हरिद्वार। र्धमनगरी के नगर निगम के अंतर्गत आने वाले वार्ड संख्या दो की गलियों में इन दिनों तथाकथित विकास और स्वच्छता के दावों की शर्मनाक धज्जियां उड़ती साफ देखी जा सकती हैं, जहाँ क्षेत्रीय पार्षद सुनीता शर्मा के निर्वाचन क्षेत्र में अव्यवस्था, गंदगी और प्रशासनिक शून्यता का ऐसा भयावह साम्राज्य स्थापित हो गया है कि स्थानीय निवासियों का सांस लेना भी दूभर हो चुका है। इस वार्ड की वर्तमान दुर्दशा को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि नगर निगम के आला अधिकारियों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने इस पूरे इलाके को जानबूझकर उनके भाग्य के भरोसे लावारिस छोड़ दिया है, क्योंकि यहाँ की मुख्य सड़कों से लेकर अंदरूनी गलियों तक में बहता बदबूदार गंदा पानी और कूड़े के ऊंचे-ऊंचे ढेर नगर निगम की कार्यप्रणाली के मुंह पर एक करारा तमाचा मार रहे हैं। इलाके की इस भयावह स्थिति का आलम यह है कि केंद्र और राज्य सरकार के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के बड़े-बड़े लुभावने नारे यहाँ की सड़ांध मारती हवाओं और नालियों के गंदे मलबे में कहीं गहरे दफन होकर रह गए हैं, जिससे जनता अब खुद को पूरी तरह असहाय और ठगा हुआ महसूस कर रही है। सबसे ज्यादा विडंबना और हैरानी की बात तो यह है कि जिस वार्ड की कमान और जिम्मेदारी एक महिला जनप्रतिनिधि के हाथों में सौंपी गई है, वहां की महिलाएं, मासूम बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा संक्रामक बीमारियों के जानलेवा साये में जीने को मजबूर हैं, लेकिन शासन-प्रशासन की कुंभकर्णी नींद और संवेदनहीनता टूटने का नाम नहीं ले रही है, जो लोकतंत्र के लिए एक बेहद चिंताजनक संकेत है।
क्षेत्रीय जनता के सब्र का बांध अब पूरी तरह से लबालब होकर टूट चुका है और वार्ड के प्रत्येक घर में बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक में व्यवस्था के खिलाफ भारी आक्रोश और नाराजगी व्याप्त है, जो साफ़ तौर पर उनके मुरझाए चेहरों और बार-बार की जा रही शिकायतों में स्पष्ट नजर आता है। यहाँ के एक जागरूक स्थानीय निवासी अंकल जी अत्यंत हताशा और गुस्से में अपने मोबाइल फोन की स्क्रीन पर उन दर्जनों ‘मैसेज’ और शिकायतों का अंतहीन पुलिंदा दिखा रहे हैं, जो उन्होंने बीते कई महीनों से समाधान की क्षीण उम्मीद में नगर निगम के जिम्मेदारों और जनप्रतिनिधियों को लगातार भेजे थे, लेकिन अफसोस की बात यह है कि इतने संदेशों की बौछार करने और बार-बार गुहार लगाने के बावजूद आज तक किसी भी अधिकारी ने मौके पर आकर सुध लेना मुनासिब नहीं समझा। जनता का सीधा और तीखा आरोप है कि चुनाव के समय तो यही पार्षद और उनके चाटुकार समर्थक सफेद कुर्ते पहनकर घर-घर जाकर हाथ जोड़ते हैं और इलाके को स्वर्ग बनाने के झूठे वादे करते हैं, लेकिन जैसे ही सत्ता की कुर्सी और पद मिल जाता है, वैसे ही ये लोग जनता के दुखों और उनकी बुनियादी जरूरतों से पूरी तरह मुंह मोड़ लेते हैं। यहाँ की गलियों में आज “अपना काम बनता और भाड़ में जाए जनता” वाली पुरानी कहावत अक्षरशः चरितार्थ होती दिखाई दे रही है, जहाँ जनप्रतिनिधि अपनी वातानुकूलित सुख-सुविधाओं और राजनीति के दांव-पेंचों में मग्न हैं और एक आम ईमानदार करदाता नागरिक नारकीय और अपमानजनक जीवन जीने को विवश कर दिया गया है।

वार्ड नंबर दो की सकरी गलियों और रास्तों पर पैदल चलना अब किसी खतरनाक जानलेवा चुनौती से कम नहीं रह गया है, क्योंकि जगह-जगह गटर का काला, बदबूदार और दूषित पानी सड़कों पर एक गंदी झील की तरह लबालब भरा पड़ा है, जिससे राहगीरों, स्कूली बच्चों और दोपहिया वाहन चालकों को आए दिन भारी दुर्घटनाओं और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सीवर लाइनें और नालियां पूरी तरह से चोक होकर जाम हो चुकी हैं, जिसके कारण घरों का गंदा पानी वापस गलियों और कभी-कभी तो लोगों के ड्राइंग रूम तक में घुस रहा है, जिससे न केवल असहनीय दुर्गंध फैल रही है बल्कि जहरीले मच्छरों और मक्खियों का प्रकोप भी सामान्य से कई गुना अधिक बढ़ गया है। स्थानीय निवासियों का गला रुंधा हुआ है जब वे बताते हैं कि उन्होंने अपनी इन अंतहीन समस्याओं को लेकर कई बार स्थानीय वार्ड मेंबर और यहाँ तक कि मेयर महोदय को भी व्यक्तिगत तौर पर और सोशल मीडिया के माध्यम से अवगत कराया, लेकिन उनकी शिकायतों का कोई ठोस या स्थाई समाधान निकलने के बजाय उन्हें केवल फाइलों में दबे खोखले आश्वासन और कोरी सांत्वनाएं ही नसीब हुईं। मेयर कार्यालय तक सीधे मैसेज पहुँचाने और गुहार लगाने के बावजूद जब जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई या सफाई कर्मचारी नजर नहीं आता, तो यह सीधे तौर पर नगर निगम की कार्यप्रणाली और उसकी जवाबदेही पर एक बहुत बड़ा और गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है कि क्या प्रशासन की नजर में जनता के स्वास्थ्य और उनकी परेशानी का रत्ती भर भी कोई मूल्य शेष नहीं रह गया है।
पूरे वार्ड की भौगोलिक स्थिति पर गौर करें तो हर मोड़ पर जगह-जगह फैले कूड़े के ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और उन पर मंडराते आवारा पशु तथा कीड़े-मकोड़े इस बात की प्रत्यक्ष तस्दीक कर रहे हैं कि यहाँ डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन की योजना और नियमित सफाई व्यवस्था का तंत्र पूरी तरह से ध्वस्त और चरमरा गया है। गंदगी के इस भयावह आलम ने पूरे क्षेत्र में किसी बड़ी महामारी या हैजा जैसी बीमारी के फैलने का वास्तविक डर पैदा कर दिया है, और इस लापरवाही का सबसे ज्यादा खामियाजा छोटे बच्चों को भुगतना पड़ रहा है जो इस गंदगी के बीच से स्कूल जाने को मजबूर हैं, लेकिन वार्ड पार्षद सुनीता शर्मा और निगम का पूरा अमला संवेदनहीनता की एक मोटी चादर ओढ़े चैन की बंशी बजा रहा है। लोगों का आक्रोश इस बात पर सबसे ज्यादा है कि जब वोट बटोरने का चुनावी मौसम आता है तो ये तमाम नेता बड़ी-बड़ी लग्जरी गाड़ियों में बैठकर धूल भरी गलियों की खाक छानते फिरते हैं और पैर छूने तक से परहेज नहीं करते, लेकिन आज जब वही जनता गंदगी के इस दलदल में तिल-तिल कर मर रही है या नारकीय परिस्थितियों में जीने को संघर्ष कर रही है, उससे इन बेपरवाह सत्ताधारियों को रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता। जनप्रतिनिधियों का यह घोर जनविरोधी और अमानवीय रवैया क्षेत्रवासियों के भीतर एक गहरी निराशा, हीन भावना और व्यवस्था के प्रति विद्रोह की ज्वाला को जन्म दे रहा है, जो आने वाले भविष्य के चुनावों में इन नेताओं के लिए भारी राजनीतिक नुकसान का सबब बन सकता है।

नगर निगम प्रशासन की इस घोर और अक्षम्य लापरवाही तथा स्थानीय पार्षद की निरंतर अनदेखी के खिलाफ अब वार्ड संख्या दो के जागरूक नागरिकों ने आर-पार की निर्णायक लड़ाई लड़ने का पूरा मन बना लिया है, क्योंकि उनके धैर्य और बर्दाश्त करने की अंतिम सीमा अब पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है। क्षेत्र के लोगों का अब प्रशासन को स्पष्ट और दो टूक अल्टीमेटम है कि यदि अगले कुछ दिनों के भीतर गटर के गंदे पानी की समुचित निकासी, सड़कों पर पड़े कूड़े का वैज्ञानिक निस्तारण और वार्ड की नियमित साफ-सफाई की चाक-चौबंद व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की गई, तो वे अपने घरों से निकलकर सड़कों पर उतरने और नगर निगम मुख्यालय का घेराव कर उग्र आंदोलन करने के लिए पूरी तरह से बाध्य होंगे। उच्च अधिकारियों और शासन में बैठे कर्णधारों को अब यह कड़वा सच समझना ही होगा कि जनता केवल एक वोट बैंक या सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी मात्र नहीं है, बल्कि उनकी बुनियादी और मानवीय जरूरतों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करना हर निर्वाचित प्रतिनिधि का नैतिक और संवैधानिक अनिवार्य दायित्व है। काशीपुर के इस वार्ड की यह बदहाली और बदबू मारती गलियां देश के नीति निर्माताओं को यह सोचने पर विवश करती हैं कि क्या ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘निर्मल भारत’ के हसीन सपने केवल कागजी आंकड़ों, विज्ञापनों और भाषणों तक ही सिमट कर रह जाएंगे, या कभी धरातल पर भी उस परिवर्तन की सुखद बयार बहेगी, जहाँ एक आम इंसान को सम्मानजनक परिवेश में जीने का अधिकार मिलेगा और उसे सरकार द्वारा न्यूनतम मूलभूत नागरिक सुविधाएं बिना मांगे ही उपलब्ध करवाई जाएंगी।
वार्ड की इस विकट परिस्थिति को देखते हुए अब स्थानीय युवाओं ने सोशल मीडिया पर भी एक व्यापक मुहिम छेड़ने का निर्णय लिया है, ताकि गूंगे और बहरे हो चुके प्रशासन के कानों तक जनता की चीखें पहुँच सकें और उच्च स्तर पर बैठे मंत्रियों और मुख्यमंत्री तक इस वार्ड की बदहाली की तस्वीरें भेजी जा सकें। निवासियों का कहना है कि जब तक अधिकारी स्वयं आकर इस गंदगी के बीच खड़े होकर स्थिति का जायजा नहीं लेते, तब तक वे चैन से नहीं बैठेंगे और अपनी मांग को लेकर धरने पर बैठे रहेंगे, क्योंकि अब यह मामला केवल सफाई का नहीं बल्कि उनके आत्मसम्मान और स्वास्थ्य की सुरक्षा का बन चुका है। काशीपुर नगर निगम को अब अपनी जिम्मेदारी समझते हुए तत्काल प्रभाव से सफाई कर्मचारियों की एक विशेष टीम इस वार्ड में तैनात करनी चाहिए और युद्धस्तर पर नालियों की सफाई करवानी चाहिए, अन्यथा जनता का यह आक्रोश आने वाले समय में एक बड़े जन-विद्रोह का रूप ले सकता है जिसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर पार्षद और मेयर की होगी।





