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सात दिवसीय संस्कृत सम्भाषण शिविर का प्रमाणपत्र वितरण के साथ हुआ बेहद भव्य समापन

मुख्य अतिथि प्रो. मोहन चन्द्र पाण्डेय ने देववाणी को समस्त ज्ञान-विज्ञान का आधार बताते हुए आधुनिक युग में इसकी महत्ता को रेखांकित किया और छात्र-छात्राओं ने संस्कृत में प्रस्तुत किए बेहतरीन कार्यक्रम।

रामनगर। देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नगरी रामनगर के शैक्षणिक गलियारे से एक बेहद सुखद और भारतीय सनातन परंपरा को मजबूत करने वाली भव्य खबर सामने आ रही है जहाँ संस्कृत-भारती उत्तरांचल की रामनगर इकाई के तत्वावधान में आयोजित सात दिनों का विशेष संस्कृत-सम्भाषण-शिविर आज पूरे जोश और वैदिक गूंज के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। इस ऐतिहासिक और ज्ञानवर्धक भाषाई महाकुंभ का मुख्य आयोजन स्थानीय पीएमश्री राजकीय बालिका इण्टर काॅलेज, रामनगर परिसर में स्थित नेताजी सुभाषचंद्र बोस बालिका छात्रावास के भव्य और सुसज्जित सभागार के भीतर किया गया था जहाँ बीते सात दिनों से छात्राओं और प्रतिभागियों को देववाणी संस्कृत का गहन व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा था। समापन समारोह के इस विशेष और गरिमामयी अवसर पर मंच पर आसीन मुख्य अतिथियों और विशिष्ट जनों द्वारा शिविर का प्रशिक्षण पूरा करने वाले सभी प्रतिभावान छात्र-छात्राओं और प्रतिभागियों को उनकी इस बड़ी उपलब्धि के लिए उज्जवल भविष्य की शुभकामनाओं के साथ आधिकारिक प्रमाणपत्र और आकर्षक पुरस्कार वितरित किए गए जिससे पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

इस भव्य समापन सत्र को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए पीएनजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रामनगर के अत्यंत विद्वान और लोकप्रिय प्राचार्य प्रो. मोहन चन्द्र पाण्डेय ने उपस्थित जनसमूह और विद्यार्थियों के भीतर एक नई वैचारिक ऊर्जा का संचार किया। उन्होंने अपने बेहद ओजस्वी और ज्ञानवर्धक संबोधन में सीधे तौर पर इस बात को रेखांकित किया कि संस्कृत महज़ एक भाषा नहीं है बल्कि हमारी इस पावन संस्कृत में ही ब्रह्मांड का समस्त उन्नत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान पूरी तरह से समाहित है। अपने कड़क और आकर्षक वक्तव्य को आगे बढ़ाते हुए प्रख्यात शिक्षाविद् ने बेहद तार्किक अंदाज में कहा कि आज के इस आधुनिक युग में भी संस्कृत भाषा का व्यावहारिक ज्ञान हर एक इंसान के लिए बेहद अनिवार्य और समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है। उन्होंने साफ शब्दों में समझाया कि देववाणी संस्कृत भाषा का भौगोलिक और वैचारिक क्षेत्र इतना अधिक व्यापक और विशाल है कि मानव समाज का अर्थशास्त्र, आधुनिक विज्ञान, शास्त्रीय संगीत, पारंपरिक नृत्य और ललित कला आदि विधाओं में से किसी का भी गूढ़ ज्ञान संस्कृत के बिना कभी भी पूर्ण या समृद्ध नहीं हो सकता।

समारोह के भीतर अपनी विशिष्ट गरिमा की उपस्थिति दर्ज कराते हुए विशिष्ट अतिथि के पद से उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद् के सम्मानित संयुक्त सचिव, सी. पी. रतूड़ी ने भी विद्यार्थियों का हौसला बढ़ाया और देववाणी के प्रचार-प्रसार के लिए जमीनी स्तर पर बड़े कदम उठाने की वकालत की। उन्होंने आधुनिक दौर में संस्कृत भाषा के सम्यक् और समग्र विकास के लिए इस प्रकार के अल्पकालिक और दीर्घकालिक सम्भाषण-शिविरों की निरंतर आवश्यकता और महत्ता को मजबूती के साथ रेखांकित किया। शिक्षा जगत के इस कद्दावर अधिकारी ने अपने अनुभव को साझा करते हुए एक बेहद गहरी और सार्वभौमिक बात कही कि किसी भी जीवित भाषा की असली ताकत और उसकी जीवन्तता मूल रूप से समाज के आम लोगों द्वारा किए जाने वाले उसके निरंतर व्यावहारिक सम्भाषण और आपसी बोलचाल में ही पूरी तरह से निहित होती है। अगर हमें संस्कृत को दोबारा विश्व पटल पर स्थापित करना है, तो हमें इसे किताबों के पन्नों से बाहर निकालकर अपनी रोज़मर्रा की बातचीत का हिस्सा बनाना ही होगा, तभी इस तरह के बड़े और सराहनीय भाषाई शिविरों का असली सामाजिक उद्देश्य धरातल पर पूरी तरह से सफल हो पाएगा।

इससे पहले, कार्यक्रम के शानदार और औपचारिक शुभारंभ के दौरान शिविर के कुशल संयोजक डाॅ. सत्यप्रकाश मिश्र ने मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथियों को सम्मानपूर्वक ताजे और सुगंधित पुष्पगुच्छ भेंटकर पूरी आयोजन समिति की तरफ से उनका बेहद आदरपूर्ण और गर्मजोशी से स्वागत-अभिनंदन किया। स्वागत परंपरा को पूरा करने के तुरंत बाद उन्होंने मंच से सात दिनों तक चले इस विशेष शिविर की तमाम बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धियों के साथ-साथ बच्चों के भीतर आए भाषाई बदलावों की रिपोर्ट पर विस्तार से प्रकाश डाला। पूरे कार्यक्रम को अपनी बेहतरीन आवाज और कड़क शैली से बांधते हुए डाॅ. आशुतोष सती ने मंच का बेहद कुशल, आकर्षक और सुव्यवस्थित ढंग से संचालन संपन्न किया जिसके तहत उन्होंने एक के बाद एक सांस्कृतिक कार्यक्रमों को मंच पर आमंत्रित किया। इस समारोह की सबसे बड़ी और आकर्षक खूबसूरती यह रही कि शिविर के छोटे-छोटे प्रतिभागियों ने मंच पर आकर पूरी तरह से शुद्ध संस्कृत-सम्भाषण के माध्यम से कई शानदार लघु नाटक, कविताएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए, जिसे साक्षात अपनी आंखों से लाइव देखकर वहां बैठे सभी अतिथि दंग रह गए और उन्होंने माना कि सात दिनों के भीतर बच्चों ने वाकई अद्भुत भाषाई योग्यता हासिल की है।

इसी गरिमामयी समारोह के बीच अपनी बात रखते हुए महाविद्यालय के बेहद सम्मानित असिस्टेंट प्रोफेसर संस्कृत एवं मुख्य अतिथि वक्ता डाॅ. मूलचन्द्र शुक्ल ने विद्यार्थियों को भविष्य के लिए एक बेहद कड़ा और जरूरी गुरुमंत्र दिया। उन्होंने अपने संक्षिप्त लेकिन बेहद प्रभावशाली वक्तव्य में पूर्ण विश्वास जताते हुए कहा कि उन्हें यह पूरी उम्मीद है कि शिविर से विदा होने के बाद ये सभी प्यारे बच्चे संस्कृत सम्भाषण का नियमित प्रयोग अपने दैनिक जीवन में माता-पिता, भाई-बहनों और मित्रों के साथ परस्पर बातचीत के दौरान अवश्य करते रहेंगे। उन्होंने बच्चों को समझाया कि भाषा को याद रखने का एकमात्र तरीका अभ्यास है और लगातार बातचीत के अभ्यास द्वारा ही देववाणी संस्कृत का देशव्यापी प्रचार, प्रसार, संरक्षण एवं संवर्धन पूरी तरह से संभव है। उनके सुर में सुर मिलाते हुए विद्यालयीय शिक्षा परिषद् के वरिष्ठ शोध अधिकारी डाॅ. रामचंद्र पाण्डेय ने भी सभागार में मौजूद सभी छात्र-छात्राओं को विशेष रूप से सम्बोधित किया। उन्होंने बेहद संजीदगी के साथ यह कड़ा तर्क दिया कि उन्हें पूरा भरोसा है कि ये सभी होनहार बच्चे आने वाले दिनों में समाज के बीच जाकर अपने बेहतरीन संस्कृत-सम्भाषण और अच्छे आचरण द्वारा पूरे देश को सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रवाद का एक बेहद अनूठा और सकारात्मक सन्देश देंगे।

इस बेहद सफल और ऐतिहासिक सात दिवसीय संस्कृत चेतना कार्यक्रम के बिल्कुल अंतिम पड़ाव में आकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस बालिका छात्रावास की कर्मठ वार्डेन सीमा आर्या ने मंच पर आकर अपनी मधुर आवाज में समारोह में पधारे सभी शीर्ष अतिथियों, प्रबुद्ध वक्ताओं, अभिभावकों और सहयोगियों का इस सफल आयोजन के लिए ह्रदय की गहराइयों से आभार व्यक्त किया और धन्यवाद ज्ञापन पढ़ा। इस बेहद भव्य और गरिमामयी समापन समारोह के ऐतिहासिक क्षणों को अपनी गरिमामयी उपस्थिति से चार चांद लगाने के लिए क्षेत्र के कई गणमान्य लोग भी मुख्य रूप से मौजूद रहे जिनमें मुख्य रूप से दर्शन सिंह, जागरूक महिला पूजा रावत, मानसी अग्रवाल, अंजली अधिकारी, होनहार छात्रा स्नेहा, मेघा राणा, शिवानी, सुनीता और शिक्षाविद् नीलम वर्मा आदि अग्रिम पंक्ति में पूरे समय उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित जनों और अध्यापकों ने एक सुर में देववाणी के संवर्धन का संकल्प लिया और कॉलेज प्रबंधन ने सभी आगंतुकों को धन्यवाद देते हुए इस बात की पुष्टि की कि आने वाले समय में भी रामनगर की पावन धरती पर ऐसे बड़े और क्रांतिकारी भाषाई आयोजन लगातार और भी ज्यादा बड़े पैमाने पर आयोजित किए जाते रहेंगे।

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