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उक्रांद में छिड़ा महासंग्राम सुरेंद्र कुकरेती के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव और बगावत से हिला उत्तराखंड का सियासी गलियारा

आठ जिलाध्यक्षों की बर्खास्तगी और विवादित अभिनेत्री की एंट्री से भड़के कार्यकर्ताओं ने केंद्रीय नेतृत्व पर लगाया भाजपा से गुप्त सांठगांठ का संगीन आरोप और अब आर-पार की जंग के बीच तख्तापलट की तैयारी हुई तेज।

देहरादून। उत्तराखंड के राजनैतिक गलियारों में उस वक्त भूचाल आ गया जब क्षेत्रीय अस्मिता की मशाल थामने वाले उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के भीतर का लावा अचानक फूट पड़ा। पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में मची इस भारी उथल-पुथल ने अब एक निर्णायक और बेहद तीखे विद्रोह का रूप अख्तियार कर लिया है, जिससे दल के भविष्य पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। दरअसल, दिल्ली प्रदेश समेत आठ महत्वपूर्ण जनपदों के जिलाध्यक्षों और उनकी पूरी जिला कार्यकारिणियों को जिस तरह से अचानक और कथित तौर पर असंवैधानिक रूप से भंग किया गया, उसने कार्यकर्ताओं के सब्र का बांध पूरी तरह से तोड़ दिया है। जिन पदाधिकारियों ने वर्षों तक जमीन पर पसीना बहाकर उक्रांद के जनाधार को सींचा था, वे अब खुलेआम बगावती तेवर अपनाते हुए केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ लामबंद हो गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि कार्यकर्ताओं में यह संदेश भी गया है कि शीर्ष स्तर पर लिए गए निर्णय पार्टी के हितों के बजाय निजी एजेंडे से प्रेरित हो सकते हैं, जिससे उत्तराखंड के इस ऐतिहासिक दल की साख दांव पर लग गई है।

इस विवाद की तपिश उस वक्त और बढ़ गई जब नाराज पदाधिकारियों ने केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती पर बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाते हुए सीधे तौर पर मोर्चा खोल दिया। बागियों का स्पष्ट कहना है कि पार्टी के भीतर कुछ ऐसी शक्तियां सक्रिय हो गई हैं जो राष्ट्रीय दलों, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी के साथ पर्दे के पीछे से सांठगांठ कर रही हैं। प्रदर्शनकारी नेताओं का दावा है कि सुरेंद्र कुकरेती कुछ ऐसे तत्वों के प्रभाव में काम कर रहे हैं जिन्हें वे राष्ट्रीय दलों का “दलाल” करार दे रहे हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य उत्तराखंड क्रांति दल के बढ़ते प्रभाव को रोकना और उसे भीतर से खोखला करना है। इन आरोपों ने पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच गहरा अविश्वास पैदा कर दिया है, क्योंकि यूकेडी की स्थापना ही राष्ट्रीय दलों के वर्चस्व के खिलाफ क्षेत्रीय अधिकारों की रक्षा के लिए हुई थी। अब जब नेतृत्व पर ही विपक्षी दलों से मिलीभगत के आरोप लग रहे हैं, तो निचले स्तर का कार्यकर्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है, जिससे संगठन के भीतर एक तरह का गृहयुद्ध छिड़ने की स्थिति पैदा हो गई है।

बगावत की इस आग में घी डालने का काम हाल ही में एक विवादित अभिनेत्री उर्मिला सनावर की पार्टी में हुई अचानक एंट्री ने किया है, जिसे लेकर कार्यकर्ताओं का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ पदाधिकारियों को पूरी तरह से अंधेरे में रखकर जिस तरह से उर्मिला सनावर को पार्टी के मंच पर न केवल सम्मानित किया गया बल्कि उन्हें आनन-फानन में सदस्यता भी दिलाई गई, उसे संगठन के भीतर एक “राजनैतिक तमाशा” माना जा रहा है। उक्रांद के निष्ठावान खेमे का तर्क है कि जिस दल ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान नैतिकता और सिद्धांतों की लड़ाई लड़ी, वहां इस तरह के विवादित चेहरों को बिना किसी चर्चा के जगह देना पार्टी की विचारधारा का अपमान है। इस फैसले ने संगठन के भीतर अनुशासन की धज्जियां उड़ा दी हैं और कई दिग्गज नेताओं ने इसे पार्टी की गरिमा को धूमिल करने वाला कदम बताया है, जिसके कारण नेतृत्व के खिलाफ अविश्वास की भावना और अधिक प्रबल हो गई है।

वर्तमान में उक्रांद के भीतर जो राजनैतिक परिदृश्य बन रहा है, वह किसी बड़े तख्तापलट की ओर स्पष्ट संकेत दे रहा है क्योंकि असंतुष्ट खेमा अब केवल बयानबाजी तक सीमित रहने के मूड में नहीं दिख रहा है। पार्टी के भीतर से छनकर आ रही खबरों और विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो, जिन 8 जिलाध्यक्षों को पदमुक्त किया गया है, वे अपने समर्थकों के साथ मिलकर केंद्रीय अध्यक्ष के खिलाफ एक व्यापक रणनीति तैयार कर चुके हैं और बहुत जल्द उनके खिलाफ आधिकारिक तौर पर अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है। यह कदम सुरेंद्र कुकरेती के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा क्योंकि विरोध करने वाले पदाधिकारी केवल दिल्ली ही नहीं बल्कि उत्तराखंड के कई महत्वपूर्ण जनपदों में मजबूत पकड़ रखते हैं। यदि यह अविश्वास प्रस्ताव सफल होता है या फिर विरोध का यह सिलसिला इसी तरह जारी रहता है, तो उत्तराखंड क्रांति दल दो फाड़ हो सकता है, जो आगामी चुनावों की दृष्टि से पार्टी के लिए आत्मघाती सिद्ध होगा। फिलहाल, देहरादून से लेकर दिल्ली तक बैठकों का दौर जारी है और असंतुष्ट गुट का एक ही स्वर है कि तानाशाही और बाहरी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

इस पूरे घटनाक्रम ने उक्रांद के कार्यकर्ताओं के मनोबल को तगड़ा झटका दिया है, जो लंबे समय से राज्य के ज्वलंत मुद्दों को लेकर संघर्ष कर रहे थे और अब उन्हें अपनी ही पार्टी के भीतर आंतरिक कलह से जूझना पड़ रहा है। जिस “पहाड़ की आवाज” बनने का दावा यह दल करता आया है, आज उसकी अपनी ही आवाज आपसी कलह के शोर में दबती हुई नजर आ रही है। दिल्ली प्रदेश की कार्यकारिणी को भंग करना विशेष रूप से इसलिए भी चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि वहां प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच पार्टी अपनी पकड़ मजबूत कर रही थी, लेकिन इस फैसले ने वहां के संगठन को शून्य पर लाकर खड़ा कर दिया है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि केंद्रीय नेतृत्व ने जल्द ही नाराज धड़े को विश्वास में नहीं लिया और उर्मिला सनावर जैसे विवादित फैसलों पर स्पष्टीकरण नहीं दिया, तो उक्रांद का यह आंतरिक असंतोष एक बड़े बिखराव में तब्दील हो सकता है, जिससे पार्टी की नींव हिल सकती है। फिलहाल पूरी नजरें अब बागियों के अगले कदम और केंद्रीय नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं।

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