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चैती मेले में झूलों की सुरक्षा पर खौफ बढ़ा श्रद्धालुओं की चिंता चरम पर

सूरजकुंड हादसे की दहशत के बीच काशीपुर के चैती मेले में ऊँचे झूलों की सुरक्षा और तकनीकी फिटनेस को लेकर भड़का जनता का भारी आक्रोश और प्रशासन की नींद उड़ा देने वाला वह सबसे बड़ा और तीखा सवाल।

काशीपुर(सुनील कोठारी)। ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान का प्रतीक माना जाने वाला भव्य चैती मेला इस बार अपने पारंपरिक उल्लास और श्रद्धा के सैलाब के बीच एक अनकहे, गहरे खौफ और संशय के काले बादलों से घिरा हुआ नजर आ रहा है। हर साल यह मेला आस्था, असीम उत्साह और समृद्ध परंपराओं का एक अद्भुत संगम बनकर न केवल स्थानीय लोगों, बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भी अपनी ओर चुंबकीय रूप से आकर्षित करता रहा है। यहाँ धार्मिक आस्था के पावन माहौल के साथ-साथ मनोरंजन के भी बेमिसाल और आधुनिक साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं, जो मेलार्थियों के अनुभव को और भी यादगार बना देते हैं। खास तौर पर, आसमान को छूते बड़े-बड़े रंग-बिरंगे झूले, बच्चों से लेकर युवाओं तक, सभी के लिए मेले का सबसे बड़ा और निर्विवाद आकर्षण माने जाते रहे हैं, जिनकी सवारी के बिना मेले का आनंद अधूरा सा लगता है। लेकिन, इस वर्ष मेले की जगमगाती रंगीनियों और शोर-शराबे के बीच एक गहरा सन्नाटा, एक डर और आशंका का माहौल भी बहुत साफ तौर पर महसूस किया जा रहा है, जिसने उत्सव के रंग में भंग डाल दिया है। इस अभूतपूर्व चिंता और दहशत की मुख्य वजह हाल ही में फरीदाबाद के प्रतिष्ठित सूरजकुंड मेले में हुआ वह भीषण और दर्दनाक हादसा है, जिसने न केवल हरियाणा बल्कि पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था। उस भयावह घटना के बाद अब काशीपुर के इस ऐतिहासिक चैती मेले में लगने वाले ऊँचे-ऊँचे झूलों की सुरक्षा और उनकी तकनीकी फिटनेस को लेकर आम जनता के मन में गंभीर और तीखे सवाल उठने लगे हैं, और लोग अब मनोरंजन से पहले अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सतर्क, जागरूक और फिक्रमंद नजर आ रहे हैं, जो एक बड़ी तब्दीली का संकेत है।

काशीपुर का प्रसिद्ध चैती मेला इस बार अपनी पारंपरिक रौनक, धार्मिक उत्साह और भीड़भाड़ के साथ-साथ एक बिल्कुल अलग तरह की गहरी चिंता, आशंका और अविश्वास के साये में भी साफ तौर पर सराबोर नजर आ रहा है, जो इसकी ऐतिहासिक साख पर सवालिया निशान लगा रहा है। जहाँ एक ओर मेले की तैयारियाँ प्रशासनिक स्तर पर अपने चरम पर हैं, दुकाने सज चुकी हैं और दूर-दराज के इलाकों से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की भारी भीड़ उमड़ने लगी है, वहीं दूसरी ओर सबसे लोकप्रिय आकर्षण- बड़े झूलों की तकनीकी सुरक्षा और मजबूती को लेकर लोगों के मन में एक गहरी और न मिटने वाली शंका ने घर कर लिया है। हाल ही में फरीदाबाद के प्रतिष्ठित सूरजकुंड मेले में हुए उस अत्यंत खौफनाक और जानलेवा हादसे ने लोगों की सोच, नजरिए और मनोरंजन के प्रति उनके उत्साह को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है, जहाँ आनंद पल भर में मातम में बदल गया था। उस भयावह घटना के बाद अब काशीपुर के इस ऐतिहासिक और आस्था से जुड़े मेले में लगने वाले हर छोटे-बड़े झूले की फिटनेस जांच, स्ट्रक्चरल ऑडिट और गहन तकनीकी निरीक्षण को लेकर हर कोई, चाहे वह आम नागरिक हो या कोई खास, सवाल उठा रहा है और प्रशासन से जवाब मांग रहा है। पहले के समय में जहाँ लोग बिना किसी सोच-विचार या डर के, केवल आनंद के वशीभूत होकर इन ऊँचे झूलों का लुत्फ उठाते थे, अब स्थिति बिल्कुल उलट है; अब हर व्यक्ति हर कदम पर अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा की पुख्ता गारंटी तलाश रहा है और प्रशासन से केवल खोखले वादों के बजाय एक स्पष्ट, पारदर्शी और ठोस व्यवस्था की उम्मीद कर रहा है, जो उन्हें निर्भय होकर मेले का आनंद लेने दे।

बीती 7 फरवरी को फरीदाबाद के सूरजकुंड मेले में कथित तौर पर “सुनामी झूला” के अचानक और भीषण तरीके से टूटने की खौफनाक घटना ने पूरे देश को सन्न कर दिया था और मेले की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा काला धब्बा लगा दिया था। उस भयावह हादसे में ड्यूटी पर तैनात एक निर्दोष पुलिस इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद की दर्दनाक मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल होकर जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे थे, जिनकी चीखें आज भी हवा में गूंजती महसूस होती हैं। उस काले दिन की भयावह घटना आज भी लोगों के जहन में बिल्कुल ताजा है, मानो कल की ही बात हो, और यही वह मुख्य वजह है कि काशीपुर के चैती मेले में भी उसी तरह की किसी अनहोनी या तकनीकी विफलता की आशंका लोगों को अंदर ही अंदर परेशान और भयभीत कर रही है। जागरूक लोगों का स्पष्ट तौर पर कहना है कि जब देश के इतने बड़े, प्रतिष्ठित और अति-सुरक्षित माने जाने वाले मेले में इतनी बड़ी और जानलेवा लापरवाही हो सकती है, तो किसी भी अन्य क्षेत्रीय मेले में, जहाँ संसाधन और निगरानी अक्सर कम होती है, इसे नजरअंदाज करना आत्मघाती साबित हो सकता है। इस भीषण घटना ने झूलों की सुरक्षा व्यवस्था, उनके नियमित रखरखाव और निरीक्षण प्रक्रिया की गंभीर खामियों, भ्रष्टाचार और ढिलाई को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है, जिसके चलते अब हर विवेकशील व्यक्ति यह सुनिश्चित करना चाहता है कि जिस झूले पर वह या उसके मासूम बच्चे बैठें, वह तकनीकी रूप से पूरी तरह सुरक्षित, प्रमाणित और दोषमुक्त हो और उसमें किसी भी प्रकार की छोटी-मोटी तकनीकी खराबी की कोई गुंजाइश न हो।

स्थानीय निवासियों और मेले में उत्साहपूर्वक आने वाले लोगों के बीच विभिन्न स्तरों पर बातचीत करने पर यह कड़वा सच बहुत साफ तौर पर और बार-बार महसूस होता है कि इस बार उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता केवल मनोरंजन या आनंद नहीं, बल्कि अपनी और अपने परिवार की जान की सुरक्षा है। अभिभावक, खास तौर पर छोटे बच्चों को लेकर, पहले से कहीं अधिक सतर्क, डरे हुए और चौकन्ने दिखाई दे रहे हैं और कोई भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं। उनका स्पष्ट और दृढ़ मत है कि जब तक मेला प्रशासन की ओर से झूलों की गहन फिटनेस जांच, स्ट्रक्चरल टेस्टिंग और तकनीकी निरीक्षण की विस्तृत रिपोर्ट और प्रमाणपत्र सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं किए जाते, तब तक वे अपने बच्चों को इन ऊँचे और तेज रफ्तार झूलों में बैठाने से पूरी तरह हिचकिचाएंगे, चाहे बच्चे कितनी भी जिद्द क्यों न करें। कई जागरूक नागरिकों ने तो यह भी कड़े शब्दों में कहा है कि अब केवल मौखिक आश्वासनों या प्रशासनिक दावों से काम नहीं चलेगा, बल्कि हर झूले के प्रवेश द्वार के पास उसके अद्यतन फिटनेस सर्टिफिकेट और विस्तृत निरीक्षण रिपोर्ट को हिंदी और अंग्रेजी में अनिवार्य रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए, ताकि आम जनता खुद अपनी आँखों से देख सके और संतुष्ट हो सके कि झूला पूरी तरह से सुरक्षित है या नहीं। इस तरह की उठती हुई मांगें यह स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि लोग अब अपने अधिकारों और सुरक्षा के प्रति पूरी तरह से जागरूक हो चुके हैं और जानलेवा लापरवाही के मामले में प्रशासन या झूला संचालकों को कोई भी छूट या जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं हैं।

ऊँचे-ऊँचे झूले किसी भी मेले की निर्विवाद पहचान और उसकी रौनक होते हैं और चैती मेले जैसे ऐतिहासिक आयोजन में तो इनका सांस्कृतिक और मनोरंजन की दृष्टि से विशेष महत्व माना जाता रहा है। आसमान को छूते ऊँचे-ऊँचे झूले, उनकी तेज और रोमांचक रफ्तार, और चारों ओर लगी आकर्षक रंगीन लाइटिंग के साथ वे लोगों को, खास तौर पर युवाओं और बच्चों को, दूर से ही अपनी ओर खींचते हैं, मानो कोई जादुई आकर्षण हो। लेकिन, इनकी अपार लोकप्रियता के साथ-साथ इनके साथ जुड़े अंतर्निहित जोखिम, तकनीकी खामियों और मानवीय भूलों की संभावना को किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जो पल भर में उत्सव को मातम में बदल सकती है। तकनीकी विशेषज्ञों और सुरक्षा इंजीनियरों का भी यही दृढ़ मानना है कि बड़े मैकेनिकल झूलों की नियमित, गहन फिटनेस जांच और विशेषज्ञ तकनीकी निरीक्षण बेहद जरूरी है, क्योंकि इनमें कई तरह की जटिल मशीनरी, भारी धातु के स्ट्रक्चर, गियर्स, हाइड्रोलिक्स और मैकेनिकल पार्ट्स का इस्तेमाल होता है जो लगातार तनाव और घर्षण में रहते हैं। यदि इनमें से किसी एक छोटे से हिस्से, नट-बोल्ट या वेल्डिंग में भी खराबी आ जाए या धातु थकान (metal fatigue) हो जाए, तो एक बड़ा और भयावह हादसा हो सकता है। इसलिए यह परम आवश्यक है कि हर झूले की समय-समय पर, मेले से पहले और मेले के दौरान भी, गहन जांच की जाए, उसके सभी महत्वपूर्ण हिस्सों को आधुनिक उपकरणों से परखा जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि वह पूरी तरह दोषमुक्त और सुरक्षित है। यही ठोस वजह है कि इस बार मेले में झूलों की फिटनेस जांच और तकनीकी निरीक्षण को सबसे महत्वपूर्ण, संवेदनशील और गैर-समझौतावादी मुद्दा माना जा रहा है।

चैती मेले का ख़ौफ़: जब झूले भी बन गए दहशत का प्रतीक(प्रतीकात्मक चित्र)

मौजूदा तनावपूर्ण माहौल और बढ़ती जन-जागरूकता के बीच झूला संचालकों के लिए भी यह समय अत्यंत चुनौतीपूर्ण और परीक्षा की घड़ी साबित हो रहा है। एक ओर उन्हें अपने व्यवसाय को चलाना है, भारी निवेश की भरपाई करनी है और मुनाफा कमाना है, तो दूसरी ओर लोगों के खोए हुए विश्वास को फिर से बहाल करना और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उनके अस्तित्व के लिए उतना ही जरूरी है। कई जिम्मेदार झूला संचालकों का दबी जुबान में कहना है कि वे खुद भी चाहते हैं कि उनके झूले तकनीकी रूप से पूरी तरह सुरक्षित हों क्योंकि एक भी हादसा उनके पूरे करियर और निवेश को बर्बाद कर सकता है, और इसके लिए वे प्रशासन द्वारा तय किए गए सभी कड़े मानकों और दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उनका दृढ़ता से कहना है कि यदि तकनीकी जांच के दौरान किसी भी झूले में थोड़ी भी कमी, जंग या खराबी पाई जाती है, तो उसे तुरंत बिना किसी देरी के ठीक किया जाना चाहिए या फिर उसे मेले के अंत तक बंद कर देना चाहिए। उनका यह भी दृढ़ विश्वास है कि यदि सुरक्षा मानकों का कड़ाई से और ईमानदारी से पालन किया जाए, तो न केवल भयावह हादसों को रोका जा सकता है, बल्कि लोगों का डगमगाया हुआ भरोसा भी वापस जीता जा सकता है और मेले की रौनक बरकरार रखी जा सकती है। इस प्रकार, झूला संचालकों की जिम्मेदारी और नैतिकता भी इस पूरे मामले में बेहद अहम और निर्णायक हो जाती है।

जनता के भारी दबाव, बढ़ती आशंकाओं और सूरजकुंड हादसे की भयावहता को देखते हुए काशीपुर प्रशासन की ओर से भी इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर काफी गंभीरता और सतर्कता दिखाई जा रही है, जो एक सकारात्मक संकेत है। मेला अधिकारी और उपजिलाधिकारी (एसडीएम) अभय प्रताप सिंह ने इस संबंध में अपनी दृढ़ प्रतिबद्धता को स्पष्ट करते हुए कहा है कि मेले में लगाए गए सभी छोटे-बड़े झूलों की गहन तकनीकी जांच अनिवार्य रूप से कराई जा रही है और इसमें कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी। उन्होंने यह भी कड़े शब्दों में कहा कि बिना वैध और अद्यतन फिटनेस प्रमाणपत्र के किसी भी झूले को एक पल के लिए भी संचालित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, चाहे संचालक कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो। इसके अलावा, प्रशासन द्वारा लोक निर्माण विभाग (पीब्ल्यूडी) और अन्य तकनीकी विभागों के विशेषज्ञों की एक विशेष टीम गठित की गई है जो हर झूले की बारीकी से जांच कर रही है, जिसमें उसके पूरे लोहे के स्ट्रक्चर, मशीनरी, गियर्स, बैलेंसिंग सिस्टम, बिजली के कनेक्शन और आपातकालीन संचालन प्रणाली को गहनता से परखा जा रहा है। प्रशासन का दृढ़ता से कहना है कि इस बार किसी भी प्रकार की लापरवाही, भ्रष्टाचार या ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी और सुरक्षा मानकों के साथ कोई भी समझौता नहीं किया जाएगा, क्योंकि जनता की जान अनमोल है। इस तरह के कड़े कदम और प्रशासनिक सख्ती यह दर्शाते हैं कि प्रशासन इस मुद्दे की संवेदनशीलता को लेकर पूरी तरह सतर्क है।

मेले में सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक पुख्ता, अभेद्य और विश्वसनीय बनाने के लिए प्रशासन द्वारा विशेष निगरानी टीमों और टास्क फ़ोर्स का गठन किया गया है, जो लगातार 24 घंटे झूलों के संचालन, उनकी तकनीकी स्थिति और अन्य भीड़भाड़ वाली गतिविधियों पर कड़ी नजर रख रही हैं। इन टीमों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि यदि किसी भी झूले के संचालन के दौरान कोई भी तकनीकी समस्या, असामान्य आवाज या कंपन नजर आता है, तो तुरंत उसका संचालन रोककर कड़ी कार्रवाई की जाए और उसे ठीक कराए बिना दोबारा शुरू न होने दिया जाए। इसके अलावा, किसी भी संभावित आपातकालीन स्थिति या हादसे से त्वरित गति से निपटने के लिए मेले परिसर में ही अत्याधुनिक मेडिकल टीम, कई एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और अन्य आवश्यक जीवन रक्षक सुविधाओं की भी पुख्ता व्यवस्था की गई है। प्रशासन का दृढ़ता से कहना है कि उनका मुख्य और एकमात्र उद्देश्य चैती मेले में आने वाले हर एक श्रद्धालु और पर्यटक की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करना है और इसके लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। इस प्रकार की व्यवस्थाएं और कड़े सुरक्षा उपाय लोगों के मन में भरोसा और विश्वास जगाने का काम कर सकती हैं, बशर्ते इन्हें पूरी ईमानदारी, पारदर्शिता और बिना किसी भेदभाव के कड़ाई से लागू किया जाए।

सूरजकुंड में हुए उस भयानक और जानलेवा हादसे ने यह पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा के मामले में किसी भी स्तर पर बरती गई छोटी सी लापरवाही या ढिलाई कितनी भारी पड़ सकती है और कैसे खुशियों को मातम में बदल सकती है। यही ठोस कारण है कि अब काशीपुर के चैती मेले में आने वाले लोग केवल मनोरंजन या आनंद के बारे में नहीं सोच रहे, बल्कि हर पहलू, खास तौर पर सुरक्षा और रखरखाव को ध्यान में रखकर ही कोई निर्णय ले रहे हैं और अनावश्यक जोखिम लेने से बच रहे हैं। खासकर मासूम बच्चों के मामले में, अभिभावक अब कोई भी, यहाँ तक कि 1 प्रतिशत का भी जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि बच्चों की जान से बढ़कर कुछ नहीं है। उनका दृढ़ और स्पष्ट मत है कि जब तक उन्हें अपनी आँखों से पूरा यह भरोसा नहीं हो जाता कि झूले तकनीकी रूप से पूरी तरह सुरक्षित, प्रमाणित और विशेषज्ञ द्वारा जांचे गए हैं, तब तक वे अपने बच्चों को उसमें किसी भी कीमत पर नहीं बैठाएंगे। इस तरह की सोच समाज में बढ़ती शिक्षा, जागरूकता और अधिकारों के प्रति सजगता को दर्शाती है और यह भी स्पष्ट संकेत देती है कि अब प्रशासन को पहले से कहीं अधिक जिम्मेदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही निभानी होगी, केवल खानापूर्ति से काम नहीं चलेगा।

चैती मेला काशीपुर की अमूल्य सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर है और इसे सुरक्षित, सफल और निर्विघ्न बनाना न केवल प्रशासन, बल्कि झूला संचालकों और आम जनता की भी सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि इस बार प्रशासन के कड़े रुख और बढ़ती जन-जागरूकता के कारण झूलों की फिटनेस जांच और तकनीकी निरीक्षण को सही तरीके से, पूरी पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ कड़ाई से लागू किया जाता है, तो यह न केवल इस मेले के लिए बल्कि भविष्य के सभी मेलों और आयोजनों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन सकता है। इससे लोगों का प्रशासनिक व्यवस्था पर भरोसा भी मजबूत होगा और वे बिना किसी डर या आशंका के मेले का आनंद ले सकेंगे, जिससे मेले की साख बढ़ेगी। अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि इस बार का चैती मेला केवल धार्मिक उत्सव का ही नहीं, बल्कि बढ़ती सामाजिक सुरक्षा और जन-जागरूकता का भी एक बड़ा प्रतीक बन सकता है, जहाँ हर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी और सतर्कता मिलकर एक सुरक्षित, सफल और आनंदमयी आयोजन को सुनिश्चित करेगी।

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