काशीपुर। काशीपुर की हृदयस्थली कहे जाने वाले गिरिताल रोड पर बुधवार की शाम एक ऐसी सनसनीखेज वारदात घटित हुई, जिसने न केवल सरकारी तंत्र की साख पर बट्टा लगाया है, बल्कि आम जनमानस की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, विकास प्राधिकरण में तैनात एक जिम्मेदार सहायक अभियंता ने मर्यादाओं की सारी सीमाएं लांघते हुए अपनी सरकारी बोलेरो कार को नशे के प्रचंड वेग में दौड़ाना शुरू कर दिया। शाम के करीब 7:30 बज रहे थे, जब यह बेलगाम सरकारी वाहन गिरधर मंदिर के ठीक सामने काल बनकर खड़ा हो गया। प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो नशे में धुत अधिकारी वाहन पर से पूरी तरह नियंत्रण खो चुका था, जिसके परिणामस्वरूप उसने वहां खड़ी एक कार को इतनी भीषण टक्कर मारी कि वाहन के परखच्चे उड़ गए। यह क्षतिग्रस्त कार शहर के एक वरिष्ठ पत्रकार के पुत्र की बताई जा रही है, जो उस वक्त सौभाग्यवश मंदिर के भीतर ईश-साधना में लीन थे। यदि वे वाहन के भीतर होते, तो परिणाम अत्यंत वीभत्स हो सकते थे, लेकिन नियति ने उन्हें इस भीषण प्रहार से सुरक्षित बचा लिया।
हादसे की भयावहता यहीं शांत नहीं हुई, बल्कि इस अनियंत्रित सरकारी बोलेरो ने गिरधर मंदिर के पास से गुजर रहे दो अन्य निर्दोष राहगीरों को भी अपनी चपेट में ले लिया। टक्कर इतनी जोरदार थी कि मौके पर चीख-पुकार मच गई और अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया। जैसे ही उस मदहोश सहायक अभियंता को अपनी इस अक्षम्य गलती का एहसास हुआ, वह अपनी सरकारी गाड़ी को बीच सड़क पर लावारिस छोड़कर अंधेरे का फायदा उठाते हुए मौके से नौ दो ग्यारह हो गया। इस घटना ने सरकारी अधिकारियों के उस रसूख और लापरवाही को उजागर कर दिया है, जहाँ जनता की सुरक्षा को ताक पर रखकर नशे के सुरूर में सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग किया जा रहा है। घटना के बाद स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश देखा गया, क्योंकि एक तरफ जहाँ मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ थी, वहीं दूसरी तरफ एक नशेबाज अधिकारी अपनी रफ्तार से मौत का खेल खेल रहा था। गनीमत रही कि इस पूरे घटनाक्रम में किसी भी व्यक्ति को जानलेवा चोटें नहीं आईं, वरना यह हादसा काशीपुर के इतिहास में एक काला अध्याय बन सकता था।
जैसे ही इस कांड की सूचना विभागीय गलियारों में पहुंची, वैसे ही संबंधित महकमे के उच्चाधिकारियों के हाथ-पांव फूलने लगे और आनन-फानन में मामले को दबाने की कवायद शुरू कर दी गई। सरकारी बोलेरो के साथ हुए इस हादसे ने विभाग की छवि को धूमिल कर दिया था, जिसके चलते पर्दे के पीछे से मामले को रफा-दफा करने की बिसात बिछाई जाने लगी। जब इस संवेदनशील विषय पर एसडीएम काशीपुर प्रताप सिंह से संपर्क साधा गया और उनसे घटना की जानकारी लेनी चाही, तो उन्होंने पूरी तरह से अनभिज्ञता जाहिर करते हुए मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया। यह अपने आप में चौंकाने वाला विषय है कि शहर के मुख्य मार्ग पर सरकारी गाड़ी से इतना बड़ा एक्सीडेंट हो जाए और क्षेत्र के उपजिलाधिकारी को इसकी भनक तक न लगे। प्रशासन की यह चुप्पी कई गहरे संदेश दे रही है और यह इशारा कर रही है कि रसूखदार अधिकारियों को बचाने के लिए सिस्टम ने अपनी आंखें मूंद ली हैं। विभागीय अधिकारियों की सक्रियता अपराधी को दंड दिलाने के बजाय पत्रकार और अन्य प्रभावितों के साथ समझौता कराने में ज्यादा दिखाई दी।
गुरुवार की दोपहर करीब 4:00 बजे का समय था, जब कटरा लाल पुलिस चौकी में इस पूरे हाई-प्रोफाइल ड्रामे का पटाक्षेप करने की तैयारी पूरी कर ली गई। चौकी प्रभारी सब इंस्पेक्टर कौशल भाकुनी की मौजूदगी में दोनों पक्षों के बीच सुलह-समझौते की कागजी कार्रवाई पूरी की गई। विभागीय दबाव और आपसी रजामंदी का हवाला देते हुए इस गंभीर अपराध को महज एक ‘दुर्घटना’ का रूप देकर फाइलों में दफन कर दिया गया। विभागीय अधिकारियों के निरंतर हस्तक्षेप के कारण पुलिसिया कार्रवाई भी धीमी पड़ती दिखाई दी और अंततः कानून के लंबे हाथों के बीच समझौते की जीत हुई। शहर के बुद्धिजीवी वर्ग में इस बात को लेकर काफी रोष है कि आखिर क्यों एक नशेड़ी अधिकारी को सलाखों के पीछे भेजने के बजाय उसे ‘समझौते’ का सुरक्षा कवच प्रदान किया गया। सरकारी वाहन चला रहे अधिकारी का नशे में होना अपने आप में एक संगीन जुर्म है, लेकिन कटोरा ताल पुलिस चौकी में हुई यह सेटिंग अब पूरे शहर में चर्चा और आलोचना का प्रमुख केंद्र बनी हुई है।
इस पूरी घटना का एक और पहलू यह है कि आरोपी अधिकारी और संबंधित विभाग के जेई की कार्यशैली पहले से ही विवादों के घेरे में रही है। अभी हाल ही के दिनों में काशीपुर के महापौर दीपक बाली ने नगर निगम के एक कार्यक्रम के दौरान इस सहायक अभियंता और जेई की जमकर क्लास लगाई थी और उनकी लापरवाही को लेकर कड़ी फटकार भी जड़ी थी। महापौर दीपक बाली की उस सख्त चेतावनी के बावजूद इन अधिकारियों के रवैये में कोई सुधार नहीं आया, जिसका प्रमाण बुधवार की रात को देखने को मिला। एक तरफ जनप्रतिनिधि व्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे बेखौफ अधिकारी सरकारी मर्यादाओं को तार-तार कर रहे हैं। काशीपुर की जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि क्या सरकारी पद पर बैठे लोगों को नशे में धुत्त होकर सड़कों पर तांडव मचाने की खुली छूट मिली हुई है? फिलहाल, पुलिस चौकी में हुए समझौते ने इस मामले की कानूनी आग को तो ठंडा कर दिया है, लेकिन जनता के मन में सुलग रहे आक्रोश की ज्वाला अभी भी शांत नहीं हुई है ।





