काशीपुर। द्रोण की नगरी में सदियों से आयोजित होने वाला सुप्रसिद्ध चैती मेला आज अपने अस्तित्व और पहचान की रक्षा के लिए एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है। उत्तर भारत के सांस्कृतिक मानचित्र पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाला यह मेला, जो कभी आस्था, परंपरा और सामाजिक सौहार्द का जीवंत उदाहरण हुआ करता था, अब प्रशासनिक जटिलताओं और अंधाधुंध बाजारीकरण की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है। स्थानीय जनमानस और व्यापारियों के बीच इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है कि जिस मेले ने कभी लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित किया, वह अब केवल ऊंचे टेंडरों और राजस्व वसूली का एक माध्यम बनकर रह गया है। 2018 के बाद से जब से प्रशासन ने इस मेले की बागडोर अपने हाथों में ली है, तब से इसकी रूहानियत और पारंपरिक चमक फीकी पड़ती जा रही है। आज स्थिति यह है कि आम आदमी के लिए इस मेले का आनंद लेना उसकी जेब पर भारी पड़ने लगा है, जिसके कारण मेले की रौनक साल-दर-साल कम होती जा रही है।
माता बाल सुंदरी की असीम अनुकंपा और बोक्सा समुदाय की गहरी अटूट आस्था का केंद्र माने जाने वाले इस पवित्र आयोजन का स्वरूप अब व्यावसायिकता के दलदल में धंसता जा रहा है। टेंडर प्रक्रिया की जो होड़ वर्ष 2018 में शुरू हुई थी, वह 2026 तक आते-आते लगभग 4 करोड़ रुपये के भारी-भरकम आंकड़े तक पहुंच चुकी है, जिसने मेले के पूरे आर्थिक ढांचे को हिलाकर रख दिया है। ऊंचे दामों पर ठेके छूटने का सीधा परिणाम यह हुआ है कि दुकानदारों को अपनी छोटी-सी जगह के लिए मोटी रकम चुकानी पड़ रही है, जिसकी भरपाई वे ग्राहकों से ऊंचे दाम वसूल कर कर रहे हैं। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि प्रशासन की इस कार्यप्रणाली ने मेले के उस मूल वजूद को खतरे में डाल दिया है, जो कभी इस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर हुआ करता था। श्रद्धालुओं की घटती संख्या इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि लोग अब मेले की इस नई और महंगी संस्कृति से खुद को कटा हुआ महसूस कर रहे हैं।
विगत वर्षों के इतिहास पर नजर डालें तो चैती मेले के प्रबंधन को लेकर तब बड़ा बदलाव आया था जब पंडा परिवार के बीच आंतरिक विवाद उत्पन्न हुआ था। उस संकटपूर्ण स्थिति में मेले के कुशल संचालन की जिम्मेदारी कुछ समय के लिए काशीपुर नगर निगम को सौंपी गई थी, लेकिन यह व्यवस्था अधिक समय तक टिक नहीं सकी। तत्कालीन जिलाधिकारी ने एक नया आदेश पारित करते हुए एसडीएम को मेला अधिकारी नियुक्त कर दिया और बागडोर फिर से प्रशासनिक हाथों में सौंप दी। तभी से टेंडर प्रक्रिया की एक ऐसी अंतहीन प्रतिस्पर्धा शुरू हुई जिसने मेले को ‘लाभ-हानि’ के तराजू पर तौलना शुरू कर दिया। जानकारों का कहना है कि प्रशासन का मुख्य केंद्र केवल अधिकतम राजस्व प्राप्त करना बन गया है, जबकि मेले के सांस्कृतिक गौरव और आम जनता की सहूलियतें हाशिए पर धकेल दी गई हैं। इसी प्रशासनिक नियंत्रण के चलते आज व्यापारी और स्थानीय नागरिक इस व्यवस्था के खिलाफ लामबंद होने लगे हैं।

काशीपुर नगर निगम के पक्ष में तर्क देते हुए स्थानीय प्रबुद्ध वर्ग और सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह प्रबल मानना है कि एक लोकतांत्रिक संस्था होने के नाते निगम स्थानीय जनभावनाओं और क्षेत्रीय आवश्यकताओं को प्रशासन की तुलना में कहीं अधिक बेहतर ढंग से समझ सकता है। जब कोई आयोजन सीधे तौर पर नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में होता है, तो उसके पास यह अधिकार होता है कि वह टेंडर की दरों को केवल मुनाफे के दृष्टिकोण से न देखकर, जनहित और सांस्कृतिक संरक्षण के आधार पर निर्धारित करे। महापौर दीपक बाली के नेतृत्व में निगम प्रशासन जिस प्रकार शहर के विकास कार्यों को गति दे रहा है, उसे देखते हुए जनता को यह पूर्ण विश्वास है कि निगम के हाथों में मेला जाने से न केवल अव्यवस्थाओं का अंत होगा, बल्कि दुकानदारों पर पड़ने वाला भारी-भरकम आर्थिक बोझ भी स्वतः ही कम हो जाएगा। निगम के पास अपनी सफाई व्यवस्था, प्रकाश प्रबंध और स्वयं का ढांचा उपलब्ध है, जिससे मेले के प्रबंधन की लागत को न्यूनतम किया जा सकता है। यदि संचालन का यह दायित्व नगर निगम को मिलता है, तो अधिशेष राजस्व का उपयोग भी सीधे तौर पर शहर के विकास और मेले की सुविधाओं को विश्वस्तरीय बनाने में किया जा सकेगा, जो वर्तमान में प्रशासनिक फाइलों और सरकारी खजाने के बीच उलझकर रह जाता है।
चैती मेले की महत्ता केवल व्यापारिक लेन-देन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वह मंच है जहां विभिन्न समुदायों के लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान साझा करते हैं। विशेष रूप से बोक्सा जनजाति के लिए यह मेला उनकी आराध्य देवी माता चैती की पूजा-अर्चना और सामाजिक मिलन का सबसे बड़ा केंद्र है। लेकिन विडंबना देखिए कि आज टेंडर के करोड़ों रुपये के खेल में वह पारंपरिक सादगी कहीं खो गई है। पहले जहां सैकड़ों की संख्या में दूर-दराज से आए व्यापारी अपनी विशिष्ट वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाते थे, वहां अब दुकानों की घटती संख्या चिंता का विषय बन गई है। यदि मेले का स्वरूप इसी प्रकार व्यावसायिक होता रहा, तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल एक महंगे बाजार के रूप में देखेंगी, न कि एक महान सांस्कृतिक विरासत के रूप में। इसीलिए अब समय आ गया है कि सरकार और प्रशासन जनभावनाओं का सम्मान करते हुए इस दिशा में कोई ठोस और सकारात्मक निर्णय लें।
सांस्कृतिक अस्मिता की इस लड़ाई में अब व्यापारी वर्ग भी खुलकर सामने आ गया है, क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति इस बदलते स्वरूप के कारण बुरी तरह प्रभावित हुई है। छोटे दुकानदारों का कहना है कि प्रशासन द्वारा तय की गई दरें इतनी अधिक हैं कि वे अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रहे हैं, जिससे इस ऐतिहासिक मेले से उनका मोहभंग हो रहा है। आर्थिक लाभ न होने के कारण कई पुराने परिवारों ने, जो पीढ़ियों से यहां दुकान लगाते थे, अब किनारा करना शुरू कर दिया है। लोगों का मानना है कि नगर निगम को बागडोर मिलने से न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, बल्कि मेले का वह पारंपरिक वजूद भी बच पाएगा जिसे ‘उत्तर भारत का गौरव’ कहा जाता था। अब गेंद प्रशासन के पाले में है कि क्या वह राजस्व के आंकड़ों को तरजीह देता है या काशीपुर की इस महान ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को विलुप्त होने से बचाने के लिए इसे जन-प्रतिनिधियों के हाथों में सौंपता है।





