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इंसानी लालच और कंक्रीट के गगनचुंबी जंगलों की भेंट चढ़ी प्रकृति की बेमिसाल खूबसूरती

तरक्की की अंधी और बेलगाम दौड़ में बेदर्दी से ऊंचे उड़ते मानव ने नन्हीं गौरैया और पहाड़ों का वजूद मिटाकर जीवनदायिनी नदियों तथा ममतामयी पृथ्वी को खून के आंसू रोने पर मजबूर कर दिया।

रामनगर(सुनील कोठारी)। ब्रह्मांड के अनंत अंचल में नील गगन के नीचे सांस लेती इस सुजलाम-सुफलाम वसुंधरा पर जब विकास की अंधी और बेलगाम दौड़ शुरू हुई, तो किसी ने यह नहीं सोचा था कि इंसान की यह तरक्की एक दिन प्रकृति के विनाश का सबसे खौफनाक और बदनुमा दस्तावेज बन जाएगी। वक्त के बदलते पहिए के साथ आधुनिक समाज का संवेदनहीन चेहरा पूरी तरह बेनकाब हो चुका है और इंसानी लालच के उस स्याह पहलू पर से पर्दा उठ गया है जिसके चलते कभी इंसानी बस्तियों के आंगन की रौनक बढ़ाने वाली नन्हीं और चुलबुली गौरैया आज कंक्रीट के गगनचुंबी जंगलों के बीच कहीं पूरी तरह से गुम हो चुकी है। प्राचीन काल से ही जब इस धरती पर जीवन की शुरुआत हुई थी, तब प्रकृति और मानव के बीच एक बेहद खूबसूरत, गहरा और अटूट संतुलन बना हुआ था, जहां प्रकृति दाता थी और मनुष्य उसका सम्मान करने वाला एक अदना सा हिस्सा था। लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, इंसान के भीतर छिपे विकास के राक्षस ने अपने पंख फैलाने शुरू किए और वह आसमान की ऊंचाइयों को छूने की चाहत में अंधा होकर इतनी क्रूरता और बेदर्दी से ऊपर उड़ा कि उसने नीचे चहकने वाले मासूम परिंदों के अस्तित्व को ही पूरी तरह मिटा दिया, जिसके परिणामस्वरूप आज हमारी प्यारी और नन्हीं गौरैया इस आधुनिक दुनिया की चकाचौंध में हमेशा के लिए कहीं खो गई है।

इस बेहद दर्दनाक दास्तान के अगले पड़ाव पर जब नजर जाती है, तो वहां सदियों से अडिग खड़े विशालकाय और सीना ताने पहरेदार की तरह सुरक्षा करने वाले ऊंचे पर्वतों की बर्बादी की एक बेहद डरावनी तस्वीर साफ दिखाई देती है। इतिहास गवाह है कि इस धरती पर कभी एक विशाल, शांत और बर्फ की सफेद चादर ओढ़े गौरवशाली पहाड़ हुआ करता था और उसके साये में सुकून से अपनी जिंदगी बसर करने वाला एक आम आदमी होता था, जो अपनी हर जरूरत के लिए उस पर्वतराज के आगे नतमस्तक रहता था। मगर आधुनिकता के नशे में चूर और मशीनों की ताकत से लैस इस स्वार्थी आदमी ने अपनी ताकत और अहंकार का ऐसा खौफनाक प्रदर्शन किया कि उसने उन पवित्र पर्वतों के सीने को बारूद से छलनी करना शुरू कर दिया और अपनी सुख-सुविधाओं के लिए उनके वजूद को ही चुनौती दे डाली। आज वह आदमी उन प्राचीन पर्वतों के सामने इस कदर अकड़कर, तनकर और क्रूरता के साथ सीना तानकर खड़ा हो गया है कि उन ऊंचे पर्वतों की ऊंचाई भी छोटी पड़ गई है और सदियों पुराना वह विशाल पहाड़ आज इंसानी क्रूरता के आगे बेबस, लाचार और अपनी अंतिम सांसें गिनता हुआ महज एक मूक गवाह बनकर रह गया है।

प्रकृति के विनाश की इस खौफनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली हकीकत में आगे पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसती दुनिया और दम तोड़ती जलधाराओं की उस जलती हुई दास्तान का जिक्र आता है जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान का कलेजा मुंह को आ जाए। बीते कल की सुनहरी यादों को खंगालें तो इस धरती पर कभी कल-कल छल-छल के मधुर संगीत के साथ अविरल बहने वाली एक पावन और जीवनदायिनी नदी हुआ करती थी, जिसके तट पर अपनी प्यास बुझाने और अपनी सभ्यता को जीवन देने वाला एक कृतज्ञ आदमी निवास करता था। लेकिन औद्योगिक क्रांति और शहरीकरण के इस तथाकथित आधुनिक युग में उस आदमी के भीतर लालच और स्वार्थ का एक ऐसा तेज वेग, अंधा प्रवाह और विनाशकारी जुनून सवार हुआ कि उसने उस पवित्र जलधारा को केवल और केवल कचरा फेंकने का नाला समझ लिया। इंसानी लालच, फैक्ट्रियों के जहरीले रसायनों और अनियंत्रित दोहन के इस भयानक वेग ने जल की उस अविरल और पवित्र धारा का दम इस कदर घोंट दिया कि सदियों से सबको जीवन बांटने वाली वह मुस्कुराती हुई नदी आज हमेशा-हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गई है, और उसकी सूखी हुई तलहटी इंसानी बेरहमी की गवाही दे रही है।

इस कहानी का अगला हिस्सा उस हरियाली की मौत का मातम मनाता नजर आता है जिसने कभी इस धरती को स्वर्ग जैसा सुंदर और सांस लेने लायक शुद्ध वातावरण प्रदान किया था। इस दुनिया के शुरुआती दिनों में जब चारों तरफ सिर्फ खुशहाली थी, तब एक विशाल, छायादार और फल-फूलों से लदा हुआ हरा-भरा पेड़ हुआ करता था और उसकी ठंडी छांव में बैठकर अपनी थकान मिटाने वाला तथा उसकी ऑक्सीजन पर जिंदा रहने वाला एक आदमी हुआ करता था। मगर जैसे-जैसे समय का पहिया घूमा, उस आदमी के सिर पर अपनी सुख-सुविधाओं को बढ़ाने और जंगलों को साफ करके आलीशान इमारतें खड़ी करने का ऐसा पागलपन भरा भूत सवार हुआ कि वह विनाश के नशे में झूमने लगा। वह स्वार्थी और अंधा आदमी प्रकृति के विनाश के इस खौफनाक नाच में इतनी तेजी और पागलपन के जोर से झूमा कि उसने उन हरे-भरे वनों की बलि चढ़ा दी और कुल्हाड़ियों के बेरहम प्रहारों से उस जीवनदाता वनस्पति को इस कदर सुखा दिया कि आज वह हरा-भरा पेड़ पूरी तरह से सूखकर एक कंकाल में तब्दील हो चुका है।

इस महाविनाश और इंसानी क्रूरता की यह गाथा जब अपने अंतिम और सबसे संवेदनशील पड़ाव पर पहुंचती है, तो समूचे ब्रह्मांड को कंपा देने वाली एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने आती है जिसे देखकर दुनिया के बड़े-बड़े विचारकों और नीति-निर्धारकों के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें उभर आती हैं। सृष्टि के प्रारंभ में जीवन के तमाम रंगों को अपने भीतर समेटे हुए एक बेहद खूबसूरत, शांत और हरी-भरी पृथ्वी हुआ करती थी और उसकी गोद में एक अबोध, संतोषी और सीधा-साधा आदमी शांतिपूर्वक निवास करता था। लेकिन समय के साथ उस आदमी के भीतर आधुनिकता, परमाणु हथियारों की होड़ और औद्योगिक प्रदूषण का ऐसा विनाशकारी पहिया घूमा कि उसने इस पूरी धरती को एक दहकते हुए बारूद के ढेर पर लाकर खड़ा कर दिया। वह आदमी विकास की अंधी भूलभुलैया में इतने जोर से, इतनी बेरहमी से और इतनी बेलगाम रफ्तार से घूमा कि इस अत्यधिक शोषण, प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग के अत्याचारों से तंग आकर अंततः हमारी वह ममतामयी पृथ्वी दर्द के मारे बुरी तरह से रो पड़ी।

इस दिल दहला देने वाली और भावुक कर देने वाली दास्तान का सबसे खौफनाक मोड़ तब आता है जब यह पूरी प्रकृति और खुद यह घायल पृथ्वी अपने आंसुओं के समंदर में डूबकर एक बहुत बड़ा और तीखा सवाल इस पूरी मानव सभ्यता के सामने खड़ा करती है। आज इंसानी लालच के कारण लहूलुहान हो चुकी यह पृथ्वी अपने वजूद के मिटने के डर से इस कदर रो पड़ी है कि उसके आंसुओं की बाढ़ में आज का पूरा विज्ञान और तकनीक असहाय नजर आ रहे हैं। यह दुखी और जख्मी पृथ्वी आज अपने अतीत को याद करके और इंसान की इस बदली हुई शक्ल को देखकर इस बात पर फूट-फूटकर रो पड़ी है कि कभी बीते हुए सुनहरे दौर में इस धरती पर सचमुच एक संवेदनशील, दयालु और प्रकृति से प्रेम करने वाला आदमी हुआ करता था। आज का इंसान तो केवल एक हाड़-मांस का पुतला और विनाश की मशीन बनकर रह गया है, जिसके भीतर से इंसानियत, दया और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना पूरी तरह मर चुकी है, और यही सोचकर आज यह पूरी धरती मां अपने सबसे प्रिय बच्चे यानी उसी आदमी के खो जाने के गम में लगातार आंसू बहा रही है।

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