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तीर्थ मार्ग पर हरियाली का कत्लेआम सैकड़ों पेड़ कटे, पर्यावरण और श्रद्धालुओं की आस्था आहत

भीमगोडा से हर की पौड़ी जाने वाले तीर्थ मार्ग पर सैकड़ों हरे भरे पेड़ों की कटाई से मचा हड़कंप, रेलवे ने वन विभाग की अनुमति का दिया हवाला, लेकिन उसी स्थान पर वृक्षारोपण न होने से पर्यावरण प्रेमियों और श्रद्धालुओं में बढ़ी चिंता।

हरिद्वार। तीर्थ नगरी हरिद्वार, जिसे गंगा की पावन धारा, धार्मिक आस्था और प्राकृतिक सुंदरता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है, इन दिनों एक ऐसे घटनाक्रम के कारण चर्चा में है जिसने पर्यावरण प्रेमियों और श्रद्धालुओं दोनों को चिंतित कर दिया है। गंगा किनारे बसा यह प्राचीन शहर केवल मंदिरों और घाटों के कारण ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहां की हरियाली और शुद्ध वातावरण भी इसकी पहचान का अहम हिस्सा रहा है। वर्षों से भीमगोडा कुंड से हर की पौड़ी तक जाने वाला मार्ग सैकड़ों हरे-भरे वृक्षों की छाया से ढका रहता था, जिससे यहां से गुजरने वाले श्रद्धालुओं को गर्मी और धूप से काफी राहत मिलती थी। लेकिन हाल ही में सामने आए एक दृश्य ने लोगों को हैरान कर दिया, जब इस मार्ग पर खड़े बड़े-बड़े वृक्षों को काटने का काम शुरू कर दिया गया। जैसे ही पेड़ों पर आरी चलने की आवाज गूंजने लगी और एक-एक कर कई पेड़ जमीन पर गिरते नजर आए, वहां मौजूद लोगों के मन में कई सवाल उठने लगे। स्थानीय नागरिकों के साथ-साथ तीर्थ यात्रियों ने भी इस घटना को बेहद दुखद बताया और कहा कि जिन वृक्षों ने दशकों तक यात्रियों को छाया और सुकून दिया, उन्हें इस तरह अचानक काट देना पर्यावरण और आस्था दोनों के साथ अन्याय जैसा प्रतीत होता है।

भीमगोडा से हर की पौड़ी तक जाने वाला मार्ग हरिद्वार की धार्मिक यात्रा का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु इसी रास्ते से गुजरते हुए गंगा स्नान के लिए हर की पौड़ी पहुंचते हैं। सुबह की पहली किरण से लेकर देर रात तक इस मार्ग पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। गर्मियों के मौसम में जब तापमान काफी अधिक हो जाता है, तब सड़क किनारे खड़े विशाल वृक्ष यात्रियों को राहत प्रदान करते थे। कई बुजुर्ग श्रद्धालु बताते हैं कि वर्षों से वे इस रास्ते से गंगा स्नान के लिए आते रहे हैं और इन वृक्षों की छाया उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं थी। लेकिन जिस दिन इन पेड़ों को काटने की प्रक्रिया शुरू हुई, उस दिन का दृश्य बेहद विचलित करने वाला था। देखते ही देखते कई बड़े पेड़ जमीन पर गिरा दिए गए और कुछ ही घंटों में वह मार्ग, जो पहले हरे-भरे वृक्षों से आच्छादित रहता था, सूना और उजाड़ सा दिखाई देने लगा। यह दृश्य देखकर स्थानीय लोग और श्रद्धालु दोनों ही स्तब्ध रह गए। कई लोगों ने कहा कि जिस स्थान की पहचान ही प्राकृतिक सौंदर्य और हरियाली से रही हो, वहां इस तरह पेड़ों का कटान होना बेहद चिंताजनक है और इसके दूरगामी परिणाम सामने आ सकते हैं।

घटना स्थल पर मौजूद लोगों ने जब पेड़ों को काट रहे श्रमिकों और वहां मौजूद ठेकेदार से इस विषय में जानकारी लेने की कोशिश की तो उन्होंने बताया कि यह काम किसी निजी निर्णय के तहत नहीं बल्कि सरकारी आदेश के आधार पर किया जा रहा है। ठेकेदार ने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें रेलवे विभाग से अनुमति प्राप्त हुई है और उसी के निर्देश पर यह कार्य किया जा रहा है। यह सुनकर वहां मौजूद लोगों की जिज्ञासा और भी बढ़ गई, क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर वृक्षों को काटना सामान्य प्रक्रिया नहीं माना जाता। कई लोगों ने सवाल उठाया कि यदि यह निर्णय रेलवे विभाग द्वारा लिया गया है तो क्या इसके पर्यावरणीय प्रभावों का सही आकलन किया गया था या नहीं। कुछ श्रद्धालुओं का कहना था कि तीर्थ नगरी जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी प्रकार का निर्माण या बदलाव करते समय पर्यावरण और धार्मिक भावनाओं दोनों का ध्यान रखना जरूरी होता है। ऐसे में यदि सैकड़ों वृक्षों को काटा जा रहा है तो इसके पीछे का कारण स्पष्ट होना चाहिए ताकि लोगों को यह समझ में आ सके कि आखिर यह कदम क्यों उठाया गया।

इस पूरे मामले को लेकर जब रेलवे विभाग के एक अधिकारी से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि वृक्षों का कटान नियमों के अनुरूप किया जा रहा है और इसके लिए वन विभाग से विधिवत अनुमति प्राप्त की गई है। अधिकारी का कहना था कि किसी भी प्रकार का कार्य शुरू करने से पहले सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी की गई हैं और पर्यावरणीय नियमों का भी ध्यान रखा गया है। उन्होंने यह भी बताया कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए एक पेड़ के बदले दो नए पौधे लगाए जाने की योजना है। हालांकि जब उनसे यह पूछा गया कि क्या यह वृक्षारोपण उसी स्थान पर किया जाएगा जहां से पेड़ों को हटाया गया है, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि नए पौधे इस स्थान पर नहीं बल्कि किसी अन्य जगह लगाए जाएंगे। यही बात अब लोगों के मन में कई नए सवाल खड़े कर रही है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि पेड़ इसी मार्ग पर काटे गए हैं तो नए पौधे भी यहीं लगाए जाने चाहिए ताकि इस क्षेत्र का पर्यावरण संतुलित रह सके।

स्थानीय लोगों का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण केवल कागजों पर योजनाएं बनाने से संभव नहीं है बल्कि इसके लिए जमीनी स्तर पर प्रभावी कदम उठाने जरूरी होते हैं। यदि किसी स्थान से बड़े-बड़े वृक्षों को हटाया जाता है और बदले में पौधे किसी दूसरे क्षेत्र में लगाए जाते हैं, तो उस स्थान का स्थानीय तापमान और पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित होना तय है। भीमगोडा से हर की पौड़ी तक का मार्ग पहले ही तीर्थ यात्रियों की भारी भीड़ के कारण काफी व्यस्त रहता है और गर्मियों के दौरान यहां तापमान काफी अधिक हो जाता है। ऐसे में यदि सड़क किनारे खड़े वृक्षों को हटा दिया जाता है तो श्रद्धालुओं को धूप और गर्मी का अधिक सामना करना पड़ेगा। कई पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यदि विकास कार्यों के लिए पेड़ों को हटाना आवश्यक भी हो, तो उसके साथ-साथ उसी स्थान पर नए पौधे लगाने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए ताकि पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भरपाई हो सके।

कोरोना महामारी के दौरान पूरी दुनिया ने जिस तरह ऑक्सीजन की कमी का गंभीर संकट देखा था, उसकी याद आज भी लोगों के मन में ताजा है। उस समय हर व्यक्ति ने पेड़ों के महत्व को गहराई से महसूस किया था और समाज के कई वर्गों ने अधिक से अधिक वृक्ष लगाने का संकल्प भी लिया था। अस्पतालों के बाहर ऑक्सीजन के लिए संघर्ष करते लोगों की तस्वीरें आज भी यह याद दिलाती हैं कि प्रकृति के संसाधन कितने महत्वपूर्ण हैं। उस कठिन समय के बाद कई संगठनों और सामाजिक संस्थाओं ने बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान भी चलाए थे ताकि पर्यावरण को बेहतर बनाया जा सके। लेकिन अब जब फिर से बड़े-बड़े वृक्षों को काटे जाने की घटनाएं सामने आती हैं, तो लोगों को लगता है कि शायद समाज उस कठिन दौर से मिली सीख को धीरे-धीरे भूलता जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह बिना पर्याप्त योजना के वृक्षों का कटान जारी रहा तो आने वाले समय में शहरों का तापमान और अधिक बढ़ सकता है और इसका सीधा प्रभाव मानव जीवन पर पड़ेगा।

भीमगोडा से हर की पौड़ी तक का मार्ग हरिद्वार के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक मार्गों में से एक माना जाता है। देश के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालु इसी रास्ते से गुजरते हुए गंगा के पवित्र जल में स्नान करने पहुंचते हैं। पहले इस मार्ग पर खड़े घने वृक्ष यात्रियों को न केवल छाया देते थे बल्कि वातावरण को भी ठंडा बनाए रखते थे। लेकिन अब जब इन वृक्षों का बड़ा हिस्सा काट दिया गया है, तो लोगों को चिंता है कि आने वाले दिनों में यहां का तापमान अधिक बढ़ सकता है और श्रद्धालुओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि यदि मार्ग पर छाया कम हो जाएगी तो गर्मियों में यात्रियों की आवाजाही भी प्रभावित हो सकती है, जिससे व्यापार पर भी असर पड़ेगा।

इस घटना के बाद स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण से जुड़े लोगों ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है। उनका कहना है कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि आखिर कितने पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई थी और वास्तव में कितने वृक्ष हटाए गए हैं। साथ ही यह भी जांच की जानी चाहिए कि क्या यह निर्णय वास्तव में आवश्यक था या इसे किसी अन्य तरीके से टाला जा सकता था। कई लोगों का मानना है कि यदि किसी विकास परियोजना के लिए पेड़ों को हटाना अनिवार्य हो, तो उसके साथ-साथ उसी स्थान पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाना चाहिए ताकि पर्यावरण संतुलन बना रहे।

तीर्थ नगरी हरिद्वार केवल एक शहर नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। यहां की हरियाली और प्राकृतिक वातावरण इस शहर की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। यदि इस शहर की हरियाली को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया गया तो इसका असर केवल पर्यावरण पर ही नहीं बल्कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की भावनाओं पर भी पड़ेगा। यही कारण है कि स्थानीय लोग और पर्यावरण से जुड़े संगठन प्रशासन से यह अपेक्षा कर रहे हैं कि इस मामले को गंभीरता से लिया जाए और यदि किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी हुई है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए।

अंततः यह पूरा प्रकरण एक महत्वपूर्ण सवाल सामने रखता है कि क्या विकास के नाम पर हरियाली का बलिदान देना उचित है। आधुनिक सुविधाओं और बुनियादी ढांचे के निर्माण की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन यदि इन कार्यों के कारण प्रकृति को गंभीर नुकसान पहुंचता है तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव समाज पर ही पड़ेगा। हरिद्वार जैसी पवित्र नगरी में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद आवश्यक है। अब सभी की नजर प्रशासन और संबंधित विभागों पर है कि वे इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और किस प्रकार यह सुनिश्चित करते हैं कि भविष्य में विकास कार्यों के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी समान महत्व दिया जाए।

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