काशीपुर। राज्य निर्माण के नायकों के अधिकारों को लेकर एक बार फिर से एक बहुत बड़ा सियासी तूफान खड़ा हो गया है, जिसने शासन-प्रशासन के गलियारों में भारी खलबली मचा दी है। पृथक राज्य के गठन में अपनी जवानी और खून-पसीना बहाने वाले जांबाज आंदोलनकारियों की अनदेखी को लेकर अब मुख्य विपक्षी दल ने सीधे मुख्यमंत्री आवास तक अपनी नाराजगी की गूंज पहुंचा दी है। उत्तराखंड कांग्रेस के बेहद कद्दावर और वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं मुख्य प्रवक्ता होने के साथ-साथ चिन्हित राज्य आंदोलनकारी संयुक्त समिति के केंद्रीय मुख्य संरक्षक के रूप में जन-जन की आवाज उठाने वाले धीरेंद्र प्रताप ने सीधे तौर पर मौजूदा सरकार की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने बेहद कड़े शब्दों में आरोप लगाया है कि काशीपुर क्षेत्र के उन तमाम वीर राज्य निर्माण सेनानियों की वर्तमान शासन तंत्र द्वारा लगातार घोर उपेक्षा की जा रही है, जिन्होंने उत्तराखंड राज्य की नींव रखने के लिए उस दौर के खौफनाक और बर्बर दमन चक्र का डटकर मुकाबला किया था। इस गंभीर और विचारणीय मुद्दे को उठाते हुए उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने अपनी जान की बाजी लगाकर इस सुंदर पहाड़ी प्रदेश का सपना साकार किया, आज उन्हीं को अपने वजूद और पहचान के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
इस बेहद गरमा-गरम और संवेदनशील राजनीतिक घटनाक्रम की जमीनी पृष्ठभूमि तब सामने आई जब कांग्रेस के यह वरिष्ठ रणनीतिकार अपना एक अत्यंत व्यस्त और महत्वपूर्ण दौरा संपन्न करके वापस लौट रहे थे। चार दिनों तक चलने वाले अपने अत्यंत सघन और व्यापक गढ़वाल दौरे के समापन के पश्चात जब धीरेंद्र प्रताप काशीपुर के रास्ते से होते हुए प्रांतीय राजधानी देहरादून की ओर अग्रसर थे, तब उन्होंने स्थानीय कार्यकर्ताओं और आंदोलनकारियों की पीड़ा को बेहद करीब से महसूस किया। उन्होंने पत्रकारों से मुखातिब होते हुए साफ तौर पर कहा कि राज्य आंदोलनकारियों के आधिकारिक और विधिवत चिन्हिकरण के अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में काशीपुर के निवासियों और सेनानियों की लंबे समय से लगातार घोर उपेक्षा की जा रही है। शासन स्तर पर बरती जा रही इस प्रशासनिक सुस्ती और सौतेले व्यवहार के कारण वर्तमान में यहां के स्थानीय आंदोलनकारियों और उनके परिवारों के भीतर गहरा आक्रोश, असंतोष और आक्रोश पनप रहा है। धीरेंद्र प्रताप ने आगाह किया कि सरकार सेनानियों के इस बढ़ते हुए सब्र के बांध को कमजोर न समझे, क्योंकि जिस जनता ने राज्य बनाया है वह अपने नायकों का ऐसा अपमान कभी भी बर्दाश्त नहीं करेगी।
सड़कों से लेकर सदन तक आंदोलनकारियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले इस वरिष्ठ संरक्षक ने सीधे प्रदेश के मुखिया के सामने अपनी मांगें रखी हैं ताकि इस व्यवस्था को सुधारा जा सके। उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से बेहद पुरजोर तरीके से यह न्यायसंगत मांग की है कि वह तत्काल प्रभाव से हस्तक्षेप करें और काशीपुर के बचे हुए सभी वास्तविक आंदोलनकारियों के चिन्हिकरण की रुकी हुई प्रक्रिया को पूरी गति के साथ तेज करने का आदेश जारी करें। धीरेंद्र प्रताप ने पुराने दिनों की यादों को ताजा करते हुए वर्तमान पीढ़ी को बताया कि काशीपुर के इन जांबाज निवासियों ने उत्तराखंड राज्य निर्माण के उस ऐतिहासिक और बेहद कठिन जनांदोलन में अपनी बेहद महत्वपूर्ण, निर्णायक और अतुलनीय भूमिका निभाई थी। इतिहास के पन्नों को पलटते हुए उन्होंने भावुक अंदाज में कहा कि ‘राज्य नहीं तो चुनाव नहीं’ के उस गूंजते हुए ऐतिहासिक नारे और आंदोलन के दौरान वे स्वयं भी काशीपुर की सड़कों पर संघर्ष करते हुए पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए थे और उन्हें कई दिनों तक जेल की सलाखों के पीछे रहने की यातनाएं झेलनी पड़ी थीं।

मौजूदा सत्ताधारी दल की नीतियों पर तीखा प्रहार करते हुए उन्होंने इसे आंदोलनकारियों के सम्मान के साथ एक बहुत बड़ा भद्दा मजाक और उनकी भावनाओं को आहत करने वाला कदम बताया है। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जिस तरह से राज्य निर्माण के इन महान सेनानियों की उम्मीदों की अनदेखी की है और उनके चिन्हिकरण की अंतिम समय सीमा को मात्र दो महीने की बेहद अल्प अवधि के लिए आगे बढ़ाया है, यह सचमुच बेहद अफसोसजनक, निराशाजनक और अपमानजनक है। इसके साथ ही, उन्होंने आंदोलनकारी सम्मान परिषद के भीतर लगातार नए अध्यक्षों और उपाध्यक्षों के पदों की संख्या में की जा रही बेतहाशा बढ़ोतरी को सरकार की एक सोची-समझी गहरी साजिश करार दिया। धीरेंद्र प्रताप के अनुसार, पदों का यह बंदरबांट असल में आंदोलनकारियों की आंखों में धूल झोंकने और उनके मुख्य अधिकारों से उनका ध्यान भटकाने की शासन की एक चाल मात्र है। हालांकि, इस पूरे विवाद के बीच उन्होंने हुकम सिंह कुंवर को आंदोलनकारी सम्मान परिषद के सर्वोच्च पद यानी अध्यक्ष बनाए जाने के निर्णय पर अपनी ओर से पूरा संतोष व्यक्त किया।
परिषद के नए मुखिया की योग्यताओं की सराहना करते हुए उन्होंने यह भी साफ किया कि किसी एक व्यक्ति की अच्छाई से पूरी सरकारी व्यवस्था की नाकामियों को छुपाया नहीं जा सकता। उन्होंने बेहद खुले दिल से यह स्वीकार किया कि हुकम दा वास्तव में एक बेहद सुलझे हुए, समर्पित और सच्चे आंदोलनकारी हैं, जिनका राज्य आंदोलन के इतिहास में एक बेहद विशेष, अद्वितीय और अनुकरणीय योगदान रहा है। परंतु, इसके साथ ही उन्होंने वर्तमान प्रशासनिक पेंच पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि जिस तरह से अब क्षेत्र में चुनाव की आचार संहिता लागू हो चुकी है और चुनाव आयोग ने तमाम प्रशासनिक अधिकारियों के तबादलों एवं नई नीतियों पर पूरी तरह से रोक लगा दी है, उससे सरकार की मंशा बेनकाब हो गई है। धीरेंद्र प्रताप ने तकनीकी पहलू को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब तक इस संबंध में शासन द्वारा कोई नया और स्पष्ट शासनादेश (जीओ) जारी होकर धरातल पर लागू नहीं होगा, तब तक आंदोलनकारियों के चिन्हिकरण की यह पूरी की पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से ठप और बंद रहेगी, जिससे केवल समय की बर्बादी होगी।
अधिकारों की इस महाजंग में उन्होंने समय सीमा को नाकाफी बताते हुए सरकार से अपनी इस त्रुटिपूर्ण नीति में तत्काल प्रभाव से एक बड़ा और व्यावहारिक बदलाव करने की मांग दोहराई है। यद्यपि उन्होंने केवल दो महीने के लिए चिन्हिकरण की इस अधूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाए जाने पर अपना तीव्र असंतोष और कड़ा विरोध दर्ज कराया, वहीं उन्होंने इसे कम से कम ६ महीने तक के लिए विस्तारित किए जाने की बेहद तार्किक मांग शासन के समक्ष रखी ताकि हर एक छूट गए व्यक्ति को न्याय मिल सके। इसके साथ ही, कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष ने सरकार पर सबसे बड़ा और सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा कि वर्तमान शासन तंत्र आंदोलनकारियों को मिलने वाले 10 फीसदी क्षैतिज आरक्षण के कानूनी लाभ से उन्हें जानबूझकर वंचित रख रहा है। उन्होंने बेहद तीखे और कड़े लहजे में कहा कि इस कल्याणकारी नीति को सही ढंग से लागू न करके भाजपा सरकार ने राज्य निर्माण के इन महान आंदोलनकारियों के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात और धोखा किया है, जिसे राज्य की जनता कभी माफ नहीं करेगी। इस पूरे सियासी घमासान और आंदोलनकारियों के हक-हकूक से जुड़ी ऐसी ही तमाम गरमा-गरम, प्रामाणिक और पल-पल बदलती खबरों की हर छोटी-बड़ी लाइव अपडेट के लिए आप लगातार हमारे साथ बने रहिए, हम आपको हर हलचल से रूबरू कराते रहेंगे।





