काशीपुर। उत्तराखंड की समान नागरिक संहिता को लागू हुए एक वर्ष बीत चुका है और अब यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि इस कानून ने समाज के कोने‑कोने में एक नई सोच और बदलाव की दिशा प्रारंभ कर दी है। नगर निगम में आयोजित कार्यक्रम के एक वर्ष पूरे होने पर उपनिबंधक अंकित खर्कवाल ने इसकी उपलब्धियों और फायदों के बारे में बताया कि इस संहिता का उद्देश्य सिर्फ़ कागज़ों पर एक नया कानून लागू करना नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा सामाजिक ढांचा तैयार करना था जो धर्म, जाति या समुदाय की परवाह किए बिना हर नागरिक को समान अधिकार और समान सुरक्षा प्रदान करे। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड समान नागरिक संहिता कानून अपने मूल उद्देश्य में इसीलिए अनूठा और समय की मांग है, क्योंकि यह सामाजिक संबद्धता को बढ़ाता है, विशेषकर उन मामलों में जहाँ पारिवारिक और निजी मामलों में असमानता देखने को मिलती थी। अंकित खर्कवाल का मानना है कि इस कानून की क्रियान्वयन प्रक्रिया में हर नागरिक को कानूनी दृष्टिकोण से समान अधिकार मिले, यह इसके सबसे बड़े फायदों में से एक है।
उपनिबंधक अंकित खर्कवाल बताते हैं कि सामान्य सामाजिक जीवन में समान नागरिक संहिता के लाभों का असर तब और स्पष्ट रूप से दिखने लगा, जब इसने लैंगिक समानता को एक नए स्तर पर स्थापित किया। पहले परंपरागत तौर पर बेटा और बेटी के बीच संपत्ति के अधिकार को लेकर भ्रम और असमानता बनी रहती थी, लेकिन यूसीसी लागू होने के बाद अब संहिता स्पष्ट रूप से यह सुनिश्चित करती है कि उत्तराधिकार में बेटा और बेटी दोनों को बराबर का हिस्सा मिले। इस बदलाव को समाज के लिए एक बड़ा कदम बताते हुए अंकित खर्कवाल कहते हैं कि यह न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से समर्थ बनाता है बल्कि सामाजिक स्तर पर भी उनकी भूमिका को सम्मान देता है। महिलाएँ अब घर‑परिवार के निर्णयों में पहले से कहीं अधिक सक्षम और सक्रिय हो रही हैं, और यह बदलाव शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक संरक्षण जैसे क्षेत्रों में भी सकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।
एक अन्य महत्वपूर्ण लाभ को बताते हुये अंकित खर्कवाल बताते हुये कहा कि जो समान नागरिक संहिता से जुड़ा हुआ है, वह कुप्रथाओं पर प्रभावी रोक है। उत्तराखंड में लागू यूसीसी के तहत बहुविवाह (एक से अधिक विवाह) तथा एकतरफा तलाक जैसे हलाला और इद्दत जैसी कुरीतियों पर प्रतिबंध लगाया गया है। अंकित खर्कवाल बताते हैं कि पिछले समय में यह प्रथाएँ कानूनी अंतराल और सामाजिक दमन का कारण बनती थीं, लेकिन अब स्पष्ट कानूनी प्रावधानों के कारण इस प्रकार की असमानताओं और कुरीतियों के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने कहा कि यह रोक केवल कानूनी प्रावधान भर नहीं है, बल्कि यह समाज में एक संदेश दे रही है कि सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार और पारिवारिक मामलों में समानता कायम कराना कितना आवश्यक है। इससे परिवारों में निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में भी सकारात्मक परिवर्तन आया है और हमारे युवा अब स्वस्थ, सम्मानजनक और न्यायपूर्ण पारिवारिक संरचना में विश्वास करने लगे हैं।
अंकित खर्कवाल कहते है कि वहीं विवाह के मामलों में समान नागरिक संहिता के द्वारा किए गए बदलाव भी देखने योग्य है। अब हर विवाह का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है, जिससे विवाह का वैधानिक दस्तावेज जुड़ जाता है। इसका मतलब यह है कि विवाह के लिए अब केवल सामाजिक या धार्मिक मान्यताओं पर निर्भर होना नहीं है, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड में उसका पंजीकरण होना भी अनिवार्य है। अंकित खर्कवाल ने बताया कि इस कदम से न केवल विवाह की वैधता सुनिश्चित हुई है, बल्कि सरकारी योजनाओं, आय‑कर छूट, बीमा सुरक्षा, आवास और स्वास्थ्य सेवाओं में भी पारदर्शिता आने लगी है। कई परिवार ऐसे हैं जहाँ पहले विवाह के दस्तावेज नहीं होने के कारण विवाह से संबंधित अधिकार और सुविधाएँ नहीं मिल पाती थीं, लेकिन अब पंजीकरण के कारण किसी भी नागरिक को उन सुविधाओं से वंचित नहीं रहना पड़ता।
उपनिबंधक अंकित खर्कवाल इसके अलावा, समान नागरिक संहिता ने लिव-इन रिलेशनशिप में सुरक्षा को भी एक सशक्त कानूनी रूप दिया है। इस नए कानून के अनुसार लिव‑इन रिलेशनशिप का भी पंजीकरण अब आवश्यक है, जिससे न सिर्फ़ दोनों वयस्कों को वैधानिक मान्यता प्राप्त होती है बल्कि इससे पैदा होने वाले बच्चों को भी जायज बच्चे के समान अधिकार दिए जाते हैं। अंकित खर्कवाल ने कहा कि यह प्रावधान सामाजिक संरचना में सकारात्मक परिवर्तन ला रहा है, क्योंकि इससे पहले लिव-इन रिलेशनशिप के मामले में बच्चों के हक और संरक्षण को लेकर व्यापक असमंजस और कानूनी विवाद उत्पन्न होते थे। अब जब यह स्पष्ट रूप से पंजीकरण के दायरे में आता है, तो बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, उत्तराधिकार के अधिकार और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने में आ रही बाधाएँ दूर हो जाती हैं।

इस कानून के तहत शादी की न्यूनतम उम्र को भी हर धर्म के लिए 18 वर्ष तय किया गया है, जिससे बाल विवाह जैसी प्रथाओं को रोकने में मदद मिली है। अंकित खर्कवाल ने कहा कि यह प्रबंध केवल कानून का पालन कराने की बात नहीं है, बल्कि यह बच्चों के भविष्य और परिवार के कल्याण को सुनिश्चित करने का एक निर्णायक कदम है। इससे पहले कई सामाजिक संरचनाओं में लड़कियों की शादी की उम्र को लेकर भ्रम और समायोजन की स्थिति बनी रहती थी, लेकिन अब स्पष्ट रूप से यह तय हो चुका है कि लड़कियाँ 18 वर्ष से पहले शादी नहीं कर सकतीं। इसके कारण न केवल शिक्षा में निरंतरता बनी रहती है, बल्कि स्वास्थ्य और आर्थिक विकास की दिशा में भी सकारात्मक परिवर्तन आता है।
गोद लेने के मामलों में उपनिबंधक अंकित खर्कवाल बताते है कि समान नागरिक संहिता की भूमिका भी खास है। अब सभी धर्मों के लोगों के लिए बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष हो गई है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं छिना जाएगा, चाहे वह किसी भी समुदाय, धर्म, जाति या पृष्ठभूमि से संबंधित क्यों न हो। अंकित खर्कवाल कहते हैं कि इससे पहले गोद लेने की प्रक्रियाओं में कई अनावश्यक जटिलताएँ और बाधाएँ थीं, लेकिन अब इसका पारदर्शी रूप समाज में बच्चों के कल्याण को प्राथमिकता देता है। बच्चों को एक सुरक्षित और न्यायपूर्ण परिवेश देने के लिए यह कदम एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि इससे अब बच्चों को केवल सामाजिक सुरक्षा मिलती है, बल्कि उन्हें भविष्य में शिक्षा, स्वास्थ्य और संरक्षकता के सभी अधिकार भी मिलते हैं।
अंकित खर्कवाल बताते है कि समान नागरिक संहिता की प्रमुख उपलब्धियों में से एक यह भी है कि अब विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े निजी कानून एक समान रूप से लागू होते हैं, जिससे कानूनी जटिलताएँ और विवाद कम हुए हैं। अंकित खर्कवाल कहते हैं कि पहले यह मुद्दा अक्सर अदालतों तक पहुँच जाता था और न्याय में देरी, झगड़े तथा अनावश्यक खर्च का कारण बनता था। अब जब यह सब एक समान कानूनी ढांचे में आता है, तो न केवल मामलों का समाधान जल्दी होता है, बल्कि यह पारदर्शिता और बेहतर प्रशासनिक नियंत्रण भी सुनिश्चित करता है। इससे न्यायालयों पर बोझ कम हुआ है, और व्यक्ति-व्यक्ति के बीच के विवाद जल्दी और न्यायपूर्ण तरीके से समाप्त हो रहे हैं।
समाज के कई वर्गों ने समान नागरिक संहिता के इन बदलावों को समाजिक समरसता, पारिवारिक सुरक्षा और महिला सशक्तिकरण का आधार बताया है। अंकित खर्कवाल का कहना है कि यह केवल कानून ही नहीं है बल्कि सामाजिक संरचना को एक नए सिरे से मजबूती प्रदान करने का माध्यम है। उन्होंने यह भी कहा कि कानून का क्रियान्वयन तभी सफल होता है जब समाज उसके आदर्शों और मूल्यों को समझता है और उसे अपनाता है। उत्तराखंड में न्ब्ब् ने विवाह, तलाक, संपत्ति और गोद लेने जैसे मामलों में समानता और नीति की स्पष्टता को बढ़ाया है, जिससे नागरिक अब कानूनी जटिलताओं से बचते हुए अपने अधिकारों का लाभ उठा पा रहे हैं।
अंकित खर्कवाल ने बताते हे कि महिलाओं के सशक्तिकरण के संदर्भ में, समान नागरिक संहिता ने उन बाधाओं को हटाया है जो पहले उनके आगे खड़ी थीं। अब महिलाओं को न सिर्फ़ संपत्ति के समान अधिकार मिले हैं बल्कि पारिवारिक निर्णयों में भी उनका योगदान बढ़ा है। अंकित खर्कवाल यह मानते हैं कि इससे न केवल सामाजिक विश्वास बढ़ा है, बल्कि महिलाओं की आत्म‑सम्मान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी एक मजबूत पहचान मिली है। महिलाएँ अब घर के अर्थ, शिक्षा और स्वास्थ्य की निर्णय प्रक्रियाओं में बराबरी से हिस्सेदारी कर रही हैं, जिससे समाज में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।
नगर निगम के उपनिबंधक अंकित खर्कवाल बताते हैं कि समग्र रूप से देखा जाए तो उत्तराखंड की समान नागरिक संहिता ने पारिवारिक और सामाजिक मामलों में समान अवसर, स्पष्ट कानूनी ढांचा, पारदर्शिता और महिला सशक्तिकरण को एक नई दिशा दी है। अंकित खर्कवाल के अनुसार यह कानून न केवल वर्तमान समाज की समस्याओं का समाधान करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत और न्यायपूर्ण सामाजिक ढांचे की नींव भी रखता है। उपनिबंधक अंकित खर्कवाल कहते है कि ये कहा जा सकता है कि समान नागरिक संहिता ने उत्तराखंड को सामाजिक न्याय, समानता और अधिकारों के नए युग में प्रवेश कराने का कार्य किया है, जिससे नागरिकों को न केवल कानूनी रूप से बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी लाभ मिल रहा है।





