त होते ही उनके वादे हवा में कपूर की तरह उड़ जाते हैं। ऐसा लगता है कि ये माननीयों की जमात सिर्फ झूठे आश्वासन देने की कला में माहिर हो चुकी है और उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि उनके खोखले वादों की वजह से यहां पसीना बहाने वाले युवाओं का मनोबल किस हद तक टूट रहा है।

वर्तमान समय में यदि कोई अनजान व्यक्ति इस परिसर के भीतर कदम रखे, तो उसे यह यकीन ही नहीं होगा कि वह किसी खेल के मैदान में खड़ा है, बल्कि उसे ऐसा महसूस होगा जैसे वह किसी खौफनाक हॉरर फिल्म के सेट, किसी भूतिया बंगले या फिर सदियों पुरानी किसी भूली-बिसरी काल कोठरी में आ फंसा हो। दीवारों से पपड़ी बनकर उखड़ता हुआ प्लास्टर, जगह-जगह से चटके हुए खंभे, टूटे-फूटे खिड़की-दरवाजे और पूरी तरह से जर्जर हो चुके भवन इस बात की गवाही दे रहे हैं कि पिछले कई वर्षों से इस जगह पर मरम्मत के नाम पर एक ईंट भी नहीं लगाई गई है। कभी जिन कमरों में खिलाड़ियों के सपनों को नई उड़ान मिलती थी, आज वे कमरे खुद अपनी बुनियाद को बचाने के लिए किसी मसीहा की तलाश कर रहे हैं। राज्य सरकार एक तरफ तो नई खेल नीतियों का ढिंढोरा पीटती है, नए अवसरों के सृजन की बात करती है और खेल प्रतिभाओं को विश्व पटल पर स्थापित करने के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन दूसरी तरफ इस खेल परिसर की यह बदरंग तस्वीरें उन तमाम सरकारी दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी हैं। यह समझ से परे है कि करोड़ों रुपये के बजट का आवंटन आखिर कागजों में कहां गायब हो जाता है, जबकि जमीन पर सिर्फ वीरानगी और बर्बादी का ही साम्राज्य नजर आता है। यह खंडहर में तब्दील होता ढांचा सिर्फ ईंट-गारे का नुकसान नहीं है, बल्कि यह उन हजारों युवाओं की उम्मीदों की कब्रगाह बन चुका है जो यहां अपना भविष्य संवारने आते हैं।

बदइंतजामी और प्रशासनिक अनदेखी का सबसे खौफनाक और शर्मनाक पहलू तब सामने आता है जब इस परिसर के सुनसान हिस्सों और खास तौर पर शौचालयों का बारीकी से मुआयना किया जाता है। वहां का नजारा किसी की भी रूह कंपा देने के लिए काफी है, क्योंकि उन जगहों पर भारी मात्रा में इस्तेमाल की गई सिरिंज और नशे के खतरनाक इंजेक्शन बिखरे हुए पाए गए हैं। यह कोई मामूली बात नहीं है, बल्कि एक ऐसा सुलगता हुआ सवाल है जो सीधे तौर पर समाज के भविष्य और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाता है। आखिर एक पवित्र माने जाने वाले खेल परिसर के भीतर नशीली दवाओं और मादक पदार्थों का यह जानलेवा जखीरा कैसे पहुंच रहा है? क्या यहां पसीना बहाने वाले युवा खिलाड़ी अनजाने में किसी गहरे तनाव के चलते इस जानलेवा नशे की गिरफ्त में फंसते जा रहे हैं, या फिर बाहरी असामाजिक तत्वों और नशेड़ियों के गिरोह ने इस लावारिस पड़े प्रांगण को अपना सुरक्षित अड्डा बना लिया है? अगर बाहरी लोग बेखौफ होकर इस परिसर में घुसपैठ कर रहे हैं और नशे की महफिलें सजा रहे हैं, तो फिर करोड़ों के बजट वाली पुलिस और सुरक्षा व्यवस्था आखिर किस गहरी नींद में सो रही है? यह केवल एक इमारत की असुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर हमारी युवा पीढ़ी की नसों में जहर घोलने की एक खौफनाक साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है, जिस पर सभी जिम्मेदार मौन साधे बैठे हैं।

इस दुर्दशा की कहानी केवल बाहरी परिसर या शौचालयों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि जब आप उन कमरों के भीतर झांकने का साहस जुटाते हैं जहां खिलाड़ियों को अपना सामान सुरक्षित रखना होता है, तो वहां का दृश्य और भी ज्यादा पीड़ादायक होता है। कमरों के अंदर खिलाड़ियों के कीमती खेल उपकरण, उनकी किट और अन्य जरूरी साजो-सामान इस बेतरतीब और अपमानजनक तरीके से धूल फांकते हुए इधर-उधर बिखरे पड़े हैं, मानो उन्हें किसी कूड़ाघर या कबाड़खाने में फेंक दिया गया हो। यह दृश्य उन तमाम उच्चाधिकारियों और खेल विभाग के कर्ताधर्ताओं के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर खेलों के विकास की भव्य रूपरेखा तैयार करते हैं। जिस सामान को एक खिलाड़ी अपने भगवान की तरह पूजता है, उसकी ऐसी दुर्गति देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान का दिल पसीज सकता है। यह हालात चीख-चीख कर यह बता रहे हैं कि खेल विभाग के अधिकारियों के भीतर खिलाड़ियों की भावनाओं और उनके संघर्ष के प्रति संवेदना का पूरी तरह से अकाल पड़ चुका है। वे केवल फाइलों का पेट भरने और कागजी खानापूर्ति करने में ही अपनी पूरी ऊर्जा खपा रहे हैं। क्या जिन युवाओं को हम भविष्य का ओलंपिक पदक विजेता मानते हैं, उनके संघर्षों और उनके उपकरणों का यही सिला दिया जाना चाहिए? यह प्रशासनिक विफलता का वह चरम बिंदु है जहां जवाबदेही नाम का शब्द सरकारी शब्दकोश से पूरी तरह गायब हो चुका है।

अब सबसे ज्वलंत और सीधा सवाल उन सफेदपोश जनप्रतिनिधियों, नौकरशाहों और नीति-निर्माताओं से पूछा जाना चाहिए जो समय-समय पर इस प्रांगण में अपने राजनीतिक और प्रशासनिक रुतबे का प्रदर्शन करने आते हैं। जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के उड़नखटोले के लिए यहां अस्थायी वीआईपी हेलीपैड तैयार किया जाता है, तो रातों-रात उस छोटे से हिस्से को चमका दिया जाता है, लेकिन उसी प्रांगण के बाकी हिस्से में पसरी यह भयावह गंदगी और जर्जरता क्या किसी भी प्रशासनिक अधिकारी की आंखों में नहीं चुभती? क्या उन आला अफसरों की आंखों पर कोई ऐसा खास चश्मा चढ़ा हुआ है जो उन्हें केवल सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की चमक ही दिखाता है और जमीन पर सिसकते खिलाड़ियों का दर्द उनकी नजरों से ओझल कर देता है? क्या हमारे देश और राज्य में होनहार खिलाड़ियों का भविष्य केवल धूल फांकती सरकारी फाइलों के किसी अंधेरे कोने में हमेशा के लिए दफन होकर रह गया है? यह विडंबना ही है कि जहां एक तरफ मंचों से खड़े होकर भाषणों की बारिश की जाती है, वहीं दूसरी तरफ असलियत में इन युवाओं के पैरों तले से जमीन खिसकाई जा रही है। अगर यही व्यवस्था कायम रही, तो वह दिन दूर नहीं जब इस राज्य से कोई भी युवा खेल के क्षेत्र में अपना करियर बनाने का सपना देखना ही छोड़ देगा, क्योंकि जब बुनियाद ही इतनी खोखली और सड़ी हुई हो, तो उस पर सफलता की मजबूत इमारत कभी खड़ी नहीं की जा सकती।

इस समूचे प्रकरण का सबसे दुखद पहलू यह है कि यह महज एक इमारत के खंडहर में तब्दील होने की सामान्य खबर भर नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत झूठे वादों, खोखले दावों और राजनीतिक फरेब का जीता-जागता स्मारक बन चुका है जो दशकों से खिलाड़ियों की भावनाओं के साथ खेले जा रहे हैं। कभी जिस प्रांगण की मिट्टी ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर देश का गौरव बढ़ाने वाले नगीने पैदा किए थे, आज वही जगह घोर अनियमितताओं, भ्रष्टाचार की बदबू और असीम सरकारी उपेक्षा का एक बदनुमा और शर्मनाक केंद्र बनकर रह गई है। सवाल यह उठता है कि क्या मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की नजर कभी अपने हेलीकॉप्टर की खिड़की से नीचे उतरकर इस प्रांगण की असली और खौफनाक तस्वीर पर पड़ेगी? क्या खेल विभाग के उन लापरवाह अधिकारियों पर कभी कोई सख्त कार्रवाई होगी जिन्होंने इस ऐतिहासिक धरोहर को नशेड़ियों और असामाजिक तत्वों की शरणस्थली में तब्दील होने दिया? आखिर इस घोर बदहाली का असली गुनहगार है कौन? क्या प्रशासन और सरकार की कुंभकर्णी नींद तब टूटेगी जब यहां कोई बड़ी आपराधिक घटना घट जाएगी या जब सारे खिलाड़ी पूरी तरह से हताश होकर खेल के मैदान से हमेशा के लिए मुंह मोड़ लेंगे? समय आ गया है कि अब खोखली बयानबाजी को दरकिनार कर धरातल पर ठोस और पारदर्शी कदम उठाए जाएं, अन्यथा यह ऐतिहासिक खेल परिसर हमेशा के लिए इतिहास के काले पन्नों में सिर्फ एक खंडहर के रूप में ही दर्ज होकर रह जाएगा।

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