हरिद्वार। धर्मनगरी के हरिपुर कला क्षेत्र से सामने आई एक हृदयविदारक सच्चाई ने ‘नमामि गंगे’ और ‘स्वच्छ गंगा’ के उन तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी है, जिन पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने का दावा किया जाता है। जानकारी के अनुसार, हरिपुर कला क्षेत्र के प्रेम विहार चौक से निकलने वाला एक विशाल और बदबूदार गंदा नाला अपनी पूरी गंदगी और विषाक्तता के साथ सीधे मां गंगा की मुख्य धारा में समाहित हो रहा है। विडंबना यह है कि यह दूषित और जहरीला पानी यहाँ से बहते हुए आगे सप्तऋषि घाट, गीता कुटीर घाट, परमार्थ निकेतन घाट जैसे उन अति-महत्वपूर्ण स्नान स्थलों से गुजरता है, जहाँ हर रोज हजारों श्रद्धालु श्रद्धाभाव से डुबकी लगाते हैं। यही गंदा जल अंततः आस्था के सर्वोच्च केंद्र ‘हर की पौड़ी’ तक पहुंचता है, जहाँ कुंभ के महापर्व पर करोड़ों सनातनी भक्त और नागा संन्यासी अमृत स्नान की अभिलाषा लेकर दुनिया के कोने-कोने से आते हैं। क्या प्रशासन इस बात से अनभिज्ञ है कि जिस जल को आचमन के योग्य माना जाता है, उसमें गटर का पानी मिलाना न केवल पर्यावरण का विनाश है, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं और उनकी धार्मिक मर्यादा के साथ एक अत्यंत क्रूर मजाक है?
हरिपुर कला के इस विशेष क्षेत्र में तकनीकी योजना और प्रशासनिक क्रियान्वयन के बीच का जो भयानक अंतर दिखाई देता है, वह किसी भी जागरूक नागरिक को विचलित करने के लिए पर्याप्त है। इस इलाके में लगभग 80 प्रतिशत सीवर लाइन बिछाई जा चुकी है, फिर भी गंदे नालों का प्रवाह आज भी अनवरत जारी है। यहाँ एक बड़ा और बुनियादी सवाल यह उठता है कि जब करोड़ों की लागत से सीवर प्रोजेक्ट तैयार किए जा रहे थे, तो क्या इन घातक नालों को मास्टर प्लान में चिन्हित करने में जानबूझकर लापरवाही बरती गई? यदि इन नालों की पहचान पहले ही हो चुकी थी, तो उन्हें अब तक मुख्य सीवर नेटवर्क से जोड़कर शोधन संयंत्रों (STP) तक क्यों नहीं पहुँचाया गया? और यदि इन नालों को योजना का हिस्सा ही नहीं बनाया गया, तो फिर इतनी बड़ी विकास योजना के डिजाइन पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यह सरकारी खजाने का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है, जहाँ एक तरफ घाटों को सुंदर दिखाने के लिए पैसा बहाया जा रहा है और दूसरी तरफ वही घाट गंदे पानी की चपेट में हैं?

जब इस गंभीर प्रशासनिक चूक के संदर्भ में जिम्मेदार अधिकारियों को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई, तो हमेशा की तरह ‘जिम्मेदारी टालने’ का वह पुराना और निराशाजनक खेल शुरू हो गया, जो सरकारी तंत्र की पहचान बन चुका है। पेयजल निगम की परियोजना प्रबंधक मीनाक्षी मित्तल ने इस मामले पर एक अत्यंत औपचारिक और रटा-रटाया जवाब देते हुए कहा कि वे जल्द ही अपने कनिष्ठ अधिकारियों को भेजकर मौके का निरीक्षण करवाएंगी और रिपोर्ट तैयार की जाएगी। उन्होंने आगे की जिम्मेदारी से बचते हुए गेंद अधिशासी अभियंता के पाले में डाल दी। दूसरी ओर, उत्तराखंड जल संस्थान के अधिशासी अभियंता हरीश बंसल ने यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि उनका विभाग केवल उन परियोजनाओं का संचालन और रखरखाव करता है जिन्हें निर्माण एजेंसी द्वारा उन्हें पूर्ण करके सौंपा जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई नाला गंगा में गिर रहा है, तो उसे बंद कर सीवर लाइन से जोड़ने की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी पेयजल निगम की है। विभागों के बीच की यह खींचतान और एक-दूसरे पर दोषारोपण की नीति आज गंगा की दुर्दशा की सबसे बड़ी वजह है, जबकि कुंभ जैसा महा-आयोजन दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।
पिछले एक दशक का इतिहास खंगाला जाए, तो गंगा की सफाई के नाम पर नमामि गंगे और अन्य क्षेत्रीय योजनाओं के तहत हजारों करोड़ रुपये की धनराशि को ठिकाने लगाया जा चुका है, लेकिन जमीनी स्तर पर आज भी कई स्थानों पर हालात 20वीं सदी जैसे ही बने हुए हैं। हाल ही में आई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने भी उत्तराखंड में नमामि गंगे के क्रियान्वयन में भारी अनियमितताओं, दोषपूर्ण एसटीपी डिजाइन और नालों को टैप न कर पाने की विफलता को उजागर किया है। यह रिपोर्ट बताती है कि किस प्रकार एसटीपी अपनी क्षमता से अधिक लोड झेल रहे हैं या फिर बिना किसी घरेलू कनेक्शन के बेकार पड़े हैं। विकास के नाम पर हरिद्वार में कंक्रीट के विशाल घाट तो बन गए, लेकिन गंगा की अविरलता और निर्मलता आज भी फाइलों के बोझ और अधिकारियों के बयानों तक ही सीमित नजर आती है। कुंभ 2027 में जब दुनिया भर के कैमरे और करोड़ों आंखें हरिद्वार की ओर होंगी, तो क्या सरकार उन्हें यह जवाब दे पाएगी कि मोक्षदायिनी के जल में गटर का पानी क्यों मिल रहा है?

आगामी 2027 का महाकुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भारत की आध्यात्मिक शक्ति और ‘सॉफ्ट पावर’ का वैश्विक प्रदर्शन है। अगर दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक जमावड़े में श्रद्धालु दूषित जल में स्नान करने को मजबूर होते हैं, तो यह न केवल भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को भारी नुकसान पहुँचाएगा, बल्कि ‘अमृत स्नान’ की पवित्र अवधारणा को भी धूमिल कर देगा। हरिद्वार और आसपास के क्षेत्रों से गंगा में गिरने वाले हर छोटे-बड़े नाले को जब तक पूर्ण रूप से सील नहीं किया जाता, तब तक 700 करोड़ के सौंदर्यीकरण का कोई मूल्य नहीं है। प्रशासन को यह समझना होगा कि कुंभ की भव्यता पत्थर के घाटों से नहीं, बल्कि गंगा की शुचिता और उसकी लहरों की पवित्रता से तय होती है। यदि सरकार वास्तव में मां गंगा को ‘निर्मल’ देखना चाहती है, तो उसे कागजी निरीक्षणों से बाहर निकलकर युद्ध स्तर पर इन नालों को बंद करने का अभियान छेड़ना होगा और दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी।
अब यह देखना शेष है कि क्या प्रशासन इस गंभीर चेतावनी को स्वीकार कर गंगा की मर्यादा की रक्षा करेगा या फिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के बीच गंदे नालों का यह जहर यूं ही बहता रहेगा। चारधाम यात्रा की शुरुआत के साथ ही हरिद्वार में भारी भीड़ जुटने वाली है, और यदि यही स्थिति रही, तो श्रद्धालुओं का गुस्सा प्रशासन पर भारी पड़ सकता है। सरकार के लिए यह केवल एक तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास की रक्षा की एक अग्निपरीक्षा है। हरिद्वार का बच्चा-बच्चा आज यही पूछ रहा है कि आखिर कब तक गंगा मैया के आंचल को सीवर के पानी से मैला किया जाता रहेगा? क्या 2027 के कुंभ में हमें वास्तव में वही निर्मल और दिव्य गंगा देखने को मिलेगी जिसका वादा हर चुनाव और हर योजना में किया जाता है, या फिर यह भी एक चुनावी जुमला बनकर रह जाएगा? समय कम है और चुनौतियां अपार, अब निर्णय और क्रियान्वयन की बारी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और उनके प्रशासनिक अमले की है।





