उत्तराखण्ड(सुनील कोठारी)। देहरादून की सियासी फिजाओं में इन दिनों एक बेहद सनसनीखेज और दिलचस्प सुगबुगाहट तैर रही है, जो उत्तराखंड की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के भीतर मचे आंतरिक घमासान को साफ बयां कर रही है। वर्ष 2027 में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर सूबे की राजनीति का पारा अभी से सातवें आसमान पर पहुंच चुका है और बीजेपी के सामने इस बार कोई बाहरी दल नहीं बल्कि खुद उसके अपने ही कद्दावर नेता एक महा-चुनौती बनकर खड़े हो रहे हैं। एक तरफ जहां शीर्ष नेतृत्व साल 2022 के पिछले चुनावों में हारी हुई सीटों को हर हाल में वापस जीतने के लिए बेहद आक्रामक और गुप्त रणनीतियां तैयार करने में दिन-रात जुटा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के भीतर कुनबे का लगातार बढ़ता आकार अब संगठन के नीति-निर्धारकों के लिए गले की हड्डी बनता जा रहा है। टिकटों के बंटवारे को लेकर मचे इस अंदरूनी घमासान ने बीजेपी आलाकमान की रातों की नींद और दिन का चैन पूरी तरह से छीन लिया है क्योंकि हर एक विधानसभा सीट पर टिकट के दावेदारों की एक लंबी-चौड़ी फौज खड़ी हो चुकी है, जिसे संभालना किसी जलते हुए कोयले को हाथ में पकड़ने जैसा साबित हो रहा है।
इस बार उत्तराखंड की सियासत में टिकट वितरण की यह पूरी प्रक्रिया बीजेपी के लिए किसी भी लिहाज से फूलों की सेज साबित नहीं होने वाली है बल्कि यह कांटों भरा एक ऐसा सफर है जिसमें अपनों को संतुष्ट रखना सबसे बड़ा इम्तिहान होगा। वर्तमान सिटिंग विधायकों की सुरक्षित मानी जाने वाली सीटों पर पार्टी के ही दूसरे रसूखदार नेताओं ने अपनी पैनी नजरें गड़ा दी हैं और वे किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे हैं, जिसने पार्टी के भीतर एक बड़े गृहयुद्ध के संकेत दे दिए हैं। पिछले चार वर्षों के कार्यकाल के दौरान मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दलों को छोड़कर भारी संख्या में वरिष्ठ और दिग्गज नेताओं ने पाला बदलकर बीजेपी का दामन थामा था और अब ये तमाम आयातित नेता आगामी 2027 के महासंग्राम में चुनावी टिकट के लिए अपनी सबसे मजबूत और दावेदारी पेश कर रहे हैं। इनके साथ ही सालों से पार्टी के लिए दरी बिछाने वाले विभिन्न निगमों व बोर्डों के दायित्व धारी, प्रदेश संगठन के रसूखदार पदाधिकारी और जमीनी कार्यकर्ता भी अपनी उपेक्षा से नाराज होकर इस बार आर-पार की लड़ाई के मूड में चुनावी दौड़ में पूरी ताकत से कूद पड़े हैं।
हालात इस कदर विस्फोटक और बेकाबू हो चुके हैं कि राज्य की कई महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों पर वर्तमान में काबिज सिटिंग विधायकों के ठीक सामने उनकी ही पार्टी के भीतर से दो-दो और तीन-तीन बेहद रसूखदार और आर्थिक रूप से संपन्न प्रतिद्वंद्वी पूरी मुस्तैदी से अपनी गोटियां बिछा रहे हैं। इस अभूतपूर्व और विकट परिस्थिति में बिना किसी बगावत के टिकटों का पारदर्शी और सर्वमान्य आवंटन करना बीजेपी संगठन और प्रांतीय हाईकमान के लिए एक ऐसी अग्निपरीक्षा बन चुका है जिससे पार पाना नामुमकिन सा लग रहा है। नगर निगमों और पालिकाओं को संभालने वाले पार्टी के लगभग पांच से छह बेहद रसूखदार और ताकतवर मेयरों ने इस बार सीधे तौर पर विधानसभा चुनाव लड़ने की अपनी प्रबल इच्छा सार्वजनिक रूप से जाहिर करके सीधे सिटिंग विधायकों को चुनौती दे डाली है। काशीपुर विधानसभा सीट की बात करें तो वहां के स्थानीय मेयर दीपक बाली ने इस बार विधानसभा चुनाव लड़ने का खुला मन बना लिया है और उनके तेवरों से साफ है कि वे इस बार किसी भी कीमत पर पीछे हटने वाले नहीं हैं।

इसी कड़ी में एक और बड़ा सियासी धमाका हुआ है जहां कोटद्वार नगर निगम के मौजूदा मेयर शैलेंद्र रावत ने यमकेश्वर विधानसभा सीट से चुनावी समर में उतरने का पूरा मन बना लिया है और वे लगातार क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ाकर सिटिंग विधायक की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। इस सियासी रेस में ट्विस्ट तब आया जब रुद्रपुर के बेहद आक्रामक मेयर विकास शर्मा ने भी यमकेश्वर विधानसभा सीट से ही चुनाव लड़ने की रेस में कूदकर अपनी दावेदारी ठोक दी है, जिससे एक ही सीट पर कई बड़े सूरमा आपस में टकराने को मजबूर हो चुके हैं। सीमांत जनपद पिथौरागढ़ की बात करें तो वहां की कद्दावर महिला मेयर कल्पना देवलाल भी इस बार विधानसभा के टिकट के लिए अपनी तीव्र इच्छा और दावेदारी पार्टी फोरम के सामने खुलकर जाहिर कर चुकी हैं। इनके अलावा एक और रसूखदार मेयर गजराज बिष्ट भी विधानसभा चुनाव के इस महामुकाबले में अपनी किस्मत आजमाने के लिए पूरी तरह से बेताब नजर आ रहे हैं और उन्होंने भी टिकट पाने के लिए देहरादून से लेकर दिल्ली तक अपनी लॉबिंग को बेहद तेज कर दिया है।
टिकट की चाह रखने वाले इन रसूखदार मेयरों के अलावा उत्तराखंड सरकार में विभिन्न पदों पर सुशोभित दायित्व धारियों और संगठन के बड़े चेहरों की लंबी सूची ने भी पार्टी आलाकमान के माथे पर गहरी चिंता की लकीरें खींच दी हैं। बीजेपी के समर्पित और वरिष्ठ नेताओं में शुमार विनय रोहिला, दिनेश मेहरा, कैलाश पंत, गोविंद पिलखवाल, भूपेश उपाध्याय और हेमराज सिंह बिष्ट जैसे कद्दावर चेहरे इस समय विधानसभा चुनाव का टिकट हासिल करने की अंधी दौड़ में सबसे आगे दिखाई दे रहे हैं। इन तमाम अंदरूनी चुनौतियों और बगावती सुरों के बीच पार्टी के वरिष्ठ विधायक विनोद चमोली ने एक बड़ा बयान देकर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की है कि किसी भी चुनाव में सिटिंग विधायक ही हमेशा संगठन की पहली और स्वाभाविक प्राथमिकता होते हैं। विनोद चमोली का साफ तौर पर तर्क है कि यदि कोई वर्तमान विधायक किन्हीं अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण स्वयं चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर नहीं करता है, केवल उसी सूरत में पार्टी अन्य नए और ऊर्जावान चेहरों पर गंभीरता से विचार करेगी।
पार्टी के भीतर मचे इस घमासान पर वरिष्ठ नेताओं का यह भी कहना है कि जहां हमारे सिटिंग विधायक मौजूद हैं, वहां स्वाभाविक तौर पर सबसे पहले उन्हीं के नाम और काम को तरजीह दी जाएगी क्योंकि उन्होंने पांच साल तक क्षेत्र की जनता की सेवा की है। हालांकि, अगर कोई ऐसी विशेष परिस्थिति बनती है जहां कोई विधायक खुद लिखित में दे दे कि वह इस बार चुनावी समर में उतरने का इच्छुक नहीं है, तभी संगठन किसी अन्य विकल्प को तलाशेगा और यह भी देखा जाएगा कि किस चेहरे को मैदान में उतारकर पार्टी सबसे आसानी से सीट को अपनी झोली में डाल सकती है। बीजेपी की यह अंदरूनी चिंता सिर्फ टिकट मांगने वालों की लंबी कतार तक ही महदूद नहीं है बल्कि प्रांतीय संगठन को इस बात का भी गहरा अंदेशा सता रहा है कि टिकट न मिलने की सूरत में ये महत्वाकांक्षी नेता दोबारा पाला बदलकर विपक्षी दलों में शामिल हो सकते हैं। संगठन को सबसे बड़ा डर इस बात का है कि यदि इन बागी नेताओं को टिकट नहीं मिला, तो ये चुनाव के ऐन वक्त पर पार्टी के घोषित प्रत्याशी के खिलाफ पर्दे के पीछे से भितरघात जैसी आत्मघाती स्थिति पैदा कर सकते हैं।

यही सबसे बड़ी वजह है कि भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष संगठन अभी से सक्रिय होकर संभावित बगावत को रोकने और डैमेज कंट्रोल करने की कवायद में पूरी शिद्दत से जुट गया है ताकि ऐन वक्त पर कोई बड़ा नुकसान न हो सके। पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि जो सीटें वर्तमान में खाली हैं या जिन सीटों पर पिछले चुनाव में हार मिली थी, यदि वहां नए चेहरों के आने से जीत की शत-प्रतिशत संभावनाएं बनती हैं, तो उनके नाम पर बेहद गंभीरता और खुले मन से विचार किया जाएगा। बीजेपी के बड़े नेताओं का दावा है कि पूर्व में पार्टी ने हमेशा बड़ा दिल दिखाते हुए आगे बढ़कर विपक्षी दलों से आए हर नेता का हाथ थामा है और उन्हें संगठन व सरकार में बहुत बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियों से नवाजा भी है। वर्तमान में सब लोग एकजुट होकर संगठन के काम में लगे हुए हैं, इसलिए जब भविष्य में टिकट वितरण की बात आएगी तो निश्चित तौर पर ऐसे जिताऊ लोगों पर भी विचार होगा जो आज की तारीख में पार्टी को विजयश्री दिला सकते हैं और जहां हमारे पास पहले से कोई मजबूत विकल्प मौजूद नहीं है।
फिलहाल के राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो उत्तराखंड बीजेपी की पूरी नजर लगातार तीसरी बार प्रचंड बहुमत के साथ सूबे की सत्ता में ऐतिहासिक वापसी कर अपनी जीत की शानदार हैट्रिक लगाने पर टिकी हुई है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि इस बार बीजेपी के लिए असली और सबसे कठिन चुनौती बिखरे हुए विपक्ष को हराना कतई नहीं है, बल्कि अपने ही भरे-पूरे कुनबे के भीतर दिन-प्रतिदिन उफान मार रही व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को कुशलतापूर्वक संभालना है। ऐसे में अब यह देखना बेहद दिलचस्प और रोमांचक होगा कि क्या बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व आगामी टिकट वितरण के इस बेहद पेचीदा गुणा-भाग और जोड़-तोड़ में सब कुछ पूरी तरह से बैलेंस कर पाएगा या फिर अपनों की यह अति-महत्वाकांक्षा उसके हैट्रिक लगाने के सुनहरे सपने को बिखेर कर रख देगी।





