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एलडी भट्ट अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं का क्रूर मजाक और आवारा कुत्तों का खूनी तांडव

एलडी भट्ट चिकित्सालय में एंटी रेबीज इंजेक्शन के अकाल और बदतमीज स्टाफ की दबंगई ने गरीबों की जिंदगी दांव पर लगाई जिससे खूंखार कुत्तों के शिकार बेबस मरीज अब प्राइवेट दुकानों से महंगी दवा खरीदने को मजबूर हैं।

काशीपुर। देवभूमि के उधम सिंह नगर जिले का प्रमुख शहर काशीपुर इन दिनों एक भयानक और जानलेवा संकट की गिरफ्त में है, जहां सड़कों पर घूमते खूंखार आवारा कुत्तों ने मासूम बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक का जीना मुहाल कर दिया है, लेकिन विडंबना देखिए कि इस आतंक से सुरक्षा देने वाला सरकारी तंत्र पूरी तरह से कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ है। काशीपुर स्थित एलडी भट्ट उप जिला चिकित्सालय, जो क्षेत्र का सबसे बड़ा सरकारी स्वास्थ्य केंद्र होने का दंभ भरता है, आज खुद ही वेंटिलेटर पर नजर आ रहा है क्योंकि वहां पहुंचने वाले रेबीज पीड़ितों को इलाज के नाम पर सिर्फ निराशा और अपमान हाथ लग रहा है। स्वास्थ्य विभाग की तैयारियां इस कदर खोखली और कमजोर साबित हो रही हैं कि अस्पताल में जीवन रक्षक एंटी रेबीज इंजेक्शन का नामोनिशान तक नहीं है, जिससे गरीब और मध्यम वर्गीय जनता के बीच हाहाकार मचा हुआ है। सरकार के बड़े-बड़े दावों की पोल खोलती यह हकीकत बयां कर रही है कि प्रशासन को आम आदमी की जान की कोई परवाह नहीं है, और कुत्तों के काटने के बाद जिंदगी और मौत के बीच झूलते मरीजों को उनके हाल पर ही मरने के लिए छोड़ दिया गया है।

अस्पताल की दहलीज पर जब कोई लाचार मरीज कुत्ते के काटने का जख्म लेकर पहुंचता है, तो वहां तैनात स्टाफ का व्यवहार मरहम लगाने के बजाय जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा होता है, जो सरकारी सिस्टम की सड़ांध को जगजाहिर करता है। इंजेक्शन की उपलब्धता के बारे में पूछने पर वहां मौजूद कर्मचारी और इंजेक्शन लगाने वाले लोग मरीजों के साथ न केवल दुर्व्यवहार कर रहे हैं, बल्कि उन्हें यह कहकर जलील कर रहे हैं कि “तुम्हें तो हर चीज मुफ्त में चाहिए,” जो सीधे तौर पर जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का अपमान है। एक तरफ जहां रेबीज जैसी घातक बीमारी का टीका समय पर न लगने से इंसान की जान जा सकती है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी अस्पताल के कर्मचारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार कर रहे हैं, जिससे मरीजों और उनके परिजनों में भारी आक्रोश व्याप्त है। क्या एक आम नागरिक का यह हक नहीं है कि उसे टैक्स के बदले न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधाएं मिलें, या फिर सरकार ने मान लिया है कि सरकारी अस्पताल सिर्फ बदहाली का दूसरा नाम बनकर रह गए हैं, जहां मरीजों को इंसान नहीं बल्कि मुफ्तखोर समझा जाता है?

एलडी भट्ट उप जिला चिकित्सालय की यह बदहाल तस्वीर स्वास्थ्य विभाग की उस कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े करती है, जो केवल कागजों पर विकास की लंबी-चौड़ी गाथाएं लिखती है, जबकि धरातल पर स्थितियां इसके ठीक उलट और बेहद डरावनी हैं। कुत्तों के काटने के मामलों में लगातार हो रही बेतहाशा बढ़ोतरी के बावजूद अस्पताल में एंटी रेबीज इंजेक्शन की किल्लत होना यह दर्शाता है कि आपूर्ति श्रृंखला और आपातकालीन प्रबंधन पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। ऐसे में जो लोग निजी अस्पतालों या दवाखानों से महंगे दामों पर इंजेक्शन खरीदने की हैसियत नहीं रखते, उनके पास अपनी किस्मत को कोसने और मौत का इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। स्थानीय लोगों का तो यहां तक कहना है कि सरकारी अस्पताल अब महज एक सफेद हाथी बनकर रह गए हैं, जहां न तो पर्याप्त दवाइयां उपलब्ध हैं और न ही किसी गंभीर स्थिति से निपटने के लिए संसाधन, जिससे जनता का विश्वास इस स्वास्थ्य ढांचे से पूरी तरह उठ चुका है।

गौरतलब है कि यह चिकित्सालय लंबे समय से डॉक्टरों और विशेषज्ञों की भारी कमी के कारण पहले ही अपनी साख खो चुका था, और अब संसाधनों के अभाव ने इसकी बची-कुची गरिमा को भी धूल में मिला दिया है। हालांकि, हाल ही में जब महिला फिजिशियन डॉक्टर कीर्ति मेहता ने यहां अपना कार्यभार संभाला, तो उनकी कार्यकुशलता और समर्पण के कारण अस्पताल की ओपीडी में अचानक भारी उछाल देखने को मिला, जिससे उम्मीद जगी थी कि शायद अब हालात सुधरेंगे। पहले जहां ओपीडी में प्रतिदिन महज 200 से 250 मरीज ही बमुश्किल आते थे, वहीं अब डॉक्टर कीर्ति मेहता की लोकप्रियता और बेहतर चिकित्सा के चलते यह आंकड़ा बढ़कर 500 से 700 मरीजों तक पहुंच गया है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि जैसे-जैसे मरीजों का विश्वास बढ़ा और भीड़ बढ़ी, वैसे-वैसे अस्पताल प्रशासन की अक्षमता और संसाधनों का अकाल और अधिक मुखर होकर सामने आ गया, जिससे डॉक्टर की मेहनत पर भी पानी फिरता नजर आ रहा है क्योंकि बिना दवाओं और इंजेक्शन के कोई भी चिकित्सक जादू नहीं कर सकता।

एलडी भट्ट अस्पताल की इस जर्जर व्यवस्था ने काशीपुर की जनता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वे वास्तव में किसी विकसित राज्य का हिस्सा हैं, जहां एक अदद टीके के लिए भी गरीब को अपमानित होना पड़ता है। स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों की चुप्पी और अस्पताल प्रशासन की लापरवाही इस बात का प्रमाण है कि वे केवल ऊपरी दबाव में काम करते हैं और आम जनमानस की समस्याओं से उनका कोई सरोकार नहीं है। इंजेक्शन की इस कमी ने न केवल मरीजों की मुश्किलें बढ़ाई हैं, बल्कि स्थानीय दवा विक्रेताओं की चांदी कर दी है, जहां मजबूर लोग अपनी जमा-पूंजी खर्च करके बाजार से महंगे इंजेक्शन खरीदने को विवश हैं। सरकार को यह समझना होगा कि स्वास्थ्य सेवाएं कोई खैरात नहीं बल्कि बुनियादी जरूरत हैं, और यदि एलडी भट्ट जैसे प्रमुख अस्पतालों में जीवनरक्षक दवाओं का अकाल बना रहा, तो आने वाले समय में यह जनाक्रोश एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी उजागर किया है कि जिले के स्वास्थ्य ढांचे में भारी विसंगतियां हैं, जहां कागजों पर करोड़ों का बजट ठिकाने लगाया जाता है लेकिन असल में अस्पताल की अलमारियां खाली पड़ी हैं। जनता के बीच यह चर्चा आम है कि जब एक छोटे से इंजेक्शन की व्यवस्था सरकार नहीं कर सकती, तो फिर बड़े चिकित्सा शिविरों और स्वास्थ्य मेलों का ढोंग क्यों रचा जाता है? काशीपुर के नागरिक अब इस दोहरे प्रहार से थक चुके हैं—एक तरफ आवारा कुत्तों का जानलेवा खौफ और दूसरी तरफ सरकारी अस्पताल की उपेक्षा और कर्मचारियों की बदतमीजी। अगर समय रहते एंटी रेबीज इंजेक्शन की आपूर्ति सुनिश्चित नहीं की गई और दोषी स्टाफ के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो एलडी भट्ट चिकित्सालय केवल एक खंडहर बनकर रह जाएगा जहां इलाज कम और अपमान ज्यादा मिलता है। सरकार को अब अपनी नींद त्यागनी होगी, वरना जनता की आह और यह अव्यवस्था सत्ता के गलियारों तक गूंजने में देर नहीं लगाएगी।

अंततः, स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यह अनिवार्य हो जाता है कि स्वास्थ्य महानिदेशालय तुरंत हस्तक्षेप करे और एलडी भट्ट उप जिला चिकित्सालय में दवाओं और टीकों का आपातकालीन कोटा बहाल करे। डॉक्टर कीर्ति मेहता जैसे समर्पित चिकित्सकों के आने से जो भीड़ अस्पताल की ओर मुड़ी है, उसे उचित चिकित्सा सुविधा मिलना उनका अधिकार है, न कि कर्मचारियों के ताने सुनना। काशीपुर की जनता अब आर-पार की लड़ाई के मूड में है क्योंकि सवाल उनकी और उनके बच्चों की जान का है, जो इन दिनों सड़कों पर कुत्तों और अस्पतालों में सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता की भेंट चढ़ रहे हैं। क्या मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री इस भयावह स्थिति का संज्ञान लेंगे या फिर काशीपुर को इसी तरह लावारिस और बदहाल छोड़ दिया जाएगा, यह एक ऐसा ज्वलंत प्रश्न है जिसका उत्तर क्षेत्र की जनता आने वाले समय में जरूर मांगेगी। प्रशासन को यह याद रखना चाहिए कि जनता की सहनशक्ति की भी एक सीमा होती है, और जब इलाज के नाम पर सिर्फ जिल्लत मिलती है, तो व्यवस्था परिवर्तन की नींव वहीं से पड़ती है।

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शहर की भीड़भाड़ और बढ़ती बीमारियों के दौर में जब चिकित्सा जगत को नए और भरोसेमंद विकल्पों की तलाश थी, उसी समय काशीपुर से उभरती एक संस्था ने अपनी गुणवत्ता, विशेषज्ञता और इंसानी सेहत के प्रति समर्पण की मिसाल कायम कर दी। एन.एच.-74, मुरादाबाद रोड पर स्थित “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” आज उस भरोसे का नाम बन चुका है, जिसने अपनी प्रतिबद्धता, सेवा और उन्नत चिकित्सा व्यवस्था के साथ लोगों के दिलों में एक अलग स्थान स्थापित किया है। इस संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ इलाज का आधार केवल दवा नहीं, बल्कि रोगी की पूरी जीवनशैली, उसकी भावनाओं और उसके व्यवहार तक को समझकर उपचार उपलब्ध कराया जाता है। संस्था के केंद्र में वर्षों से सेवा कर रहे डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा का अनुभव, उनकी अंतरराष्ट्रीय योग्यता और कार्य के प्रति उनका गहरा समर्पण उन्हें चिकित्सा जगत में एक विशिष्ट पहचान देता है। अपनी अलग सोच और उच्च स्तरीय चिकित्सा व्यवस्था के कारण यह संस्थान न केवल स्थानीय लोगों का विश्वास जीत रहा है, बल्कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले मरीज भी यहाँ भरोसे के साथ उपचार लेने पहुँचते हैं। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” ने NABH Accreditation और ISO 9001:2008 व 9001:2015 प्रमाणपत्र हासिल कर यह साबित कर दिया है कि यहाँ इलाज पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया, गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के साथ किया जाता है। संस्थान की दीवारों पर सजे सैकड़ों प्रमाणपत्र, सम्मान और पुरस्कार इस बात के गवाह हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा ने उपचार को केवल पेशा नहीं, बल्कि मानव सेवा की जिम्मेदारी माना है। यही वजह है कि उन्हें भारतीय चिकित्सा रत्न जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है। रोगियों के प्रति संवेदनशीलता और आधुनिक तकनीकी समझ को मिलाकर जो उपचार मॉडल यहाँ तैयार हुआ है, वह लोगों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है। संस्थान के भीतर मौजूद विस्तृत कंसल्टेशन रूम, मेडिकल फाइलों की सुव्यवस्थित व्यवस्था और अत्याधुनिक निरीक्षण प्रणाली इस बात को स्पष्ट दिखाती है कि यहाँ मरीज को पूर्ण सम्मान और ध्यान के साथ सुना जाता है। पोस्टर में दर्शाए गए दृश्य—जहाँ डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मानित होते दिखाई देते हैं—उनकी निष्ठा और चिकित्सा जगत में उनकी मजबूत प्रतिष्ठा को और मजबूत बनाते हैं। उनकी विदेशों में प्राप्त डिग्रियाँ—बीएचएमएस, एमडी (होम.), डी.आई.एच. होम (लंदन), एम.ए.एच.पी (यूके), डी.एच.एच.एल (यूके), पीएच.डी—स्पष्ट करती हैं कि वे केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिकित्सा अनुसंधान और उपचार के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। काशीपुर जैसे शहर में आधुनिक विचारों और उच्च गुणवत्ता वाले उपचार का ऐसा संयोजन मिलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। संस्था की ऊँची इमारत, सुगम पहुँच और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित परिसर मरीजों को एक शांत, सकारात्मक और उपचार के अनुकूल माहौल प्रदान करता है। इसी माहौल में रोगियों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली वैज्ञानिक होम्योपैथिक औषधियाँ उनके लंबे समय से चले आ रहे दर्द और समस्याओं को जड़ से ठीक करने की क्षमता रखती हैं। उपचार के दौरान रोगी को केवल दवा देना ही उद्देश्य नहीं होता, बल्कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य पुनर्स्थापन पर यहाँ विशेष ध्यान दिया जाता है। यही वह कारण है कि मरीज वर्षों बाद भी इस संस्थान को याद रखते हुए अपने परिवार और परिचितों को यहाँ भेजना पसंद करते हैं। समाज के विभिन्न समूहों से सम्मान प्राप्त करना, राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों द्वारा सराहना मिलना, और बड़े मंचों पर चिकित्सा सेवाओं के लिए सम्मानित होना—ये सभी तस्वीरें इस संस्था की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को और अधिक उजागर करती हैं। पोस्टर में दिखाई देने वाले पुरस्कार न केवल उपलब्धियों का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा लगातार लोगों की सेहत सुधारने और चिकित्सा के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने में जुटे हुए हैं। उनका सरल स्वभाव, रोगियों के प्रति समर्पण और ईमानदारी के साथ सेवा का भाव उन्हें चिकित्सा जगत में एक उल्लेखनीय व्यक्तित्व बनाता है। संपर्क के लिए उपलब्ध नंबर 9897618594, ईमेल drrajneeshhom@hotmail.com और आधिकारिक वेबसाइट www.cureme.org.in संस्थान की पारदर्शिता और सुविधा की नीति को मजबूत बनाते हैं। काशीपुर व आसपास के क्षेत्रों के लिए यह संस्थान विकसित और उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बन चुका है जहाँ लोग बिना किसी डर, संदेह या हिचकिचाहट के पहुँचते हैं। बढ़ते रोगों और बदलती जीवनशैली के समय में इस प्रकार की संस्था का होना पूरा क्षेत्र के लिए बड़ी राहत और उपलब्धि है। आने वाले समय में भी यह संस्था चिकित्सा सेवा के नए आयाम स्थापित करती रहेगी, यही उम्मीद लोगों की जुबान पर साफ झलकती है।
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