रामनगर।विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क की तलहटी में बसे रामनगर के शांत और सुरम्य सीमावर्ती ग्रामीण अंचलों में इन दिनों सूरज के ढलते ही सन्नाटा नहीं पसरता, बल्कि एक अनजाना, रोंगटे खड़े कर देने वाला खौफ पूरी फिजा में अपनी पैठ बना लेता है, क्योंकि जंगल के इन बेखौफ और खूंखार दरिंदों ने अब इंसानी बस्तियों के भीतर घुसकर उन्हें अपना नया शिकारगाह बनाना शुरू कर दिया है। ताजा और रोंगटे खड़े कर देने वाला यह मामला रामनगर के समीपवर्ती कानियां गांव के हृदय स्थल से सामने आया है, जहाँ बीती काली अंधेरी रात में एक विशालकाय और बेहद फुर्तीले गुलदार की निडर चहलकदमी ने पूरे क्षेत्र की जनता के बीच दहशत का एक ऐसा सैलाब ला दिया है जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। जंगल की गहरी ओट और घनी रिहायशी बस्तियों के बीच की वह महीन और धुंधली होती सरहदों का सबसे जीवंत और डरावना प्रमाण तब मिला जब इस शातिर शिकारी जानवर की एक-एक घातक हरकत वहां लगे सीसीटीवी कैमरे की तीसरी पैनी नजर में डिजिटल रूप से कैद हो गई। इस रोंगटे खड़े कर देने वाले फुटेज के सार्वजनिक होते ही पूरे रामनगर क्षेत्र के ग्रामीणों की रातों की सुकून भरी नींद और दिन का चैन पूरी तरह से काफूर हो गया है, क्योंकि अब यह साफ़ तौर पर सिद्ध हो चुका है कि मौत का साया किसी भी अंधेरे मोड़ पर घात लगाए बैठा है और वह किसी भी वक्त, किसी के भी मासूम घर की कच्ची या पक्की दहलीज को बड़ी ही आसानी से पार कर सकता है, जिससे व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
आधी रात के उस वीरान और खामोश सन्नाटे को चीरते हुए यह खूंखार जंगली मेहमान भाजपा सोशल मीडिया प्रभारी नीमा पांडे के निजी आवास के ठीक बाहर काफी देर तक मौत का एक अदृश्य जाल बुनता हुआ कैमरे में साफ नजर आया, जिसे देखकर आज किसी भी बहादुर व्यक्ति के रोंगटे खड़े होना स्वाभाविक है। सीसीटीवी फुटेज के विचलित कर देने वाले दृश्यों में बड़ी ही स्पष्टता के साथ यह देखा जा सकता है कि यह आदमखोर प्रवृत्ति वाला गुलदार बिना किसी मानवीय डर या रत्ती भर की झिझक के नीमा पांडे के घर के मुख्य लोहे के द्वार और आसपास की ऊँची दीवारों के पास काफी समय तक मंडराता रहा, मानो वह किसी शिकार की गंध सूंघकर उसकी टोह ले रहा हो या फिर इस रिहायशी इलाके को अपना ही प्राकृतिक शिकार क्षेत्र मानकर वहां की रेकी कर रहा हो। फुटेज में गुलदार की वह विशिष्ट चित्तीदार शारीरिक बनावट, उसकी गठीली मांसपेशियां और उसकी वे दो चमकदार, पीली आँखें घोर अंधेरे में किसी जलते हुए दहकते अंगारे की तरह जलती हुई प्रतीत हो रही थीं, जो यह बताने के लिए काफी थीं कि वह कितना शक्तिशाली, धैर्यवान और पलक झपकते ही हमला करने वाला खुंखार शिकारी है। इस अप्रत्याशित घटना ने नीमा पांडे के पूरे परिवार समेत उनके आस-पास के पूरे मोहल्ले और कॉलोनी को गहरे मानसिक सदमे और डर के माहौल में धकेल दिया है, क्योंकि जिस आंगन में दिनभर नन्हे बच्चे बेफिक्र होकर खेलते हैं और शाम को बुजुर्ग टहलते हैं, वहां एक हिंसक जानवर का इस कदर बेखौफ घूमना किसी बहुत बड़ी और हृदयविदारक अनहोनी का स्पष्ट और अंतिम चेतावनी संकेत दे रहा है।
रामनगर के तराई-भाबर क्षेत्रों और घने जंगलों की सीमा से लगे हुए गांवों के लिए वन्यजीवों का यह बेधड़क दखल अब कोई नई, अनोखी या पहली बार होने वाली चौंकाने वाली बात नहीं रह गई है, बल्कि यह एक ऐसी कड़वी और जानलेवा हकीकत बन चुकी है जिससे यहाँ का हर ग्रामीण हर रोज अपनी जान हथेली पर रखकर दो-चार होता है। पिछले काफी लंबे समय से स्थानीय स्तर पर यह निरंतर देखा और महसूस किया जा रहा है कि गुलदार जैसे शातिर शिकारी अब भोजन और स्वच्छ पानी की तलाश में अपने मूल प्राकृतिक जंगलों को छोड़कर घनी आबादी वाली रिहायशी गलियों की खाक छान रहे हैं, जहाँ बंधे हुए पालतू कुत्ते, गलियों में घूमने वाले आवारा सियार और बाड़ों में कैद मवेशी उनके लिए बहुत ही आसान और बिना मेहनत वाले निवाले बन जाते हैं। कानियां और इसके आसपास के तमाम छोटे-बड़े इलाकों में रात ढलते ही आवारा कुत्तों का बेवजह और डरावना भौंकना अब कोई सामान्य घटना नहीं रह गई है, बल्कि यह वहां रहने वाले इंसानों के लिए इस बात का सायरन जैसा संकेत होता है कि कोई खूंखार शिकारी काली झाड़ियों के पीछे अपनी अगली छलांग के लिए घात लगाकर बैठा है। वन्यजीव विशेषज्ञों का भी यह स्पष्ट मानना है कि जंगलों के भीतर बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप, अवैध खनन और शिकार की भारी कमी के कारण ये शक्तिशाली शिकारी अब मजबूरी में गांवों की ओर रुख कर रहे हैं, जहाँ उन्हें आबादी के बीच आसानी से भोजन उपलब्ध हो जाता है, लेकिन यह बदलती हुई प्रवृत्ति अब सीधे तौर पर इंसानों और खूंखार जानवरों के बीच एक खूनी और कभी न खत्म होने वाले संघर्ष की नींव को बहुत मजबूती से रख रही है।
आधुनिक डिजिटल तकनीक और घर-घर में घुस चुकी सुरक्षा प्रणाली के इस दौर में अब जंगल और मानवीय बस्ती के बीच का यह संघर्ष केवल डरावनी कहानियों, लोक कथाओं या प्रत्यक्षदर्शियों के मौखिक दावों तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आधुनिक सीसीटीवी कैमरों ने इन ‘खतरनाक और बिन बुलाए मेहमानों’ की हर छोटी-बड़ी हरकत को एक पुख्ता डिजिटल रिकॉर्ड में तब्दील कर दिया है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। पहले के समय में जब कोई घबराया हुआ ग्रामीण रात के अंधेरे में गुलदार देखने का दावा करता था, तो उसे अक्सर केवल एक भ्रम, वहम या कोई सुनी-सुनाई मनगढ़ंत बात कहकर वन विभाग के अधिकारियों द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाता था, लेकिन अब हर घर के बाहर लगी पुलिस और जनता की इस तीसरी आंख ने कड़वे सच को नग्न रूप में सबके सामने लाकर खड़ा कर दिया है। सीसीटीवी कैमरों की यह हाई-डेफिनेशन फुटेज अब घने जंगल से निकलकर सीधे इंसानों के बेडरूम की खिड़की तक पहुँचने वाले इन शिकारी जानवरों की पूरी खौफनाक दास्तां पूरी दुनिया को सोशल मीडिया के माध्यम से पल-पल दिखा रही है, जिससे वन विभाग के सुस्त तंत्र के पास अब बहानेबाजी या टालमटोल करने का कोई भी रास्ता शेष नहीं बचा है। इस आधुनिक तकनीक ने जहाँ एक ओर सुरक्षा की दृष्टि से ग्रामीणों की बहुत मदद की है, वहीं दूसरी ओर इन वीडियो फुटेज ने लोगों के कोमल मन में उस अनजाने डर को और भी अधिक गहरा और पुख्ता कर दिया है जिसे वे पहले केवल एक दूर की संभावना मानकर चलते थे, क्योंकि अब साक्षात मौत उनके स्मार्टफोन की चमकती स्क्रीन पर साफ़-साफ़ चलती-फिरती दिखाई दे रही है।

कानियां गांव के इस ताजा, रोंगटे खड़े कर देने वाले और दहलाने वाले सीसीटीवी वीडियो ने एक बार फिर उस पुराने, ज्वलंत और बेहद गहरे दार्शनिक सवाल को समाज के सामने जन्म दे दिया है कि क्या वास्तव में आज की आधुनिक इंसानी बस्तियां अपनी भौगोलिक सीमाएं लांघकर चुपचाप जंगल के निजी साम्राज्य के भीतर घुसपैठ कर रही हैं या फिर अब जंगल खुद अपनी सीमाओं को तोड़कर आधुनिक शहरों और विकसित गांवों के दरवाजों पर दस्तक देने लगा है। देश के जाने-माने पर्यावरणविदों और समाजशास्त्रियों के बीच यह निरंतर एक गंभीर बहस का विषय बना हुआ है कि अंधाधुंध बढ़ते कंक्रीट के जंगलों और निर्माण कार्यों ने वन्यजीवों के सदियों पुराने प्राकृतिक गलियारों को पूरी तरह से अवरुद्ध और नष्ट कर दिया है, जिससे वे शिकारी जानवर भोजन के लिए भ्रमित होकर इंसानी आबादी के ठीक बीचों-बीच पहुँच रहे हैं। जब प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है, तो प्रकृति और उसके भीतर रहने वाले हिंसक जीव इसी खतरनाक अंदाज में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, लेकिन इस वर्चस्व की खींचतान में सबसे ज्यादा जान-माल का नुकसान उन मासूम और निर्दोष ग्रामीणों का हो रहा है जो हर पल अपनी जिंदगी को दांव पर लगाकर इन रिहायशी इलाकों में जीने को मजबूर हैं। यह सवाल अब केवल किताबी चर्चा का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बहुत बड़ी और आखिरी चेतावनी है कि यदि समय रहते हमने प्रकृति के साथ सही संतुलन नहीं बनाया, तो भविष्य में यह मानव-वन्यजीव संघर्ष और भी अधिक रक्तरंजित और विनाशकारी रूप अख्तियार कर सकता है जिसे रोकना नामुमकिन होगा।
फिलहाल कानियां गांव और इसके आसपास के तमाम सटे हुए गांवों के हज़ारों निवासियों के बीच भारी दहशत और घोर असुरक्षा का माहौल पूरी तरह से व्याप्त है और जैसे ही आसमान में काले बादलों के साथ अंधेरा छाता है, लोग खुद को और अपने दुधमुंहे बच्चों को लोहे के मजबूत दरवाजों और खिड़कियों के भीतर कैद करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। शाम के सात बजते ही गांव की गलियों में एक मरघट जैसा सन्नाटा पसर जाता है और लोग अब अकेले घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं, वे भारी लाठी-डंडों, टॉर्च और शोर मचाने वाले यंत्रों के साथ टोलियों में रहने की कोशिश कर रहे हैं ताकि किसी भी संभावित हिंसक हमले या अप्रिय स्थिति का डटकर सामना किया जा सके। वहीं दूसरी ओर, भाजपा नेत्री नीमा पांडे के घर के बाहर का यह सनसनीखेज सीसीटीवी वीडियो अब सोशल मीडिया के विभिन्न डिजिटल प्लेटफार्मों जैसे व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर जंगल की आग की तरह तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे देखकर लोग न केवल अचंभित और डरे हुए हैं बल्कि एक-दूसरे को सतर्क रहने और रात में बाहर न निकलने की गंभीर सलाह भी दे रहे हैं। यह वायरल होता वीडियो आज चीख-चीख कर शासन और प्रशासन को यह संदेश दे रहा है कि अब मौत का खौफनाक खतरा सुदूर जंगलों की गहराई में नहीं छिपा है, बल्कि वह आपके घर के ठीक बाहर, आपकी निजी दहलीज के पास घात लगाकर आपके एक कदम बाहर निकलने का इंतज़ार कर रहा है, जिसके लिए वन विभाग को अब कागजों से बाहर निकलकर धरातल पर पिंजरे लगाने और गश्त बढ़ाने जैसे ठोस कदम तत्काल उठाने होंगे अन्यथा कोई बड़ी और अपूरणीय जनहानि होने से अब कोई भी नहीं रोक पाएगा।
ग्रामीणों में इस बात को लेकर भी भारी रोष देखा जा रहा है कि घटना के कई घंटे बीत जाने के बाद भी वन विभाग की कोई टीम मौके पर निरीक्षण करने नहीं पहुँची है, जिससे लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। स्थानीय निवासियों ने चेतावनी दी है कि यदि गुलदार को पकड़ने के लिए जल्द ही क्षेत्र में आदमखोर घोषित कर पिंजरा नहीं लगाया गया, तो वे रामनगर-हल्द्वानी हाईवे को जाम कर उग्र प्रदर्शन करेंगे, क्योंकि वे अपने बच्चों की बलि चढ़ते हुए चुपचाप नहीं देख सकते। नीमा पांडे के घर के पास हुई इस हलचल ने यह भी साबित कर दिया है कि गुलदार अब इंसानों की आहट से डरने के बजाय उनके साथ सामंजस्य बिठाने लगा है, जो किसी भी शिकारी के स्वभाव में आने वाला सबसे खतरनाक बदलाव माना जाता है। अब सबकी नजरें वन विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं कि क्या वे इस खूंखार शिकारी को पकड़ने में सफल होते हैं या फिर ग्रामीण इसी खौफ के साये में अपनी रातें काटते रहेंगे।





