काशीपुर। नगर में आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आज आयोजित विराट हिंदू सम्मेलन ने पूरे शहर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। रामनगर रोड स्थित श्री रामलीला मैदान में आयोजित इस अंतिम विशाल सम्मेलन में हजारों नागरिकों ने भाग लिया। इस अवसर पर उत्तराखंड प्रान्त के सह प्रान्त प्रचारक चंद्रशेखर और संस्कृत प्रवक्ता सरिता सक्सेना सहित कई विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे। मुख्य अतिथि महामंडलेश्वर दिनेशानंद भारती ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि यह कार्यक्रम संघ की स्थापना के उद्देश्यों का पुनर्मूल्यांकन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह सम्मेलन केवल आयोजन का नाम नहीं बल्कि समाज में जागरूकता फैलाने, सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों को मजबूत करने और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का प्रयास है। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक भारत अखंड राष्ट्र के रूप में स्थापित नहीं होता और पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं अफगानिस्तान को मिलाकर एक अखंड भारत का स्वरूप विश्व मानचित्र पर नहीं दिखता, तब तक यह प्रयास निरंतर जारी रहेगा। उन्होंने यह भी बताया कि संघ का उद्देश्य समाज में एकजुटता, जागृति और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करना है और यह प्रयास हमेशा चलता रहेगा।
विराट हिंदू सम्मेलन में अपने संबोधन के दौरान संस्कृत प्रवक्ता सरिता सक्सेना ने कहा कि जब हम समाज और राष्ट्र की उन्नति की बात करते हैं, तो उसकी सबसे महत्वपूर्ण इकाई परिवार होता है। परिवार केवल एक सामाजिक इकाई नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक, नैतिक और आर्थिक समृद्धि का मूल आधार भी है। हमारे समाज की सृजनशीलता, प्रगतिशीलता और समृद्धि का निर्माण परिवार से ही होता है। भारतीय संस्कृति में परिवार व्यवस्था को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने भी बहुत पहले ही वेदों में परिवार की महत्ता को स्पष्ट किया है।
उन्होंने अथर्ववेद का उदाहरण देते हुए कहा कि आदर्श परिवार वह है जिसमें पुत्र अपने पिता का आज्ञाकारी हो, माता के समान संवेदनशील हो, पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति मधुर और सम्मानजनक व्यवहार रखें तथा परिवार के सभी सदस्य परस्पर संतुष्ट और प्रसन्न रहें। ऐसे परिवार में सदैव कल्याण और सौभाग्य का वास होता है। सरिता सक्सेना ने कहा कि आज के आधुनिक और व्यस्त जीवन में, तकनीकी चकाचौंध के कारण लोग परिवार की मूल भावना से दूर होते जा रहे हैं। पहले जहां संयुक्त परिवारों की परंपरा मजबूत थी, वहीं अब धीरे-धीरे एकल परिवार की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। आज की युवा पीढ़ी “हम और हमारे बच्चे” तक ही परिवार की परिभाषा सीमित कर रही है, जिससे सामाजिक और पारिवारिक संबंधों में दूरी बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि परिवार का अर्थ केवल एक ही छत के नीचे रहना नहीं होता, बल्कि एक-दूसरे की भावनाओं को समझना, सम्मान देना और साथ मिलकर जीवन के सुख-दुख को साझा करना ही सच्चे परिवार की पहचान है। अपने संबोधन में उन्होंने भारतीय कुटुंब व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए छह महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर विशेष बल दिया। सबसे पहला सिद्धांत है भाषा। उन्होंने कहा कि हमें अपने परिवार में अपनी मातृभाषा का प्रयोग करना चाहिए। बच्चों को भी मातृभाषा में संवाद करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। अंग्रेजी भाषा सीखना और बोलना प्रगति के लिए आवश्यक हो सकता है, लेकिन अपनी मातृभाषा बोलने में कभी भी शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए। संस्कृत हमारी प्राचीन और समृद्ध भाषा रही है, जिसमें हमारे वेद, शास्त्र और परंपराएं समाहित हैं। यदि हम अपने बच्चों को संस्कृत के श्लोक और मंत्र सिखाते हैं, तो यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर को आगे बढ़ाने का कार्य होगा।
दूसरा सिद्धांत है भूषा, अर्थात वेशभूषा। उन्होंने कहा कि हमें अपनी संस्कृति और परंपरा के अनुरूप ही पहनावा अपनाना चाहिए। भारतीय वेशभूषा हमारी पहचान और गौरव का प्रतीक है। स्वामी विवेकानंद जब विदेश गए तो उन्होंने भारतीय परिधान में ही अपनी संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया और पूरे विश्व ने उनका सम्मान किया। इसलिए हमें अपने देश में अपनी परंपरागत वेशभूषा पहनने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए और अपने बच्चों को भी इसके प्रति गर्व का भाव सिखाना चाहिए। तीसरा सिद्धांत है भजन। उन्होंने कहा कि प्रत्येक परिवार में आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण होना चाहिए। घर में सुबह और शाम भजन, मंत्र या श्लोक का उच्चारण होना चाहिए। इससे बच्चों में नैतिकता, अनुशासन और आध्यात्मिकता के संस्कार विकसित होते हैं। उन्होंने कहा कि गायत्री मंत्र जैसे पवित्र मंत्रों का ज्ञान हर बच्चे को होना चाहिए, क्योंकि इससे “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना वास्तविक रूप में साकार हो सकती है।
चौथा सिद्धांत है भ्रमण। उन्होंने कहा कि परिवार को वर्ष में कम से कम एक बार ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों का भ्रमण अवश्य करना चाहिए। इससे बच्चों को अपने देश की महान विरासत, मंदिरों, प्राचीन स्थापत्य कला और महान व्यक्तित्वों के बारे में जानने का अवसर मिलता है। जब हम अपनी संस्कृति और इतिहास को करीब से देखते हैं, तो स्वाभाविक रूप से गर्व की भावना उत्पन्न होती है। पांचवां सिद्धांत है भोजन। उन्होंने कहा कि आज की व्यस्त जीवनशैली में लोग एक साथ बैठकर भोजन करने की परंपरा को भूलते जा रहे हैं। मोबाइल और तकनीक ने लोगों को एक-दूसरे से दूर कर दिया है। कम से कम दिन में एक समय ऐसा होना चाहिए जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर भोजन करे और आपस में बातचीत करे। इससे परिवार के सदस्यों के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत होते हैं। छठे और महत्वपूर्ण विषय के रूप में उन्होंने मोबाइल और तकनीक के संतुलित उपयोग पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मोबाइल आज के समय में आवश्यक साधन है और इसके माध्यम से हमें कई सुविधाएं और प्रगति के अवसर मिलते हैं। लेकिन यदि इसका अत्यधिक उपयोग किया जाए तो यह परिवारों के बीच दूरी पैदा कर सकता है। आज कई लोग अपने ही परिवार के बीच रहते हुए भी मोबाइल में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें अपने बच्चों और परिवार की गतिविधियों का ध्यान नहीं रहता।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सोशल मीडिया और मोबाइल गेम्स के कारण बच्चे और युवा धीरे-धीरे वास्तविक जीवन से दूर होते जा रहे हैं। इसलिए आवश्यक है कि परिवार में मोबाइल और सोशल मीडिया के उपयोग के लिए एक संतुलित समय निर्धारित किया जाए, ताकि बच्चों का ध्यान शिक्षा, संस्कार और परिवार की ओर बना रहे। अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने कहा कि यदि हम अपनी भाषा, वेशभूषा, भक्ति, भ्रमण, भोजन और पारिवारिक संवाद जैसी छोटी-छोटी परंपराओं को जीवन में अपनाएं, तो भारतीय परिवार व्यवस्था को फिर से सशक्त बनाया जा सकता है। तकनीक का उपयोग प्रगति के लिए होना चाहिए, लेकिन परिवार और संस्कृति से दूरी बनाने के लिए नहीं। उन्होंने कहा कि मजबूत परिवार ही मजबूत समाज और मजबूत राष्ट्र की नींव होते हैं, इसलिए हम सभी का कर्तव्य है कि भारतीय कुटुंब व्यवस्था को सहेजते हुए आने वाली पीढ़ियों को संस्कार, संस्कृति और एकता की सीख दें।
महामंडलेश्वर ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि संघ ने जिन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्थापना की थी, उनका मूल्यांकन करना और उनकी दिशा में सुधार करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन उन उद्देश्यों का एक पुनरावलोकन है और समाज को यह समझाने का भी प्रयास है कि हमने अब तक कितनी सफलता प्राप्त की और आगे क्या किया जाना चाहिए। उनके अनुसार यह केवल संगठन का काम नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह समाज, संस्कृति और धर्म की सेवा में योगदान दे। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू समाज का प्रत्येक सदस्य यह सुनिश्चित करे कि उसकी संख्या और उसकी संतानों की संख्या समाज और राष्ट्र के हित में बढ़े।
महामंडलेश्वर दिनेशानंद भारती ने हिंदू समाज में जनसंख्या वृद्धि की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि इतिहास में हमारे पूर्वजों ने बड़े परिवार बनाए और समाज के निर्माण में योगदान दिया। उन्होंने बताया कि सागर के सात हजार पुत्र, सौ कौरव, पांच पांडव और भगवान श्री राम के चार भाई हमारे पूर्वजों के समय में थे। वहीं, भगवान श्री कृष्णा अपनी माता के आठवें पुत्र थे। उनका कहना था कि यह साबित करता है कि हिंदू समाज में संतान का होना केवल परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि देश में बच्चों की संख्या घटती रही, तो भविष्य में देश की सीमाओं की रक्षा, सेना की क्षमता और समाज की उन्नति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने उपस्थित लोगों से अपील की कि घर में जिम्मेदारी निभाने वाला चार संतान पैदा करे, समाज में सम्मान पाने वाला पांच संतान पैदा करे और समाज में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति बनाए रखने वाला छह संतान पैदा करे।
महामंडलेश्वर ने कहा कि बच्चों का होना केवल माता-पिता का मामला नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण का आधार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के समय में समाज, संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए संख्या बल अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने भाषण में उदाहरण और दोहे साझा किए, जैसे कि “चार लट का चौधरी, पांच लट का पंच, छह लट का बापू तंत्र”, जो दर्शाता है कि जिम्मेदारी और सम्मान के अनुसार बच्चों की संख्या निर्धारित करनी चाहिए। उनका मानना था कि हर हिंदू परिवार को कम से कम चार से छह संताने पैदा करनी चाहिए ताकि समाज में स्थायित्व और सम्मान बना रहे।
महामंडलेश्वर ने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां वृद्धों की संख्या बढ़ गई और कामकाजी जनसंख्या घट गई है। उन्होंने इसे इस तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया कि यदि बच्चों की संख्या पर्याप्त नहीं रही, तो समाज में असंतुलन पैदा होगा। उन्होंने कहा कि भारत में भी यही दृष्टि अपनाना आवश्यक है ताकि समाज और राष्ट्र का संतुलन बना रहे। उन्होंने कहा कि हमारे बुजुर्गों ने यह सिद्धांत दिया था कि चार, पांच और छह संतान वाला परिवार समाज और राष्ट्र दोनों के निर्माण में मजबूत आधार देता है। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि चार संतान घर में जिम्मेदारी निभाने के लिए, पांच संतान समाज में सम्मान अर्जित करने के लिए और छह संतान राष्ट्र निर्माण और सांस्कृतिक नेतृत्व के लिए आवश्यक हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ का यह प्रयास केवल संख्या बढ़ाने के लिए नहीं है, बल्कि समाज को जागृत करने, धर्म और संस्कृति की रक्षा करने और बच्चों को चरित्रवान और जिम्मेदार बनाने का है। उन्होंने उपस्थित लोगों से अपील की कि वे यह संदेश अपने परिवारों में फैलाएं। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि माताएँ और परिवार इस दिशा में योगदान करेंगे, तो देश में भगत सिंह, विवेकानंद और अन्य महान व्यक्तित्व जन्म लेंगे। उन्होंने कहा कि यह केवल बच्चों की संख्या का विषय नहीं है, बल्कि समाज, संस्कृति और धर्म की सुरक्षा का विषय है।
महामंडलेश्वर दिनेशानंद भारती ने पिछले सौ वर्षों में संघ द्वारा किए गए कार्यों का पुनरावलोकन करते हुए कहा कि राजनीतिक क्षेत्र में हिंदू समाज काफी जागृत हो चुका है, लेकिन सांस्कृतिक और धार्मिक जागृति अभी अधूरी है। उन्होंने कहा कि समाज के युवाओं और युवतियों का सही प्रशिक्षण, माता-पिता की जिम्मेदारी और समाज में बच्चों का प्रभावशाली योगदान अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बच्चों की संख्या और उनके संस्कार पर ध्यान देना अनिवार्य है। उनका मानना था कि धर्म और संस्कृति की सेवा तभी संभव है जब हर परिवार अपने बच्चों को सही संस्कार दे, उन्हें चरित्रवान बनाए और राष्ट्र निर्माण में योगदान करने के लिए प्रेरित करे।
महामंडलेश्वर ने कहा कि लोकतंत्र में संख्या बल ही निर्णायक भूमिका निभाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विद्वता, बाहुबल या धनबल से अधिक महत्वपूर्ण है कि समाज में संख्या बल पर्याप्त हो। यदि हिंदू समाज के सांसद, पार्षद और मेयर चुने जाने हैं, तो समाज और परिवार में संख्या बढ़ाना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि माता-पिता को अपने बच्चों की संख्या और संस्कार पर ध्यान देना होगा ताकि समाज, संस्कृति और धर्म की सेवा संभव हो सके। उन्होंने जोर देकर कहा कि चार से छह संतान वाला परिवार समाज में स्थायित्व, सम्मान और प्रभाव बढ़ाता है।
सम्मेलन का समापन उत्साहपूर्ण हुआ। उपस्थित जनसमूह ने जोरदार जय हिंद और भारत माता की जय के उद्घोष से अपना समर्थन व्यक्त किया। महामंडलेश्वर ने उपस्थित लोगों से अपील की कि वे इस संदेश को अपनाएं और अपने परिवारों में अधिक संतान पैदा करने की दिशा में कदम बढ़ाएं। उनका मानना था कि धर्म की सेवा, सांस्कृतिक जागृति और राष्ट्र निर्माण तभी साकार होगा जब प्रत्येक हिंदू परिवार इस दिशा में योगदान देगा। उन्होंने कहा कि लड़का हो या लड़की, संतान का होना अनिवार्य है, और इससे समाज और राष्ट्र दोनों की स्थायित्व और उन्नति सुनिश्चित होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि माताओं और परिवारों को अपने बच्चों को सही संस्कार देना चाहिए, ताकि वे समाज और देश के लिए जिम्मेदार नागरिक बनें। इस सम्मेलन ने उपस्थित लोगों को प्रेरित किया कि वे अपने परिवार और समाज में इस विचार को लागू करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत और जागृत हिंदू राष्ट्र के निर्माण में योगदान दें।





