उत्तराखण्ड(सुनील कोठारी)। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक ऐसा भूचाल आने वाला है जो देवभूमि उत्तराखंड की शांत वादियों से लेकर उत्तर प्रदेश के तपते सियासी गलियारों तक की पूरी तस्वीर को जड़ से पलट कर रख देगा। नरेंद्र मोदी सरकार के आगामी रणनीतिक कदमों को लेकर गलियारों में जो फुसफुसाहट शुरू हुई है, उसने न केवल राजनीतिक पंडितों बल्कि अनुभवी दिग्गजों की रातों की नींद हराम कर दी है। सूत्रों की मानें तो केंद्र सरकार एक ऐसे ऐतिहासिक संशोधन विधेयक पर मुहर लगाने जा रही है, जो परिसीमन के पुराने ढांचों को ध्वस्त कर नए सिरे से सत्ता के समीकरण लिखेगा। इस योजना का केंद्र बिंदु वर्ष 2011 की जनसंख्या को आधार मानकर सीटों का पुनर्गठन करना है, जिससे उत्तराखंड जैसे राज्यों में विधानसभा का आकार वर्तमान के सत्तर से छलांग लगाकर सीधा एक सौ पाँच तक पहुँचाने की प्रबल संभावना है। यह मात्र सीटों की संख्या में वृद्धि नहीं है, बल्कि उस ‘नारी शक्ति’ को मुख्यधारा में लाने का एक अभूतपूर्व प्रयास है, जिसके बिना अब तक का लोकतंत्र अधूरा माना जाता रहा है। आगामी बजट सत्र में यदि यह जादुई संशोधन बिल पेश होकर कानून की शक्ल लेता है, तो उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में होने वाले अगले चुनावों का पूरा भूगोल और गणित पूरी तरह बदल चुका होगा और पुराने नेताओं की गद्दी खिसकना तय है।
इस नए सियासी फार्मूले की बारीकियों को समझना हर उस मतदाता और नेता के लिए अनिवार्य है जो भविष्य की राजनीति का हिस्सा बनना चाहता है, क्योंकि यहाँ ‘पचास-तैंतीस’ का एक जटिल और असरदार गणित काम कर रहा है। उदाहरण के तौर पर, यदि उत्तराखंड की वर्तमान सत्तर सीटों को आधार माना जाए, तो प्रस्तावित योजना के तहत इसका पचास प्रतिशत यानी पैंतीस नई सीटें सृजित की जाएंगी, जिससे कुल सीटों का आंकड़ा एक सौ पाँच पर जा टिकेगा। असली धमाका तो तब होगा जब इन एक सौ पाँच सीटों पर तैंतीस प्रतिशत महिला आरक्षण का चाबुक चलेगा, जिसके परिणामस्वरूप लगभग पैंतीस सीटें विशेष रूप से महिला प्रत्याशियों के लिए आरक्षित हो जाएंगी। इसका सीधा और सरल अर्थ यह है कि वर्ष 2027 के विधानसभा रणक्षेत्र में उत्तराखंड की पैंतीस सीटों पर केवल और केवल महिलाएं ही चुनावी ताल ठोकती नजर आएंगी, जो कि दशकों से चले आ रहे पुरुष प्रधान राजनीतिक वर्चस्व के लिए एक जबरदस्त और हिला देने वाला झटका साबित होने वाला है। भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वे इस नए प्रयोग को सबसे पहले उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की प्रयोगशाला में उतारने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव तक इसकी धमक पूरे राष्ट्र में गूँज सके।
इस क्रांतिकारी परिवर्तन के बाद सत्ता का सिंहासन पाने के लिए बहुमत का जो पुराना जादुई आंकड़ा हुआ करता था, वह भी अब हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगा और लोकतंत्र की एक नई लकीर खींची जाएगी। वर्तमान में उत्तराखंड की सत्तर सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए छतीस विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है, लेकिन एक सौ पाँच सीटों के नए परिसीमन के बाद यह तस्वीर पूरी तरह से बदल जाएगी। नए ढांचे के भीतर बहुमत प्राप्त करने के लिए किसी भी राजनीतिक दल को कम से कम तिरेपन विधायकों की विजय सुनिश्चित करनी होगी, जिसमें उन पैंतीस महिला सीटों की भूमिका सबसे ज्यादा निर्णायक और महत्वपूर्ण होगी। अब तक जो पार्टियां पुराने चेहरों, जातीय समीकरणों और घिसे-पिटे दांव-पेंचों के भरोसे अपनी जीत की योजनाएं बुन रही थीं, उनकी सारी तैयारी धरी की धरी रह जाएगी क्योंकि नए परिसीमन में न केवल सीटों का दायरा बदलेगा बल्कि मतदाताओं की प्राथमिकताएं भी पूरी तरह बदल जाएंगी। यह संशोधन विधेयक राजनीतिक दलों के लिए एक ऐसी अग्निपरीक्षा पेश करने वाला है जहाँ उन्हें शून्य से शुरुआत करनी होगी और महिलाओं को केवल चुनावी रैलियों की भीड़ तक सीमित न रखकर उन्हें शासन की अग्रिम पंक्ति में अनिवार्य रूप से बिठाना होगा।
भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश महामंत्री दीप्ति रावत भारद्वाज ने इस मुद्दे पर एक बहुत ही बेबाक, तीखा और कड़ा रुख अपनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि अब वह समय बीत गया जब पुरुष नेता महिलाओं का टिकट काटने का साहस कर पाते थे। उन्होंने बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा कि सत्तर के बजाय एक सौ पाँच सीटों पर काम करना संगठन के लिए कोई चुनौती नहीं बल्कि एक शानदार और ऐतिहासिक अवसर है, क्योंकि इससे कार्यकर्ताओं के लिए मैदान और बड़ा हो जाएगा। दीप्ति रावत भारद्वाज के अनुसार, सीटों की संख्या बढ़ने से न केवल जनता का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा बल्कि विकास का असली विकेंद्रीकरण भी होगा, क्योंकि छोटी विधानसभा सीटों का प्रबंधन और वहां की स्थानीय जनसमस्याओं का निवारण करना कहीं अधिक प्रभावी और सुगम हो जाता है। उनके बयानों से यह साफ झलकता है कि बीजेपी इस बदलाव को एक ‘लॉटरी सिस्टम’ के रूप में देख रही है, जहाँ शुरुआत में उन क्षेत्रों को विशेष वरीयता दी जाएगी जहाँ महिलाओं की संख्या, जागरूकता और प्रभाव अधिक है। उन्होंने चुटकी लेते हुए यह भी स्पष्ट किया कि जब सदन का दृश्य बदलेगा तो उसका सीधा असर नीति-निर्माण की संवेदनशीलता पर पड़ेगा, जिससे समाज के अंतिम पायदान पर बैठी महिला तक न्याय पहुँचना संभव होगा।
राजनीति के गलियारों में दीप्ति रावत भारद्वाज का यह बयान भी आज सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है कि कैसे वर्तमान मंत्रिमंडल की मात्र बारह सीटों में केवल एक महिला मंत्री की मौजूदगी वाला असंतुलन भविष्य में बीते दौर की बात हो जाएगी। उन्होंने तर्क दिया कि जब विधानसभा के भीतर महिलाओं की संख्या पैंतीस या उससे अधिक होगी, तो स्वाभाविक रूप से कैबिनेट का रंग-रूप भी महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से खिल उठेगा और शासन में उनकी धमक बढ़ेगी। दीप्ति रावत भारद्वाज ने अपनी बातों में इस बात पर विशेष बल दिया कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने हमेशा ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ जैसे क्रांतिकारी कदमों के माध्यम से महिलाओं को शिक्षा, सेना और सामाजिक कल्याण से आगे ले जाकर वास्तविक राजनीतिक शक्ति देने का संकल्प किया है। उनके अनुसार, यह संशोधन बिल भारतीय राजनीति के लिए एक सबसे बड़ा श्गेम चेंजरश् साबित होगा क्योंकि अब तक जो पुरुष प्रधान व्यवस्था टिकटों के बंटवारे में महिलाओं को हाशिए पर धकेल देती थी, उसे अब संवैधानिक बाध्यता के कारण उनके सामने झुकना ही पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि बीजेपी इस महान परिवर्तन का स्वागत करने के लिए अपने जमीनी कैडर को तैयार कर चुकी है और अब बस संसद के आगामी सत्र का इंतजार है जहाँ से यह ऐतिहासिक फरमान जारी होना है।

जैसे-जैसे 2 अप्रैल की वो तारीख करीब आ रही है जब संसद का सत्र समाप्त होगा, वैसे-वैसे दिल्ली से लेकर देहरादून और लखनऊ तक की धड़कनें तेज होती जा रही हैं क्योंकि इसी अवधि के दौरान मोदी सरकार इस बड़े राजनीतिक धमाके को अंजाम दे सकती है। यदि यह बिल अपनी वर्तमान परिकल्पना के साथ पारित हो जाता है, तो उत्तराखंड की जनता और पुराने ढर्रे के नेताओं के लिए यह किसी सुनामी से कम नहीं होगा जो पुराने स्थापित किलों को ढहाकर नए और ऊर्जावान नेतृत्व का उदय करेगा। विपक्ष से लेकर सत्ता पक्ष तक के वो तमाम बाहुबली नेता जो दशकों से अपनी सुरक्षित मानी जाने वाली सीटों पर कुंडली मारकर बैठे थे, उनके लिए अब अपनी राजनीतिक जमीन बचाना नामुमकिन हो जाएगा क्योंकि परिसीमन के बाद उनकी सीटों का भूगोल बदल चुका होगा। यह बदलाव केवल संख्यात्मक नहीं बल्कि पूरी तरह से गुणात्मक होगा, जहाँ नीतियों में महिलाओं की ममता, उनकी दूरदर्शिता और कड़े अनुशासन का समावेश होगा और भ्रष्टाचार या प्रशासनिक लापरवाही की गुंजाइश पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। अब सभी की निगाहें दिल्ली के उस सत्ता केंद्र पर टिकी हैं, जहाँ से निकलने वाला एक मास्टरस्ट्रोक उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक भविष्य को एक नई, भव्य और गरिमापूर्ण दिशा देने वाला है।
अगले कुछ हफ्तों में जो सियासी पिक्चर उभरने वाली है, वह उत्तराखंड में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही मुख्य दलों को अपनी रणनीति की फाइलें दोबारा खोलने और पुराने वादों को नए संदर्भों में ढालने के लिए मजबूर कर देगी क्योंकि अब मुकाबला बराबरी का होगा। दीप्ति रावत भारद्वाज के नेतृत्व में बीजेपी की महिला विंग पहले ही इस बदलाव के जश्न और जमीनी तैयारी में जुट गई है, जिससे यह कड़ा संदेश जा रहा है कि पार्टी इस परिवर्तन को लेकर मानसिक और सांगठनिक रूप से पूरी तरह तैयार है। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जब नए परिसीमन की आधिकारिक घोषणा होगी, तो कौन से पुराने दिग्गज अपनी जमीन खोएंगे और कौन सी नई महिला नेत्रियां प्रदेश की राजनीति के फलक पर चमकते सितारे बनकर उभरेंगी। उत्तराखंड की इस वीर भूमि पर, जहाँ महिलाओं ने हमेशा चिपको आंदोलन से लेकर राज्य गठन तक के हर संघर्ष का नेतृत्व किया है, अब उन्हें विधानसभा के भीतर मुख्य नीति-निर्माता के रूप में देखना राज्य के चहुंमुखी विकास के लिए एक शुभ और ऐतिहासिक संकेत माना जा रहा है। कुल मिलाकर, नरेंद्र मोदी सरकार का यह कदम भारतीय लोकतंत्र के उस अधूरे सपने को सच करने की ओर एक निर्णायक प्रहार है जहाँ सत्ता की बागडोर सचमुच आधी आबादी के सशक्त हाथों में होगी।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे रोमांचक पहलू यह है कि परिसीमन के बाद कई ऐसी सीटें जो अब तक सुरक्षित या सामान्य मानी जाती थीं, वे रातों-रात महिला आरक्षित श्रेणी में चली जाएंगी, जिससे कई बड़े राजनीतिक घरानों का वर्चस्व हमेशा के लिए खत्म हो सकता है। दीप्ति रावत भारद्वाज ने साफ तौर पर कहा है कि इस बदलाव से पुरुषों को घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें महिलाओं के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की आदत डाल लेनी चाहिए क्योंकि अब योग्यता ही एकमात्र पैमाना होगी। उत्तराखंड में इस समय हर चौक-चौराहे पर बस इसी बात की चर्चा है कि क्या वाकई पैंतीस महिलाएं एक साथ विधानसभा पहुँचकर राज्य की तकदीर बदल पाएंगी या यह केवल एक चुनावी स्टंट बनकर रह जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए छोटी सीटों का होना प्रशासन की पहुँच को और अधिक सुगम बनाएगा, जिससे दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों के विकास को एक नई गति और पहचान मिल सकेगी। इस बिल के पास होने की आहट मात्र से ही उत्तराखंड के सचिवालय से लेकर विधायकों के आवास तक में बैठकों का दौर शुरू हो गया है, जहाँ हर कोई अपने भविष्य के सुरक्षित ठिकानों की तलाश में जुटा है।
यदि हम गहराई से विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट होता है कि केंद्र सरकार का यह मास्टरप्लान न केवल महिलाओं को सशक्त करेगा बल्कि राजनीति में व्याप्त वंशवाद और भाई-भतीजावाद पर भी एक करारी चोट करेगा क्योंकि नई सीटों पर नए चेहरों की जरूरत होगी। दीप्ति रावत भारद्वाज के अनुसार, जब महिलाएं नीति-निर्माण में शामिल होती हैं, तो वे परिवार और समाज के प्रति अपनी स्वाभाविक संवेदनशीलता के कारण स्वास्थ्य, शिक्षा और बच्चों के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित करती हैं, जो किसी भी राज्य की प्रगति के लिए अनिवार्य है। उत्तराखंड जैसे राज्य के लिए, जहाँ ‘पलायन’ एक नासूर बन चुका है, वहां महिला विधायकों की बढ़ती संख्या से उम्मीद की जा रही है कि वे स्थानीय स्तर पर रोजगार और संसाधनों के सृजन के लिए अधिक ठोस और मानवीय नीतियां बना पाएंगी। भाजपा प्रदेश महामंत्री ने जिस तरह से ‘पुरुष अब महिलाओं का टिकट नहीं काट पाएंगे’ वाली बात कही है, वह इस बात का प्रमाण है कि भीतर ही भीतर महिलाओं में अपनी राजनीतिक शक्ति को लेकर कितनी तड़प और तैयारी है। यह खबर मात्र एक सूचना नहीं है, बल्कि एक नए युग का शंखनाद है जो आने वाले समय में उत्तराखंड की हर विधानसभा को एक नई पहचान और एक नया नेतृत्व देने का माद्दा रखती है।
अंतिम रूप से, यह देखना होगा कि विपक्षी दल इस ऐतिहासिक बदलाव का सामना किस तरह करते हैं, क्योंकि अब तक उनकी राजनीति भी सीमित चेहरों और पुराने गठबंधनों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। उत्तराखंड की जनता अब जागरूक हो चुकी है और वह केवल वादों पर नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और ठोस नतीजों पर भरोसा करती है, ऐसे में पैंतीस महिला सीटों का आना राज्य की चेतना को झकझोरने वाला साबित होगा। 2 अप्रैल तक का समय किसी बड़ी फिल्म के क्लाइमेक्स जैसा लग रहा है, जहाँ हर पल एक नया मोड़ आने की संभावना बनी हुई है और दिल्ली की हर हलचल पर देहरादून की नजरें जमी हुई हैं। मोदी सरकार के इस प्रस्तावित संशोधन बिल ने यह साबित कर दिया है कि वे राजनीति के स्थापित मानदंडों को तोड़ने और नए भारत की नई राजनीति को गढ़ने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। दीप्ति रावत भारद्वाज और उनके जैसे अन्य नेताओं के उत्साह को देखकर लगता है कि यह प्रयोग न केवल सफल होगा बल्कि भारत के अन्य राज्यों के लिए भी एक अनुकरणीय मॉडल बनकर उभरेगा। अब इंतजार है तो बस उस आधिकारिक मुहर का, जो उत्तराखंड की राजनीतिक फिजाओं में ‘नारी शक्ति’ के नए अध्याय की शुरुआत करेगी और लोकतंत्र को वास्तव में समावेशी और सशक्त बनाएगी।





