काशीपुर।शहर को साफ और स्वच्छ रखने वाले कर्मठ हाथों ने अपने बुनियादी अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करते हुए व्यवस्था के खिलाफ एक बड़ा मोर्चा खोल दिया। देवभूमि उत्तराखंड के भीतर सरकारी तंत्र की कथित वादाखिलाफी और श्रमिक विरोधी नीतियों के खिलाफ पनप रहा तीव्र आक्रोश अब पूरी तरह से सड़कों पर फूट पड़ा है, जिससे स्थानीय नगर निकाय प्रशासन के हाथ-पांव फूलने लगे हैं। प्रांतीय संगठन के कड़े दिशा-निर्देशों और प्रदेशव्यापी आह्वान पर अपनी वाजिब मांगों को लेकर संघर्षरत कर्मचारियों ने अब आर-पार की लड़ाई का पूरा मन बना लिया है, जिसका सीधा असर स्थानीय नागरिक व्यवस्था पर पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। लंबे समय से धैर्य का परिचय दे रहे इन श्रमजीवियों का सब्र अब पूरी तरह टूट चुका है, और शासन की दमनकारी नीतियों के खिलाफ शुरू हुआ यह मौन विद्रोह आने वाले दिनों में एक बड़ी नागरिक अशांति का सबब बन सकता है। शासन स्तर पर लगातार हो रही घोर उपेक्षा और झूठे आश्वासनों के पुलिंदों से भयंकर नाराज होकर शहर की सफाई व्यवस्था के रीढ़ माने जाने वाले इन तमाम कामगारों ने सामूहिक रूप से अपनी आवाज को धार देना शुरू कर दिया है, जिससे यह पूरी तरह साफ है कि अब बात सिर्फ सामान्य बातचीत तक सीमित नहीं रहने वाली है।
देवभूमि उत्तराखण्ड सफाई कर्मचारी संघ की स्थानीय शाखा काशीपुर के बैनर तले सैकड़ों की तादाद में प्रदर्शनकारी इकट्ठा हुए। शासन प्रशासन को गहरी नींद से जगाने और अपने प्रति हो रहे अन्याय को रेखांकित करने के लिए इन आक्रोशित आंदोलनकारियों ने अपने हाथों और बाजुओं पर काली पट्टियां बांध रखी थीं, जो सरकार के प्रति उनके गहरे विरोध और व्यवस्था द्वारा किए गए विश्वासघात का खुला प्रतीक थीं। इस बेहद आक्रामक और तीखे सांकेतिक प्रदर्शन के दौरान समूचा निगम परिसर सरकार विरोधी गगनभेदी नारों से गूंज उठा, जिससे वहां काम कर रहे आला अधिकारियों और कर्मचारियों में खलबली मच गई। आंदोलनकारियों का मुख्य गुस्सा इस बात को लेकर था कि प्रदेश सरकार ने सत्ता में बने रहने के दौरान सत्ताईस जुलाई दो हजार इक्कीस को एक बेहद महत्वपूर्ण लिखित समझौता किया था, जिसमें कर्मचारियों के कल्याण से जुड़ी कई बुनियादी शर्तों को स्वीकार किया गया था। लेकिन विडंबना यह है कि पांच साल का लंबा समय बीत जाने के बाद भी उस ऐतिहासिक समझौते की एक भी कड़वी सच्चाई को धरातल पर नहीं उतारा गया, जिससे इस श्रमजीवी वर्ग के भीतर धोखे और छलावे की भावना चरम पर पहुंच गई है।

इस विशाल और आक्रामक विरोध प्रदर्शन की कमान पूरी मुस्तैदी के साथ संभाल रहे महानगर अध्यक्ष सुमित सौदा ने उपस्थित जनसैलाब को संबोधित करते हुए राज्य सरकार की नीतियों पर जमकर तीखे वाकप्रहार किए। सुमित सौदा ने अपने बेहद ओजस्वी और जोशीले संबोधन में कहा कि इस वर्ग ने समाज को स्वच्छ और महामारी मुक्त रखने के लिए हमेशा अपने प्राणों की बाजी लगाई है, लेकिन बदले में इस सड़ चुके सिस्टम ने उन्हें सिर्फ और सिर्फ मानसिक प्रताड़ना और झूठे वादे ही दिए हैं। उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में स्पष्ट किया कि समझौते को हुए पूरे पांच वर्ष का लंबा अरसा बीत चुका है, लेकिन वर्तमान हुक्मरानों ने पुरानी पेंशन योजना यानी ओपीएस की बहाली, दैनिक भोगी कर्मचारियों के नियमितीकरण और अमानवीय ठेका प्रथा को हमेशा के लिए समाप्त करने के अपने एक भी वादे को पूरा नहीं किया। सुमित सौदा ने चेतावनी देते हुए कहा कि अब वह दौर बीत चुका है जब इस सीधे-साधे और शोषित वर्ग को केवल खोखले आश्वासनों के दम पर शांत करा दिया जाता था, क्योंकि अब काशीपुर का एक-एक सफाई कर्मी इस बार-बार मिलने वाले धोखे और प्रशासनिक क्रूरता को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
आंदोलन की आगामी और उग्र रूपरेखा को साफ करते हुए सुमित सौदा ने मंच से इस बात का भी पुरजोर ऐलान किया कि पूरे प्रदेश के भीतर इस दमनकारी नीति के खिलाफ अठारह जून से ही एक व्यापक और ऐतिहासिक प्रदेशव्यापी आंदोलन का बिगुल फूंका जा चुका है। उन्होंने दोटूक शब्दों में चेतावनी दी कि यदि प्रदेश सरकार ने समय रहते अपनी हठधर्मिता को नहीं त्यागा और उनके अधिकारों से जुड़ी जायज मांगों को तत्काल प्रभाव से पूरा नहीं किया, तो काशीपुर शाखा इस सांकेतिक धरने को एक पूर्णकालिक और विनाशकारी आंदोलन में तब्दील करने से पीछे नहीं हटेगी। सुमित सौदा के मुताबिक, यदि आगामी कुछ दिनों के भीतर शासन स्तर पर कोई ठोस और लिखित आदेश जारी नहीं हुआ, तो समूचे काशीपुर नगर निगम के भीतर पूरी तरह से तालाबंदी कर दी जाएगी और सभी प्रकार के विभागीय कार्यों का पूर्ण कार्य बहिष्कार शुरू कर दिया जाएगा। इस कड़े कदम से यदि शहर की स्वच्छता व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त होती है और जनता को किसी भी प्रकार की महामारी या परेशानी का सामना करना पड़ता है, तो उसकी शत-प्रतिशत नैतिक और वैधानिक जिम्मेदारी केवल और केवल गूंगी-बहरी सरकार और स्थानीय निकम्मे प्रशासन की होगी।

इस ऐतिहासिक और तीखे धरने को संगठनात्मक रूप से मजबूती प्रदान करने और अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर आंदोलन को धार देने के लिए संगठन के कई शीर्ष पदाधिकारी भी मुस्तैद दिखाई दिए। प्रदर्शनकारियों का मनोबल बढ़ाने और सरकार को अपनी सांगठनिक ताकत का अहसास कराने के लिए प्रदेश सचिव जितेन्द्र देवांतक ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और सरकार की नीतियों को श्रमिक विरोधी बताया। उनके साथ ही मोहल्ला स्वच्छता समिति अध्यक्ष अमित टांक ने स्थानीय स्तर पर कर्मचारियों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि वरिष्ठ उपाध्यक्ष संजय कुमार ने भी व्यवस्था के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार किया। संगठन के ढांचे को मजबूती देते हुए उपाध्यक्ष रिंकू कुमार और सचिव राजेश कुमार बबलू ने इस पूरे विरोध प्रदर्शन के दौरान अनुशासन और आक्रामकता का एक बेहतरीन संतुलन बनाए रखा, जिससे प्रशासन पर दबाव लगातार बढ़ता गया। महिला कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करते हुए और उनके अधिकारों की आवाज को बुलंद करते हुए सुपरवाइजर अनीता ने भी इस धरने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और यह साबित कर दिया कि हक की इस जंग में महिलाएं किसी भी मोर्चे पर पुरुषों से पीछे रहने वाली नहीं हैं।
निगम कार्यालय के बाहर चल रहे इस अनवरत और आक्रामक प्रदर्शन में युवाओं और वरिष्ठ कर्मचारियों की एक बहुत बड़ी टोली सक्रियता के साथ डटी रही, जिसमें मुख्य रूप से रोहित खत्री और रजत ने अग्रिम पंक्ति में रहकर कड़ा मोर्चा संभाला। व्यवस्था के खिलाफ इस महासंग्राम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए शिवा, अंशु सौदा और विकास सौदा ने भी गगनभेदी नारों के साथ माहौल को पूरी तरह से जीवंत और ऊर्जावान बनाए रखा। इस आंदोलन को जमीनी स्तर पर धार देने के लिए नानक खत्री और मुकेश विशेष ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी, जबकि अनिल ने भी कर्मचारियों की मांगों का पुरजोर समर्थन करते हुए सरकार के खिलाफ अपना रोष प्रकट किया। सबसे खास और प्रेरणादायक बात यह रही कि इस पूरे प्रदर्शन के दौरान गीता और सरोज जैसी तमाम महिला कर्मचारियों के साथ-साथ भारी संख्या में पुरुष कामगारों ने भीषण गर्मी और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मैदान नहीं छोड़ा। इन सभी निष्ठावान कार्यकर्ताओं की सामूहिक उपस्थिति और अटूट हौसले ने इस बात को पूरी तरह साफ कर दिया कि यह लड़ाई अब किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज के आत्मसम्मान की लड़ाई बन चुकी है।

धरना स्थल पर मौजूद आक्रोशित जनसमुदाय के कंठों से निकलने वाले तीखे और चुभते हुए नारे पूरे शहर के प्रशासनिक वातावरण को हिला रहे थे, जिनमें सबसे प्रमुख नारा वादा निभाओ वरना कुर्सी खाली करो गूंज रहा था। इस नारे के माध्यम से सीधे तौर पर सत्ता के शीर्ष पर बैठे राजनेताओं को यह चेतावनी दी गई कि यदि वे अपनी कही बातों पर कायम नहीं रह सकते, तो उन्हें सत्ता में बने रहने का भी कोई नैतिक अधिकार नहीं है। इसके साथ ही हवा में गूंजते ठेका प्रथा मुर्दाबाद के नारों ने उस शोषणकारी व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया जो मानव श्रम का बेरहमी से व्यापार करती है और कर्मचारियों को बंधुआ मजदूर बनाकर रख देती है। वहीं दूसरी ओर ओपीएस बहाल करो और नियमितीकरण लागू करो के गगनभेदी उद्घोषों ने कर्मचारियों के सुरक्षित भविष्य और उनके बुढ़ापे की लाठी को वापस पाने की तड़प को पूरी तरह उजागर कर दिया। इन नारों की गूंज केवल निगम के दफ्तरों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि इसने पूरे काशीपुर क्षेत्र के आम नागरिकों को भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि जो लोग शहर को साफ रखते हैं, उनका अपना भविष्य कितना असुरक्षित है।
कुल मिलाकर काशीपुर नगर निगम के प्रवेश द्वार पर हुआ यह विशाल सांकेतिक धरना प्रदर्शन केवल एक दिन की गतिविधि नहीं है, बल्कि यह आने वाले एक बहुत बड़े और भीषण नागरिक संकट की शुरुआती आहट मात्र है। कर्मचारियों का यह साफ संदेश शासन की फाइलों में बंद उन वादों के लिए एक बड़ी चुनौती है जो केवल चुनावी वेदियों पर ही दिखाई देते हैं और चुनाव बीतने के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं। यदि उत्तराखंड की प्रदेश सरकार ने इस बेहद संवेदनशील और उग्र होते मामले को गंभीरता से नहीं लिया और वर्ष दो हजार इक्कीस के लिखित समझौते को तुरंत लागू करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो काशीपुर सहित पूरा सूबा एक गंभीर संकट की चपेट में आ सकता है। अब देखना यह होगा कि सत्ता के गलियारों में बैठे नीति-निर्माता इस गूंजती हुई आवाज को सुनकर अपनी कुंभकर्णी नींद से जागते हैं या फिर हमेशा की तरह उपेक्षा का रास्ता चुनकर पूरे शहर को एक भीषण तालाबंदी और पूर्ण कार्य बहिष्कार की आग में झोंकने का आत्मघाती कदम उठाते हैं।





