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सरकारी नाकामी की आग में झुलसी जनता और बैकफुट पर आई तेल कंपनियां

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की औंधे मुंह गिरी कीमतों के बावजूद घरेलू बाजार में आम जनता पर थोपी गई इस बेतहाशा मूल्य वृद्धि ने केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों और नियंत्रण तंत्र को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।

भारत(सुनील कोठारी)। भारत की आम जनता को एक बार फिर से महंगाई के उस भीषण दौर में धकेल दिया गया है, जहां से वापसी का कोई रास्ता फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। सोमवार की अलसुबह जब पूरा देश अपने दैनिक कामकाज के लिए जाग रहा था, ठीक उसी वक्त सरकारी तेल कंपनियों ने आम आदमी की जेब पर एक और सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में आग लगा दी। इस ताजा और अप्रत्याशित फैसले के तहत पेट्रोल के दामों में सीधे 2.61 रुपये प्रति लीटर की एकतरफा वृद्धि कर दी गई, जबकि डीजल की कीमतों को भी 2.71 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ा दिया गया। पिछले मात्र दस दिनों के भीतर यह चौथा ऐसा मौका है जब देश के नागरिकों को ईंधन की बढ़ती कीमतों का यह कड़वा घूंट पीने पर मजबूर किया गया है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार की उन आर्थिक नीतियों और नियंत्रण तंत्र की नाकामी को उजागर करती है, जो जनता को राहत देने के बजाय तेल कंपनियों को खुली छूट देकर मूकदर्शक बनी बैठी है। देश की राजधानी नई दिल्ली में अब इस बेतहाशा बढ़ोतरी के बाद पेट्रोल का भाव आसमान छूते हुए 102.12 रुपये प्रति लीटर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है, वहीं माल ढुलाई और कृषि क्षेत्र की रीढ़ माना जाने वाला डीजल भी 95.20 रुपये प्रति लीटर के डरावने आंकड़े को पार कर चुका है।

इस अभूतपूर्व आर्थिक बोझ को समझने के लिए हमें पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम पर नजर डालनी होगी, क्योंकि यह कोई अचानक हुआ फैसला नहीं है बल्कि एक सोची-समझी क्रमिक मार है। इससे पहले भी देशवासियों को 15 मई और फिर 23 मई को इसी तरह की असहनीय मूल्य वृद्धियों का सामना करना पड़ा था, जिसने मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के बजट को पूरी तरह से तहस-नहस कर के रख दिया था। इस निरंतर हो रही मूल्य वृद्धि के पीछे केंद्र सरकार और उसके नीति नियंता पूरी तरह से वैश्विक तनाव, होर्मुज स्ट्रेट संकट तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्पन्न हुई सप्लाई बाधाओं को जिम्मेदार ठहराकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा विरोधाभास और सरकारी दावों की पोल तब खुल जाती है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें फिलहाल पिछले दो सप्ताह के सबसे निचले स्तर पर रिकॉर्ड की जा रही हैं। जब दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें घट रही हैं, तब भारत के भीतर घरेलू बाजार में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाना सीधे तौर पर केंद्र सरकार की प्रशासनिक विफलता और जनविरोधी रुख को ही प्रदर्शित करता है, जिससे आम जनता पर महंगाई का दबाव लगातार एक असहनीय सीमा तक बढ़ता जा रहा है।

यदि हम इस पूरी स्थिति की बहुत ही बारीक और निष्पक्ष समीक्षा करें, तो यह साफ हो जाता है कि सरकार ने देश की जनता को अंतरराष्ट्रीय ताकतों और तेल विपणन कंपनियों के रहमों-करम पर लावारिस छोड़ दिया है। होर्मुज स्ट्रेट संकट का रोना रोकर जनता की गाढ़ी कमाई को टैक्स और ऊंचे दामों के जरिए लूटना अब एक स्थापित परिपाटी बन चुका है, जबकि वास्तविकता यह है कि सरकार चाहती तो अपने भारी-भरकम एक्साइज टैक्स को कम करके आम आदमी को एक बहुत बड़ी राहत दे सकती थी। जब ब्रेंट क्रूड की अंतरराष्ट्रीय दरें नीचे आ रही थीं, तब कायदे से देश के भीतर भी ईंधन के दाम कम होने चाहिए थे, ताकि बाजार में चौतरफा फैल रही इस महंगाई के दबाव को कुछ कम किया जा सकता। मगर सरकारी तेल कंपनियों ने सोमवार सुबह जो रवैया अपनाया, उसने यह साबित कर दिया कि व्यवस्था को लोक कल्याण से कोई सरोकार नहीं रह गया है। नई दिल्ली जैसी मुख्य नगरी में जब पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये हो जाए, तो इसका सीधा असर केवल वाहन चालकों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि देश के सुदूर हिस्सों में रहने वाले उन गरीब परिवारों पर भी पड़ता है जिनके राशन और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें माल ढुलाई महंगी होने के कारण अपने आप बढ़ जाती हैं।

महंगाई के इस नए दौर ने भारतीय समाज के हर तबके को एक गहरी चिंता और मानसिक अवसाद में डाल दिया है, क्योंकि पिछले दस दिनों में चार बार तेल की कीमतें बढ़ाना कोई सामान्य घटना नहीं है। इस निरंतर जारी आर्थिक प्रहार के कारण अब रसोई से लेकर परिवहन तक सब कुछ आम लोगों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। जब 15 और 23 मई को कीमतें बढ़ाई गई थीं, तब भी देश की जनता ने इस उम्मीद में चुप्पी साधे रखी थी कि शायद अब यह सिलसिला यहीं थम जाएगा और सरकार कुछ हस्तक्षेप करेगी। परंतु सोमवार सुबह पेट्रोल में 2.61 रुपये और डीजल में 2.71 रुपये की इस नई छलांग ने जनता के उस भरोसे को पूरी तरह से तोड़ दिया है जो उसने अपनी चुनी हुई सरकार पर जताया था। आर्थिक विश्लेषक भी इस बात से हैरान हैं कि वैश्विक तनाव और सप्लाई बाधाओं का बहाना बनाकर घरेलू बाजार को इस तरह क्यों लूटा जा रहा है, जबकि कच्चे तेल के वैश्विक सूचकांक कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। इस पूरी क्रोनोलॉजी को देखें तो यह स्पष्ट है कि केंद्र सरकार देश की अर्थव्यवस्था को संभालने और अपने नागरिकों को वित्तीय सुरक्षा चक्र प्रदान करने में पूरी तरह से नाकाम साबित हुई है।

समीक्षात्मक दृष्टि से देखा जाए तो इस ईंधन संकट और मूल्य वृद्धि ने केंद्र सरकार के उन सभी दावों की हवा निकाल दी है जिनमें आर्थिक स्थिरता और आम आदमी के विकास की बातें जोर-शोर से की जाती थीं। नई दिल्ली के बाजारों से लेकर आम रिहायशी इलाकों तक आज सिर्फ इसी बात की चर्चा है कि आखिर एक आम कमाऊ व्यक्ति इतने भारी आर्थिक दबाव के बीच अपनी गृहस्थी को कैसे चलाए। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई नरमी का फायदा जब घरेलू उपभोक्ताओं को नहीं मिलता, तो जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस नीतिगत विफलता के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए। होर्मुज स्ट्रेट संकट या कोई भी अन्य वैश्विक व्यवधान निश्चित रूप से अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित करता है, लेकिन एक संप्रभु और मजबूत सरकार का यह दायित्व होता है कि वह अपने देश की जनता पर इन बाहरी झटकों का असर न पड़ने दे। इसके विपरीत, यहाँ तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सरकारी तेल कंपनियों को खुली छूट देकर जनता की जेब से पैसा निकालने का एक नया जरिया ढूंढ लिया गया है, जिससे चौतरफा हाहाकार मचा हुआ है और महंगाई का यह हिंसक चक्रव्यूह लगातार मजबूत होता जा रहा है।

इस समूचे घटनाक्रम का सबसे दुखद पहलू यह है कि डीजल में की गई 2.71 रुपये की भारी बढ़ोतरी सीधे तौर पर हमारे कृषि प्रधान देश के किसानों और माल ढुलाई करने वाले ट्रक ऑपरेटरों की कमर तोड़ देगी। डीजल महंगा होने का मतलब है कि आने वाले दिनों में फल, सब्जियां, दूध, दवाइयां और रोजमर्रा के इस्तेमाल की हर छोटी-बड़ी चीज की कीमतों में एक नया उछाल देखने को मिलेगा, जिससे आम जनता पर महंगाई का दबाव पहले के मुकाबले कई गुना ज्यादा बढ़ जाएगा। 15 और 23 मई की बढ़ोतरी का असर अभी बाजार पूरी तरह से संभाल भी नहीं पाया था कि सोमवार सुबह के इस नए झटके ने व्यापारियों और उपभोक्ताओं दोनों को पूरी तरह से पस्त कर दिया है। नई दिल्ली में पेट्रोल का 102.12 रुपये प्रति लीटर पर पहुंचना केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह केंद्र सरकार की उस लचर आर्थिक रणनीति का जीता-जागता प्रमाण है जो देश को एक गहरे संकट की ओर धकेल रही है। वैश्विक तनाव और सप्लाई बाधाओं का हवाला देकर अपनी कमियों को छिपाने का खेल अब ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता, क्योंकि धरातल पर जनता अब इस असहनीय मूल्य वृद्धि के खिलाफ पूरी तरह से आक्रोशित हो चुकी है और व्यवस्था से जवाब मांग रही है।

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