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गगन कंबोज का कांग्रेस प्रेम पड़ा भारी और मनोज पाल ने दिखाया बाहर का रास्ता

युवा कांग्रेस के सारिम सैफी को बधाई देने वाले गगन कंबोज की चुप्पी पर भड़के भाजपा जिला अध्यक्ष मनोज पाल और अनुशासन का डंडा चलाते हुए सार्वजनिक वीडियो जारी कर पार्टी से उनकी विदाई तय कर दी।

काशीपुर। उत्तराखंड की शांत वादियों में बसी काशीपुर की सियासत इन दिनों भीषण गर्मी के पारा चढ़ने से पहले ही उबाल पर है, जहां रिश्तों की गर्माहट और पार्टी की विचारधारा के बीच एक ऐसी जंग छिड़ गई है जिसने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। भारतीय जनता पार्टी के भीतर अनुशासन का डंडा अब उस समय चलता दिखाई दे रहा है जब अपनों के ही अपनों के प्रति उमड़े प्रेम ने संगठन की जड़ों में मट्ठा डालने का काम किया है। पूरा मामला उत्तराखंड युवा कांग्रेस के हालिया संगठनात्मक चुनावों से शुरू होता है, जिसमें सारिम सैफी ने काशीपुर जिला अध्यक्ष पद पर अपनी शानदार जीत दर्ज की थी, लेकिन उनकी इस जीत का जश्न कांग्रेस के गलियारों से ज्यादा भाजपा के खेमों में चर्चा का विषय बन गया। इस जीत के तुरंत बाद गगन कंबोज का एक वीडियो सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों पर बिजली की गति से वायरल होने लगा, जिसमें वह नवनिर्वाचित युवा कांग्रेस अध्यक्ष सारिम सैफी को बड़े ही गर्मजोशी के साथ बधाई और शुभकामनाएं देते नजर आ रहे थे। जैसे ही यह वीडियो भाजपा के आलाकमान और स्थानीय नेतृत्व की नजरों में आया, वैसे ही अनुशासन की दुहाई देते हुए काशीपुर की राजनीति में एक नया भूचाल आ गया और यह सवाल खड़ा हो गया कि क्या विचारधारा अब केवल कागजों तक ही सीमित रह गई है।

भारतीय जनता पार्टी के काशीपुर जिला अध्यक्ष मनोज पाल ने इस पूरे प्रकरण को बेहद गंभीरता से लिया और इसे अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा मानते हुए तुरंत हरकत में आए, क्योंकि एक तरफ भाजपा का कार्यकर्ता कांग्रेस की जीत पर जश्न मनाए, यह बात संगठन के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी। मनोज पाल ने बिना किसी देरी के गगन कंबोज को एक औपचारिक पत्र प्रेषित किया, जिसमें उनसे बेहद कड़े लहजे में यह पूछा गया कि भाजपा का एक सक्रिय सदस्य होने के बावजूद उन्होंने विपक्षी दल के प्रत्याशी सारिम सैफी को सार्वजनिक रूप से बधाई देने का साहस कैसे किया। इस पत्र के माध्यम से भाजपा जिला अध्यक्ष ने साफ तौर पर गगन कंबोज से उनकी मंशा स्पष्ट करने को कहा था और यह जानने की कोशिश की थी कि आखिर उनकी निष्ठा किस दल के प्रति है, क्योंकि राजनीति में वैचारिक मतभेद के बावजूद इस तरह का प्रेम प्रदर्शन पार्टी की छवि को धूमिल करता है। मनोज पाल ने इस पत्र में सात दिनों की एक निश्चित समय सीमा तय की थी, ताकि गगन कंबोज अपना पक्ष रख सकें और यह बता सकें कि क्या उनके इस कृत्य के पीछे कोई व्यक्तिगत कारण थे या फिर वे भाजपा की विचारधारा से किनारा कर चुके हैं, जिससे पार्टी के भीतर मचे इस असंतोष को शांत किया जा सके।

समय का पहिया अपनी रफ्तार से घूमता रहा और गगन कंबोज के लिए दी गई वह सात दिनों की मोहलत भी बीत गई, लेकिन भाजपा कार्यालय को उनके पक्ष से कोई संतोषजनक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ, जिससे मामला और भी ज्यादा पेचीदा और गंभीर होता चला गया। गगन कंबोज की इस रहस्यमयी चुप्पी ने भाजपा के जिला नेतृत्व को और भी अधिक आक्रामक होने पर मजबूर कर दिया, क्योंकि किसी भी अनुशासित संगठन में नेतृत्व के पत्र का जवाब न देना सीधे तौर पर चुनौती माना जाता है। जब निर्धारित अवधि समाप्त हो गई और गगन कंबोज ने अपनी मंशा व्यक्त करने की जहमत नहीं उठाई, तो जिला अध्यक्ष मनोज पाल ने एक बार फिर मोर्चा संभाला और इस बार उन्होंने सीधे जनता और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी बात रखने के लिए एक वीडियो संदेश जारी किया। इस वीडियो में मनोज पाल के चेहरे पर स्पष्ट रूप से नाराजगी और अनुशासन को लेकर चिंता देखी जा सकती थी, जिसमें उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पत्र का जवाब न देना ही अपने आप में एक जवाब है, जो यह दर्शाता है कि संबंधित व्यक्ति को अब संगठन की मर्यादाओं की कोई परवाह नहीं रह गई है।

भाजपा जिला अध्यक्ष मनोज पाल ने अपने ताजा वीडियो वक्तव्य में बेहद तल्ख लहजे में खुलासा किया कि हमने गगन कंबोज जी को एक विधिवत पत्र प्रेषित कर उनसे उनकी स्थिति स्पष्ट करने का पूरा अवसर दिया था, लेकिन उन्होंने इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। मनोज पाल ने वीडियो में जोर देकर कहा कि हमने उन्हें सात दिनों का पर्याप्त समय दिया था ताकि वे अपनी निष्ठा और भाजपा में बने रहने की इच्छा के बारे में अवगत करा सकें, परंतु उस समय सीमा के उपरांत भी उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया न आना यह सिद्ध करता है कि वे अब पार्टी के प्रति समर्पित नहीं हैं। जिला अध्यक्ष ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि आज की तिथि तक की स्थिति को देखते हुए यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि गगन कंबोज अब भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता या सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निभाने के इच्छुक नहीं दिखते हैं। उनका यह मौन उनकी उस मंशा पर मुहर लगाता है कि वे अब पार्टी की रीति-नीति से खुद को अलग कर चुके हैं और सारिम सैफी को दी गई वह बधाई महज एक संयोग नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा कदम था जिसने भाजपा की सांगठनिक शक्ति को चुनौती दी है।

काशीपुर की राजनीति के इस हाई-प्रोफाइल ड्रामे ने अब एक नया मोड़ ले लिया है, जहां एक तरफ कांग्रेस के सारिम सैफी अपनी जीत का आनंद ले रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा के भीतर गगन कंबोज और मनोज पाल के बीच छिड़ी यह “लेटर वॉर” और वीडियो संदेशों की जंग ने कार्यकर्ताओं को दोफाड़ कर दिया है। शहर के चौक-चौराहों पर अब केवल इसी बात की चर्चा है कि क्या गगन कंबोज का कांग्रेस प्रेम उन्हें भाजपा से निष्कासन की ओर ले जाएगा या फिर भाजपा उन्हें खुद से अलग मानकर अब औपचारिक कार्रवाई की तैयारी में है। मनोज पाल के इस कड़े रुख ने यह संदेश तो दे दिया है कि पार्टी में अनुशासन के साथ कोई समझौता नहीं होगा, लेकिन अब देखना यह होगा कि क्या गगन कंबोज इस सार्वजनिक बयानबाजी के बाद अपनी चुप्पी तोड़ते हैं या फिर काशीपुर की सियासत में किसी नए बड़े उलटफेर की पटकथा लिखी जाने वाली है। फिलहाल, भाजपा जिला अध्यक्ष के इस वीडियो ने आग में घी डालने का काम किया है और आने वाले दिनों में यह विवाद और भी ज्यादा गरमाने के आसार नजर आ रहे हैं, जिससे सत्ताधारी दल के भीतर की अंदरूनी कलह सतह पर आ गई है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि गगन कंबोज द्वारा सारिम सैफी को दी गई वह बधाई केवल एक व्यक्तिगत संबंध का प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि इसके पीछे उत्तराखंड की युवा राजनीति के गहरे समीकरण छिपे हो सकते हैं जो आने वाले चुनावों में समीकरण बदल सकते हैं। मनोज पाल जिस तरह से इस मुद्दे पर अड़े हुए हैं, उससे यह भी प्रतीत होता है कि भाजपा अब किसी भी कीमत पर कैडर के भीतर अनुशासनहीनता को पनपने नहीं देना चाहती, खासकर जब बात विपक्षी दल के साथ नजदीकियों की हो। काशीपुर के इस सियासी दंगल में अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पार्टी का प्रदेश नेतृत्व इस पूरे मामले में क्या हस्तक्षेप करता है और गगन कंबोज के राजनीतिक भविष्य का ऊंट किस करवट बैठता है। जिस तरह से जिला अध्यक्ष ने स्पष्ट कर दिया है कि अब उन्हें भाजपा का अंग नहीं माना जा सकता, उससे यह साफ है कि काशीपुर की राजनीति की यह “हॉट” खबरें अभी और भी कई दिनों तक अखबारों की सुर्खियां और सोशल मीडिया की बहस का मुख्य केंद्र बनी रहेंगी।

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